कैमिकल लोचा… हे राम
September 15, 2007 at 6:52 pm | In कटाक्ष | 38 Commentsव्यंग्य रचनाओं में उस्ताद फुरसतिया को उनके जन्मदिवस पर सप्रेम भेंट.
ऑफ़िस से घर की ओर पैदल जाना होता है.. बीस मिनट की दूरी पैदल चलते पूरी हो जाए तो दो फ़ायदे और एक मजबूरी होती है। एकमात्र मजबूरी यह कि अपनी ऑफ़िशियल औकात के लोग अब कारों में चलते हैं और अपने पास पैसा नहीं तो कार नहीं। दो अनॉफ़िशयल फ़ायदे गिनाकर मैं इस इकलौती मजबूरी को ढांक लेता हूं। पहला फ़ायदा यह कि इससे सेहत बनी रहती है और दूसरा गली-कूचों से निकलते हुए मेरे पत्रकारी मन की संवेदनाओं को बड़ी राहत मिलती है। अपने जागरुक और संवेदनशील होने का भ्रम बना रहता है। यहां से गुज़रते हुए अपने ज़मीनी जुड़ाव के सरोकारवादी दंभ में कभी-कभी इतना चूर हो जाता हूं कि नाली से भी जुड़ाव महसूस करने लगता हूं।
फ़िल्मसिटी से वाया रजनीगंधा चौक होते हुए अपने सेक्टर की ओर पैदल जा रहा था। बीच में एक पुल पड़ता है, जिसके किनारे पसरे अंधेरे से पगडंडी पर चलते हुए जाना होता है। कुछ ही दूर चला था कि एक साया मेरी ओर बढ़ता जा रहा था। दस-बारह मीटर की दूरी बची थी कि अचानक से मेरी नज़र उस साये के चेहरे पर पड़ी. वो किसी दिव्य पुरूष का चेहरा था। पास पहुंचते ही इस दिव्य पुरूष के दर्शन मात्र से मेरे हाथ-पैर ढीले हो गए। चेहरे-मोहरे से जाने-पहचाने से लग रहे थे। समझ नहीं आ रहा था कि कौन हो सकता है यह दिव्य पुरूष। सिर के पीछे प्रकाश की छटा बिखरी थी, माथे पर तिलक और कानों में कुंडल, लंबी नाक और बड़ी आंखे.. रंग सांवला। चेहरे-मोहरे से अपने भगवान राम दिख रहे थे। मैने सोचा कि दशहरे के लिए स्पेशल प्रोग्राम कराने कोई स्टूडियो लेकर आया होगा..खाली टाइम में यहीं घूम रहे होंगे रामलीला वाले ये सज्जन.. लेकिन प्रभामंडल देख हैरानी में पड़ चुका था। मुझे वो अलौलिक लग रहे थे। अंधेरे में चेहरा ही नहीं बल्कि पूरा शरीर शनैः शनैः प्रकाशित हो रहा था…मैंने सोचा कि कहीं लगायी तो नहीं…फिर याद आया कि अरे, अभी घर पहुंचा ही नहीं हूं।

भक्त नैतिक रूप से समर्थवान होना चाहिए जो भगवान से आंखे चार कर सके। मेरी क्या बिसात.. मेरे माथे पर पसीना आने लगा। कुछ पल वो देखते रहे, मैं संभला और पूछा.. “आप मुझे देख रहे हैं?” उस सज्जन ने कहा- “हां पुत्र, तुम कहां जा रहे हो? क्या मेरी सहायता करोगे?”
मैंने हिम्मत कर पूछा.. “आ..आ..आप कौन?”
वो बोले- “मैं राम हूं। अयोध्या का राम।”
इतना सुनते ही मैं मूर्छित होने की कगार पर था कि फौरन संभला और सवाल किया, रा.. रा.. राम.. आप… आप प्रभु श्री राम?
उन्होंने कहा, “हां पुत्र… मैं ही राम हूं।”
इतना कहते ही उनका एक हाथ ऊपर उठा..हथेली खुली और उसमें से मेरी तरफ़ आशीर्वाद की किरण लपकी। ठीक वैसे ही जैसे फ़िल्मों में देखा था। धन्य हुआ मैं.. साक्षात प्रभु मेरे सामने थे। अहा.. मर्यादा पुरूषोत्तम राम वो भी अकेले में.. कई आर्शीवाद, वरदान वगैरह मिलेंगे, यह सोचकर खुश हुआ जा रहा था। सारी दुनिया का ऐश्वर्य मेरी आंखों के सामने तैर रहा था।
“पुत्र, मेरी सहायता करो” प्रभु बोले। मैंने कहा, “हे मर्यादा पुरुषोत्तम, हे दयानिधान, सर्वशक्तिशाली.. मैं तो धन्य हूं आपके दर्शन मात्र से.. किंतु प्रभु.. मैं अदना-सा प्राणी आपकी क्या सहायता करूं?”
