संजू बाबा.. बहोत हो गई गांधीगीरी
फ़िल्म खलनायक में संजय दत्त की मां बनी राखी गुलज़ार का संवाद याद आ रहा है- ”जो मांएं अपने बेटों की काली करतूतों पर परदा डालती हैं वे बड़े हो कर खलनायक बनते हैं।” असल ज़िंदगी में मां-बाप की व्यस्तता का असर संजय के जीवन पर पड़ा। बचपन में मां नरगिस के भाई अनवर अली के बच्चे संजय के साथी हुआ करते थे। घर का अकेला लड़का अपनी मां को बचपन में ही खो चुका था। पिता समाज सुधार को समर्पित थे। समाज को समर्पित होने का खामियाज़ा अकसर परिवार को उठाना पड़ता है। संयोग से इन्हीं दिनों गांधी माय फ़ादर परदे पर आ रही है जिसमें गांधी के बिगड़ैल बेटे की कहानी है। समाज की विसंगतियों को दूर करने का बीड़ा उठाने वाले को सबसे बड़ी चुनौती उनके अपनों से मिलती है।
रेशमा और शेरा से लेकर शूटऑउट एट लोखंडवाला तक संजय ने तक़रीबन 110 फ़िल्मों में एक्टिंग की है। पिता सुनील दत्त ने संजय को लेकर 1981 में रॉकी बनाई थी। तब संजय की नशीली आंखें और चाल-ढाल बताती थी कि यह लड़का किस कदर नशाखोर रहा होगा। पिता ने चाहा था कि बेटा काम में व्यस्त होते ही व्यसनों से मुक्त हो जाएगा। हुआ उल्टा, फ़िल्मी करियर चढ़ते ही साधारण-सा दिखने वाला कलाकार चमकीले परदे का सितारा बन चुका था। संजय को इस बात से मतलब नहीं रहा कि जो लोग जनता का प्यार पाते हैं, उन्हें ज़िम्मेदारी भी उठानी पड़ती है। मौक़ा आने पर त्याग की अपेक्षा भी उन्हीं से की जाती है।
बेपरवाह संजय ग़लत कामों में अपनी सितारा छबि और पिता के रसूख का इस्तेमाल करते रहे। कई फ़िल्मों में अंडरवर्ल्ड का किरदार अदा करने वाले इस शख्स पर असल अंडरवर्ल्ड का गहरा प्रभाव रहा है। संजय के माफ़ीनामे में यह दलील दी गई थी कि 1992 के मुंबई दंगों से उपजे दहशत के माहौल की वजह से उन्हें अपनी सुरक्षा में हथियार लेना पड़ा। जिन लोगों से हथियार मिले वे अंडरवर्ल्ड के उस्ताद थे। सिनेनगरी में इनकी धमक थी लिहाज़ा इनके साथ नाता रखना संजय की शख्सियत में भी औरों पर धमक का काम करता था। पांच साल पहले टाडा कोर्ट में पेश हुई और अख़बार मिड डे में छपी छोटा शकील और संजय दत्त के बीच बातचीत यह बताती है कि संजय के लिए ‘भाई‘ की कितनी अहमियत थी। किस सितारे से क्या कहना है, कौन भाव नहीं दे रहा है, चिप दुबई वाली भेजनी है या उससे ज़्यादा बेहतर…
CS: Abhi ek baat boloon, Preity, na mere namse hool diya woh logon ne
SD: Achcha, achcha
CS: Aur yahan ka number chhoda, main doosre din woh number trace karne gaya phir doosre din usne apne naam se baat karke yeh kya phir
SD: Achha achha
CS: Aur yahan ka number chhod diya koi duplicate, maine voh number pe check kiya, wo number tha hin nahin, number hin bandh aa raha tha woh
SD: Bhai do-teen number main aapko deta hoon…मुंबई धमाकों के सात साल बाद हुई यह पूरी बातचीत आज फिर पढ़ और सुन लेनी चाहिए।
जनता की याददाश्त कमज़ोर होती है। सुविधाजनक माहौल में पुरानी बातें अकसर भुला दी जाती हैं। नयी सुविधा का इंतज़ाम जो करना होता है। आइए, एक और ख़बर याद करने के लिए अपने दिमाग़ पर ज़ोर डाला जाए। जिसमें संजय दत्त के वक़ील सतीश मनेशिंदे क्या कहते देखे गए थे-

