कैमिकल लोचा… हे राम

September 15, 2007 38 comments

व्यंग्य रचनाओं में उस्ताद फुरसतिया को उनके जन्मदिवस पर सप्रेम भेंट.

फ़िस से घर की ओर पैदल जाना होता है.. बीस मिनट की दूरी पैदल चलते पूरी हो जाए तो दो फ़ायदे और एक मजबूरी होती है। एकमात्र मजबूरी यह कि अपनी ऑफ़िशियल औकात के लोग अब कारों में चलते हैं और अपने पास पैसा नहीं तो कार नहीं। दो अनॉफ़िशयल फ़ायदे गिनाकर मैं इस इकलौती मजबूरी को ढांक लेता हूं। पहला फ़ायदा यह कि इससे सेहत बनी रहती है और दूसरा गली-कूचों से निकलते हुए मेरे पत्रकारी मन की संवेदनाओं को बड़ी राहत मिलती है। अपने जागरुक और संवेदनशील होने का भ्रम बना रहता है। यहां से गुज़रते हुए अपने ज़मीनी जुड़ाव के सरोकारवादी दंभ में कभी-कभी इतना चूर हो जाता हूं कि नाली से भी जुड़ाव महसूस करने लगता हूं।

फ़िल्मसिटी से वाया रजनीगंधा चौक होते हुए अपने सेक्टर की ओर पैदल जा रहा था। बीच में एक पुल पड़ता है, जिसके किनारे पसरे अंधेरे से पगडंडी पर चलते हुए जाना होता है। कुछ ही दूर चला था कि एक साया मेरी ओर बढ़ता जा रहा था। दस-बारह मीटर की दूरी बची थी कि अचानक से मेरी नज़र उस साये के चेहरे पर पड़ी. वो किसी दिव्य पुरूष का चेहरा था। पास पहुंचते ही इस दिव्य पुरूष के दर्शन मात्र से मेरे हाथ-पैर ढीले हो गए। चेहरे-मोहरे से जाने-पहचाने से लग रहे थे। समझ नहीं आ रहा था कि कौन हो सकता है यह दिव्य पुरूष। सिर के पीछे प्रकाश की छटा बिखरी थी, माथे पर तिलक और कानों में कुंडल, लंबी नाक और बड़ी आंखे.. रंग सांवला। चेहरे-मोहरे से अपने भगवान राम दिख रहे थे। मैने सोचा कि दशहरे के लिए स्पेशल प्रोग्राम कराने कोई स्टूडियो लेकर आया होगा..खाली टाइम में यहीं घूम रहे होंगे रामलीला वाले ये सज्जन.. लेकिन प्रभामंडल देख हैरानी में पड़ चुका था। मुझे वो अलौलिक लग रहे थे। अंधेरे में चेहरा ही नहीं बल्कि पूरा शरीर शनैः शनैः प्रकाशित हो रहा था…मैंने सोचा कि कहीं लगायी तो नहीं…फिर याद आया कि अरे, अभी घर पहुंचा ही नहीं हूं।

Prabhu Raam

भक्त नैतिक रूप से समर्थवान होना चाहिए जो भगवान से आंखे चार कर सके। मेरी क्या बिसात.. मेरे माथे पर पसीना आने लगा। कुछ पल वो देखते रहे, मैं संभला और पूछा.. “आप मुझे देख रहे हैं?” उस सज्जन ने कहा- “हां पुत्र, तुम कहां जा रहे हो? क्या मेरी सहायता करोगे?”

मैंने हिम्मत कर पूछा.. “आ..आ..आप कौन?”
वो बोले- “मैं राम हूं। अयोध्या का राम।”

इतना सुनते ही मैं मूर्छित होने की कगार पर था कि फौरन संभला और सवाल किया, रा.. रा.. राम.. आप… आप प्रभु श्री राम?
उन्होंने कहा, “हां पुत्र… मैं ही राम हूं।”
इतना कहते ही उनका एक हाथ ऊपर उठा..हथेली खुली और उसमें से मेरी तरफ़ आशीर्वाद की किरण लपकी। ठीक वैसे ही जैसे फ़िल्मों में देखा था। धन्य हुआ मैं.. साक्षात प्रभु मेरे सामने थे। अहा.. मर्यादा पुरूषोत्तम राम वो भी अकेले में.. कई आर्शीवाद, वरदान वगैरह मिलेंगे, यह सोचकर खुश हुआ जा रहा था। सारी दुनिया का ऐश्वर्य मेरी आंखों के सामने तैर रहा था।

“पुत्र, मेरी सहायता करो” प्रभु बोले। मैंने कहा, “हे मर्यादा पुरुषोत्तम, हे दयानिधान, सर्वशक्तिशाली.. मैं तो धन्य हूं आपके दर्शन मात्र से.. किंतु प्रभु.. मैं अदना-सा प्राणी आपकी क्या सहायता करूं?”

“पुत्र, बैकुण्ठधाम में मुझे समाचार मिला था कि मेरे होने ना होने की बात कलयुग में उठ रही है। पृथ्वीलोक के किसी राजा ने मेरे अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगाया है।“

नहीं.. नहीं प्रभु.. राजा ने नहीं रानी ने- मैं तत्क्षण बोला। प्रभु फिर बोले, “हां वही पुत्र.. किंतु मैं विचार कर रहा हूं कि मेरे होने नहीं होने का सवाल कैसे उठता है। क्या कलयुग में प्राणियों ने मेरी शिक्षाएं विस्मृत कर दीं? क्या असुरों का वर्चस्व हो गया?”

“नहीं प्रभु, ऐसे असुर तो इधर इंडिया में दिखते नहीं। हां.. बाहर से इम्पोर्ट होते रहते हैं..यहां की सरकार पकड़ भी ले तो घुमा-फिराकर पुष्पक में बिठाकर बाहर तक एक्सपोर्ट कर आ जाती है। बाक़ियों को छुड़ाने के लिए ह्यूमन राइट्स वाले हैं। किंतु रावण के जिन वशंजों को आपने जीवनदान दिया था, उन्हीं की पुश्तों ने यहां पार्टियां ज्वाइन कर ली हैं। वे ही राजपाट संभाल रहे हैं।“

प्रभु बोले- “पुत्र, जो भी हो। चूंकि, सभी युगों में विविध आचार व्यवहार संहिता होती आई है। इसलिए मैं कलयुग में आकर वर्तमान मानदंडों के अनुरूप आचरण करूंगा। नारद मुनि का कहना था कि किसी न्यायालय में मुझे अपने अस्तित्व को प्रमाणित करने के लिए सशरीर उपस्थित होना पड़ेगा। मुझे वहां ले चलो जहां न्यायालय हो। मैं स्वयं उपस्थित होकर अपने होने का प्रमाण दूंगा पुत्र।“
कहां मैं सांसारिक सुखों को भोगने की प्लानिंग कर रहा था और कहां प्रभु मुझे अदालती चक्कर में फंसाने की बात कर रहे थे। मैं भक्तिभाव की तंद्रा से जागा… सांसारिक अवगुणों से ग्रस्त हूं, इसलिए तुरंत भक्तिरस के कैमिकल लोचे से बाहर आ गया। सबसे बड़ा डर मुझे प्रभु के इस तरह एकाएक पदार्पण पर था। तत्क्षण मेरा दिमाग़ चकराया और मुझे सरकारी हलफ़नामे से लेकर चक्काजाम, ख़ून खराबा, कोर्ट कचहरी, संसदीय जूतम-पैजार, रैली-भाषण, दंगे-फ़साद सब याद आने लगे। ओहहह…

“प्रभु… सरकार से बड़ा कोई नहीं है प्रभु.. सरकार ने कह दिया कि आप नहीं थे तो मानने में क्या हर्ज़ है? मान लो प्रभु.. सरकारों से पंगे लेना विवेकपूर्ण कृत्य नहीं है प्रभु। प्लीस, आप इधर कोने में आइए हे पुरुषोत्तम.. कहीं यूपी पुलिस ने देख लिया तो शामत आ जाएगी। आए दिन एनकाउंटर करते रहते हैं। पता नहीं कब रासुका-वासुका, टाडा-मकोका लगाकर अंदर कर दे। सरकार ने कहीं आपको देख लिया तो राष्ट्रद्रोह का आरोपी बनाकर जेल में ठूंस देगी। प्रभु, आप कोई नेता- अभिनेता तो हो नहीं जो ज़मानत-अमानत करवा लेंगे। आप जगत के सामने सशरीर आ गए तो सरकार की विश्वसनीयता का क्या होगा? सरकार की बेइज़्ज़ती हो जाएगी। हे कौशल्यानंदन…. मेरी मानो कलटी मार देते हैं यहां से..।“

