डूब मरो हिंदुस्तांवालो, लानत इस खामोशी पर…
August 2, 2007 at 7:39 pm | In भारतनामा | 13 Commentsनवभारत टाइम्स में छपा ताज़ा लेख हमारी संवेदनहीनता पर प्रहार कर रहा है।
लेखक – उमेश स्रोत- नवभारत टाइम्स
कर्नल वी . वसंत ने भारत – पाक सीमा पर आतंकवादियों से लड़ते हुए जान दे दी। लेकिन मीडिया के लिए यह खबर नहीं बन सकी। आम भारतीय को जैसे इन विषयों में कोई दिलचस्पी नहीं रही। हो सकता है , सैनिक जान देने के लिए ही सेना में जाता है इसलिए किसी सैनिक की मौत पर न तो कोई हल्ला होता है और न ही कोई पॉलिटिशन बयान देता है। हमारा सैनिक आज जवाब चाहता है , आखिर उसके त्याग की इस देश के लिए कोई कीमत है या नहीं ?
पिछले तीन दिनों में तीन सीन भारतीय पटल पर उभरते हैं। तीनों ही दृश्यों में आतंकवाद स्थायी भाव है। संजू बाबा यानी संजय दत्त 1993 के बम्बई के सीरियल बम ब्लास्ट के सिलसिले में खतरनाक हथियार एके-56 राइफल रखने के दोषी पाए जाने पर 6 साल के लिए जेल भेजे जाते हैं , मो. हनीफ लंदन के ग्लास्गो एयरपोर्ट पर हमले के अभियुक्तों के साथ जुड़े होने के कारण ऑस्ट्रेलिया में गिरफ्तारी के बाद भारत वापस आते हैं , और तीसरा दृश्य है सीमा पर आतंकवादियों के साथ लड़ते हुए कर्नल वी. वसंत की अपनी जान न्यौछावर कर देते हैं।
आम भारतीय को संजू बाबा और हनीफ के साथ सहानुभूति हो रही है , जिसमें किसी को कोई परहेज़ भी नहीं होना चाहिए। लेकिन कर्नल वसंद ने किसी का क्या बिगाड़ा था , जिनकी मौत पर आंसू बहाने के लिए उनके परिवार के सिवाय कोई नहीं है ? राजकीय सम्मान के साथ तिरंगे में लिपटे हुए कर्नल के पार्थिव शरीर की अंत्येष्टि हो गई और बेंगलूर के संवेदनहीन शहर में किसी को इस बहादुर की याद नहीं आई। उसी दिन बेंगलूर में हनीफ भी पधार रहे थे , सबको उनका इंतजार था , मीडिया में लंबी-लंबी खबरें छप रही थीं , चैनलों पर 24 घंटे उनके बारे में तमाम रहस्योद्घाटन हो रहे थे , लेकिन कर्नल की बहादुरी की एक भी कहानी किसी की ज़ुबान पर नहीं थी।
संजू की सजा पर केंद्रीय मंत्रिमंडल को दुख होता है। हनीफ के साथ अल्पसंख्यकों के वोट का मामला जुड़ा था इसलिए कर्नाटक के मुख्यमंत्री से लेकर सभी तथाकथित सेक्युलर दलों के नेता उनके दर पर अपना चेहरा दिखाने से नहीं चूकना चाहते थे। केंद्र सरकार भी लंदन से लेकर ऑस्ट्रेलिया में चले ट्रायल पर नजरें गड़ाए हुए थी कि कहीं हनीफ के साथ कोई अन्याय न हो जाए। संजय और हनीफ के साथ अन्याय नहीं होना चाहिए, इससे किसी की असहमति नहीं हो सकती लेकिन एक सैनिक जो देश के लिए आतंकवादियों से लड़ रहा था, उसके प्रति भी अन्याय तो नहीं होना चाहिए।
कर्नल वसंत की मौत पर यदि देश ने आंसू बहाए होते तो सैनिकों के हौसले और बुलंद होते। दुश्मन की गोली खाते समय उन्हें भरोसा होता कि वे एक कृतज्ञ देश के लिए जान दे रहे हैं। अमेरिका में एक-एक सैनिक की मौत पर वहां की सरकार से सवाल पूछे जाते हैं, और हमारे यहां उसकी मौत को एक छोटी-सी खबर बनाकर अखबारों में कहीं छाप दिया जाता है जिसे पढ़ने की भी किसी को फुर्सत नहीं है।
क्या इस स्थिति के लिए सिर्फ मीडिया जिम्मेदार है ? या हम भी कहीं चैन की नींद सोते-सोते यह भूल चुके हैं कि कोई हमारे लिए न सिर्फ अपने दिन और रात, अपना पारिवारिक सुख बल्कि अपनी जिंदगी भी कुर्बान कर रहा है ? क्या आपको भी लगता है कि कहीं कोई कमी है हममें, अगर हां तो कहां ? अपनी राय दीजिए। शायद आपकी बात इस देश की जनता को जगाने में मदद करे। अपनी राय देने के लिए यहां क्लिक करें।
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Entries and comments feeds.

अफसोस है एक सैनिक की मौत पर!