संजय को शुक्रिया अदा करना चाहिए कि गांधीगीरी के चलते लोग मुन्ना-भाईगीरी को भूल गए। इसका अनुभव नेताओं में संजय के लिए सहानुभूति देखकर भी किया जा सकता है। वीआईपी लोगों में अधिकाधिक प्रसिद्धी और न्यूनतम ज़िम्मेदारी का चलन हमारे बीच फैल रही अपसंस्कृति का नतीजा है। यही वजह है कि अब तक इन्हें सांकेतिक सज़ाएं मिलने का दौर जारी है। संजय भी टाडा के आरोपों से मुक्त हो गए। ऊपर छपे चित्र की इस ख़बर पर ग़ौर किया जाए।
संजय ज़िंदगी के एक दौर में नशे की लत के शिकार थे और पिता ने इसका लंबा इलाज में विदेश में कराया था। उन पर अवैध शिकार के भी आरोप लगे और जवानी के जोश में पालीहिल्स में बिना किसी वजह के गोलियां भी दागी थीं। रिचा शर्मा से विवाह के कुछ ही दिनों बाद यह पता चला कि रिचा को केंसर है। इसके बाद संजय रिचा से अलग हो गए। याद रहे कि पिता सुनील दत्त ने केंसर से पीड़ित अपनी पत्नी नरगिस का आख़री दौर तक साथ दिया था। फिर तमाम उम्र वे केंसर के इलाज के लिए जनसुविधाएँ जुटाने का काम करते रहे। बाद में संजय का नाम लिज़ा रे, रिया पिल्ले समेत कई औरतों से जुड़ा। अपने पिता संजय की इन्हीं कमज़ोरियों को बेटी त्रिशाला ने अपनी ताज़ा चिट्ठी में भी लिखा है और सावधान रहने की गुज़ारिश की है।
फ़िल्मी तारिकाओं को अश्लील मैसेज भेजने और धमकाने वाले शख्स मेहराज रहमान की हाल ही में गिरफ़्तारी हुई है। यह मेहराज सिनेनगरी की आइटम गर्ल मान्यता का पति रह चुका है। पिछले सात-आठ महीनों से यह मान्यता संजय दत्त के साथ रह रही है और कई समारोहो में संजय के साथ ही देखी जाती रही है। मेहराज ने हाल ही में एक टीवी चैनल से बातचीत में यह दावा किया था कि उनका और मान्यता का ज्वाइंट एकाउंट दुबई में है।
48 साल के संजय दत्त ने जीवन का लंबा सफर बेपरवाही से तय किया है। अपनी उद्दंता में उन्होंने क़ानून का उल्लंघन किया है। सुनील दत्त जैसे बेहतरीन इंसान को अपने बेटे की करतूतों पर रहम के लिए क़ानून का मज़ाक बनाने वाली शिवसेना के सुप्रीमो बाल ठाकरे के दर पर सलामी ठोकनी पड़ी। पिता की मौत के बाद संजय की इमेज सुधारने की चालाकी भरी कोशिश उनके दोस्तों ने की है। यह जिम्मा संजय के लिए चोपड़ा-हीरानी ने उठाया और मुन्नाभाई को गांधीवादी बना दिया। गांधी की टोपी लगाए ‘भाई‘ की फ़िल्म हिट हो गई और जनता को इन्हीं संजय में गांधी का अक्स नज़र आने लगा। जहां हिट वहां टीआरपी.. लिहाज़ा चैनल वाले इस संजय में बसे मुन्नाभाई के लिए कल ऐसे स्यापा कर रहे थे मानो संजय नहीं कोई गांधीवादी जेल जा रहा हो।
कुछ बरस पहले तक जो सिनेसितारे ‘भाई‘ के इशारे पर ठुमके लगाते थे, संजय की ग़िरफ़्तारी पर उनका रोना देखकर मेरे मित्र का कहना था कि इन्हें भी संजय ‘भाई‘ की खिदमत करने महीनेभर के लिए जेल भेज दिया जाना चाहिए। मीडिया में ग़िरफ़्तारी के दिन की सुबह से यह प्रचारित हो रहा है कि संजय दत्त पर इंडस्ट्री के 150 करोड़ रुपए दांव पर लगे हैं, जबकि गिनाई जा रही फिल्मों में से कई तो पूरी हो चुकी हैं, जबकि बाक़ी फ़िल्में अभी शुरू भी नहीं हुई हैं।
जस्टिस पीडी कोडे को मैं सलाम करता हूं उन्होंने क़ानून के प्रति हमारे दिल में सम्मान बनाए रखा है। जिन्हें संजय से हमदर्दी हो रही है उन्हें ये तय करना है कि ये हमदर्दी संजय से है या मुन्नाभाई से। मुझे विधु चोपड़ा की गांधीगीरी ने प्रभावित नहीं किया क्योंकि मेरा मानना है कि मुन्ना नाम का औना-पौना आम नागरिक यदि गांधीवाद के नाम पर ज़िंदगीभर फूल भेजता रहे तो भी मोटी चमड़ी वालों से सुसज्जित हमारी व्यवस्था में बदलाव नहीं ला सकता। अलबत्ता ये ज़रूर है कि पप्पूभाई नाम का कोई दादा एक फूल भेजकर ही अपना काम करा सकता है। यह गांधी नहीं बल्कि गांधी के नाम पर की जा रही भाईगीरी का असर होता है। फूल देने वाले के हाथ देखे जाते हैं.. हाथों में पसरी ताक़त देखी जाती है। फूलों में लपेटी गई धमकी असर दिखाती है। यही संजय की मुन्ना-भाईगीरी थी। जिसे देश के क़ानून ने मंगलवार को यह कहते हुए छह साल के लिए सलाखों के पीछे भेज दिया कि, ”संजू बाबा, बहोत कर ली फ़िल्मी गांधीगीरी (Gandhigiri).. अब जाओ गांधी बनने के लिए छह साल जेल में रहो”