प्रभु बोले, “तो चलो पुत्र.. जहां से आए हो वहीं चलते हैं।“
मैं सकपका गया. तुरंत बोला..”नहीं नहीं प्रभु..जहां से आया वहां फिर क्यों ले जा रहे हो। ड्यूटी पूरी कर चुका हूं। आप ही का नाम लेकर ड्यूटी करता हूं। ‘जितनी तनख्वाह उतना काम, रघुपति राघव राजा राम’… उधर फ़िल्मसिटी है। कई चैनलों के स्टूडियों हैं। अपन वहां पहुंच गए और किसी रिपोर्टर ने देख लिया तो पकड़ लेगा। फिर जो दुदर्शा होगी… ओह। सारा दिन आपसे चमत्कारों के खेल कराएंगे, रामानंद सागर की रामायण के डायलॉग बुलवाएंगे। दर्शकों से फ़ोन पर सीधी बात कराएंगे। इतना ड्रामा जब दिनभर में हो जाएगा तो रात होते-होते पुलिस भी बुला लेंगे और सरेंडर का लाइव टेलीकास्ट करेंगे। दिन में चैनल और फिर रातभर पुलिस। बड़ा बुरा होगा प्रभु, भक्त की अर्ज सुनो और निकल चलिए मेरे साथ..।“

इतने अनुरोध पर भी प्रभु नहीं माने.. कहने लगे, “भक्त.. तो आओ इधर चलते हैं..” और आगे बढ़ने लगे।
मैं उनके चरणों में लपका और कहा- “उधर, कहां जाना है प्रभु, आप मर्यादा पुरूषोत्तम राम हैं। उधर मर्यादित आचरण नहीं होता प्रभु। वो रास्ता दिल्ली को जाता है। जैसे आपकी राजधानी अयोध्या थी, इस कलयुग में भारत (अनुच्छेद एक के अनुसार भारत, जो कि इंडिया है) की राजधानी यही दिल्ली नगरिया है। वहां बहुत सारे राजनीतिक दलों के दफ़्तर हैं। प्रभु चुनाव निकट हैं, आप सशरीर हाथ लग गए तो रैलियां-भाषण करा-कराकर थका देंगे। आपके आने से पहले ही रामानंद की रामायण के कई एक्टरों को ये लोग रोड शो करा चुके हैं। एक बार इन पर तरस खाकर इनका काम कर भी दिया तो अगले चार साल तक ये आप पर तरस नहीं खाएंगे। हे अयोध्या नरेश, आप इस कचाइन में कूदने की चेष्टा क्यों कर रहे हैं।“
प्रभु मेरी प्रार्थना मान गए और मेरे साथ चलने लगे। हम कुछ आगे बढ़े.. नाला करीब था। दिल्ली की सारी गंदगी इसी नाले में बहते हुए नोएडा तक आती है। बदबू से नाक सिकोड़ते हुए प्रभु आगे बढ़ते रहे। नाले पर बने पुल को देखते ही प्रभु बोले, “पुत्र, नल और नील की याद आ गई। उन कुशल वानरों ने इससे सहस्त्र गुना चौड़े सागर के दो पाटों पर सेतु बना दिया था।“

मैं नए संकट में ! जैसे-तैसे प्रभु को फ़्लैशबैक में जाने से रोकता हूं, वो बार-बार त्रेतायुग में चले जाते हैं। जिस सवाल से पुरातात्विक विभाग वाले नहीं पार पा सके, उस सवाल को मेरे जैसा अपुरातात्विक महत्व का प्राणी से कैसे हल कर सकता है। मैंने दोबारा कहा “चलिए आप मेरे साथ”..प्रभु मेरे साथ चल पड़े।

एक रिक्शेवाले को रोका। वो रुककर प्रभु को ग़ौर से देखने लगा। इससे पहले कि वो भी जकड़ता, मैंने फ़ौरन रिक्शेवाले को कहा, “क्या देख रहे हो भाई, हम रामलीला वाले हैं। सेक्टर १५ ले चलो, पंद्रह रुपए देंगे।“ प्रभु को बिठाया आगे और मैं पीछे लटक लिया। रिक्शा घर तक पहुंचा.. शुक्र है, किसी ने ज्यादा देखा-देखी नहीं की..मेरे अनुमान से सभी अपने अपने घरों में भारत-पाकिस्तान के बीच ट्वेंटी-ट्वेंटी विश्वकप का मैच देख रहे थे।

घर पहुंचते ही प्रभु को अपने कमरे तक लेकर आया और हाथ पैर धुलाए। घर में सारी चीज़ें अस्त-व्यस्त पड़ी थीं। प्रभु देखकर मुस्कुराए और कहा, ”तुम अभी तक कुंवारे हो।” मैंने कहा, ”प्रभु आपकी कृपा रही तो आगे नहीं रहूंगा।”

प्रभु को शबरी ने जूठे बेर खिलाए थे। बेर मेरे पास कहां से होते.. फ्रिज खोलकर देखा तो कोला, केक और अगड़म-बगड़म पड़े थे। नीचे देखा .. हां सेब दिखा.. मैने प्रभु को प्रस्तुत किया। अयोध्यानंदन सेब खाने लगे। कृपानिधान किसी का निवेदन ठुकराते नहीं.. मैं प्रभु के चरणों में बैठ गया।

टीवी चालू किया तो चैनल खबरियाने लगे। सरेआम मुंह काला करने की खबर, तोड़-फोड़, रिश्वतखोरी, स्टिंग ऑपरेशन, बलात्कार… प्रभु की आंखे छलछला रही थीं… मैंने टीवी बंद कर दिया..
प्रभु की डबडबायी आंखे.. मेरी ओर उठी..और कहा, “पुत्र, तुमने अच्छा किया जो मुझे बता दिया कि इस स्वार्थी संसार में मेरे जीवनचरित का कोई महत्व नहीं रहा। अब मेरी किसी को आवश्यकता नहीं। ऐसे कलयुग से मेरा युग अच्छा था। राक्षस उस काल में भी थे किंतु उस समय सुर और असुर में अंतर देखते ही समझ आ जाता था। क्या करूंगा इन्हें अपने अस्तित्व का प्रमाण देकर। मुझे वापस जाना होगा.. अपने बैकुण्ठधाम में”
प्रभु के वचन सुनकर मेरी आंखों में आंसू उतर आए.. प्रभु सर्वशक्तिशाली थे। आज अपने को अप्रासंगिक मान रहे हैं। मुझे अपने कलयुगी होने पर शर्म आने लगी।

मैंने प्रभु से कहा, “हे मर्यादा पुरुषोत्तम… आप मेरे मन में बस जाओ.. मन में रहो प्रभु, आप खुद यही कहते आए हो कि मैं तो चाहने वाले के दिल में रहता हूं, भक्तों के हृदय में रहता हूं। मेरे मन में ही रहो प्रभु, सरकार का डर भी नहीं होगा। सरकार खुद कह चुकी है कि लोगों के मन में रहते हैं राम। तो क्यों ना संप्रभुत्वसम्पन्न लोकतांत्रिक कल्याणकारी राज्य में संवैधानिक आचरण करते हुए आप मेरी बात मान ही लो.. हे कौशल्यानंदन, मान लो मेरी बात.. मेरे मन में रहो।“

और प्रभु मान गए। मेरे राम मान गए और मेरे मन में समा गए..

