चमकता भारत, सिसकता भारत
August 15, 2007 at 5:27 pm | In भारतनामा | 12 Commentsस्वाधीनता दिवस पर विशेष
भारत बढ़ रहा है.. चमक रहा है.. यक़ीनन बढ़ रहा है.. लोग तरक्की कर रहे हैं.. लेकिन हर कोई नहीं बढ़ रहा है.. हर नागरिक चमक नहीं रहा है.. ये प्रचार कि हम चमक रहे हैं.. ये उनके ढिंढोरे हैं जिनकी संसाधनों पर पकड़ है.. माध्यमों में पैठ है.. अवसर है कहने-लिखने का.. तब हमें लगता है कि हां भारत चमक रहा है.. लेकिन ‘लगने‘ और ‘होने‘ में अंतर होता है.. अब इस अंतर को समझ लें तो ख़ुद हमें अपने चमकने पर शरम आएगी। आज़ादी के साठ सालों में हम कितना आगे बढ़े हैं और कितनों को पीछे छोड़ रखा है यह जानना ज़रूरी है। चमकते और सिसकते भारत की तस्वीर बयां करते ये आंकड़ें-
अरबपतियों की तादाद में भारत जापान से आगे हो गया।
Millionaire की तादाद में एक साल के भीतर 20 फ़ीसद इज़ाफ़ा हुआ है।
अनिल अंबानी के खाते में हर मिनट 15 लाख रुपए आते हैं।
26 करोड़ लोग रोज़ाना 50 रूपए से कम में अपना गुज़ारा चलाते हैं।
दुनिया के 20 फ़ीसदी slums भारत में हैं। मुम्बई की 54 फ़ीसद आबादी slums में रह्ती है।
60 फ़ीसद आबादी खेती-बाड़ी से जुड़ी है, लेकिन कृषि विकास दर में कमी आई जिससे 60 लाख टन गेहूं import करना पड़ा।
मानव विकास सूचकाँक में भारत का नंबर है 127वां।
19 फ़ीसद प्रायमरी स्कूलों में केवल एक टीचर है।
10 फ़ीसद प्रायमरी स्कूलों में ब्लैक बोर्ड नहीं है।
25 फ़ीसद प्रायमरी स्कूल टीचर अपने काम से ग़ैरहाज़िर रहते हैं।
देश के 46 फ़ीसद बच्चे underweight है।
महानगरों में 17 फ़ीसद बच्चे मोटापे के शिकार हैं।
शिशु मृत्युदर में भारत बांग्लादेश से पीछे है।
देश के 14 करोड़ लोगों को पीने का साफ़ पानी उपलब्ध नहीं है।
महानगरों में बोतल बंद पानी का कारोबार पिछले दस सालों में 225 करोड़ से बढ़कर 1800 करोड़ रुपए हो गया।
राजधानी दिल्ली में रोज़ाना दस लाख पानी की बोतलें बिकती हैं। गर्मियों में जहां हर तरफ़ पानी के लिए त्राहिमाम होता है वहीं अवैध तरीक़े से रोज़ तीन लाख रूपए के पानी की ख़रीद-फ़रोख्त होती है।
40 फ़ीसद डॉक्टर सरकारी हॉस्पीटलों से नदारद होते हैं।(विश्वबैंक का आंकलन)
केवल 38 फ़ीसद हेल्थ सेंटरों के पास ही पूरा स्टाफ है।
केवल 31% के पास इलाज के लिये जरूरी सामान।
TB से देश मे हर साल 5 लाख लोग मरते हैं।
कुल दवा कारोबार में नकली दवाओं का हिस्सा 35 फ़ीसद है, दूसरी ओर Health Tourism के कारोबार में 30 फ़ीसद की सालाना बढ़ोतरी।
56% ग्रामीण घरों में बिजली नहीं है। 1 लाख 20 हज़ार गांवों में बिजली नहीं है।
देश में हर साल 30 हज़ार करोड़ रुपए की बिजली चोरी होती है।
सांसदों-पूर्व सांसदों पर टेलीफ़ोन और बिजली का 7 करोड़ से ज़्यादा बकाया है।
देश के सिर्फ़ 7 फ़ीसद लोग इंटरनेट इस्तेमाल करते हैं। फ़ोन उपभोक्ताओं की तादाद 22 करोड़ 52 लाख।
इस बार केवल 8 फ़ीसद महिलाएं संसद में पहुंची हैं।
11 साल से लटका है महिला आरक्षण बिल, 1996 में लोकसभा में पेश किया गया था।
10 लाख कन्याएं हर साल गर्भ में ही मार दी जाती हैं।
हर साल 18 हज़ार महिलाएं बलात्कार का शिकार होती हैं।
हर घंटे 1 महिला दहेज के लिए जला दी जाती है।
देश की राष्ट्रपति, दो राष्ट्रीय दलों की अध्यक्ष औऱ तीन राज्यों की मुख्यमंत्री महिलाएं हैं।
भारत में इस समय करीब 3 करोड़ 80 लाख युवा बेरोज़गार है। जिनमें 90 फ़ीसद ग्रामीण युवा हैं।
भारत में 2000-01 में BPO में काम करने वालों की संख्या 16 हजार थी और आज यही संख्या डेढ़ लाख का आंकड़ा पार कर चुकी है। जो देश की जनसंख्या का एक फ़ीसद भी नहीं है।कॉल सेंटरों का बिजनेस महज़ पांच सौ मिलियन डॉलर प्रतिवर्ष है।
136 सदस्य क्रिमिनल बैकग्राउंड के 14वीं लोकसभा में हैं जबकि पहली लोकसभा में कोई नहीं था।
ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के 102 देशों में किए गए सर्वे के मुताबिक़ भारत भ्रष्टाचार की सूची में 13वें नंबर पर है।
94 संशोधन हो चुके भारतीय संविधान में जबकि अमेरिका में 218 सालों में सिर्फ़ 27.. वहीं देश की अदालतों में 2 करोड़ 95 लाख केस कोर्ट मे लंबित पड़े हैं।
जन-गण-मन की धुन किसने बनाई
August 14, 2007 at 11:28 pm | In भारतनामा | 26 Comments