[...] रचयिता- ज्ञानेंद्रनाथ, सीनियर कॉपी एडीटर, इंडिया टीवी. अवश्य पढ़े – संजूबाबा चरितलीला [...]
Teri maa ki choot behan k lode kisi kutti maa k bachhey koi aur kaam nahi madarchodh !
[...] है। यही बाहुल्यवाद की धमक है। मेरे पिछले लेख पर कुछ पाठकों ने इसी बिंदु पर सवाल किए [...]
han jo likha wo sach hai wo gunahgar hai ye to sabh ko maloom hai use bhi maloom hai.bas thoda leek se hatkar kuchh mamalo ko sochane ki jaroorat hoti hai kya wo terrorist tha,kya kabhi usane aisa koi kam kiya,sayad hame nahi maloom,han mumbai ke jitane bhi high profile log hai sabake kahi na kahi bhai se sambandh hote hai,ye bate hamesa khulake samane aati hai,hajaro ne unake samane jake nacha,unhe bhi saja milani chahye phir,……aapaka kahana theek hai par wo deshdrohi nahi hai kuchh visam paristhiyo ka mara hua hai jisaki saja use mil chuki thi….aur usake ham hindustaniyo me ek khas jagah hai sayad usaki family khud usaki ek alhad quality ya aap jo bhi kah sakate hai ….jab parliyament me attack karane wale chhot sakate hai aur unaki ansi ki saja itani lambi pad sakati hai to sanju ko bhi hamae beech hona chahiye
Par updesh kushal bahutere.
All people break laws based on their status.
बेहतरीन लेख है। बहुत बढिया और सटीक लिखा है।बधाई। जज पीडी कोडे को हमारा भी सलाम है। टाडा हटाने से थोडी निराशा और शंका हुई थी पर वह निराधार साबित हुई ।…और प्रियरंजन दास मुंशी से मै यह कहना चाहता हूं कि मुंशी जी को मंत्रालय का भारीभरकम दायित्व छोड़कर संजय के केस की सुप्रीम कोर्ट के पैरवी तथा जमानत का प्रबंध देखना चाहिए वैसे भी इस मुद्दे पर दिए गए बयान पर “मैडम” की झिडकी के बाद उनकी स्थिति असहज हो जायेगी।……
वही चन्द्रभूषण जी से मै सिर्फ यह कहना चाहता हूं कि किसी दूसरे के अपराध को गिना देने से अपने अपराध कम नही हो जाते कम से कम भारतीय कानून मे कोई ऐसा प्रावधान नही है।
बहुत सही आंकलन किया है नीरज आपने ।
Jo bhi faisla hua achcha hua.. mujhe lag raha hai ki sanjay ke saath phir bhi hamdardi dikhai gai.. jamanat par sanjay chutte rahe.. aur unhe is mamle mein jo sabse kam saza ho sakti thi hui.. unhe das saal qaid ki saza bhi ho sakati thi.. public figure aur bade baap ke beton ko zyada pak saaf aur sayant rahna chahiy kyonki chahe jaise bhi ho vo logon aur khaskar naujawanon ke liye role model ban jaate hain.. is faisle se aam logon ka justice system mein vishwas bana raha… agar ek pal sonche ki sanjay ko riha kar diya jata.. probation ka bahana dekar chod diy jata to kitna anarth hota.. vo bhartiya justice system ke itihas mein kala din sabit hota aur aam logon ka bacha khucha vishwas justice system se uth jaata..