Comment by अनूप शुक्ल — August 2, 2007 #
“शहीदो की मजारो पर मिलेगे बस तुम्हे कुत्ते
वतन पर मरने वालो का यही बाकी निशा होगा”
ये देश है वोटपरस्त नेताओ,फिलमी हीरो और ढोगी बाबाओ का,
इसके बारे मे गलत फहमी मत पालिये…
Comment by अरुण — August 2, 2007 #
मीडिया अगर दोषी है तो समाज भी दोषी है।
समाज पर मीडिया ज्यादा असर डाल रहा है बजाये इस बात के समाज मीडिया पर असर डाले।
Comment by जगदीश भाटिया — August 2, 2007 #
अक्सर कहा जाता रहा है ” मीडिया वही दिखाता है जो पब्लिक देखना चाहती है।”
इसका अर्थ यह हुआ कि गलती जितनी मीडिया की है उस से ज्यादा हमारी, हमारे समाज की है।
साधुवाद स्वीकार करें इस मुद्दे को उठाने के लिए!
Comment by Sanjeet Tripathi — August 2, 2007 #
वैसे हमे ज्यादातर खबरे मीडिया से पत चलती है,ाउर वो दौ कोडी की खबरे ही दिखाते रहेगे इस नाम पर ही कि हम वही देखना चाहते है तो…?
भाइसाहब सबसे बडा दोषी मीडिया ही है..
Comment by अरुण — August 3, 2007 #
अति अफसोस जनक. आपने आवाज उठाई, आभार नीरज भाई.
Comment by समीर लाल — August 3, 2007 #
नमन । नीरज भाई ध्यान में लाने के लिए धन्यवाद ।
“आरंभ”
Comment by Sanjeeva Tiwari — August 3, 2007 #
भई हम तो जानना चाहते ही हैं शहीदों के बारे में, बशर्ते आप बताएँ। खबर का शुक्रिया।
Comment by अनुराग — August 3, 2007 #
जब तक हम और हममें से प्रत्येक, ‘आत्मपरक भाव’ (सब्जेक्टिवली) से बात नहीं करेगा तब तक शहीदों के मरने पर ऐसे ही विधवा विलाप होते रहेंगे । कर्नल वी. वसन्त की शहादत की इस उपेक्षा का दोष केवल मीडिया पर क्यों ? बात तो आपने बहुत सही उठाई लेकिन आप भी तो अपने आप को दूर रख कर बात कर रहे हैं । कोई खुद को अपराधी माने या न माने, कर्नल सावन्त की शहादत पर बरती इस उपेक्षा के लिए मैं तो अपने आप को दोषी मानता हूं । कर्नल सावन्त की गौरव गाथा का बखान केवल मीडिया की जिम्मेदारी ही क्यों हो ? भाई विजय वाते का यह एक शेर सारी बात साफ कर देता है -
चाहते हैं सब, के बदले ये अंधेरों का निजाम ।
पर हमारे घर किसी बागी की पैदाइश न हो ।
Comment by विष्णु बैरागी — August 3, 2007 #
किसने कहा की हमें सिपाही के शहीद होने का अफसोस नहीं या इस खबर में दिलचस्पी नहीं? जरूर है, मगर खबर हम तक पहूँचे कैसे?
मीडिया वही दिखाता हिअ जो लोग देखना चाहते है, तो बतायें मैने समाचार चैनल देखने क्यों बन्द कर दिये.
Comment by sanjay bengani — August 3, 2007 #
Bahut sahi aapane likha hai. Darasal jab voto ki rajneet ki jayagi yahi hota rahega. Sanju ka mamla isliye sarkar ke liye mahatvapoorn hai kyonki unaki bahan aur suneel dutta ki beti Member of parliament hain. Doosari baat suneel dutta porva munuster rah chuke hain. Isliya jaroori hai ki sahanubhuti sanju ke saath hai. Kendra sarkar ka vash chale to vah sanjoo ki isi dam isi samay chchod de. Lekin kya kare, kendra sarkar aisa kar nahin sakati, kyonki court ka mamla hai. Isliye sabake haath bandhe hue hain. Doosari baat Haneef mamale ki, yah to shuddha Voto ki rajneet se juda mamala hai. Musalmanon ka vote sarkar ko chahiya to vo yeh sab karegi, nahin to haar jayenge. Rahi baat sena ke javano ki atmahuti ki, sarkar ki najar mein ye kewal sainik hain aur bali ke bakare. yeh to marane ke hi liye paale jate hain. Inako koi poochane wala kyon ho. Daraasal hamari mano bhavanayen , sahanubhuti, icchashakti sab khatma ho gayi hai, hame kewal apana swarth dikhayi deta hai. Jahen yeh sab cheeje hongi vahan hamein jyada in sab baton ki ummed nahin karani chahiye.
Comment by prakruti — August 3, 2007 #
शहीदो के प्रति श्रद्धा दिखान ढोंग ही रह गया है अब.. तभी तो कोई नाम तक नही लेना चाहता है.. आपने आवाज उठाई और इस हकिकत से हमे रुबरू कराया… शुक्रिया।
Comment by गरिमा — August 6, 2007 #
Neerajji, Yahan bus sensation bikta hai.Kennedy ne kaha tha “when dog bites a man it is not a news when man bites a dog it is news”. Intezar kariye ki kab insaan .hum log wo log hain jo verticals ko tolerate nahin karte horizontal ka respect karte hain . logon ke shahid hone ke baad shayad log unhe salam karen but unke jeete ji we take them for granted.hamen deshbakti ka paath padane wale kisi neta ke bete fauz mein nahin hain na to yeh khabar kaise ho sakti thee……
AAp acha likhte hain ….vishwas to nahin umeed hai ki shayad kalam ke kisi sipahi ki koi chingari aag mein badlegi…..
Comment by sunil balani — September 24, 2009 #