स्वाधीनता दिवस पर विशेष
क्या आप जानते हैं -
पाकिस्तान को आजादी 14 अगस्त 1947 भारत से एक दिन पहले भले ही मिल गई हो लेकिन 30 सितंबर 1948 तक वहाँ भारतीय नोट ही चलते रहे इसलिए रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया भारत के साथ साथ पाकिस्तान के लिए भी मुद्रा प्रबंधन का जिम्मा उठाती थी। 1947 का ऐसा ही नोट देखें जिसमें बायीं ओर गवर्नमेंट ऑफ़ पाकिस्तान भी लिखा है।
लार्ड माउंटबेटन ऐसे शख्स थे जिन्होने 14 अगस्त को कराची में पाकिस्तान की आजादी समारोह में और 15 अगस्त को नई दिल्ली में भारतीय आजादी के समारोह में शिरकत की थी। (पाक में जिन्ना और भारत में नेहरू का वीडियो देखें) वीडियो में भारतीय संसद भवन के आसमास उमड़ी जनता का उत्साह देखते ही बनता है।
राष्ट्रगान ‘जन गण मन अधियानक जय हे भारत भाग्य विधाता‘ की धुन राम सिंह ठाकुर ने कम्पोज़ की थी। गीत के रचयिता गुरूदेव रविन्द्रनाथ टैगोर थे। यह गीत पहली बार इंडियन नेशनल कॉग्रेस के कोलकाता अधिवेशन में 27 दिसम्बर 1911 को गाया गया था। (कम्पोज़र राम सिंह ठाकुर के बारे में यहां पढ़े) प्रस्तुत चित्र में गांधी जी के सम्मान में ठाकुर वायलिन बजा रहे हैं।
राष्ट्रगान के रचयिता गुरूदेव रविन्द्रनाथ टैगोर की आवाज़ में ‘जन-गण-मन’ यहां सुनें।
27 फ़रवरी 1948 को ब्रिटिश सैनिकों की आखरी टुकड़ी को मुंबई के गेट वे ऑफ़ इंडिया से विदाई दी गई। भारतीय फौज ने ब्रिटिश टुकड़ी के मेजर जनरल इन कमांडिंग एल जी हिटलर को समारोहपूर्वक विदाई दी। लगभग डेढ़ सौ बरस भारत में रहने वाले अंग्रेज़ों को दी जाने वाली यह आख़िरी विदाई थी। वीडियो देखें-
‘पाकिस्तान‘ शब्द का उल्लेख पहले-पहले ब्रिटेन मे चौधरी रहमत अली ने किया था। मुस्लिम लीग से जुड़े इस शख़्स ने ब्रिटेन में भारत के पश्चिमी हिस्से के पांच राज्यों को लेकर मुस्लिम बहुल राष्ट्र पाकिस्तान की परिकल्पना की थी। इसका उल्लेख 28 जनवरी 1933 को उनके प्रकाशित किए गए एक पर्चे “Now or Never; Are we to live or perish forever? में मिलता है।
”दुनिया सो रही है भारत जाग रहा है…”
‘Tryst with Destiny’ आज़ादी की मध्यरात्रि दिया जाने वाला पंडित नेहरू का भाषण था। इंडियन कॉस्टीट्यूएंट असेम्ब्ली में दिए गए इस भाषण में नेहरू ने देश के इतिहास की गौरवपूर्ण गाथाओं को याद करने के साथ ही आने वाले कल के आधुनिक भारत की अपनी परिकल्पना प्रस्तुत की थी। यहां सुनें और वीडियो देखें।
”आज हिमालय की चोटी से दुश्मन को ललकारा है..दूर हटो ऐ दुनियावालों हिन्दोस्तां हमारा है”- 1943 में आई अशोक कुमार की सुपरहिट फिल्म ”किस्मत” का गाना अदाकारा मुमताज शांति ने मंच से गाकर ब्रिटिश सेंसर को सकते में डाल दिया था। डायरेक्टर ज्ञान मुखर्जी ने चालाकी से ये तर्क दिया था कि ये गीत दूसरे विश्व युद्ध में नाजियों और जापानियों को भारतीय चुनौती है। जबकि असल में यह अंग्रेज़ी हुक़ूमत के ख़िलाफ़ गीतकार कवि प्रदीप का लिखा गीत था।
15 अगस्त 1947 में भारत और पाकिस्तान की आज़ादी की ख़बर दुनिया के हर बड़े अख़बारों की सुर्खियां थीं। न्यूयॉर्क टाइम्स का अंक देखिए जिसमें इस ख़बर को सेकन्ड लीड बनाया गया। दोनों देशों का नक़्शा छपा और हेडिंग थी- “India and Pakistan become nations, clashes continue” क्लेशेस कन्टीन्यू यानी फ़साद जारी.. विभाजन की त्रासदी यही थी जिसने दोनों देशों को हिलाकर रख दिया था। इन दंगो में 13 लाख लोग मारे गए, डेढ़ करोड़ विस्थापित हुए, साढ़े बारह लाख शरणार्थी भारत में आए, एक लाख औरतों का बलात्कार हुआ और करोड़ों की लूट-पाट हुई।

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इसका गुलशन फूंक दूं उसका शबिस्तां फूंक दूं
August 14, 2007 at 6:20 pm | In जहांनामा | 1 Commentनज़्में जिन्होंने जंग-ए-आज़ादी का जज़्बा जगाया
आज़ादी के संघर्ष में हिन्दुस्तानी ज़बान में लिखी गई नज़्मों, ग़ज़लों के योगदान की चर्चा कर रहे हैं शकील अख़्तर। नवप्रभात ग्वालियर से पत्रकारिता की शुरूआत करने वाले शकील ने इंदौर में नई दुनिया, चौथा संसार, फ्रीप्रेस जनरल, दैनिक भास्कर में विभिन्न पदों पर ज़िम्मेदारियों का निर्वहन किया है. संप्रति- कॉपी प्रोड्यूसर, इंडिया टीवी.
