मेरे बारे में
नाम से यूं ना समझ लें कि हम किसी राजा साहाब के यहां दीवान हैं, दरअसल दादा-परदादा कभी किसी राजघराने में जाकर दीवान बन गये थे. तभी से ये सिलसिला चल पडा. पत्रकारिता करता हूं, यही पेशा भी है, दिल्ली में रहते चार साल हो चुके, घर-बार छोडे अरसा बीत गया. इस दरम्यां देशबन्धु, जनसत्ता, आल इंडिया रेडियो वगैरह में भी काम किया.
पत्रकारों को क़लम का सिपाही कहा जाता है, लेकिन क़लम छोडे भी ज़माने बीत गए, अब इस कंप्यूटर युग में ‘की-बोर्ड का सिपाही‘ कहलाने से गुरेज़ नही.ख़बरों की लत ऐसी कि शायद छुटाए नहीं छूटेगी. ख़बरों के पीछे दिमाग़ी दौड़-भाग में ज़िन्दगी का आधा रास्ता यूं ही गुज़र गया अकेले- अकेले… दिमाग़ी घोड़े मेरे की-बोर्ड के बिना सरपट नहीं भागते. गली-कूचों से निकलते हुए मेरे पत्रकारी मन की संवेदनाओं को बड़ी राहत मिलती है. अपने जागरुक और संवेदनशील होने का भ्रम बना रहता है। अपने ज़मीनी जुड़ाव के सरोकारवादी दंभ में कभी-कभी इतना चूर हो जाता हूं कि नाली से भी जुड़ाव महसूस करने लगता हूं.
हिन्दी चिट्ठाकारी से दो साल पहले ऐसा जुड़ा कि चिट्ठाजगत के कुछ सदस्य अब घर के सदस्य और कुछ मोहल्ले के यार-दोस्त लगने लगे हैं. पसंद सब कुछ है या कहूं कि खाना, पीना, गज़लें, और मुंह की खुजली दूर करना (बुद्धिजीवियों की भाषा में कहें तो विचार-विमर्श).
नापसंद वे हैं जो हिन्दुस्तानी होते हुए भी अंग्रेज़ीयत का चोला पहने रहते हैं. इसके अलावा वैचारिक कट्टरवादियों को देखकर मेरे मन में सिर्फ़ सहानुभूति उपजती है कि काश… दो-चार किताबें कम पढ़ लेते तो दो-चार इंसानों को समझने का मौक़ा मिल जाता.
मेरा जन्म होशंगाबाद (मध्यप्रदेश) में हुआ. पिता जी पुलिस विभाग में थे इसलिए तबादले लगातार होते रहे. 1979 में रायपुर (अब छत्तीसगढ़ में) आ गए. छत्तीसगढ़ के छोटे से ज़िले राजनांदगांव में स्कूल और कॉलेज की पढ़ाई हुई. यहीं से पत्रकारिता का शौक चर्राया जो बाद में जुनून में तब्दील हो गया. राजधानी रायपुर आकर इसे पेशे के तौर पर अपनाया. देशबन्धु और जनसत्ता में मुझे प्रतिभावान वरिष्ठों का साथ मिला जो मेरे लिए आज भी प्रेरणास्रोत बने हुए हैं. वहां से दिल्ली तक के सफ़र में सीखता आ रहा हूं. चार सालों से दिल्ली से सटे शहर नोएडा मे रह रहा हूं. फ़िलहाल एक न्यूज़ चैनल के लिए शोध विभाग का प्रबंधक, जो बंध के रह गया. अपनी भड़ास ब्लॉगिंग के ज़रिए निकाल लेता हूं.
