क्रांति का मैनेजमेंट

September 17, 2007 at 3:48 pm | In कटाक्ष, राजपाट | 8 Comments

मन अत्यंत दुखी है। एक रमेश (लालू जी तो कै रहे थे रमेसवा..)। उसे शर्म नहीं आई? उसने बजाए इस बात के अपना नाम जयराम के जगह जॉयरम करवा लेता… अम्बिका सोनी पर ही सवाल उठा दिया। इसकी घोर निंदा की जानी चाहिए। कहां से कहां पहुंच गया चमचिस्तां हमारा? इसलिए तो इंडिया डेवलप नहीं हो पा रहा है। एक ज़माना था, जब इशारा पाते ही आस्था अभियान शुरू हो जाता था। लोग जेल जाने से लेकर हवाई जहाज़ का अपहरण करके विधायक बनने तक में अपनी शान समझते थे। अब ये गत आ गई है? इस रमेसवा को पता नही ता कि अम्बिका जी कितनी अच्छी इटैलियन जानती हैं। उनसे ज़्यादा कौन जान सकता है कि राम थे या नहीं थे। कोई कन्फ़्यूज़न होने पर सीधे पूछ सकने की पोज़ीशन में भी सबसे अच्छे ढंग से वो ही विराजमान हैं। ये रमेस क्या जाने इटैलियन? फिर भी इतना बोल गया।


हसे सहा नहीं गया ये दुख… हमने अपने एक साथी को बताया। ये साथी भी बहुत ही ग़ज़ब है। पहले आईबी कवर करता थे, फिर कॉग्रेस कवर करने लगे। हमने अपनी व्यथा उसे सुनाई। बोला- नादान हो, शाम को मिलो फिर रात को बताएंगे।

निर्देशानुसार प्रेस क्लब में हम भी पहुंच गए। वहां का माहौल देखकर हमें डर लगने लगा। जिस तरह मुर्ग़े टूट रहे थे, जिस तरह पैग बढ़ते थे और खाली होते थे। उसे देखकर हमें डर ये लगा कि कहीं हमारी भागीदारी की शिनाख़्त परेड पेमेंट काउंटर तक पहुंच गई, तो इस महीने की तनख्वाह तो खामख्वाह हो जाएगी। वहां मौजूद लोगों से यह कहकर हाथ जोड़ लिए कि डॉक्टर ने खाने-पीने को मना कर रखा है… किसी ने ज़्यादा आग्रह भी नहीं किया और हमने हिम्मतपूर्वक हर मोह पर क़ाबू पाए रखा। पहली बार हमें बहुत आसानी से विश्वास हो गया कि गौतम बुद्ध ने एकदम सही बात कही थी। इच्छा ही सारे दुखों का मूल है।

शराब का नशा दो तरीक़े से होता है। एक जब आप इसे पीते हैं और दूसरे तब जब आप इसे सिर्फ़ देखते हैं। हम दूसरे ट्रांस में थे। ऐसे में प्रतिक्रियावादी विचार ज़्यादा कौंधते हैं। क्रांति सस्पेंड हो जाती है। वहीं पहला ट्रांस क्रांतिकारी होता है और जब तक हैंगओवर रहेगा, क्रांति तेरा नाम रहेगा के नारे लगवाता रहता है।

इच्छा और दुखों का विचार हमारी प्रतिक्रियावादी कुठा को गौतम बुद्ध तक तो ले ही जा चुका था। दिमाग़ में ये भी आने लगा कि अगर कल को केंद्र सरकार ने कह दिया कि गौतम बुद्ध कोई थे ही नहीं तो.. फिर हम जैसे लोग क्या करेंगे। ग़म गलत न करने की ग़लती भी गलत नहीं की जा सकेगी। इससे फिर याद आया कि हम आखिर यहां क्यों आए हैं। वैसे ये बहुत मौलिक सवाल है और अपना मानना है कि हर इंसान को सुबह से शाम तक ये सवाल कम से कम दस बार अपने आप से पूछना चाहिए। खैर क्लब यात्रा समाप्त होने की कगार पर थी। आसपास की बत्तियां बुझ चुकी थीं। पेमेंट का झंझट भी नहीं बचा था। एक नेतानुमा पत्रकार, पत्रकारनुमा ठेकेदार और ठेकेदारनुमा अख़बार मालिक, मालिकनुमा नेता जी, जो लगातार इस खिलाई-पिलाई को बाहर से समर्थन देते आ रहे थे। उन्होंने हमारे मन का बोझ बहुत हल्का कर दिया। यहां तक कि वेटर भी बिल लेकर उन्हीं के पास आया था। पता चला कि अपना खुद का अख़बार निकालते हैं, बहादुरगढ़ से, पाक्षिक है।