(…पिछले लेख से आगे.. अंतिम कड़ी)

इसमें शक नहीं जालियांवाला बाग की दर्दनाक घटना ने आग में घी का काम किया और शायरों के ख़ून को खौला दिया। अब शायरों की आतिशनवाइयों ने जनता को उद्वेलित करने का काम शुरू किया। यही वह दौर भी था जब ख़िलावत और असहयोग आंदोलन ज़ोर पकड़ चुका था। गांधी देश के दौरे पर थे। इसी दौर में 1920 में मौलाना मुहम्मद अली ने लाहौर में तकरीर दी। इन्हीं दिनों मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद के विचार, सुबेदारी, आख़री मंज़िल और हमारा फ़र्ज़ में प्रकाशित हुए। इन्हीं दिनों शायर जफ़र अली ख़ां ने लिखा एलान-ए-जंग-
गांधी जी जंग का एलान कर दिया
बातिल से हक़ को दस्त-ओ-गरीबान कर दिया
हिन्दुस्तान में इक नयी रूह फूंककर
आज़ादी-ए-हयात का सामान कर दिया
शेख और बिरहमन में बढ़ाया इत्तिहाद
गोया उन्हें दो कालिब-ओ-यकजान कर दिया
जुल्मो-सितम की नाव डुबोने के वास्ते
कतरे को आंखों-आंखों में तूफ़ान कर दिया
(बातिलःझूठ, दस्त-ओ-गिरेबानः लड़ा देना, इत्तिहादः एकता)
लाला लालचंद, हसरत मोहानी, मीर ग़ुलाम नैरंग, मुहम्मद अली जौहर, आगा हश्र कश्मीरी, अहमद सुहैल, सागर निज़ामी, अहसान दानिश जैसे कई शायरों ने इस दौर में फिरंगी शासन के अत्याचारों के ख़िलाफ़ अनेक नज़्में कहीं। इस दौर की चंद नज़्मों पर ग़ौर करें-
तिरी बरबादियां देखी नहीं जाती है अब हमसे
ख़ुदा के वास्ते उठ और हो आज़ाद इस ग़म से
ग़ुलामी मुस्तकिल लानत है और तौहीने-इंसा हैं
ग़ुलामी से रिहा हो और आज़ादी में शिरकत है
1928 में सायमन कमीशन पर हंगामा उठा। यही वह समय भी था जब गांधीजी से लेकर पंडित जवाहर लाल नेहरू और सुभाषचंद्र बोस संपूर्ण आज़ादी की मांग करना शुरू कर चुके थे। उधर सायमन कमीशन पर नज़्मों में ग़ुस्सा बरसने लगा था।
सायमन साहब के इस्तकबाल का वक़्त आ गया
जाग अय लाहौर अपने फ़र्ज़ को पहचान कर
रेल से उतरें तो काली झंडिया हों सामने
जिनके अंदर तुम खड़े हो सीना तानकर
संपूर्ण आज़ादी की मांग ने ज़ोर पकड़ा और 1930 में कॉग्रेस ने इसका एलान कर दिया। फिर सिविल नाफ़रमानी का जेल भरो आंदोलन शुरू हुआ। कई शहीद हुए और गोली से उड़ा दिए गए। आंदोलन चलता रहा। तीसरी गोलमेज कॉफ़्रेंस के बाद निकले श्वेत पत्र के बाद गांधी जी असंतुष्ट थे। इस दौर में भी जोश मलीहाबादी, आनंद नारायण, अली जव्वाद ज़ैदी, हफ़ीज़ जालंधरी जैसे कई शायर सियासी मुद्दों से मुतास्सिर होकर क़लम को ज़ुबान देते रहे। 1942 के विद्रोह के बाद महादेव देसाई की मौत से दुखी होकर ‘क़ैदी की लाश’ जैसी मशहूर नज़्म लिखने वाले अली जव्वाद ज़ैदी की एक और नज़्म ‘मन की भूल’ ज़प्त कर ली गई। यह एक लंबी नज़्म थी जिसमें देश के सुखद अतीत को याद करते हुए परतंत्र भारत की पीढ़ी को बयां किया गया था-
मुल्क़ में इक तूफ़ान बरपा था
जयकारों का शोर मचा था
जेल में हिन्दुस्तान भरा था
था इक वो भी ज़माना प्यारे
जेल में घर तक याद नहीं था
फिर भी दिल कुछ शाद नहीं था
हिन्दुस्तान आज़ाद नहीं था
1935 में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना हुई। इससे पहले सम्मेलन की 1936 में अध्यक्षता ख़्यात साहित्यकार प्रेमचंद ने की। इस संस्था को आगे बढ़ाने में पण्डित नेहरू से लेकर रवींद्रनाथ ठाकुर, जयप्रकाश नारायण, आचार्य नरेंद्र देव, युसूफ़ मेहर अली, सज्जाद ज़हीर, डॉक्टर अली, अब्दुल हक़ जैसे दिग्गजों का सहयोग और समर्थन था। इसी दौर में उर्दू साहित्य में फ़ैज अहमद फ़ैज़, अली सरदार ज़ाफ़री, असरारुलहक़ मजाज़, जांनिसार अख़्तर, फ़िराक़ गोरखपुरी जैसे मशहूर शायर भी देशभक्ति की नज़्में लिख रहे थे। सरदार जाफ़री की नज़्म पर नज़र डालें-
