काश हम भी क्रिकेट खेलते

September 26, 2007 at 6:33 pm | In खेल-खिलाड़ी | 14 Comments

बीसीसीआई की भारतीय टीम ने आखिरकार सर उठाकर हिन्दुस्तानी सरज़मी पर क़दम रख ही दिए। इससे पहले अपन आते थे पांचवे-छठवे नंबर पर। कभी-कभार किसी स्पर्धा में खींचतानकर दूसरी पायदान पर नज़र आ जाते थे। हमारी टीम इंडिया की औसत उमर महज़ इक्कीस साल है.. जो स्पर्धा में भाग ले रहे किसी भी देश के जवानों से कम थी। नौजवानों के इस देश में अपन खुद को बूढ़े समझने लगे हैं क्योंकि अपन उन विरले लोगों में से हैं जिन्होंने 1983 की 25 जून को हुआ वो मैच देखा था जिसमें कपिल पाजी ने देश को असली विश्वकप लाकर दिया था। अभी जो मिला है वो फटाफट क्रिकेट का कप है जिसे आईसीसी वर्ल्डकप के समानांतर नहीं रखा जा सकता। विश्वकप तो एक ही होता है और इसे ना जीत पाने की टीस लगातार सालती रहती है। इन सबके बावजूद मेरी नज़र में फ़ाइनल की जीत से भी बड़ी जीत सेमीफा़इनल की जीत रही जिसमें हमारे नौजवानों ने अकड़बाज़ कंगारुओं को सबक सीखाया था। पाकिस्तान से तो अपन तीन सालों में कई दफ़ा जीतते रहे हैं। ऑस्ट्रेलियन्स सबसे खड़ूस और अकड़ू प्लेयर माने जाते रहे हैं। क्रिकेटिया तारीख़ में मेरे लिए यही यादगार दिन माना जाएगा जब हमारी टीम ने अपने मज़बूत इरादों से कंगारुओं को घुटने पर टिकने के लिए मजबूर कर दिया था।

श्रीसंत के तेवर
(सौजन्य-एएफ़पी)

आज टीम इंडिया के स्वागत के लिए मुंबई में जो उत्साह दिखा वो अभूतपूर्व था। 1983 में कपिल की टीम जब मुंबई आयी थी तब बीसीसीआई की माली हालत ठीक नहीं कही जा सकती थी। बल्कि यों कहा जाए कि तिरासी की जीत के बाद ही क्रिकेट ने देश में धर्म की शक्ल लेनी शुरू की थी। बाद में क्या हुआ ये सबको पता है। लेकिन चौबीस साल पहले टीम के स्वागत में लता मंगेशकर ने बीसीसीआई के लिए मुफ्त में प्रोग्राम किया था। इस अहसान को क्रिकेट संघ आज तक नहीं भूला है। मुंबई में होने वाले हर मैच में लता जी के लिए दो टिकटें आरक्षित रखने की परंपरा बनी हुई है।

टीम इंडिया के खिलाड़ियों को बीसीसीआई की ओर से अस्सी-अस्सी लाख रुपए मिले हैं। आईसीसी ने विजेता टीम को अलग से दे ही दिए थे। इधर नेताओं को भी जीत से उत्साहित जनता में वोटर दिखाई पड़े और उन राज्यों की सरकारों ने ऐलान कर दिया कि फलां खिलाड़ी को दस लाख, किसी को बीस लाख तो किसी को प्लॉट वगैरह दिया जाएगा। नागरिक अभिनंदन होगा और पहले से करोड़पति बन चुके खिलाड़ियों को लाखों रुपए ऐसे दिए जा रहे हैं मानो बहती गंगा में से एक दो लोटा पानी ही निकालकर देना हो। कोई ये बताए भई कि जो पहले से लखपति-करोड़पति बन चुके हैं उनको ये सरकारें इतने उदार हृदय से पैसे क्यों बांटती हैं। सभी जानते हैं कि कोई भी नेता देशभक्ति, क्रिकेटिया ज्वार और जीत की खुशी के बीच वोट जुगाड़ने का मौक़ा नहीं गवां सकता। राज्य सरकारों ने ‘माले मुफ़्त दिले बेरहम’ की तर्ज पर सौगातों की घोषणा कर दी। इनकी ज़ेबों से कुछ जाने वाला नहीं है। टीम इंडिया के खिलाड़ी यूं भी करोड़ कमा चुके और आने वाले दिनों में ये क्रिकेटिया ज्वार सर चढ़कर बोलेगा सो विज्ञापनों से भी करोड़ों की कमाई होगी। अभी नौजवान है और तक़रीबन हर खिलाड़ी के सामने पांच से दस साल का क्रिकेट करियर बाक़ी पड़ा है।