बहुत बढिया लिखा है… एक कहावत है ना
“हाथ कंगन को आरसी क्या?
पढे लिखे को फारसी क्या?”
जब सच सामने है तो कुछ कहने की जरूरत नही है… गुनाहगार को सजा मिलनी ही चाहिये, चाहे वो कोई भी हो।
क्या भारतीय कानून में बाल ठाकरे और शरद पवार के लिए भी कोई सजा बनी है, जिनकी आपसी सांठ-गांठ से निकली ‘महाआरती’ ने बंबई शहर की सूरत और हजारों मुस्लिम नौजवानों की किस्मत हमेशा-हमेशा के लिए बदल दी(और आखिरकार इसी प्रक्रिया में इस शहर का नाम भी बंबई से बदलकर मुंबई करना पड़ गया)? मुंबई का वह कौन सा माफिया है, जिसके साथ इन दोनों के कभी न कभी संपर्क नहीं रहे हैं? यह कैसी सेलेक्टिव मेमोरी है हमारी कि 1993 के मुंबई बम विस्फोट तो हमें याद रहते हैं लेकिन इससे महीना भर पहले ठीक इसी शहर में हुआ इतना सारा कुछ ऐसे भूल जाता है, जैसे वह हुआ ही न हो! अगर कानून की बात करते हैं तो श्रीकृष्ण आयोग की रपट पर गद्दा बिछाकर सोए लोगों के बारे में भी कुछ बोलिए। संजय दत्त क्या हैं, क्या नहीं हैं, इससे मुझे कोई मतलब नहीं है, लेकिन 1992 के दिसंबर में मैं बिहार के आरा शहर में था और वहां किसी अखबार में एक छोटी-सी खबर पढ़ी थी कि महाआरती के दौरान भड़के दंगों के दौरान कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं के अलावा फिल्मी दुनिया से सिर्फ सुनील दत्त और संजय दत्त ही मुस्लिम मुहल्लों में घूमकर वहां घायल पड़े लोगों की तीमारदारी कर रहे थे। ऐसे लोगों को दंडित करने में हमारी कथित मुख्यधारा किस तरह एड़ी-चोटी का जोर लगा देती है, इसका थोड़ा-सा अंदाजा निजी तौर पर मुझे भी है। और भाई, बस में पकड़े गए जेबकतरे पर तो सभी पराक्रम दिखा लेते हैं। अगर हिम्मत हो तो इसकी शतांश वीरता भी सड़क पर छेड़खानी करके शान से चले जा रहे किसी गुंडे के खिलाफ दिखाएं, जमाना इस काम में आपका साथ भले न दे लेकिन कुछ लोग तहे-दिल से आपको सलाम जरूर करेंगे।
Democracy mein kanoon ka shashan chalta hai. Isake liye vyavastha ki gayi hai. Samvidhan ke anusar har vaidh nagarik ko
kanooni adhikar diye gaye hain. Har vyakti ke upar yah lagu hota hai. Agar court neSanjay Dutta ko saja dee hai, to yah sahi hai. Main pichchale 48 varshon se mukadame lad raha hoon, is samay Bhi mukadame lagatar lad raha hun. Maine dekha aur samjha hai ki, court jo Bhifaisala deti hai, vah sahi hota hai, isame shak karanein ki koi gunjaish nahin honi chahiye. Mera manana hai ki Sanjay Dutta ke mamle mein Court ne jaisa faisala diya hai, use Sanjay ko sweekar karna chahiye. Aur apani saja puri karani chahiye. Koi kitana vada aur asardar kyon na ho, koi ho chahe kitana paisewala ho, kitana hi shaktishali kyon na ho, kanoon savake liye vravar hona chahiye. kanoon mein Bhed karenge to jangal raaj hi hoga.