राम हृदय में हैं मेरे, राम ही धडकन में हैं
राम मेरी आत्मा में, राम ही जीवन में हैं
राम हर पल में हैं मेरे, राम हैं हर स्वांस में
राम हर आशा में मेरी, राम ही हर आस में
राम ही तो करुणा में हैं, शान्ति में राम है
राम ही हैं एकता में, प्रगति में राम हैं
राम बस भक्तों नहीं, शत्रु के भी चिन्तन में हैं
देख तज के पाप रावण, राम तेरे मन में हैं
राम तेरे मन में हैं, राम मेरे मन में हैं
राम तो घर घर में हैं, राम हर आंगन में हैं
मन से रावण जो निकाले, राम उसके मन में हैं

(अंतिम पंक्तियां जावेद अख़्तर की लिखी हुई हैं. फ़िल्म स्वदेस से साभार)

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मॉडल बनी भिखारन.. दर्शक की चिट्ठी

September 3, 2007 20 comments

फुल्ली फालतू चैनल के पोस्ट बॉक्स में आई एक चिट्ठी मेरे हाथ लग गई। चिट्ठी एक दर्शक की है.. जिसे यहां जस का तस छापा जा रहा है।

gitanjali

संपादक,
फुल्लीफालतू न्यूज़ चैनल
आडियोकॉन टॉवर.
डंडेवालान, नई दिल्ली

महोदय,
आपके चैनल पर प्रसारित मॉडल गीतांजली की ख़बर देखकर मै द्रवित हुआ जा रहा हूं। यह बालिका कभी मशहूर मॉडल सुष्मिता सेन की सखी हुआ करती थी। पता नहीं सुष्मिता आगे क्यों बढ़ गई और ये क्यों पीछे रह गई। यह सवाल ऐसा है जिसका जवाब ढूंढना राष्ट्रीय महत्व का विषय है। यह जानकर संतोष हुआ कि आप चौथे स्तंभ की भूमिका का सफलतापूर्वक निर्वहन कर रहे हैं। आपके चैनल से पता चला कि यह मॉडल इन दिनों सड़कों पर भीख मांग रही है और इस ख़बर को कवर करने के महायज्ञ में जुटे पत्रकार और कैमरामैनों ने अपने अथक परिश्रम से हम तक यह खबर पहुंचाई, इसके लिए मेरा सहृदय धन्यवाद स्वीकार करें।

महानुभाव, गीतांजली इन दिनों जिस ग़रीबी में अपना जीवन जी रही है, उसे देखकर मेरा मन व्याकुल हुआ जा रहा है। वो मॉडलिंग किया करती थी। आपकी एंकर ने बताया कि पहले वो रैंप पर चला करती थी और अब फुटपाथ पर चला करती है। सच है, फुटपाथ पर चलना अब शर्म की बात है और मैं शर्म से पानी-पानी हो गया हूं क्योंकि मेरे देश की आधुनिक पढ़ी-लिखी नारी का ये हाल है। नशे और अय्याशी में डूबी ज़िंदगी अर्श से फर्श पर आ जाए तो यह समाज के लिए चिंता का विषय है। फुटपाथ पर रहने वाले और भूख से मरने वाले बच्चों और गर्म ग़ोश्त का सामान बन चुकी बच्चियों की खबरें चिंता का विषय क़तई नहीं हो सकती। गीतांजली वहां पहुंचे पराक्रमी पत्रकारों को अंग्रेज़ी में फटकार लगा रही थी। मुझे अंग्रेज़ी समझ तो नहीं आती किंतु चेहरे के भावों को पढ़कर ऐसा लगा मानो कि वह कह रही हो कि, ‘लानत है आप जैसे लोगों पर, देश में महिलाओं की कोई कद्र नहीं है। स्टॉप इट.. यू फूल.. मेरी ज़माने को परवाह नहीं।’ इतने पर भी आपके बहादुर खबरनवीसों ने हार नहीं मानी और खबर को कवर करने का सामाजिक उत्तरदायित्व निभाते रहे।

मुझे याद आता है कि आमिर ख़ान की शादी की खबर कवर करने के लिए आपके कैमरामैनों ने भारी लताड़ सुनने के बाद भी हम तक तस्वीरें पहुंचाई थी। ऐश-अभि के विवाह पर आप लोग बिग बी के घर के बाहर दिन-रात भूखे-प्यासे रहकर भी डटे रहे। आप लोगों ने हाल ही में सलमान के घर के पिछवाड़े तक में छलांग लगाकर हम तक उनकी सलामती का समाचार दिखाया था। सुरक्षाकर्मियों की दुत्कार झेलकर भी आपने हम तक मिनट-मिनट की खबर पहुंचाकर पत्रकारिता का धर्म साहस के साथ निभाया। मैं यह देखकर निश्चिंत हुआ था कि जिस देश में पेड़ पर लटकर खबर शूट करने वाले जुगाड़ू पत्रकार हों, उस देश का भविष्य सुरक्षित हाथों में है। उस देश में कोई परदे में नहीं रह सकता। सारे परदे हटा देना ही मीडिया का उद्देश्य होना चाहिए। चाहे कहीं से भी किसी के भी हटाने पड़ जाएं। कोई संकोच नहीं होना चाहिए। आपकी इसी खुलेपन की नीति का मैं समर्थक हो चुका हूं। मैंने ”जागरुक नहीं जुगाडू” का नारा अपना लिया है।

मैं सलाम करता हूं उन कैमरामैनों को जो सही एंगल के चक्कर में अपनी ही बिरादरी के लोगों की मां-बहनों को बार-बार याद करते हैं। स्टैंड लगाने के लिए होने वाला संघर्ष मुझे स्वाधीनता संघर्ष से भी ज़्यादा महत्व का विषय लगता है।

हे मूर्धन्य, गीतांजली की बदहाली की ख़बर दिल को ठेस पहुंचाती है। यदि पढ़ी-लिखी महिला का ये हाल है तो अनपढ़ी का क्या होता होगा? देश की आधी आबादी की चौथाई के साथ ऐसा हो सकता है तो तीन-चौथाई की फिक्र कौन करेगा। सही है, आपको पहले एक-चौथाई में आने वाली ऐसी प्रतिभाशाली महिलाओं की सुध लेनी चाहिए। बाक़ी के बारे में सरकार ने महिला आयोग बिठाया हुआ है। आपके चैनल से यह जानकर संतोष हुआ कि गीतांजली इन दिनों नशे का सहारा ले रही है। मेरा राष्ट्रीय महिला आयोग से भी अनुरोध है कि वह गीतांजली को तमाम सुविधाएं मुहैया कराए। प्रसन्नता इस बात की है कि आपकी ख़बर का असर तुरंत देखने मिला है। चैनल से ही ज्ञात हुआ कि अमेरिका के एक अप्रवासी भारतीय डॉक्टर ने गीतांजली को मदद का आश्वासन दिया है। ऐसी सूचना मिलने के बाद पेप्सी पी रही गीतांजली कार में बैठकर घर के लिए रवाना हो गयी। बाद में रैंप की अन्य मशहूर मॉडलों ने भी इस मामले में अपनी चिंता जताई जिसे देखकर मुझे संतोष हुआ जा रहा है कि मैं संवेदनशील समाज में जी रहा हूं। मैं इस मशहूर मॉडल को नहीं जानता था- यह मेरी अल्पज्ञता है। अब जान गया हूं, मेरा अनुरोध है कि गीतांजली से ‘सीधी बात’ की जाए। एक अनुरोध और.. इस बार भी हमेशा की तरह ‘सीधी बात’ दिखाते हुए टिकर हटा दिया जाए।

-दर्शक

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जय संजू बाबा (आरती)

September 3, 2007 15 comments

जय संजू बाबा, छप्पन, जै संजू बाबा
टीआरपी के दाता, भाइयन के भ्राता
संजयदत्त
बंबई में तुम ब्लास्ट कराए
कीट-मकोड़े मार भगाए
एके छप्पन के तुम दाता
पास कोई फटक ना पाता
जय संजू बाबा, टैरर, जै संजू बाबा…

आर्थर रोड तुम्हारो डेरा
भाई सारे करें वहीं फेरा
यरवदा में जब तुम धाए
जेल चकाचक रौनक लाए
जय संजू बाबा, छप्पन, जै संजू बाबा…

तुम्हरी छवि सिब्बलवा भाई
कॉग्रेस पार्टी बिछ-बिछ जाई
बहिन तुम्हारी संसद धाए
सोनिया गांधी को पाठ पढ़ाए
जय संजू बाबा, टैरर, जै संजू बाबा…

सकल टीआरपी तुमरे कारन
छूटे पीछे नाग अरु रावन
मीडिया तुमरे चरण को दासा
भाई लोग रहे नित पासा
जय संजू बाबा, छप्पन, जै संजू बाबा…

कोडासुर को सबक सिखाए
टाडा के सब चार्ज हटाए
आर्म्स एक्ट तुम्हारी माया
बढ़े चलो नरगिस के जाया
जय संजू बाबा, टैरर, जै संजू बाबा…

सत्य-अहिंसा मार भगाए
गांधी का नव-वर्ज़न लाए
टेरर को तुम दिए नव फेसा
रहे टापते पुलिस और केसा
जय संजू बाबा, छप्पन, जै संजू बाबा…

पवित्र भई यरवदा सारी
तर गए जेलासीन नर नारी
तेलगी और अबू सलेमा
तुम्हरे बल सब पाए नेमा
जय संजू बाबा, टैरर, जै संजू बाबा…

प्रात जो लेले नाम तुम्हारा
टीआरपी पाए दिन सारा
नेतागर्दी तुम्हीं करावो
वोटों के दाता
जय संजू बाबा, टैरर, जै संजू बाबा…