सुलग उठी है इंतिक़ाम की आग
बर्फ़ की चोटियां दहकती हैं
जुल्म और जब्र के अंधेरे में
सैकड़ों बिजलियां चमकती हैं
इंतिक़ाम की धधकी हुई इस आग से पहले और बाद में बार-बार आज़ादी का सुंदर सपना देखा गया। यहां तक कि शायरों ने धक्के खाए, फ़ाकाकशी की फिर भी आग उगलने वाली नज़्में लिखकर बरतानवियों के हत्थे चढ़ते रहे। मुज़फ़्फ़र की जप्तशुदा नज़्मों में एक-
विजय के हार होंगे
नेहरू-गांधी की गरदन में
मुक़द्दस मादरे वतन के सर पर
ताज देखेंगे
मनाएंगे ज़मीने हिन्द पर
हम जश्ने आज़ादी
फ़लक पर से हमें
ख़ुश-ख़ुश तिलक महाराज देखेंगे
सीमाब अकबराबादी, साहिर लुधयानवी, शोरिश कश्मीरी, जोश मलीहाबादी, नदीम कासमी, मसूद अख़्तर जैसे कुछ शायर थे जो आज़ादी के आंदोलन की तर्जुमानी के साथ अपनी क़लम में सामाजिक और आर्थिक हालात को दर्शा रहे थे। इनमें प्रगतिशील और मार्क्सवादी विचारों की नज़्में भी शामिल रहीं। इस दौर में जोश मलीहाबाद की एक नज़्म- ”वफ़ादाराने अजली का पयाम, शहंशाहे हिन्दुस्तान के नाम” बड़ी चर्चित हुई जिसमें उन्होंने जॉर्ज की ताजपोशी पर जमकर प्रहार किया। तंज करती ये नज़्म दरअसली भारत की बदहाली के लिए गहरा आक्रोश थी। 32 बंदों में लिखी गई इस नज़्म में भारत की त्रासद तस्वीर थी। इसके चंद बंद काबिले-ग़ौर हैं-
आपके हिन्दोस्तां के जिस्म पर बोटी नहीं
तन पे इक धज्जी नहीं, पेट में रोटी नहीं
किश्वरे-हिन्दोस्तां में रात को हंगामे-ख़्वाब
करवटें रह रह के लेता है फ़ंज़ा में इंक़िलाब
जोश की यह नज़्म तो ठीक है मगर उनकी नज़्म ”ईस्ट इंडिया कंपनी के फ़रजंदों के नाम” ने तो जैसे अंग्रेज़ी हुक़ूमत की नींद ही उड़ा दी। जोश ने यह नज़्म 1939 मे दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान वायसराय की हिन्दुस्तान के जंग में शामिल होने की घोषणा के बाद लिखी गई थी। यह नज़्म हर भारतीय की भावना का प्रतिबिंब थी। इस पर भी फिरंगी हुक़ूमत का कहर बरपा और इस नज़्म को ज़प्त कर लिया गया-
जुल्म भूले, रागिनी इंसाफ़ की गाने लगे
लग गई है आग क्या घर में कि चिल्लाने लगे
इक कहानी वक़्त लिखेगा नये मज़मून की
जिसकी सुखी को ज़रूरत है तुम्हारे ख़ून की
इंक़लाबी गीतों के बढ़ते हुए ख़तरों के मद्देनज़र आखिरकार अंग्रेज़ हुक़ूमत ने इस वक़्त तहरीर (लेखन) और तकरीर (संभाषण) दोनों पर कड़ी पाबंदी लगा दी थी। एक बार फिर आंदोलन उग्र हुआ, बड़े नेता ग़िरफ़्तार हुए, जेलें भरती चली गईं लेकिन नज़्में छपती चली गईं। मजाज़ ने अपनी नज़्म ”अंधेरी रात के मुसाफ़िर” में लिखा-
उफ़क पर जंगा का ख़ूनी सितारा जगमगाता है
हर इक झोंका हवा का, मौत का पैग़ाम लाता है
मजाज़ की नज़्म ”आवारा” की इन पंक्तियों पर ग़ौर फ़रमाएं -
मुफ़लिसी और ये मज़ाहिर हैं नज़र के सामने
सैकडों चंगेज़ो नादिर हैं नज़र के सामने
सैकडों सुलतानो जाबिर हैं नज़र के सामने
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं,
ऐ वहशत ए दिल क्या करूं
बढ के इस इन्द्रसभा का साज़ ओ सामां फूंक दूं
इसका गुलशन फूंक दूं उसका शबिस्तां फूंक दूं
तखते सुलतान क्या मैं सारा क़स्र ए सुलतान फूंक दूं
ऐ ग़म ए दिल क्या करूं,
ऐ वहशत ए दिल क्या करूं
(मज़ाहिरःदृश्य, सुल्ताने जाबिरः अत्याचारी बादशाह, शबिस्तां: शयनागार, क़स्रे सुल्तान: शाही महल)
सरदार जाफ़री ने इसी बात को बढ़ाकर कुछ इस तरह से बयां किया-
ग़म के सीने में ख़ुशी की आग भरने दो हमें
ख़ूं भरे परचम के नीचे रक्स करने दो हमें
अगस्त 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ। देश के तक़रीबन सभी बड़े नेता सलाखों के पीछे पहुंचा दिए गए थे। जनता सड़कों पर उतर आई और अंग्रेज़ो से सीधा लोहा लेने लगी। बाग़ी यहां-वहां परचम फहराने लगे। जन-नेताओं को जो दुश्वारियां पेश आईं, उन्हें लेकर भी नज़्में लिखी गईं। महात्मा गांधी की ग़िरफ़्तारी देर रात की गई थी, लिहाज़ा शमीम किरहानी लिखते हैं-