अमीरों को और अमीर बनाने के इस उदारवादी दौर में सरकारें खेलकूद की अधोसरंचना सुधारने के लिए पैसा क्यों खुलकर खर्च नहीं करतीं? क्या मधु कोड़ा ने कभी खुद हॉकी होस्टल की सुध ली कि किस स्तर का खाना वहां की बच्चियों को मिलता है? अकेले एम्सर्टडम में इतने सिंथैटिक टर्फ़ हैं उतने तो पूरे भारत में ही नहीं हैं। हॉकी से वोटों का जुगाड़ नहीं होता। हां सही है.. नहीं हो सकता। हिन्दी बोलना शर्म की बात होती है और अंग्रेज़ी में आप सभ्य मालूम पड़ते हैं.. उसी तर्ज पर हमारे राष्ट्रीय खेल हॉकी की क्या बिसात? इस लेख को पढ़ने वाले कुछ लोग शायद ही जानते होंगे कि हॉकी टीम का कप्तान कौन है? भारतीय क्रिकेट में एक बार हमने विश्व पदक जीता था लेकिन हॉकी में ओलम्पिक के आठ स्वर्ण पदक हासिल कर चुके हैं। एक बार विश्वकप जीत चुके हैं। चैंपियन्स चैलेंज एक बार, एशिया कप दो बार, एशियाई खेलो में दो बार, सैफ़ खेलों में एक बार हम सिरमौर रह चुके हैं। अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हमारी हॉकी ने अब तक 54 बार हिस्सा लिया है और तमाम षडयंत्रों (नियमों में फेरबदल की सोची-समझी साज़िश) के बावजूद 16 बार हम विजेता बने। गोरी ताक़तों ने हमारी क्लासिकी शैली को मुरमी मैदानों में पलीत कर दिया। पानी से भरी प्लास्टिक की चादर पर गोली की गति से भागती गेंद ने हमारी ड्रिबलिंग को गटक लिया। इन सबके बावजूद अपनी हॉकी दौड़ती जा रही है। हाल ही मे हमने चेन्नई में अपने खिलाड़ियों का शानदार अजेय खेल देखा है।

हॉकी का लेखाजोखा

टीम इंडिया की जीत का श्रेय लेने की दौड़ में जनता का पैसा पानी की तरह बहाना शर्म की बात है वह भी ऐसे दौर में जब खेलों के विकास के लिए सरकारें पैसा देने में आना-कानी करती हों। हॉकी की बात क्यों करूं.. फुटबॉल में, निशानेबाज़ी, शतरंज, बैडमिंटन में हमारे लोगों को क्या सुविधाएं हासिल है? ज्यादा दूर की भी ना सोचूं तो लगता है कि क्रिकेट के खेल में ही सरकारी सुविधाओं का क्या हाल है? क्या इन सरकारों की बदौलत हमें सचिन से लेकर धोनी जैसे खिलाड़ी मिले है? सरकारों के भरोसे तो हमें क्रिकेट में भी कामयाबी नहीं मिली है। आज क्रिकेट की शोहरत का श्रेय बीसीसीआई के व्यापारिक नज़रिए को जाता है। सरकारों के भरोसे क्रिकेट चलता होता तो अपन यहां भी क्वालिफ़ाइंग राउंड में ही बाहर हो जाते।