पाकिस्तान में बजे दुदुंभी
हिन्दुस्तान बने जलकुंभी
तुमसा नहीं एक्टर कोई दूजा
का करि सके करेक्टर लूजा
जय संजू बाबा, छप्पन, जै संजू बाबा…

अउर किरपा कछु कीजै बाबा
बंबई तो भई बीती बाता
सहस वक़ीलन की तुम माया
दाऊद के खासा
जय संजू बाबा, छप्पन, जै संजू बाबा…

रचयिता- ज्ञानेंद्रनाथ, सीनियर कॉपी एडीटर, इंडिया टीवी.
अवश्य पढ़े – संजूबाबा चरितलीला

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चमकता भारत, सिसकता भारत

August 15, 2007 12 comments

स्वाधीनता दिवस पर विशेष   

भारत बढ़ रहा है.. चमक रहा है.. यक़ीनन बढ़ रहा है.. लोग तरक्की कर रहे हैं.. लेकिन हर कोई नहीं बढ़ रहा है.. हर नागरिक चमक नहीं रहा है.. ये प्रचार कि हम चमक रहे हैं.. ये उनके ढिंढोरे हैं जिनकी संसाधनों पर पकड़ है.. माध्यमों में पैठ है.. अवसर है कहनेलिखने का.. तब हमें लगता है कि हां भारत चमक रहा है.. लेकिन लगनेऔर होनेमें अंतर होता है.. अब इस अंतर को समझ लें तो ख़ुद हमें अपने चमकने पर शरम आएगी। आज़ादी के साठ सालों में हम कितना आगे बढ़े हैं और कितनों को पीछे छोड़ रखा है यह जानना ज़रूरी है। चमकते और सिसकते भारत की तस्वीर बयां करते ये आंकड़ें

अरबपतियों की तादाद में भारत जापान से आगे हो गया।

Millionaire की तादाद में एक साल के भीतर 20 फ़ीसद इज़ाफ़ा हुआ है।

अनिल अंबानी के खाते में हर मिनट 15 लाख रुपए आते हैं। 

26 करोड़ लोग रोज़ाना 50 रूपए से कम में अपना गुज़ारा चलाते हैं।

दुनिया के 20 फ़ीसदी slums भारत में हैं। मुम्बई की 54 फ़ीसद आबादी slums में रह्ती है।

60 फ़ीसद आबादी खेतीबाड़ी से जुड़ी है, लेकिन कृषि विकास दर में कमी आई जिससे 60 लाख टन गेहूं import करना पड़ा। 

मानव विकास सूचकाँक में भारत का नंबर है 127वां।

19 फ़ीसद प्रायमरी स्कूलों में केवल एक टीचर है।

10 फ़ीसद प्रायमरी स्कूलों में ब्लैक बोर्ड नहीं है।

25 फ़ीसद प्रायमरी स्कूल टीचर अपने काम से ग़ैरहाज़िर रहते हैं।

देश के 46 फ़ीसद बच्चे underweight है।

महानगरों में 17 फ़ीसद बच्चे मोटापे के शिकार हैं।

शिशु मृत्युदर में भारत बांग्लादेश से पीछे है।

देश के 14 करोड़ लोगों को पीने का साफ़ पानी उपलब्ध नहीं है।

महानगरों में बोतल बंद पानी का कारोबार पिछले दस सालों में 225 करोड़ से बढ़कर 1800 करोड़ रुपए हो गया।

राजधानी दिल्ली में रोज़ाना दस लाख पानी की बोतलें बिकती हैं। गर्मियों में जहां हर तरफ़ पानी के लिए त्राहिमाम होता है वहीं अवैध तरीक़े से रोज़ तीन लाख रूपए के पानी की ख़रीदफ़रोख्त होती है।

40 फ़ीसद डॉक्टर सरकारी हॉस्पीटलों से नदारद होते हैं।(विश्वबैंक का आंकलन)

केवल 38 फ़ीसद हेल्थ सेंटरों के पास ही पूरा स्टाफ है।

केवल 31% के पास इलाज के लिये जरूरी सामान।

TB से देश मे हर साल 5 लाख लोग मरते हैं।

कुल दवा कारोबार में नकली दवाओं का हिस्सा 35 फ़ीसद है, दूसरी ओर Health Tourism के कारोबार में 30 फ़ीसद की सालाना बढ़ोतरी।     

 

 

56% ग्रामीण घरों में बिजली नहीं है। 1 लाख 20 हज़ार गांवों में बिजली नहीं है।

देश में हर साल 30 हज़ार करोड़ रुपए की बिजली चोरी होती है।

सांसदोंपूर्व सांसदों पर टेलीफ़ोन और बिजली का 7 करोड़ से ज़्यादा बकाया है।

देश के सिर्फ़ 7 फ़ीसद लोग इंटरनेट इस्तेमाल करते हैं। फ़ोन उपभोक्ताओं की तादाद 22 करोड़ 52 लाख।

इस बार केवल 8 फ़ीसद महिलाएं संसद में पहुंची हैं।

11 साल से लटका है महिला आरक्षण बिल, 1996 में लोकसभा में पेश किया गया था।

10 लाख कन्याएं हर साल गर्भ में ही मार दी जाती हैं।

हर साल 18 हज़ार महिलाएं बलात्कार का शिकार होती हैं।

हर घंटे 1 महिला दहेज के लिए जला दी जाती है।

देश की राष्ट्रपति, दो राष्ट्रीय दलों की अध्यक्ष औऱ तीन राज्यों की मुख्यमंत्री महिलाएं हैं। 

    

भारत में इस समय करीब 3 करोड़ 80 लाख युवा बेरोज़गार है। जिनमें 90 फ़ीसद ग्रामीण युवा हैं।

भारत में 2000-01 में BPO में काम करने वालों की संख्या 16 हजार थी और आज यही संख्या डेढ़ लाख का आंकड़ा पार कर चुकी है। जो देश की जनसंख्या का एक फ़ीसद भी नहीं है।कॉल सेंटरों का बिजनेस महज़ पांच सौ मिलियन डॉलर प्रतिवर्ष है।

136 सदस्य क्रिमिनल बैकग्राउंड के 14वीं लोकसभा में हैं जबकि पहली लोकसभा में कोई नहीं था।

ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के 102 देशों में किए गए सर्वे के मुताबिक़ भारत भ्रष्टाचार की सूची में 13वें नंबर पर है।

94 संशोधन हो चुके भारतीय संविधान में जबकि अमेरिका में 218 सालों में सिर्फ़ 27.. वहीं देश की अदालतों में 2 करोड़ 95 लाख केस कोर्ट मे लंबित पड़े हैं।

जन-गण-मन की धुन किसने बनाई

August 14, 2007 29 comments

स्वाधीनता दिवस पर विशेष

क्या आप जानते हैं –  

पाकिस्तान को आजादी 14 अगस्त 1947 भारत से एक दिन पहले भले ही मिल गई हो लेकिन 30 सितंबर 1948 तक वहाँ भारतीय नोट ही चलते रहे इसलिए रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया भारत के साथ साथ पाकिस्तान के लिए भी मुद्रा प्रबंधन का जिम्मा उठाती थी। 1947 का ऐसा ही नोट देखें जिसमें बायीं ओर गवर्नमेंट ऑफ़ पाकिस्तान भी लिखा है।

 

लार्ड माउंटबेटन ऐसे शख्स थे जिन्होने 14 अगस्त को कराची में पाकिस्तान की आजादी समारोह में और 15 अगस्त को नई दिल्ली में भारतीय आजादी के समारोह में शिरकत की थी। (पाक में जिन्ना और भारत में नेहरू का वीडियो देखें) वीडियो में भारतीय संसद भवन के आसमास उमड़ी जनता का उत्साह देखते ही बनता है।

राष्ट्रगानजन गण मन अधियानक जय हे भारत भाग्य विधाताकी धुन राम सिंह ठाकुर ने कम्पोज़ की थी। गीत के रचयिता गुरूदेव रविन्द्रनाथ टैगोर थे। यह गीत पहली बार इंडियन नेशनल कॉग्रेस के कोलकाता अधिवेशन में 27 दिसम्बर 1911 को गाया गया था। (कम्पोज़र राम सिंह ठाकुर के बारे में यहां पढ़े) प्रस्तुत चित्र में गांधी जी के सम्मान में ठाकुर वायलिन बजा रहे हैं।

राष्ट्रगान के रचयिता गुरूदेव रविन्द्रनाथ टैगोर की आवाज़ में ‘जन-गण-मन’ यहां सुनें।