“पुत्र, बैकुण्ठधाम में मुझे समाचार मिला था कि मेरे होने ना होने की बात कलयुग में उठ रही है। पृथ्वीलोक के किसी राजा ने मेरे अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगाया है।“
नहीं.. नहीं प्रभु.. राजा ने नहीं रानी ने- मैं तत्क्षण बोला। प्रभु फिर बोले, “हां वही पुत्र.. किंतु मैं विचार कर रहा हूं कि मेरे होने नहीं होने का सवाल कैसे उठता है। क्या कलयुग में प्राणियों ने मेरी शिक्षाएं विस्मृत कर दीं? क्या असुरों का वर्चस्व हो गया?”
“नहीं प्रभु, ऐसे असुर तो इधर इंडिया में दिखते नहीं। हां.. बाहर से इम्पोर्ट होते रहते हैं..यहां की सरकार पकड़ भी ले तो घुमा-फिराकर पुष्पक में बिठाकर बाहर तक एक्सपोर्ट कर आ जाती है। बाक़ियों को छुड़ाने के लिए ह्यूमन राइट्स वाले हैं। किंतु रावण के जिन वशंजों को आपने जीवनदान दिया था, उन्हीं की पुश्तों ने यहां पार्टियां ज्वाइन कर ली हैं। वे ही राजपाट संभाल रहे हैं।“
प्रभु बोले- “पुत्र, जो भी हो। चूंकि, सभी युगों में विविध आचार व्यवहार संहिता होती आई है। इसलिए मैं कलयुग में आकर वर्तमान मानदंडों के अनुरूप आचरण करूंगा। नारद मुनि का कहना था कि किसी न्यायालय में मुझे अपने अस्तित्व को प्रमाणित करने के लिए सशरीर उपस्थित होना पड़ेगा। मुझे वहां ले चलो जहां न्यायालय हो। मैं स्वयं उपस्थित होकर अपने होने का प्रमाण दूंगा पुत्र।“
कहां मैं सांसारिक सुखों को भोगने की प्लानिंग कर रहा था और कहां प्रभु मुझे अदालती चक्कर में फंसाने की बात कर रहे थे। मैं भक्तिभाव की तंद्रा से जागा… सांसारिक अवगुणों से ग्रस्त हूं, इसलिए तुरंत भक्तिरस के कैमिकल लोचे से बाहर आ गया। सबसे बड़ा डर मुझे प्रभु के इस तरह एकाएक पदार्पण पर था। तत्क्षण मेरा दिमाग़ चकराया और मुझे सरकारी हलफ़नामे से लेकर चक्काजाम, ख़ून खराबा, कोर्ट कचहरी, संसदीय जूतम-पैजार, रैली-भाषण, दंगे-फ़साद सब याद आने लगे। ओहहह…
“प्रभु… सरकार से बड़ा कोई नहीं है प्रभु.. सरकार ने कह दिया कि आप नहीं थे तो मानने में क्या हर्ज़ है? मान लो प्रभु.. सरकारों से पंगे लेना विवेकपूर्ण कृत्य नहीं है प्रभु। प्लीस, आप इधर कोने में आइए हे पुरुषोत्तम.. कहीं यूपी पुलिस ने देख लिया तो शामत आ जाएगी। आए दिन एनकाउंटर करते रहते हैं। पता नहीं कब रासुका-वासुका, टाडा-मकोका लगाकर अंदर कर दे। सरकार ने कहीं आपको देख लिया तो राष्ट्रद्रोह का आरोपी बनाकर जेल में ठूंस देगी। प्रभु, आप कोई नेता- अभिनेता तो हो नहीं जो ज़मानत-अमानत करवा लेंगे। आप जगत के सामने सशरीर आ गए तो सरकार की विश्वसनीयता का क्या होगा? सरकार की बेइज़्ज़ती हो जाएगी। हे कौशल्यानंदन…. मेरी मानो कलटी मार देते हैं यहां से..।“
प्रभु बोले, “तो चलो पुत्र.. जहां से आए हो वहीं चलते हैं।“
मैं सकपका गया. तुरंत बोला..”नहीं नहीं प्रभु..जहां से आया वहां फिर क्यों ले जा रहे हो। ड्यूटी पूरी कर चुका हूं। आप ही का नाम लेकर ड्यूटी करता हूं। ‘जितनी तनख्वाह उतना काम, रघुपति राघव राजा राम’… उधर फ़िल्मसिटी है। कई चैनलों के स्टूडियों हैं। अपन वहां पहुंच गए और किसी रिपोर्टर ने देख लिया तो पकड़ लेगा। फिर जो दुदर्शा होगी… ओह। सारा दिन आपसे चमत्कारों के खेल कराएंगे, रामानंद सागर की रामायण के डायलॉग बुलवाएंगे। दर्शकों से फ़ोन पर सीधी बात कराएंगे। इतना ड्रामा जब दिनभर में हो जाएगा तो रात होते-होते पुलिस भी बुला लेंगे और सरेंडर का लाइव टेलीकास्ट करेंगे। दिन में चैनल और फिर रातभर पुलिस। बड़ा बुरा होगा प्रभु, भक्त की अर्ज सुनो और निकल चलिए मेरे साथ..।“