बहुत बढिया और सटीक लिखा है।बधाई।
हाँ, कम आओ लेकिन फुल फोर्स मे आओ. बहुत ही बढिया लिखा है.
संजय को सजा ना होने का कोई औचित्य ही नही है. ये फिल्मी सितारे अपने आपको 70 MM के परदे के बाहर भी हीरो ही समझते हैं. यह गलत है.
क्या बात है सिपाही! काफी दिनो बाद लौटे मगर रंग में लौटे. बाबा को सजा क्यों न हो? कानून सबके लिए बराबर होना चाहिए. जो हुआ सही हुआ.
गुनाह के बाद सजा मिलना तो लाजमी है।
संजय के बारे में आपने जो भी बयां किया और जिस तरह सारगर्भित रूप में प्रस्तुति की वह काबिले तारीफ है.मुझे तो लगता है कि जिस तरह मुन्ना भाई ने गॉंधीगिरी के जरिए अपनी छवि सुधारने की कोशिश की शायद इससे बडा गॉंधी और देश के साथ मजाक नही हो सकता.दीवान साहब ने इस पहलु पर गौर कर प्रकाश डाला….
बहुत अच्छा है.
लगता है आजकल आप खाली है,तभी एक बेकार से वहियात टापिक पर लिखने मे और वो भी इतना अच्छा लेख और साथ मे सच के सबूत भी..?भाइ देश के महान तम लोगो मे से एक मुन्ना भाइ के खिलाफ बीडू तेर दिमाग तो नही फिरेला है..देश को चलाने वाली पार्टी जिसके साथ खडी हो..जिस के उपर भाइ का हाथ हो.नामी गिरानी चैनल जिसकी प्रशंशा करते नही अघाते हो..उसके खिलाफ..?पता नही यहा पावर और पैसा होने पर 100 खुन माफ होते है.इस बिचारे ने तो जरा सी छोटी सी ए के 47 ही तो रखली थी..और अब आप चाहते क्या है जी कोर्ट ने दे तो दी है छै साल की सजा..?
सही तेवर है..
बहुत ही अच्छा लेख है …सही ही कहा है आपने
प्रिय भाई,
आपने काफी मेहनत से लिखा है. टीवी के रंग इन काले अक्षरों के सामने कमज़ोर पड़ गए. बहुत ख़ूब !
आलोक
नीरज भाई धन्यवाद,
बहुत ही अच्छी जानकारी दी है आपने, पत्रकारिता के अपने धर्म को बखूबी निभाया है ।
संजू बाबा के संबंध में सब तो लिखा है अब हम का लिखें ।
बढिया विश्लेषण है भाई
पुन: धन्यवाद
छत्तीसगढ सवेरा से संजीव तिवारी
वाह, क्या लिखा है दादा, लगे रहो, दिख रिया है कि अखबारनवीस रह चुके हो जिनको काले अक्षरों से ही गेम बजाना होता है!!
वाह दादा खूब लिखा है।
संजय के बारे में यही कह सकते हैं कि लायक बाप का नालायक बेटा।
कानून से ऊपर कोई भी नहीं है, फिर इतने सारे आरोप होने के बाद और अंडरवर्ल्ड से इतने रिश्ते रखने के बाद किस बिना पर उसके समर्थक उसे पाक-साफ बता रहे हैं। प्रियरंजन दास मुंशी का इस बारे में बयान दुर्भाग्यपूर्ण है। आपने सही कहा कि इन्हें भी संजय ‘भाई‘ की खिदमत करने महीनेभर के लिए जेल भेज दिया जाना चाहिए।
जज पीडी कोडे को हमारा भी सलाम है।
एकदम सही।
शानदार!!
बेहतरीन लेख है। दरअसल इस समय लोग मुन्ना की गांधीगिरी से प्रभावित हैं, रील लाइफ़ और रियल लाइफ़ के अंतर को समझ नहीं पा रहे हैं। शायद इसीलिए संजय दत्त के प्रति सहानुभूति का अनुभव कर रहे हैं। आपका लेख संजय की छवि को सुधारने के लिए चढ़ाए गए कृत्रिम मुलम्मे को उघाड़ रहा है। बधाई।