 

 

27 फ़रवरी 1948 को ब्रिटिश सैनिकों की आखरी टुकड़ी को मुंबई के गेट वे ऑफ़ इंडिया से विदाई दी गई। भारतीय फौज ने ब्रिटिश टुकड़ी के मेजर जनरल इन कमांडिंग एल जी हिटलर को समारोहपूर्वक विदाई दी। लगभग डेढ़ सौ बरस भारत में रहने वाले अंग्रेज़ों को दी जाने वाली यह आख़िरी विदाई थी। वीडियो देखें-

 

पाकिस्तानशब्द का उल्लेख पहलेपहले ब्रिटेन मे चौधरी रहमत अली ने किया था। मुस्लिम लीग से जुड़े इस शख़्स ने ब्रिटेन में भारत के पश्चिमी हिस्से के पांच राज्यों को लेकर मुस्लिम बहुल राष्ट्र पाकिस्तान की परिकल्पना की थी। इसका उल्लेख 28 जनवरी 1933 को उनके प्रकाशित किए गए एक पर्चेNow or Never; Are we to live or perish forever? में मिलता है।

 

 

”दुनिया सो रही है भारत जाग रहा है…”  

‘Tryst with Destiny’ आज़ादी की मध्यरात्रि दिया जाने वाला पंडित नेहरू का भाषण था इंडियन कॉस्टीट्यूएंट असेम्ब्ली में दिए गए इस भाषण में नेहरू ने देश के इतिहास की गौरवपूर्ण गाथाओं को याद करने के साथ ही आने वाले कल के आधुनिक भारत की अपनी परिकल्पना प्रस्तुत की थी। यहां सुनें और वीडियो देखें।

 

 

हिमालय की चोटी से दुश्मन को ललकारा है..दूर हटो दुनियावालों हिन्दोस्तां हमारा है”- 1943 में आई अशोक कुमार की सुपरहिट फिल्म किस्मतका गाना अदाकारा मुमताज शांति ने मंच से गाकर ब्रिटिश सेंसर को सकते में डाल दिया था। डायरेक्टर ज्ञान मुखर्जी ने चालाकी से ये तर्क दिया था कि ये गीत दूसरे विश्व युद्ध में नाजियों और जापानियों को भारतीय चुनौती है। जबकि असल में यह अंग्रेज़ी हुक़ूमत के ख़िलाफ़ गीतकार कवि प्रदीप का लिखा गीत था।

15 अगस्त 1947 में भारत और पाकिस्तान की आज़ादी की ख़बर दुनिया के हर बड़े अख़बारों की सुर्खियां थीं। न्यूयॉर्क टाइम्स का अंक देखिए जिसमें इस ख़बर को सेकन्ड लीड बनाया गया। दोनों देशों का नक़्शा छपा और हेडिंग थीIndia and Pakistan become nations, clashes continue” क्लेशेस कन्टीन्यू यानी फ़साद जारी.. विभाजन की त्रासदी यही थी जिसने दोनों देशों को हिलाकर रख दिया था। इन दंगो में 13 लाख लोग मारे गए, डेढ़ करोड़ विस्थापित हुए, साढ़े बारह लाख शरणार्थी भारत में आए, एक लाख औरतों का बलात्कार हुआ और करोड़ों की लूटपाट हुई।

इसका गुलशन फूंक दूं उसका शबिस्तां फूंक दूं

August 14, 2007 1 comment

नज़्में जिन्होंने जंगआज़ादी का जज़्बा जगाया

आज़ादी के संघर्ष में हिन्दुस्तानी ज़बान में लिखी गई नज़्मों, ग़ज़लों के योगदान की चर्चा कर रहे हैं शकील अख़्तर। नवप्रभात ग्वालियर से पत्रकारिता की शुरूआत करने वाले शकील ने इंदौर में नई दुनिया, चौथा संसार, फ्रीप्रेस जनरल, दैनिक भास्कर में विभिन्न पदों पर ज़िम्मेदारियों का निर्वहन किया है. संप्रतिकॉपी प्रोड्यूसर, इंडिया टीवी.

(…पिछले लेख से आगे.. अंतिम कड़ी)

समें शक नहीं जालियांवाला बाग की दर्दनाक घटना ने आग में घी का काम किया और शायरों के ख़ून को खौला दिया। अब शायरों की आतिशनवाइयों ने जनता को उद्वेलित करने का काम शुरू किया। यही वह दौर भी था जब ख़िलावत और असहयोग आंदोलन ज़ोर पकड़ चुका था। गांधी देश के दौरे पर थे। इसी दौर में 1920 में मौलाना मुहम्मद अली ने लाहौर में तकरीर दी। इन्हीं दिनों मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद के विचार, सुबेदारी, आख़री मंज़िल और हमारा फ़र्ज़ में प्रकाशित हुए। इन्हीं दिनों शायर जफ़र अली ख़ां ने लिखा एलान-ए-जंग-

गांधी जी जंग का एलान कर दिया

बातिल से हक़ को दस्त-ओ-गरीबान कर दिया

हिन्दुस्तान में इक नयी रूह फूंककर

आज़ादी-ए-हयात का सामान कर दिया

शेख और बिरहमन में बढ़ाया इत्तिहाद

गोया उन्हें दो कालिब-ओ-यकजान कर दिया

जुल्मो-सितम की नाव डुबोने के वास्ते

कतरे को आंखों-आंखों में तूफ़ान कर दिया

(बातिलःझूठ, दस्त-ओ-गिरेबानः लड़ा देना, इत्तिहादः एकता)

लाला लालचंद, हसरत मोहानी, मीर ग़ुलाम नैरंग, मुहम्मद अली जौहर, आगा हश्र कश्मीरी, अहमद सुहैल, सागर निज़ामी, अहसान दानिश जैसे कई शायरों ने इस दौर में फिरंगी शासन के अत्याचारों के ख़िलाफ़ अनेक नज़्में कहीं। इस दौर की चंद नज़्मों पर ग़ौर करें-

तिरी बरबादियां देखी नहीं जाती है अब हमसे

ख़ुदा के वास्ते उठ और हो आज़ाद इस ग़म से

ग़ुलामी मुस्तकिल लानत है और तौहीने-इंसा हैं

ग़ुलामी से रिहा हो और आज़ादी में शिरकत है

1928 में सायमन कमीशन पर हंगामा उठा। यही वह समय भी था जब गांधीजी से लेकर पंडित जवाहर लाल नेहरू और सुभाषचंद्र बोस संपूर्ण आज़ादी की मांग करना शुरू कर चुके थे। उधर सायमन कमीशन पर नज़्मों में ग़ुस्सा बरसने लगा था।

सायमन साहब के इस्तकबाल का वक़्त आ गया

जाग अय लाहौर अपने फ़र्ज़ को पहचान कर

रेल से उतरें तो काली झंडिया हों सामने

जिनके अंदर तुम खड़े हो सीना तानकर

संपूर्ण आज़ादी की मांग ने ज़ोर पकड़ा और 1930 में कॉग्रेस ने इसका एलान कर दिया। फिर सिविल नाफ़रमानी का जेल भरो आंदोलन शुरू हुआ। कई शहीद हुए और गोली से उड़ा दिए गए। आंदोलन चलता रहा। तीसरी गोलमेज कॉफ़्रेंस के बाद निकले श्वेत पत्र के बाद गांधी जी असंतुष्ट थे। इस दौर में भी जोश मलीहाबादी, आनंद नारायण, अली जव्वाद ज़ैदी, हफ़ीज़ जालंधरी जैसे कई शायर सियासी मुद्दों से मुतास्सिर होकर क़लम को ज़ुबान देते रहे। 1942 के विद्रोह के बाद महादेव देसाई की मौत से दुखी होकर ‘क़ैदी की लाश’ जैसी मशहूर नज़्म लिखने वाले अली जव्वाद ज़ैदी की एक और नज़्म ‘मन की भूल’ ज़प्त कर ली गई। यह एक लंबी नज़्म थी जिसमें देश के सुखद अतीत को याद करते हुए परतंत्र भारत की पीढ़ी को बयां किया गया था-