कुछ देर ज़रा सो लेने दो
तुम जेल जिसे ले जाते हो
वह दर्द का मारा है देखो
मज़लूम, अहिंसा का हामी
बेबस दुखियारा है देखो
बेचैन सा उसकी आंखों में
पिछले का सितारा है देखो
कुछ देर ज़रा सो लेने दो
लेकिन इस समय आज़ाद हिन्द फ़ौज बनाकर अंग्रेज़ों के नाकों चने चबवाने वाले वीर क्रांतिकारी सुभाषचंद्र बोस ही एक ऐसे नेता थे जो हुक़ूमत के हाथ नही आ सके थे। इन हालात की सच्ची तस्वीर लेकर आए शायर जांनिसार अख़्तर की नज़्म ”अय हमरिहाने काफ़लाये” पर नज़र डालिए-
क्यों न कर लें आज हम खुद रास्ते का फ़ैसला
हमरहाने काफ़ला अय हमरहाने काफ़ला
रहज़नों के हाथ में हम लुट गए तो क्या हुआ
रास्ते में चंद साथी छूट गए तो क्या हुआ
अब भी वह जुरअते हैं अब भी वही हौसला
हमरहाने काफ़ला अय हमरहाने काफ़ला
आंदोलन बढ़ता रहा और क़लम तलवार बनी। जज़्बे आज़ादी के शोले अब आज़ादी की पहली किरण की बाट जोह रहे थे। मगर हालात को इस सुबह के पहले भी कुछ और मंजूर था। वह बंटवारा जिसकी मांग मुस्लिम लीग ज़ोर दे रही थी। शमीम किरहानी ने पाकिस्तान चाहने वालों के लिए एक दरख्वास्त करती हुई नज़्म लिखी पर कोई तज़वीज़ काम न आई। 1946 से बग़ावत और तेज़ हुई। 1947 में आज़ादी देने की ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एटली बार की घोषणा हुई। साम्राज्यवादी अंग्रेज़ों ने आखिर समग्र राजनीतिक आंदोलन को दो फाड़ करने में कामयाबी पायी। हिन्दुस्तान के वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने ब्रिटेन का आदेश का पालन किया। रेडक्लिफ़ का चुपचाप भारत आगमन हुआ और सदियों पुराना इंसानी रिश्ता सरहदी टुकड़ों में बंट गया। शमीम ने पूछा-
हमको बतलाओ क्या मतलब है पाकिस्तान का
जिस जगह इस वक़्त मुस्लिम हैं, नाजिस है क्या वह जा
(नाजिस-अपवित्र, जा-स्थान)
आज़ादी की बेड़ियां टूटीं। मख़दूम माहिउद्दीन ने लिखा- कहो हिन्दोस्तां की जय, फ़ैज़ ने कहा- बोल की लब आज़ाद हैं तेरे, ज़बां अब तक तेरी है। फ़िराक़ गोरखपुरी ने तहरीर दी-
हमारे सीने में शोले भड़क रहे हैं फ़िराक़
हमारी सांस से रोशन है नग़्मे-आज़ादी
जश्ने-आज़ादी के मौक़े पर सैकड़ों नज़्में लिखी गईं। इसमें दो सौ साल की ग़ुलामी के निज़ाम से लेकर ख़ुशियों तक की कहानी थी। जांनिसार अख़्तर ने नज़्म लिखी ”जश्ने आज़ादी” -
सीने से आधी रात के
फूटी वह सूरज की किरन
बरसे वह तारों के कंवल
वह रक्स में आया गगन
आये मुबारकबाद को
कितने शहीदाने-वतन
आज़ाद है आज़ाद है आज़ाद है अपना वतन
आज़ाद है अपना वतन
(शोध संदर्भः ज़प्तशुदा नज़्में, हिन्दोस्तां हमारा और अन्य) संकलन- शकील अख़्तर
स्वतंत्रता दिवस पर विशेष कल (15 अगस्त 2007) पढ़िए
भारतीय स्वातंत्र्य संग्राम से जुड़ी रोचक बातें (दुर्लभ वीडियो-ऑ़डियो प्रस्तुति)
चमकता भारत, सिसकता भारतः भारत के दो चेहरे (आंकडें कहते हैं कहानी)
जुल्म काफ़ी कर चुके, पब्लिक बिगड़ जाने को है
August 13, 2007 at 8:18 pm | In जहांनामा | 7 Commentsआज़ादी की सालगिरह पर विशेष

नज़्में जिन्होंने जंग-ए-आज़ादी का जज़्बा जगाया
आज़ादी के संघर्ष में हिन्दुस्तानी ज़बान में लिखी गई नज़्मों, ग़ज़लों के योगदान की चर्चा कर रहे हैं शकील अख़्तर। नवप्रभात ग्वालियर से पत्रकारिता की शुरूआत करने वाले शकील ने इंदौर में नई दुनिया, चौथा संसार, फ्रीप्रेस जनरल, दैनिक भास्कर में विभिन्न पदों पर ज़िम्मेदारियों का निर्वहन किया है. संप्रति- कॉपी प्रोड्यूसर, इंडिया टीवी.