इतने अनुरोध पर भी प्रभु नहीं माने.. कहने लगे, “भक्त.. तो आओ इधर चलते हैं..” और आगे बढ़ने लगे।
मैं उनके चरणों में लपका और कहा- “उधर, कहां जाना है प्रभु, आप मर्यादा पुरूषोत्तम राम हैं। उधर मर्यादित आचरण नहीं होता प्रभु। वो रास्ता दिल्ली को जाता है। जैसे आपकी राजधानी अयोध्या थी, इस कलयुग में भारत (अनुच्छेद एक के अनुसार भारत, जो कि इंडिया है) की राजधानी यही दिल्ली नगरिया है। वहां बहुत सारे राजनीतिक दलों के दफ़्तर हैं। प्रभु चुनाव निकट हैं, आप सशरीर हाथ लग गए तो रैलियां-भाषण करा-कराकर थका देंगे। आपके आने से पहले ही रामानंद की रामायण के कई एक्टरों को ये लोग रोड शो करा चुके हैं। एक बार इन पर तरस खाकर इनका काम कर भी दिया तो अगले चार साल तक ये आप पर तरस नहीं खाएंगे। हे अयोध्या नरेश, आप इस कचाइन में कूदने की चेष्टा क्यों कर रहे हैं।“
प्रभु मेरी प्रार्थना मान गए और मेरे साथ चलने लगे। हम कुछ आगे बढ़े.. नाला करीब था। दिल्ली की सारी गंदगी इसी नाले में बहते हुए नोएडा तक आती है। बदबू से नाक सिकोड़ते हुए प्रभु आगे बढ़ते रहे। नाले पर बने पुल को देखते ही प्रभु बोले, “पुत्र, नल और नील की याद आ गई। उन कुशल वानरों ने इससे सहस्त्र गुना चौड़े सागर के दो पाटों पर सेतु बना दिया था।“
मैं नए संकट में ! जैसे-तैसे प्रभु को फ़्लैशबैक में जाने से रोकता हूं, वो बार-बार त्रेतायुग में चले जाते हैं। जिस सवाल से पुरातात्विक विभाग वाले नहीं पार पा सके, उस सवाल को मेरे जैसा अपुरातात्विक महत्व का प्राणी से कैसे हल कर सकता है। मैंने दोबारा कहा “चलिए आप मेरे साथ”..प्रभु मेरे साथ चल पड़े।
एक रिक्शेवाले को रोका। वो रुककर प्रभु को ग़ौर से देखने लगा। इससे पहले कि वो भी जकड़ता, मैंने फ़ौरन रिक्शेवाले को कहा, “क्या देख रहे हो भाई, हम रामलीला वाले हैं। सेक्टर १५ ले चलो, पंद्रह रुपए देंगे।“ प्रभु को बिठाया आगे और मैं पीछे लटक लिया। रिक्शा घर तक पहुंचा.. शुक्र है, किसी ने ज्यादा देखा-देखी नहीं की..मेरे अनुमान से सभी अपने अपने घरों में भारत-पाकिस्तान के बीच ट्वेंटी-ट्वेंटी विश्वकप का मैच देख रहे थे।
घर पहुंचते ही प्रभु को अपने कमरे तक लेकर आया और हाथ पैर धुलाए। घर में सारी चीज़ें अस्त-व्यस्त पड़ी थीं। प्रभु देखकर मुस्कुराए और कहा, ”तुम अभी तक कुंवारे हो।” मैंने कहा, ”प्रभु आपकी कृपा रही तो आगे नहीं रहूंगा।”
प्रभु को शबरी ने जूठे बेर खिलाए थे। बेर मेरे पास कहां से होते.. फ्रिज खोलकर देखा तो कोला, केक और अगड़म-बगड़म पड़े थे। नीचे देखा .. हां सेब दिखा.. मैने प्रभु को प्रस्तुत किया। अयोध्यानंदन सेब खाने लगे। कृपानिधान किसी का निवेदन ठुकराते नहीं.. मैं प्रभु के चरणों में बैठ गया।
टीवी चालू किया तो चैनल खबरियाने लगे। सरेआम मुंह काला करने की खबर, तोड़-फोड़, रिश्वतखोरी, स्टिंग ऑपरेशन, बलात्कार… प्रभु की आंखे छलछला रही थीं… मैंने टीवी बंद कर दिया..