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अरे दीवान साहब आपकी टिप्पणी पढ़ी हमने अपने चिट्ठे पर (http://hindi-mishranurag.blogspot.com/), लेकिन आपका ईमेल पता नहीं मिला। खैर हमने तो विडियो उड़ाया था गूगल से, अब आप इसे यूट्यूब पर कैसे डाल सकते हैं पता नहीं। किंतु टिप्पणी के लिए धन्यवाद।
Comment by अनुराग मिश्र — November 9, 2006 #
दीवान साहब फिल्म का नाम भी बताइए।
Comment by अनुराग मिश्र — November 9, 2006 #
सो नीरज भैये, मुंह की खुजली दुर किये बिना तो चैन भी नही मिलता नहीं ना। क्या करें छुट ती ही नहीं कमबख्त मुंह की लगी हुई है………
Comment by संजीत — January 27, 2007 #
अच्छा लगा नीरज, ये देख कर कि तुम यहां इतने सक्रिय हो
Comment by संजीत — January 27, 2007 #
विस्तार से परिचय दिया अच्छा लगा पहले ‘नारद’ पर शीर्षक पढ़कर सोचा कि शायद कोई नया चिट्ठाकार आया है, स्वागत कर आएं। आकर देखा तो नीरज भाई आज आपबीती सुनाने के मूड में हैं।
Comment by Shrish — January 27, 2007 #
क्या बात है, अच्छा लगा
Comment by sanjeevsameer — February 4, 2007 #
bhai sahab
aapka khyal to behatar hai…..
with warm regards.
prakash
Comment by prakash singh — February 9, 2007 #
दुबे अउ दीवान
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के ब्राह्मण पारा में मजाक में ही सहीं एक मिथक बार बार सुनने को मिलता है कि दुबे अउ दीवान आधा पागल होथें! मेरी श्रीमती दाढी की दुबे परिवार से आई है और मेरी बुआ नवागढ के दीवान परिवार में गयी है यानी दो दो रिश्तेदार …, मैं उस मिथक पर कभी कभी चटकारें भी लेता हूं और अपनी श्रीमती को चिढाता हूं पर रायपुर वाले बाकायदा उक्त मिथक का प्रमाण देते हैं तो चिंतित हो जाता हूं क्योंकि १९९५ में सदा सदा के लिये मेरे घर में घर करने के लिये आते ही मेरी श्रीमती (समाज शास्त़्र व अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर) नें मेरे प्रकाशित – अप्रकाशित कविताओं, कहानियों व समसामयिक लेखों एवं पाण्डुलिपियों को मुझसे दूर कर दिया उसकी समझ में ये सब मिथ्या है ये सभी रूहानी सफर के सब्जबाग हैं शाश्वत से इनका दूर दूर तक वास्ता नहीं है उसकी समझ में इलाहाबाद के पथ पर निराला जी को दिखी पत्थर तोडने वाली का चित्रण को कविता में लिखने का और उस कविता पर आह और वाह करने का शाश्वत जीवन में कोई महत्व नहीं है निराला जी के लिखने के कई दशक बाद भी क्या उस महिला या उन जैसी महिलाओं की दशा को सुधारने के लिये आह और वाह करने वालों नें कुछ किया .. .. .. कुछ बदला? और भी बहुत कुछ, मैं कोई जवाब नहीं देना चाहता था,उ़स समय से मुझे लगने लगा था कि रायपुर का मिथक मिथक नहीं सहीं है
पिछले कुछ दिनों से आपको पढ रहा हूं इसलिये कि आप छत्तीसगढ से हैं और कुछ संकुचित मनोवृत्ति व सौ फीसदी सत्य को उजागर करू तो आपके नाम के साथ जुडा दीवान देख कर, आपको ज्यादा नहीं पढ पाया हूं पर पहले ही दिन से रायपुर का मिथक उडन छू हो गया भाई नाम में क्या रखा है नाम के पीछे दीवान हो या कप्तान आपने जो प्रयास किया है वह मेरे छत्तीसगढ़ का गौरव है आपके प्रयास को मैं अपने शब्दशिल्पियों व इसमें रूचि रखने वाले मित्रों में सर्वविदित कराने में अपने आप को गर्वान्वित समझूंगा
धन्यवाद
Comment by संजीव तिवारी — April 2, 2007 #
Are diwaan sahab aap to bade shaukin hain.Ye nahin bataya ki patrkaar banane ka shauk charaya kaise ! Main bhi aap hi k peshe mein hoon. Abhi abhi entry ki hai. aag hai aap k andar maanana padega .