आज़ाद हिन्दुस्तान में ज़ुबान को लेकर होने वाली सियासत पर बड़ा अफ़सोस होता है। ख़ासकर उस ज़ुबान को लेकर जिसने जंग-ए-आज़ादी में अहम रोल अदा किया और बिखरे हुए हिन्दुस्तान को एक प्लेटफ़ॉर्म पर लाने, उसे एकसूत्र में पिरोने में बड़ी मदद की। हां, ये बात उर्दू की है, जिसके बारे में तमाम ग़लतफ़हमियां हैं, शिकायत हैं, यहां तक कि झगड़ा हिन्दी बनाम उर्दू का खड़ा कर दिया गया है। परतंत्र भारत में कई उर्दू अख़बार, रिसाले थे जो देश की आज़ादी के लिए सर पर कफ़न बांधकर काम कर रहे थे। हिन्दी की अन्य भाषाओं की तरह यहां भी एक जज़्बा था- आज़ादी, सरफ़रोशी की तमन्ना।
उस दौर में क़लम से जेहाद करने वाले कितने शायर थे जिन्हें जेल जाना पड़ा, जिन पर अत्याचार हुए और जिनके इंक़लाबी तराने और नज़्में तक ज़प्त कर ली गईं। ये क़ौमी खिदमत का ज़खीरा आज़ादी के बाद भी नेपथ्य में रहा और इक्का-दुक्का प्रयासों के अलावा आम जनता के सामने न के बराबर आ सका। अब सिमटती तहज़ीब, भाषा, सियासत और आज़ाद नई पीढ़ी के पीच तो यह और भी मुश्किल है। मगर तब जज़्ब-ए-हुर्रियत यानी आज़ादी, स्वतंत्रता के लिए इन ग़ज़लों, गीतों और नज़्मों ने लोगों में ज़बर्दस्त जज़्बा पैदा किया था, क्रांति की नई लहर पैदा की थी। लोग फिरंगियों के ख़िलाफ़ मरने-मिटने को तैयार हो गए थे। इस बात की तस्दीक के लिए चलिए हम शुरूआत करते हैं रामप्रसाद बिस्मिल के उस तराने से जिसे मादर-ए-वतन के लिए हम आज भी उसी भावना से गुनगुनाते हैं।
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना ज़ोर कितना बाज़ुए क़ातिल में है
वक़्त आने पर बता देंगे तुझे ए आसमां
हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है
ऐ शहीदे मुल्क़ों मिल्लत तेरे जज़्बे के निसार
तेरी कुरबानी का चरचा ग़ैर की महफ़िल में है
अब न अगले वलवले हैं और न अरमानों की भीड़
एक मिट जाने की हसरत अब दिले-बिस्मिल में है
रामप्रसाद बिस्मिल के इस तराने ने तब वतन परस्ती की ज़ोर-आज़माइश में नई जान पैदा कर दी थी। तूफ़ान इतना उठा था कि अंग्रेज़ सरकार ने आख़िरकार इस गीत पर प्रतिबंध लगा दिया था। पर क़ौमी तराने की यह बुलंद आवाज़ दबी नहीं बल्कि करोड़ो वलवले इसमें आ मिले और आज़ादी की जुस्तजू बढ़ती चली गई। दरअसल, 1921 से 1935 तक का यह दौर हिन्दुस्तानी सियासी तारीख़ का बड़ा विप्लवग्रस्त दौर था। माले गांव नासिक में सुलेमान शाह, मधु फरीदन, मुहम्मद शाबान और असरील अल्लाहरखा को यरवदा जेल में फांसी की सज़ा दे दी गई। जिस पर पूरे देश में तूफ़ान खड़ा हुआ था। फिर 1925 में काकोरी केस चला। आठ अगस्त 1925 को शाहजहांपुर में क्रांतिकारियों का एक जलसा हुआ जिसकी अध्यक्षता रामप्रसाद बिस्मिल ने की। इसमें इंकलाब के लिए पैसा हासिल करने के लिए खज़ाना ले जाने वाली ट्रेन को लूटने का फ़ैसला किया गया था। यह काम अशफ़ाक़ उल्लाह ख़ां के ज़िम्मे आया और काकोरी मेल को लूट लिया गया। अशफ़ाक उल्लाह ख़ां और रामप्रसाद बिस्मिल को ग़िरफ़्तार कर लिया गया और फांसी दे दी गई। अशफ़ाक़ एक अच्छे शायर भी थे, उन्हें फ़ैज़ाबाद की जेल में फांसी दी गई थी। उन्होंने लिखा है-
वह गुलशान जो की आबाद था गुज़रे ज़माने में
मैं शाखे खुश्क हूं हां उजड़े गुलिस्तां का
इसी नज़्म की अगली पंक्तियों में उन्होंने बड़ी दूरंदेशी से लिखा है-
यह झगड़े ये बखेड़े मेटकर अबस में मिल जाओ
अबस तफ़रीक है तुममें यह हिंदू और मुसलमां का
पर तोप के मुहानों से बांधती ज़ालिम फिरंगी सरकार कहां मानती थी, वे आज़ादी तक फूट डालों और राज करो की नीति पर चलती रही और आख़िरकार वो दिन भी आया जब हिन्दी है हम वतन है वाला इक़बाल का हिन्दुस्तान दो टुकड़ो में बंट गया। दरार ऐसी पड़ी कि सदियां सिहर गईं। लेकिन ढाई सौ साल से ज़्यादा पैरों में में पड़ी ग़ुलामी की ज़ंजीरों को तोड़ने के लिए मरते-मरते अशफ़ाक़ ने यही कहा-
वतन है हमारा है शादकाम और आज़ाद
हमारा क्या है अगर हम रहें न रहें