मुल्क़ में इक तूफ़ान बरपा था

जयकारों का शोर मचा था

जेल में हिन्दुस्तान भरा था

था इक वो भी ज़माना प्यारे

जेल में घर तक याद नहीं था

फिर भी दिल कुछ शाद नहीं था

हिन्दुस्तान आज़ाद नहीं था

1935 में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना हुई। इससे पहले सम्मेलन की 1936 में अध्यक्षता ख़्यात साहित्यकार प्रेमचंद ने की। इस संस्था को आगे बढ़ाने में पण्डित नेहरू से लेकर रवींद्रनाथ ठाकुर, जयप्रकाश नारायण, आचार्य नरेंद्र देव, युसूफ़ मेहर अली, सज्जाद ज़हीर, डॉक्टर अली, अब्दुल हक़ जैसे दिग्गजों का सहयोग और समर्थन था। इसी दौर में उर्दू साहित्य में फ़ैज अहमद फ़ैज़, अली सरदार ज़ाफ़री, असरारुलहक़ मजाज़, जांनिसार अख़्तर, फ़िराक़ गोरखपुरी जैसे मशहूर शायर भी देशभक्ति की नज़्में लिख रहे थे। सरदार जाफ़री की नज़्म पर नज़र डालें-

सुलग उठी है इंतिक़ाम की आग

बर्फ़ की चोटियां दहकती हैं

जुल्म और जब्र के अंधेरे में

सैकड़ों बिजलियां चमकती हैं

इंतिक़ाम की धधकी हुई इस आग से पहले और बाद में बार-बार आज़ादी का सुंदर सपना देखा गया। यहां तक कि शायरों ने धक्के खाए, फ़ाकाकशी की फिर भी आग उगलने वाली नज़्में लिखकर बरतानवियों के हत्थे चढ़ते रहे। मुज़फ़्फ़र की ज‍प्तशुदा नज़्मों में एक-

विजय के हार होंगे

नेहरू-गांधी की गरदन में

मुक़द्दस मादरे वतन के सर पर

ताज देखेंगे

मनाएंगे ज़मीने हिन्द पर

हम जश्ने आज़ादी

फ़लक पर से हमें

ख़ुश-ख़ुश तिलक महाराज देखेंगे

सीमाब अकबराबादी, साहिर लुधयानवी, शोरिश कश्मीरी, जोश मलीहाबादी, नदीम कासमी, मसूद अख़्तर जैसे कुछ शायर थे जो आज़ादी के आंदोलन की तर्जुमानी के साथ अपनी क़लम में सामाजिक और आर्थिक हालात को दर्शा रहे थे। इनमें प्रगतिशील और मार्क्सवादी विचारों की नज़्में भी शामिल रहीं। इस दौर में जोश मलीहाबाद की एक नज़्म- ”वफ़ादाराने अजली का पयाम, शहंशाहे हिन्दुस्तान के नाम” बड़ी चर्चित हुई जिसमें उन्होंने जॉर्ज की ताजपोशी पर जमकर प्रहार किया। तंज करती ये नज़्म दरअसली भारत की बदहाली के लिए गहरा आक्रोश थी। 32 बंदों में लिखी गई इस नज़्म में भारत की त्रासद तस्वीर थी। इसके चंद बंद काबिले-ग़ौर हैं-

आपके हिन्दोस्तां के जिस्म पर बोटी नहीं

तन पे इक धज्जी नहीं, पेट में रोटी नहीं

किश्वरे-हिन्दोस्तां में रात को हंगामे-ख़्वाब

करवटें रह रह के लेता है फ़ंज़ा में इंक़िलाब

जोश की यह नज़्म तो ठीक है मगर उनकी नज़्म ”ईस्ट इंडिया कंपनी के फ़रजंदों के नाम” ने तो जैसे अंग्रेज़ी हुक़ूमत की नींद ही उड़ा दी। जोश ने यह नज़्म 1939 मे दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान वायसराय की हिन्दुस्तान के जंग में शामिल होने की घोषणा के बाद लिखी गई थी। यह नज़्म हर भारतीय की भावना का प्रतिबिंब थी। इस पर भी फिरंगी हुक़ूमत का कहर बरपा और इस नज़्म को ज़प्त कर लिया गया-

जुल्म भूले, रागिनी इंसाफ़ की गाने लगे

लग गई है आग क्या घर में कि चिल्लाने लगे

इक कहानी वक़्त लिखेगा नये मज़मून की

जिसकी सुखी को ज़रूरत है तुम्हारे ख़ून की

इंक़लाबी गीतों के बढ़ते हुए ख़तरों के मद्देनज़र आखिरकार अंग्रेज़ हुक़ूमत ने इस वक़्त तहरीर (लेखन) और तकरीर (संभाषण) दोनों पर कड़ी पाबंदी लगा दी थी। एक बार फिर आंदोलन उग्र हुआ, बड़े नेता ग़िरफ़्तार हुए, जेलें भरती चली गईं लेकिन नज़्में छपती चली गईं। मजाज़ ने अपनी नज़्म ”अंधेरी रात के मुसाफ़िर” में लिखा-

उफ़क पर जंगा का ख़ूनी सितारा जगमगाता है

हर इक झोंका हवा का, मौत का पैग़ाम लाता है

मजाज़ की नज़्म ”आवारा” की इन पंक्तियों पर ग़ौर फ़रमाएं –

मुफ़लिसी और ये मज़ाहिर हैं नज़र के सामने

सैकडों चंगेज़ो नादिर हैं नज़र के सामने

सैकडों सुलतानो जाबिर हैं नज़र के सामने

ऐ ग़म ए दिल क्या करूं,

ऐ वहशत ए दिल क्या करूं

बढ के इस इन्द्रसभा का साज़ ओ सामां फूंक दूं

इसका गुलशन फूंक दूं उसका शबिस्तां फूंक दूं

तखते सुलतान क्या मैं सारा क़स्र ए सुलतान फूंक दूं

ऐ ग़म ए दिल क्या करूं,

ऐ वहशत ए दिल क्या करूं

(मज़ाहिरःदृश्य, सुल्ताने जाबिरः अत्याचारी बादशाह, शबिस्तां: शयनागार, क़स्रे सुल्तान: शाही महल)

सरदार जाफ़री ने इसी बात को बढ़ाकर कुछ इस तरह से बयां किया-

ग़म के सीने में ख़ुशी की आग भरने दो हमें

ख़ूं भरे परचम के नीचे रक्स करने दो हमें

अगस्त 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ। देश के तक़रीबन सभी बड़े नेता सलाखों के पीछे पहुंचा दिए गए थे। जनता सड़कों पर उतर आई और अंग्रेज़ो से सीधा लोहा लेने लगी। बाग़ी यहां-वहां परचम फहराने लगे। जन-नेताओं को जो दुश्वारियां पेश आईं, उन्हें लेकर भी नज़्में लिखी गईं। महात्मा गांधी की ग़िरफ़्तारी देर रात की गई थी, लिहाज़ा शमीम किरहानी लिखते हैं-

कुछ देर ज़रा सो लेने दो

तुम जेल जिसे ले जाते हो

वह दर्द का मारा है देखो

मज़लूम, अहिंसा का हामी

बेबस दुखियारा है देखो

बेचैन सा उसकी आंखों में

पिछले का सितारा है देखो

कुछ देर ज़रा सो लेने दो

लेकिन इस समय आज़ाद हिन्द फ़ौज बनाकर अंग्रेज़ों के नाकों चने चबवाने वाले वीर क्रांतिकारी सुभाषचंद्र बोस ही एक ऐसे नेता थे जो हुक़ूमत के हाथ नही आ सके थे। इन हालात की सच्ची तस्वीर लेकर आए शायर जांनिसार अख़्तर की नज़्म ”अय हमरिहाने काफ़लाये” पर नज़र डालिए-

क्यों न कर लें आज हम खुद रास्ते का फ़ैसला

हमरहाने काफ़ला अय हमरहाने काफ़ला

रहज़नों के हाथ में हम लुट गए तो क्या हुआ

रास्ते में चंद साथी छूट गए तो क्या हुआ

अब भी वह जुरअते हैं अब भी वही हौसला

हमरहाने काफ़ला अय हमरहाने काफ़ला

आंदोलन बढ़ता रहा और क़लम तलवार बनी। जज़्बे आज़ादी के शोले अब आज़ादी की पहली किरण की बाट जोह रहे थे। मगर हालात को इस सुबह के पहले भी कुछ और मंजूर था। वह बंटवारा जिसकी मांग मुस्लिम लीग ज़ोर दे रही थी। शमीम किरहानी ने पाकिस्तान चाहने वालों के लिए एक दरख्वास्त करती हुई नज़्म लिखी पर कोई तज़वीज़ काम न आई। 1946 से बग़ावत और तेज़ हुई। 1947 में आज़ादी देने की ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एटली बार की घोषणा हुई। साम्राज्यवादी अंग्रेज़ों ने आखिर समग्र राजनीतिक आंदोलन को दो फाड़ करने में कामयाबी पायी। हिन्दुस्तान के वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने ब्रिटेन का आदेश का पालन किया। रेडक्लिफ़ का चुपचाप भारत आगमन हुआ और सदियों पुराना इंसानी रिश्ता सरहदी टुकड़ों में बंट गया। शमीम ने पूछा-