प्रभु की डबडबायी आंखे.. मेरी ओर उठी..और कहा, “पुत्र, तुमने अच्छा किया जो मुझे बता दिया कि इस स्वार्थी संसार में मेरे जीवनचरित का कोई महत्व नहीं रहा। अब मेरी किसी को आवश्यकता नहीं। ऐसे कलयुग से मेरा युग अच्छा था। राक्षस उस काल में भी थे किंतु उस समय सुर और असुर में अंतर देखते ही समझ आ जाता था। क्या करूंगा इन्हें अपने अस्तित्व का प्रमाण देकर। मुझे वापस जाना होगा.. अपने बैकुण्ठधाम में”
प्रभु के वचन सुनकर मेरी आंखों में आंसू उतर आए.. प्रभु सर्वशक्तिशाली थे। आज अपने को अप्रासंगिक मान रहे हैं। मुझे अपने कलयुगी होने पर शर्म आने लगी।
मैंने प्रभु से कहा, “हे मर्यादा पुरुषोत्तम… आप मेरे मन में बस जाओ.. मन में रहो प्रभु, आप खुद यही कहते आए हो कि मैं तो चाहने वाले के दिल में रहता हूं, भक्तों के हृदय में रहता हूं। मेरे मन में ही रहो प्रभु, सरकार का डर भी नहीं होगा। सरकार खुद कह चुकी है कि लोगों के मन में रहते हैं राम। तो क्यों ना संप्रभुत्वसम्पन्न लोकतांत्रिक कल्याणकारी राज्य में संवैधानिक आचरण करते हुए आप मेरी बात मान ही लो.. हे कौशल्यानंदन, मान लो मेरी बात.. मेरे मन में रहो।“
और प्रभु मान गए। मेरे राम मान गए और मेरे मन में समा गए..
राम हृदय में हैं मेरे, राम ही धडकन में हैं
राम मेरी आत्मा में, राम ही जीवन में हैं
राम हर पल में हैं मेरे, राम हैं हर स्वांस में
राम हर आशा में मेरी, राम ही हर आस में
राम ही तो करुणा में हैं, शान्ति में राम है
राम ही हैं एकता में, प्रगति में राम हैं
राम बस भक्तों नहीं, शत्रु के भी चिन्तन में हैं
देख तज के पाप रावण, राम तेरे मन में हैं
राम तेरे मन में हैं, राम मेरे मन में हैं
राम तो घर घर में हैं, राम हर आंगन में हैं
मन से रावण जो निकाले, राम उसके मन में हैं
(अंतिम पंक्तियां जावेद अख़्तर की लिखी हुई हैं. फ़िल्म स्वदेस से साभार)
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वाह वाह! आनंदा आ गया पढ़ कर।
बहुत अरसे बाद हिंदी चिट्ठों पर अच्छे स्तर का लेख पढ़ने को मिला।
क्या धोया है राम वादियों और अ-राम वादियों दोनो को।
Comment by जगदीश भाटिया — September 15, 2007 #
शानदार, बहुत खूब!!