हिन्दुस्तान की रवायत में मिली-जुली संस्कृति का सिलसिला सैकड़ों सालों से चलता आया था। ख़ासकर सूफ़ियों के ज़माने में यह हिन्दुस्तानी तहज़ीब तुर्की, अरबी और फ़ारसी शब्दों की मिलावट से जन्मी। खुसरो ज़माने में इस मिलावटी बोली को रेख्ता कहा गया। धीरे-धीरे एक नई हिन्दुस्तानी ज़ुबान हिंदवी बनी जो बाद में उर्दू कहलाई। सांस्कृतिक मेल-जोल गहरा हुआ तो उर्दू अदब में भी हिन्दुस्तानीयत हर स्तर पर झलकने लगी। सामाजिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और राजनीतिक चित्र उजागर होने लगे, मशहूर शायर मीर तकी मीर ने लिखा है-
दिल की बरबादी का क्या मज़्कूर है
यह नगर सौ मरतबा लूटा गया
यहां दिल लफ़्ज़ दिल्ली का पर्यायवाची बना जो कितनी बार उजड़ी, टूटी और बनी। यह सिलसिला ज़्यादा से ज़्यादा सियासी आंदोलनों से जुड़ा रहा। यहां तक कि जंग-ए-आज़ादी का तराना बन गई डॉक्टर अल्लामा इक़बाल की नज़्म ‘सारे जहां से अच्छा..’ आज़ादी की घोषणा के समारोह में ‘जन-गण-मन’ के साथ गाई गई। उनका शेर आज भी मौजूं है-
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी
सदियों रहा है दुश्मन दौरे-जहां हमारा
लेकिन जो नग़में और तराने आज आसान लगते हैं, जंग-ए-आज़ादी के दौर में उनका लिखना, छपना और बुलंदी से गाया जाना हंसी-मज़ाक का खेल नहीं था। हैरत होती है ये जानकर कि सारी पाबंदियों के बावजूद देशधर्म की खातिर रचनाकार कैसे न कैसे अपनी बात जनता तक पहुंचा देते थे। कितनी ऐसी ग़ज़लें, नज़्में और शेर हैं जो तब गुप्त रूप से छपते थे और बांटे जाते थे। उनके लिखने वालों का नाम पता तक आज नामालूम है। मगर उन दिनों वे हंगामा बरपा जाते थे।
बांध ले बिस्तर फिरंगी, राज अब जाने को है
जुल्म काफ़ी कर चुके, पब्लिक बिगड़ जाने को है
ऐसे मौक़े भी आए जब रचनाकारों को मगर के मुंह में रहकर भी अपनी बात लोगों तक पहुंचानी पड़ी। शायर अकबर इलाहाबादी का एक क़िस्सा काफ़ी मशहूर है। वे अंग्रेज़ हुक़ूमत के मुलाज़िम थे, पर उन्हीं की ज़्यादतियों के ख़िलाफ़ हुए। उनकी तीन नज़्में जलवा-ए-देहली दरबार में कही गईं। यह 1901 ई. में एडवर्ड सप्तम के जश्ने ताजपोशी का वक़्त था जिसमें ड्यूक ऑफ़ कनाट भी शामिल थे। एक नज़्म में अकबर ने तंज किया-
महफ़िल उनकी, साक़ी उनका आंखे मेरी, बाक़ी उनका
आज़ादी के आंदोलन को गति देने में कॉग्रेसियों का नेतृत्व अहम था। दादाभाई नौरोजी, सुरेंद्रनाथ बनर्जी, अरविंद गोखले और बदरूद्दीन तैयबजी नरम दल का तो गरम दल का नेतृत्व बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, विपिन चंद्रपाल और अरविंद घोष कर रहे थे। 1906 में कोलकाता अधिवेशन में स्वराज की मांग की गई। विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का प्रस्ताव पारित हुआ था। इस दौर में अनेक राष्ट्रीय नज़्में रची गईं। लिखने वालों को अंग्रेज़ी सरकार की प्रताड़ना और अत्याचारों से गुज़रना पड़ा। लेकिन क़लम के जेहाद का सिलसिला जारी रहा। गरम दल से ताल्लुक रखने वाले हसरत मोहानी ने लिखा है-
अय हिन्दी-ए-सादा दिल ख़बरदारहरगिज़ न चले तुझपे यह जादू
इसी दौर में ब्रजनारायण चकबस्त, जफ़र अली ख़ां, त्रिलोक चंद महरूम, बर्क़ दहेलवी की शायरी हमारे संग्राम की बहुमूल्य संपत्ति है। उदाहरण के लिए ब्रजनारायण चकबस्त की ये रचना काबिले-ग़ौर है-
हम खाके हिन्द से पैदा जोश के आसार
हिमालिया से उठे जैसे अब्रे-दरियावार
लहू रग़ों में दिखाता है बर्क़ की रफ़्तार
हुई है खाक के परदे में हडिड्या
बेदारज़मीं से अर्श तलक शोर होमरूल का है
शबाब क़ौम का है ज़ोर होमरूल का है
यहां राष्ट्रीय भावना और धार्मिक मामलों में सुधार के समर्थक सर सैयद अहमद ख़ां के एक कथन का ज़िक्र ज़रूरी है। 26 जनवरी 1882 को अमृतसर की अंजुमने इस्लामिया में तकरीर करते हुए उन्होंने कहा था- ”क़ौम से मेरा मतलब सिर्फ़ मुसलमानों से नहीं है बल्कि़ हिन्दू और मुसलमानों दोनों से है.. हिन्दुओं के अपमान से मुसलमानों का और मुसलमानों के अपमान से हिन्दुओं का अपमान है। इन हालात में जब तक दोनों भाई एक साथ परवरिश ना पा सकें, एक साथ शिक्षा ना पा सकें, एक ही प्रकार के उन्नति के साथ दोनों को उपलब्ध ना हो तो हमारी इज़्ज़त नहीं हो सकती।”