हमको बतलाओ क्या मतलब है पाकिस्तान का

जिस जगह इस वक़्त मुस्लिम हैं, नाजिस है क्या वह जा

(नाजिस-अपवित्र, जा-स्थान)

आज़ादी की बेड़ियां टूटीं। मख़दूम माहिउद्दीन ने लिखा- कहो हिन्दोस्तां की जय, फ़ैज़ ने कहा- बोल की लब आज़ाद हैं तेरे, ज़बां अब तक तेरी है। फ़िराक़ गोरखपुरी ने तहरीर दी-

हमारे सीने में शोले भड़क रहे हैं फ़िराक़

हमारी सांस से रोशन है नग़्मे-आज़ादी

जश्ने-आज़ादी के मौक़े पर सैकड़ों नज़्में लिखी गईं। इसमें दो सौ साल की ग़ुलामी के निज़ाम से लेकर ख़ुशियों तक की कहानी थी। जांनिसार अख़्तर ने नज़्म लिखी ”जश्ने आज़ादी” –

सीने से आधी रात के

फूटी वह सूरज की किरन

बरसे वह तारों के कंवल

वह रक्स में आया गगन

आये मुबारकबाद को

कितने शहीदाने-वतन

आज़ाद है आज़ाद है आज़ाद है अपना वतन

आज़ाद है अपना वतन

(शोध संदर्भः ज़प्तशुदा नज़्में, हिन्दोस्तां हमारा और अन्य) संकलन- शकील अख़्तर

स्वतंत्रता दिवस पर विशेष कल (15 अगस्त 2007) पढ़िए

भारतीय स्वातंत्र्य संग्राम से जुड़ी रोचक बातें (दुर्लभ वीडियो-ऑ़डियो प्रस्तुति)

चमकता भारत, सिसकता भारतः भारत के दो चेहरे (आंकडें कहते हैं कहानी)

जुल्म काफ़ी कर चुके, पब्लिक बिगड़ जाने को है

August 13, 2007 8 comments

आज़ादी की सालगिरह पर विशेष

नज़्में जिन्होंने जंगआज़ादी का जज़्बा जगाया

आज़ादी के संघर्ष में हिन्दुस्तानी ज़बान में लिखी गई नज़्मों, ग़ज़लों के योगदान की चर्चा कर रहे हैं शकील अख़्तर। नवप्रभात ग्वालियर से पत्रकारिता की शुरूआत करने वाले शकील ने इंदौर में नई दुनिया, चौथा संसार, फ्रीप्रेस जनरल, दैनिक भास्कर में विभिन्न पदों पर ज़िम्मेदारियों का निर्वहन किया है. संप्रतिकॉपी प्रोड्यूसर, इंडिया टीवी.

ज़ाद हिन्दुस्तान में ज़ुबान को लेकर होने वाली सियासत पर बड़ा अफ़सोस होता है। ख़ासकर उस ज़ुबान को लेकर जिसने जंग-ए-आज़ादी में अहम रोल अदा किया और बिखरे हुए हिन्दुस्तान को एक प्लेटफ़ॉर्म पर लाने, उसे एकसूत्र में पिरोने में बड़ी मदद की। हां, ये बात उर्दू की है, जिसके बारे में तमाम ग़लतफ़हमियां हैं, शिकायत हैं, यहां तक कि झगड़ा हिन्दी बनाम उर्दू का खड़ा कर दिया गया है। परतंत्र भारत में कई उर्दू अख़बार, रिसाले थे जो देश की आज़ादी के लिए सर पर कफ़न बांधकर काम कर रहे थे। हिन्दी की अन्य भाषाओं की तरह यहां भी एक जज़्बा था- आज़ादी, सरफ़रोशी की तमन्ना। 

उस दौर में क़लम से जेहाद करने वाले कितने शायर थे जिन्हें जेल जाना पड़ा, जिन पर अत्याचार हुए और जिनके इंक़लाबी तराने और नज़्में तक ज़प्त कर ली गईं। ये क़ौमी खिदमत का ज़खीरा आज़ादी के बाद भी नेपथ्य में रहा और इक्का-दुक्का प्रयासों के अलावा आम जनता के सामने न के बराबर आ सका। अब सिमटती तहज़ीब, भाषा, सियासत और आज़ाद नई पीढ़ी के पीच तो यह और भी मुश्किल है। मगर तब जज़्ब-ए-हुर्रियत यानी आज़ादी, स्वतंत्रता के लिए इन ग़ज़लों, गीतों और नज़्मों ने लोगों में ज़बर्दस्त जज़्बा पैदा किया था, क्रांति की नई लहर पैदा की थी। लोग फिरंगियों के ख़िलाफ़ मरने-मिटने को तैयार हो गए थे। इस बात की तस्दीक के लिए चलिए हम शुरूआत करते हैं रामप्रसाद बिस्मिल के उस तराने से जिसे मादर-ए-वतन के लिए हम आज भी उसी भावना से गुनगुनाते हैं। 

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

देखना ज़ोर कितना बाज़ुए क़ातिल में है

वक़्त आने पर बता देंगे तुझे ए आसमां

हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है

ऐ शहीदे मुल्क़ों मिल्लत तेरे जज़्बे के निसार

तेरी कुरबानी का चरचा ग़ैर की महफ़िल में है

अब न अगले वलवले हैं और न अरमानों की भीड़

एक मिट जाने की हसरत अब दिले-बिस्मिल में है 

रामप्रसाद बिस्मिल के इस तराने ने तब वतन परस्ती की ज़ोर-आज़माइश में नई जान पैदा कर दी थी। तूफ़ान इतना उठा था कि अंग्रेज़ सरकार ने आख़िरकार इस गीत पर प्रतिबंध लगा दिया था। पर क़ौमी तराने की यह बुलंद आवाज़ दबी नहीं बल्कि करोड़ो वलवले इसमें आ मिले और आज़ादी की जुस्तजू बढ़ती चली गई। दरअसल, 1921 से 1935 तक का यह दौर हिन्दुस्तानी सियासी तारीख़ का बड़ा विप्लवग्रस्त दौर था। माले गांव नासिक में सुलेमान शाह, मधु फरीदन, मुहम्मद शाबान और असरील अल्लाहरखा को यरवदा जेल में फांसी की सज़ा दे दी गई। जिस पर पूरे देश में तूफ़ान खड़ा हुआ था। फिर 1925 में काकोरी केस चला। आठ अगस्त 1925 को शाहजहांपुर में क्रांतिकारियों का एक जलसा हुआ जिसकी अध्यक्षता रामप्रसाद बिस्मिल ने की। इसमें इंकलाब के लिए पैसा हासिल करने के लिए खज़ाना ले जाने वाली ट्रेन को लूटने का फ़ैसला किया गया था। यह काम अशफ़ाक़ उल्लाह ख़ां के ज़िम्मे आया और काकोरी मेल को लूट लिया गया। अशफ़ाक उल्लाह ख़ां और रामप्रसाद बिस्मिल को ग़िरफ़्तार कर लिया गया और फांसी दे दी गई। अशफ़ाक़ एक अच्छे शायर भी थे, उन्हें फ़ैज़ाबाद की जेल में फांसी दी गई थी। उन्होंने लिखा है- 

वह गुलशान जो की आबाद था गुज़रे ज़माने में

मैं शाखे खुश्क हूं हां उजड़े गुलिस्तां का 

इसी नज़्म की अगली पंक्तियों में उन्होंने बड़ी दूरंदेशी से लिखा है-

 यह झगड़े ये बखेड़े मेटकर अबस में मिल जाओ

अबस तफ़रीक है तुममें यह हिंदू और मुसलमां का 

पर तोप के मुहानों से बांधती ज़ालिम फिरंगी सरकार कहां मानती थी, वे आज़ादी तक फूट डालों और राज करो की नीति पर चलती रही और आख़िरकार वो दिन भी आया जब हिन्दी है हम वतन है वाला इक़बाल का हिन्दुस्तान दो टुकड़ो में बंट गया। दरार ऐसी पड़ी कि सदियां सिहर गईं। लेकिन ढाई सौ साल से ज़्यादा पैरों में में पड़ी ग़ुलामी की ज़ंजीरों को तोड़ने के लिए मरते-मरते अशफ़ाक़ ने यही कहा- 