बाल-बाल जान बचना इसे कहते हैं। इससे हमारा प्रतिक्रियावादी हैंगओवर ट्रांस टू थोड़ा कम हुआ। हम फिर अपने सवालों से लैस हो गए। बॉस, ये रमेश को क्या हो गया? बॉस को कुछ समझ में नहीं आया। बोले- कुछ तो नहीं, एकदम फिट है। अभी शाम को ही मिला था।
नहीं.. नहीं, वो अम्बिका से इस्तीफ़ा मांग रहा है।
है तो… ठीक तो है।
माने अब ये दिन आ गए? – हमने अपनी पीड़ा व्यक्त कर दी।
नहीं भाई.. उससे कहा गया था कि तुम ऐसा कह दो, तो उसने कह दिया।
इससे क्या होगा। हमारी लघुशंकाओं की तो मानो झड़ी लगी हुई थी। प्रेस क्लब का पिछवाड़ा उपयुक्त स्थान भी है। ऑबिवियस है.. मुद्दा कहीं अपोज़ीशन के हाथ न लग पाएं… और सोनियाजी तक कोई बात ना आ पाए।
एक बात और है… इससे ये भी साफ़ हो जाएगा कि कॉग्रेस के अंदर कहीं कोई खिचड़ी पकाने की हिमाकत तो नहीं कर रहा है।
लगा कि ट्रांस वन कभी-कभी ज़्यादा बुलवा देता है।
खिचड़ी…. कैसी खिचड़ी??
अरे पता चल जाएगा ना कि कहीं किसी ने रमेश के सुर में सुर तो नहीं मिलाया। पार्टी सुरक्षित तो है ना।
बड़ी तसल्ली हुई। लगा कि अपने देश का ही नहीं बल्कि इटली भी सुरक्षित हैं।

बॉस तक तक रंग में आ चुके थे। बोले- ये जो पॉलीटिक्स है ना.. अब इसमें बहुत बड़े पैमाने पर मैनेजमेंट घुस चुका है। प्रोफ़ेशनल मैनेजर रखने पड़ते हैं। मोटी तनख्वाह लेते हैं। बल्कि तनख्वाह तो कोई इश्यू ही नहीं होती है।

तनख्वाह का ज़िक्र होते ही प्रतिक्रियावादी हैंगओवर ट्रांस टू फिर शुरू हो चुका था.. हमने कहा- बॉस, अब घर चलें.. घर पर वेट हो रहा है।
हां हां बिल्कुल..।
हमने कहा- आप नहीं जा रहे हैं? एक और लघुशंका की अभिव्यक्ति।
नहीं.. कहीं और जा रहा हूं। कोर मैनेजमेंट वालों ने बुलाया है। पत्रकारों के बिना कैसे मैनेजमेंट करेंगे। बॉस का ड्राइवर आ गया था, ट्रांस वन चरम पर था। हमने देखा मैनेजमेंट का नाम भी बड़ी आसानी से ट्रांस वन के सुरूर की दिशा बदलवा देता है। हम फिर लघुशंका के मूड में आ गए। बॉस की कार उन्हें लेकर चली गई… सवाल चले गए… जवाब मैनेज हो चुके थे… क्रांति शुरू होने वाली है… कोई कह रहा था… अगले साल तक हो ही जाएगी। करात ने ऊपर बात कर ली है।

लेखक- ज्ञानेंद्रनाथ, सीनियर कॉपी एडीटर, इंडिया टीवी

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