Comment by Sanjeet Tripathi — September 15, 2007 #
मै थोडी बेवकुउफ हूँ, अंत तक चलते चलते ऐसा लगा नही की यह कटाक्ष है, मुझे सच सा लगा, हा समाज पर बहुत कसा हूआ सा व्यंग है… बढिया लेख
Comment by गरिमा — September 15, 2007 #
बढ़िया व्यंग्य, राम के होने का तथ्य मांगा जा रहा है। कार्टून भी लग गया। किसी और धर्म का कार्टून लगा देते तो हंगामा हो जाता, जैसा डेनमार्क में हुआ था। यह हम हिन्दू ही हैं जो सब कुछ सहन कर लेते हैं। यह हमारी विशेषता भी है।
कठमुल्लों का कार्टून छापकर देखो. सरकारी प्रश्रय में विरोध होने लगेगा।
Comment by जीतेंद्र खुराना — September 15, 2007 #
सचमुच आज राम पृथ्वी पर आ भी जायें तो उन्हें अपने होने का प्रमाण देना पड़ेगा। बहुत कसा हुआ और सटीक व्यंग।
सबको सदबुद्धि दे भगवान….. हे राम
Comment by सागर चन्द नाहर — September 15, 2007 #
very nice
Comment by Dr. Chayanika Uniyal — September 15, 2007 #
बहुत मज़ा आया। वाकई कई दिनों के बाद कुछ ऐसा पढ़ने को मिला जिसमें बात भी थी और व्यंग्य भी भरपूर था। उम्दा लेखन। ढेरों बधाई।
Comment by ओम प्रकाश — September 15, 2007 #
शब्द नही है मित्र……..बहुत ही उत्तम विचार लिखे है आपने….
आज के युग मे राम बस वोट लेने का साधन बन के रह गये है….
जब स्वार्थ होता है तभी याद आते है राम!!
Comment by Ashish — September 15, 2007 #
सही लिखे हो दादा, बहुत कसा हुआ कटाक्ष है।
वैसे एक सुधार कर लो, सतयुग में राम के पूर्वज सूर्यवंशी राजा सत्यवादी हरीशचंद्र हुए थे। मर्यादा पुरुषोत्तम तो त्रेता युग में हुए थे!
उसके बाद द्वापर युग में श्री कृष्ण हुए थे और कलयुग में हम लोग हुए हैं!
Comment by Amit — September 15, 2007 #
बढ़िया है नीरज भाई….बधाई
Comment by reetesh gupta — September 16, 2007 #
नीरज जी, आपने बहुत सटीक और समयानुकूल व्यंग्य-कथा लिखी है! अति रोचक शैली में।
मुझे एक चलचित्र “य़ूँ ही कभी” की भी स्मृति हो आयी, जिसमें भगवान को न्यायालय में उपस्थित होना पड़ता दिखाया गया है , संजाल पर खोजने पर अधिक विवरण भी मिल गया। सन्दर्भ के लिये :
http://www.imdb.com/title/tt0388554/plotsummary
Comment by राजीव — September 16, 2007 #
बहुत ही बढिया
Comment by DR PRABHAT TANDON — September 16, 2007 #
बहुत खूब!!
Comment by नितिन — September 16, 2007 #
वाह नीरज भाई बहुत ही रुचिकर और सटीक व्यंग्य। काफी दिनों बाद इतना उम्दा लेखन पढ़ने को मिला। कार्टून बहुत ही सटीक और मजेदार है।
Comment by श्रीश शर्मा — September 16, 2007 #
बहुत सही, झकास।
अच्छा लिखे हो, प्रभु तो हम सभी के मन मे है, फिर आज राम के नाम की विश्वसनीयता खतरे में क्यों पड़ रही है।
बहुत अच्छा लेख।
Comment by जीतू — September 16, 2007 #
this is nice keep it up.
Comment by sayeed alam — September 16, 2007 #
कम आते हो, पर जब आते हो तो बस छा जाते हो.
छा गए गुरू.
ह-राम-यों को सही सबक दिया है.
हे राम!
Comment by pankaj bengani — September 16, 2007 #
Jai Sri Ram
Amazing.. nice piece of writing
Best wishes
Comment by Sweta Ranjan — September 16, 2007 #
Bahut Badhia Neeraj Bhai…
Comment by Md Afsar — September 17, 2007 #
Very Good….dada.