वतन है हमारा है शादकाम और आज़ाद

हमारा क्या है अगर हम रहें न रहें 

हिन्दुस्तान की रवायत में मिली-जुली संस्कृति का सिलसिला सैकड़ों सालों से चलता आया था। ख़ासकर सूफ़ियों के ज़माने में यह हिन्दुस्तानी तहज़ीब तुर्की, अरबी और फ़ारसी शब्दों की मिलावट से जन्मी। खुसरो ज़माने में इस मिलावटी बोली को रेख्ता कहा गया। धीरे-धीरे एक नई हिन्दुस्तानी ज़ुबान हिंदवी बनी जो बाद में उर्दू कहलाई। सांस्कृतिक मेल-जोल गहरा हुआ तो उर्दू अदब में भी हिन्दुस्तानीयत हर स्तर पर झलकने लगी। सामाजिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और राजनीतिक चित्र उजागर होने लगे, मशहूर शायर मीर तकी मीर ने लिखा है- 

दिल की बरबादी का क्या मज़्कूर है

यह नगर सौ मरतबा लूटा गया 

यहां दिल लफ़्ज़ दिल्ली का पर्यायवाची बना जो कितनी बार उजड़ी, टूटी और बनी। यह सिलसिला ज़्यादा से ज़्यादा सियासी आंदोलनों से जुड़ा रहा। यहां तक कि जंग-ए-आज़ादी का तराना बन गई डॉक्टर अल्लामा इक़बाल की नज़्म ‘सारे जहां से अच्छा..’ आज़ादी की घोषणा के समारोह में ‘जन-गण-मन’ के साथ गाई गई। उनका शेर आज भी मौजूं है- 

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी

सदियों रहा है दुश्मन दौरे-जहां हमारा 

लेकिन जो नग़में और तराने आज आसान लगते हैं, जंग-ए-आज़ादी के दौर में उनका लिखना, छपना और बुलंदी से गाया जाना हंसी-मज़ाक का खेल नहीं था। हैरत होती है ये जानकर कि सारी पाबंदियों के बावजूद देशधर्म की खातिर रचनाकार कैसे न कैसे अपनी बात जनता तक पहुंचा देते थे। कितनी ऐसी ग़ज़लें, नज़्में और शेर हैं जो तब गुप्त रूप से छपते थे और बांटे जाते थे। उनके लिखने वालों का नाम पता तक आज नामालूम है। मगर उन दिनों वे हंगामा बरपा जाते थे। 

बांध ले बिस्तर फिरंगी, राज अब जाने को है

जुल्म काफ़ी कर चुके, पब्लिक बिगड़ जाने को है 

ऐसे मौक़े भी आए जब रचनाकारों को मगर के मुंह में रहकर भी अपनी बात लोगों तक पहुंचानी पड़ी। शायर अकबर इलाहाबादी का एक क़िस्सा काफ़ी मशहूर है। वे अंग्रेज़ हुक़ूमत के मुलाज़िम थे, पर उन्हीं की ज़्यादतियों के ख़िलाफ़ हुए। उनकी तीन नज़्में जलवा-ए-देहली दरबार में कही गईं। यह 1901 ई. में एडवर्ड सप्तम के जश्ने ताजपोशी का वक़्त था जिसमें ड्यूक ऑफ़ कनाट भी शामिल थे। एक नज़्म में अकबर ने तंज किया- 

महफ़िल उनकी, साक़ी उनका आंखे मेरी, बाक़ी उनका

आज़ादी के आंदोलन को गति देने में कॉग्रेसियों का नेतृत्व अहम था। दादाभाई नौरोजी, सुरेंद्रनाथ बनर्जी, अरविंद गोखले और बदरूद्दीन तैयबजी नरम दल का तो गरम दल का नेतृत्व बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, विपिन चंद्रपाल और अरविंद घोष कर रहे थे। 1906 में कोलकाता अधिवेशन में स्वराज की मांग की गई। विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का प्रस्ताव पारित हुआ था। इस दौर में अनेक राष्ट्रीय नज़्में रची गईं। लिखने वालों को अंग्रेज़ी सरकार की प्रताड़ना और अत्याचारों से गुज़रना पड़ा। लेकिन क़लम के जेहाद का सिलसिला जारी रहा। गरम दल से ताल्लुक रखने वाले हसरत मोहानी ने लिखा है- 

अय हिन्दी-ए-सादा दिल ख़बरदारहरगिज़ न चले तुझपे यह जादू

इसी दौर में ब्रजनारायण चकबस्त, जफ़र अली ख़ां, त्रिलोक चंद महरूम, बर्क़ दहेलवी की शायरी हमारे संग्राम की बहुमूल्य संपत्ति है। उदाहरण के लिए ब्रजनारायण चकबस्त की ये रचना काबिले-ग़ौर है- 

हम खाके हिन्द से पैदा जोश के आसार

हिमालिया से उठे जैसे अब्रे-दरियावार

लहू रग़ों में दिखाता है बर्क़ की रफ़्तार

हुई है खाक के परदे में हडिड्या

बेदारज़मीं से अर्श तलक शोर होमरूल का है

शबाब क़ौम का है ज़ोर होमरूल का है

यहां राष्ट्रीय भावना और धार्मिक मामलों में सुधार के समर्थक सर सैयद अहमद ख़ां के एक कथन का ज़िक्र ज़रूरी है। 26 जनवरी 1882 को अमृतसर की अंजुमने इस्लामिया में तकरीर करते हुए उन्होंने कहा था- क़ौम से मेरा मतलब सिर्फ़ मुसलमानों से नहीं है बल्कि़ हिन्दू और मुसलमानों दोनों से है.. हिन्दुओं के अपमान से मुसलमानों का और मुसलमानों के अपमान से हिन्दुओं का अपमान है। इन हालात में जब तक दोनों भाई एक साथ परवरिश ना पा सकें, एक साथ शिक्षा ना पा सकें, एक ही प्रकार के उन्नति के साथ दोनों को उपलब्ध ना हो तो हमारी इज़्ज़त नहीं हो सकती। 

1914 में इंग्लैंड और जर्मनी में जंग छिड़ गई। उस वक़्त हिन्दुस्तान ने अंग्रेज़ों का साथ दिया। लेकिन शिबली नोमानी ने तब भी फिरंगियों पर वार किया था। उनकी नज़्म ‘जंगे यूरोप और हिन्दुस्तानी’ पर वारंट जारी कर दिया गया था। बरतानवी हुक़ूमत उनकी दुश्मन बन गई। शिबली ने लिखा था- 

इक जर्मनी ने मुझसे कहा अजरहे गुरूर

आसां नहीं है फ़तह तो दुश्वार भी नहीं

बरतानिया की फ़ौज है दस लाख से भी कम

और इस पे लुत्फ़ यह कि तैयार भी नहीं

बाक़ी रहा फ़्रांस तो वह रिन्दे लमयजलहम

लोग अहले-हिन्द हैं जर्मन से दस गुने

तुझको तमीज़े अन्दरक-ओ-बिसियार भी नहीं

सुनता रहा वो ग़ौर से मेरा कलाम और

फिर कहा जो लायके-इज़हार भी नहीं

इस सादगी पे कौन न मर जाए अय ख़ुदा

लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं 

(अजरहे गुरूर: घमंड से, रिन्दे लमयजल: अनश्वर, शराबी, अहलेहिन्द: भारतवासी, अन्दरबिसियार: कम और ज़्यादा, लायकेइज़हार: बताने योग्य) 

ख़ुद इख़्तियारी का ऐलान (1915), होमरूल आंदोलन (1916), मांटेग्यू सुधार (1917), रोलेट एक्ट (1918) जैसे मुद्दों पर अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ देशभर में आवाज़ उठी। इससे शायर भी अछूते नहीं रहे। महात्मा गांधी की लीडरशिप में आंदोलन आगे बढ़ा और हिन्दू और मुसलमान कंधे से कंधा मिलाकर आज़ादी की जंग लड़ते रहे। 1919 में जालियां वाला बाग की दुखद घटने ने देशवासियों को झकझोर दिया। सैकड़ों लोग निहत्थे शहीद हो गए। फिरंगियों की इस क्रूरता के ख़िलाफ़ उर्दू में कई नज़्में लिखी गईं। उर्दू के मशहूर शायर त्रिलोकचंद महरूम ने लिखा है-

बदले तूने यह लिए भला किस दिन के

ज़िबह कर डाले हैं मुर्ग़ाने चमन गिन गिन के

(मुर्ग़ाने चमन- उपवन के पक्षी) 

.. जारी..