मेरे खेल पत्रकार दोस्त ने कल ही एक वाक़ये का ज़िक्र किया था। उसने याद किया कि बैंकॉक एशियाड में स्वर्ण पदक जीतने के बाद हमारी हॉकी टीम के स्वागत के लिए एयरपोर्ट पर मुटठीभर लोग जुटे थे। टीम डेढ़ घंटे तक एयरपोर्ट पर इंतज़ार कर रही थी। धनराज पिल्ले की आंखो में आंसू छलक आए थे। इसी पत्रकार मित्र ने छह साल पहले वह ख़बर चलायी थी जिसमें महिला हॉकी की राष्ट्रीय टीम को रेलवे स्टेशन पर बने नल से पानी लेकर ट्रेन के टॉयलेट तक जाते हुए दिखाया गया था।

हम सबके लिए शर्म की एक ख़बर आज देख रहा हूं। हाल ही में एशिया कप जीतने वाली हॉकी टीम के कोच और चार खिलाड़ी कर्नाटक के मुख्यमंत्री आवास के सामने भूख हड़ताल पर बैठने जा रहे हैं।

मैं पूरे परिदृश्य में हमारी क्रिकेट टीम की जीत को छोटा नहीं करना चाहता। बल्कि हमारे खिलाड़ियों ने वो हासिल कर लिया है जिसकी ज़रूरत लंबे अरसे से महसूस की जाती रही है। इसे किलर इंस्टिक्ट कहा जाता है। आरपी सिंह, युवराज और श्रीसंत में मुझे वो जज्‍बा दिखाई दे रहा हैं जहां मरने-मारने (खेल भावना से लें) का हौसला होता है। लेंडू क्लासिकी अंदाज़ के प्लेयर अब इतिहास की बात हो चुके हैं। फटाफट क्रिकेट का स्वरूप लेंडू प्लेयरों को मैदान के बाहर ही खड़ा रखता है। शुक्र है कि हॉकी और क्रिकेट दोनों में हमें धाकड़ खिलाड़ी दिखने लगे हैं। कोफ्त उन नेताओं से हो रही है जो इस पूरे परिदृश्य में एक बार फिर अपनी शातिराना हरकत दिखा चुके हैं। अच्छा होता कि अमीर खिलाड़ियों का केवल सम्मान किया जाता और पैसे उन हॉस्टलों, स्टेडियमों और खिलाड़ियों को दिए जाते, जिन्हें ज़रूरत है। आज वे बच्चे ज़रूर अफ़सोस कर रहे होंगे कि काश उनने भी क्रिकेट ही खेला होता।

अंत में..
कल रात से दो-तीन चैनल नरेंदर मोदी को गरिया रहे हैं। अपने प्रिय सेकुलर एजेंडे के तहत चैनलों ने इस बार पठान बंधुओं को पैसा न दिए जाने के लिए मोदी को निशाने पर ले लिया है। पेपरों ने छापा..फिर कुछ और चैनल गरियाने लगे तो मोदी ने घबराकर पहले से बने एक करोड़ रुपए के सरकारी फंड में से पांच-पांच लाख रुपए देने की घोषणा कर दी। क्यों भई? पहले कर देते तो इत्ता सुनना पड़ता क्या?
चलिए बात पैसों के लेन-देन की चली ही है तो अपन बता दें कि पेशेवर रवैया क्या होता है। लोगबाग अपने को पेशेवर बनो, पेशेवर बनो की सीख देते हैं। बॉसी एटीट्यूड के लिए ऐसा कहना आज की ज़रूरत माना जाता है। बनना मुमकिन हो ना हो पर बोलना ज़रूरी है। तो इधर, भारत में खबरिया चैनलों ने फटाफट क्रिकेट का प्रसारण कर रहे ईएसपीएन चैनल के फुटेज जमकर काटे। जितनी लिमिट है उससे आगे कूद फांदकर एक-एक ओवर तक दिखा गए। कुछ अतिउत्साहित चैनलों ने पारितोषिक वितरण समारोह का सीधा प्रसारण तक कर दिया। इस काम में दूरदर्शन थोड़ा सहमा-सा था। लेकिन मैं सलाम करता हूं सीएनएन को जिसने बाक़ायदा जोहानिसबर्ग से ईएसपीएन के लोगो के बगैर प्लेन फीड लेकर (खरीदकर) अपनी रिपोर्ट बनायी। इसे कहते हैं पेशेवर रवैया !! ठीक है या नहीं? मोदी से पैसा मांगने वालों.. अब फटाफट ईएसपीएन का हिसाब चुकता कर दो।

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