Comment by aftab — September 17, 2007 #
अरे वाह, हमारे जन्मदिन पर बड़ा धांसू लेख लिखा। वाह, बधाई। धन्यवाद भी कि ये हमें समर्पित हो गया। ऐसे ही जल्दी-जल्दी समर्पण करते रहा करो भाई। इसी बहाने लेख मिलेंगे पढ़ने को धांसू!
मन में बसे राम की कृपा शीघ्र हो और कुंवारापन जल्दी खतम हो।
Comment by अनूप शुक्ल — September 17, 2007 #
@ फुरसतिया जी. आदरणीय, जो मेरे मन से श्रेष्ठ जान पड़ा वही आपको भेंट किया. पोस्ट के साथ कमेंट्स भी. आपको पढ़ पढ़कर ही सीखता आया हूं.
Comment by neerajdiwan — September 17, 2007 #
[...] उधर नीरज दद्दा के ब्लॉग पर पढ़े रहे कि परभू राम को भी प्रमाण दे की जरूरत है, हम ठहरे मामूली गरीब आदमी, तो हमार को [...]
Pingback by हमरी फोटू लगी गैलरी मा « दुनिया मेरी नज़र से - world from my eyes!! — September 18, 2007 #
अरे कहें रावण को निकलने की बात कह राहे हैं महराज? जीना मुहाल हो जाएगा कलजुग में रावण के बिना.
Comment by Isht Deo Sankrityaayan — September 18, 2007 #
अच्छा लिखा..
Comment by अभय तिवारी — September 18, 2007 #
Adbhut… Sabko gazab ka dhoya hai… Cartoon bhi ekdam satik hai… Ram ke cartoon se bhi Ram ki mahima badhati hi hai.
Badhai…
Comment by Alok Vani — September 18, 2007 #
सिपाही हो तो आप सा. वाह.. आप ही सच्चे सिपाही हैं.
Comment by Pawan — September 21, 2007 #
अच्छा हुआ…जो मैने अपना रास्ता बदल लिया…वरना मोटरसाईकिल की सीट पर बैठकर जाते… तो आपका कभी भगवान राम का साक्षातकार नहीं हो पाता…और हम सुधी पाठकगण को इतने बढ़िया कटाक्ष से वंचित हो जाते…वैसे भगवान राम से अकेले से दुकेले होने का आशीर्वाद तो आपने प्राप्त कर ही लिया है इसलिए अब एक चारपहिया ले लो ताकि भगवान राम को लिफ्ट भी दे सको…बेचारे को रिक्शे पर ले गए…खिलाने पिलाने का भी बढ़िया इंतज़ाम नहीं किया कम से कम…पित्ज़ा या फिर बढ़िया मंचूरियन(वेज)खिला देते…रास्ते में ही मिलता है…कलयुग से स्वादिष्ट पकवानों से भगवान को महरूम कर दिया आपने….
दोस्त…चौराहेवाला (वहीं जहां फटफिटया लगा कर अपन गप किया करते थे)
Comment by दोस्त चौराहेवाला — September 22, 2007 #
वाह! वाह !! वाह!!!
अद्भुत. इसे व्यंग्य कहा या यथार्थ , कथा या कटाक्ष , कुछ भी.
लेखनी का चमत्कार .
पढ्कर मज़ा आ ही गया.
Comment by Arvind Chaturvedi — September 24, 2007 #
kalyug mai ram pareshan ram ram sahab
Comment by neeraj — June 12, 2008 #
wah bhai wah maja aa gaya . bahut dino ke bad koi supar chij padane ko mili. thank you
Comment by manohar soni manasa — January 27, 2009 #
kya lekha sir, awesome, aap ke lekh ko padh kar mujhe bhi lekhne ka bukhar chadne laga hai
Comment by pragati — February 2, 2009 #
it was too nice sir….really it was fabulous…
Comment by Sandeep — July 10, 2009 #
ram ram sa
kaai chokho kataksh likhya ho
mann ke aantre thaanke liye aur bhi aadar badh gayo
kaai likho ho…waah waah!!!
australia maaye reh ke to aur bhi prasangik laage hai thaanko lekh
Comment by nisha — July 11, 2009 #
aap to kamaal ho……….
Comment by Hemant Kumawat — July 13, 2009 #
It is osome…..really u wrote truth…..
Comment by Ankit chaudhary — July 17, 2009 #
Amazing feature. Straightly sarcastic,witty and deeply effective article. The empact is not on mind but on heart. Lovely reading.
Comment by Mrs Neetu Shrivas — July 28, 2009 #
superb
Comment by himanshu — August 24, 2009 #