Comment by Akhilesh chandra — April 18, 2007 #
Yaar ishi khabro ki duniya mein aaya tha ki padhne likhne ki cheej hai, kuch to kar hi lenge lekin bhai yaha padhana likhna to aapka apna kaam hai. office ka kaam to kuch aur hi hai. Khair ab main ram gaya hu. Aapke baare mein jankar badi khusi hui hai
Comment by Rajesh Roshan — April 21, 2007 #
neeraj jee aap ka comment accha laga
kundan
Comment by kunan srivastava — April 23, 2007 #
adbhut lekh, sundar prawah…badhai…
Comment by chandiduttshukla — August 29, 2007 #
SANJU BABA KI AARTI BAHUT ACHCHHI LAGI KAS SANJU BABA ISE PADHTE TO SAYAD UNKI NIYAT SAPH HO JATI.
(VIKAS/VINAY)
Comment by VIKAS.PRADHAN — September 9, 2007 #
अपना ईमेल जरा मेरे मेल पर भेज दें. लगता है आपसे बतिया कर अच्छा लगेगा. मेरा मेल है :
idsankrityaayan@gmail.com
Comment by Isht Deo Sankrityaayan — September 18, 2007 #
भाषा के जादूगर हैं आप, आपका अपना लेखन तजुर्बे का दूसरा नाम लगता है| शब्द साधारण तो वही है जो शब्दकोश में मिल जाते हैं लेकिन पाठक को अपनी ओर खींचने में समर्थ हैं| ऐसा सब शायद इसलिए है कि आप शब्दों को नहीं बोल चाल के तरीक़े को अहमीयत देते हैं|
मेरे ब्लॉग को पढ़ने के लिए शुक्रिया…
Comment by विनय प्रजापति — September 26, 2007 #
अच्छा लगा आपके बारे में जानकर ।
Comment by अजित वडनेरकर — October 16, 2007 #
I did not knew that you kind off dispise people, of the english sorts………….well hope as you have already converted me like the pages of wordpress…..u make me more likeable to you…..Cheers !!!!!!
Comment by keshav bhardwaj — November 22, 2007 #
well done keep it up agar chaho to aisey achchey do chaar article or bhi likh saktey ho
Comment by Monica — November 26, 2007 #
Hindi main blog padh kar atyant prasannta hui. Aap hi jaise logon ki badolat Hindi falti fulti rahegi.
Comment by pr3rna — December 7, 2007 #
दादा को प्रणाम…
काफी दिनों बाद आपका ब्लाग खोला…आपका मुस्कुराता चेहरा देखकर काफी अच्छा लगा..पुरानी यादें फिर से ताज़ा हो उठी..दादा मैं इस समय लाइव इंडिया में बतौर रिपोर्टर काम कर रहा हूं..आपसे बात करने की तमन्ना है कृपया नं दे या फिर हमें ही फोन कर नं हैं 09313337914
आपका अनुज
दिग्विजय
Comment by digvijay — January 26, 2008 #
HI SIR ,
I AM STUDENT OF UNIVERSITY OF RAJASTHAN , AND I HAVE SOME PROB. WITH UNIVERSITY .CAN I TALK ABOUT THIS MATTER.IF YES THEN PLS REPLAY ME ON SSSSSS_5@YAHOO.CO.IN………………
……………………………..SUNIL
Comment by SUNIL — June 30, 2008 #
Glad to know the Hindi Books available on this site. ……Thank You…..Mumtaz Khan,……6/3, Khari Bawdi, DEWAS (M.P.)……….Mobile No. 9893560368
Comment by Mumtaz Khan — December 7, 2008 #
diwan sahab main bhi hoshangabad ka hu
Comment by shailesh — April 13, 2009 #
by adopting the medium of english we are doing cruelty to ourselves. usually our children have to waste their tremendous energy in learning a foreign language. it may be status quo for some people but it is actually a ubearable burden for the massess. you are right in your every word bhai saheb
Comment by suresh — May 2, 2009 #
Aadrniya Diwan sahab,
Meine pahli bar koi blog khola hai aur saubhagya se aapka lekh pade achcha laga shriganesh narmda ki mati ke lal se hua hai. Me bhi narmada putr hu aur aapke janmsthal Hoshangabad jila (Timarni now distt Harda) ka niwasi hu.
Dhanyawad
Ashish Sakalle
Comment by Ashish Sakalle — May 25, 2009 #