1914 में इंग्लैंड और जर्मनी में जंग छिड़ गई। उस वक़्त हिन्दुस्तान ने अंग्रेज़ों का साथ दिया। लेकिन शिबली नोमानी ने तब भी फिरंगियों पर वार किया था। उनकी नज़्म ‘जंगे यूरोप और हिन्दुस्तानी’ पर वारंट जारी कर दिया गया था। बरतानवी हुक़ूमत उनकी दुश्मन बन गई। शिबली ने लिखा था-
इक जर्मनी ने मुझसे कहा अजरहे गुरूर
आसां नहीं है फ़तह तो दुश्वार भी नहीं
बरतानिया की फ़ौज है दस लाख से भी कम
और इस पे लुत्फ़ यह कि तैयार भी नहीं
बाक़ी रहा फ़्रांस तो वह रिन्दे लमयजलहम
लोग अहले-हिन्द हैं जर्मन से दस गुने
तुझको तमीज़े अन्दरक-ओ-बिसियार भी नहीं
सुनता रहा वो ग़ौर से मेरा कलाम और
फिर कहा जो लायके-इज़हार भी नहीं
इस सादगी पे कौन न मर जाए अय ख़ुदा
लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं
(अजरहे गुरूर: घमंड से, रिन्दे लमयजल: अनश्वर, शराबी, अहले-हिन्द: भारतवासी, अन्दर-ओ-बिसियार: कम और ज़्यादा, लायके-इज़हार: बताने योग्य)
ख़ुद इख़्तियारी का ऐलान (1915), होमरूल आंदोलन (1916), मांटेग्यू सुधार (1917), रोलेट एक्ट (1918) जैसे मुद्दों पर अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ देशभर में आवाज़ उठी। इससे शायर भी अछूते नहीं रहे। महात्मा गांधी की लीडरशिप में आंदोलन आगे बढ़ा और हिन्दू और मुसलमान कंधे से कंधा मिलाकर आज़ादी की जंग लड़ते रहे। 1919 में जालियां वाला बाग की दुखद घटने ने देशवासियों को झकझोर दिया। सैकड़ों लोग निहत्थे शहीद हो गए। फिरंगियों की इस क्रूरता के ख़िलाफ़ उर्दू में कई नज़्में लिखी गईं। उर्दू के मशहूर शायर त्रिलोकचंद महरूम ने लिखा है-
बदले तूने यह लिए भला किस दिन के
ज़िबह कर डाले हैं मुर्ग़ाने चमन गिन गिन के
(मुर्ग़ाने चमन- उपवन के पक्षी)
.. जारी..
श्श्श्श्श… मुस्लिम
August 3, 2007 at 8:28 pm | In भारतनामा | 10 Commentsसीएनएन-आईबीएन की प्रख्यात पत्रकार सागरिका घोष ने मुंबई और कोयंबटूर बमकांड के फ़ैसले के परिप्रेक्ष्य में मुस्लिमों को मिल रही सज़ा पर विचारोत्तेजक लेख लिखा है जो शुक्रवार के हिन्दुस्तान टाइम्स में प्रकाशित किया गया है।

सागरिका लिखती हैं कि मुंबई बमकांड 1993 में 257 लोगों की मौत के ज़िम्मेदार रहे मुस्लिम षडयंत्रकारियों को सज़ा-ए-मौत से लेकर आजीवन कारावास तक की सज़ा दे दी गई। केवल मुस्लिमों को मिल रही सज़ा के ख़िलाफ़ जो आवाज़े उठ भी रही है तो वे सभी या तो छदम सेकुलर करार दी जा रही हैं या फिर उनसे किसी का वास्ता नहीं है। एक ख़ामोशी-सी छायी है। दूसरी ओर संजय दत्त को मिली सज़ा पर हाय-तौबा मचायी जा रही है। लाखों उनके लिए सहानुभूति में आंसू बहा रहे हैं।
बाबरी मस्जिद तोड़े जाने के बाद हुए मुंबई दंगों में तक़रीबन 900 लोग मारे गए थे। एक तरफ़ बमकांड के दोषियों को सज़ा मिल रही है दूसरी ओर बमकांड के पहले हुए मुंबई दंगों के आरोपियों पर सरकारें ख़ामोश हैं, मीडिया ख़ामोश हैं। जनता ख़ामोश है। श्रीकृष्ण आयोग की रिपोर्ट दफ़न कर दी गई और ‘जनरल की तरह‘ भीड़ को कमांड कर रहे बाल ठाकरे से लेकर राम नाइक, गोपीनाथ मुण्डे, मधुकर सरपोतदार जैसे नेता छाती चौड़ी कर आज भी छुट्टे घूम रहे हैं। वे ३१ पुलिस वाले भी जिन्होंने सड़कों पर अपनी वीरता दिखाते हुए मुस्लिमों पर दनादन फ़ायरिंग की थी और जिन अफ़सरों का ज़िक्र श्रीकृष्ण आयोग की रिपोर्ट में बतौर आरोपी दर्ज है।
सागरिका सवाल उठाती हैं कि जब पार्लियामेंट अटैक केस में अफ़शां गूरू बरी की जा सकती हैं तो रुबिना मेमन क्यों नहीं। अफ़शां को इस बात की जानकारी नहीं थी कि उनका घर आतंकी गतिविधियों के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। इसी तरह रुबिना मामले में पुनर्विचार क्यों नहीं किया गया? क्या महज़ कार पर मालिकाना हक़ होने से रुबिना इस आतंकी साज़िश का हिस्सा हो सकती है? जबकि यह हमारा समाज जानता है कि बीवी को नाममात्र स्वामित्व मिलता है लेकिन चीज़े हमेशा मर्दों के नियंत्रण में होती हैं। टाइगर मेमन के भाई सुलेमान की बीवी रुबिना इन दिनों आजीवन कारावास के लिए जेल भेजी जा चुकी हैं।
कोयंबटूर और मुंबई कोर्ट में लुंगी और बुरक़े में आते-जाते आरोपियों को देखकर जो पब्लिक परसेप्शन बन रहा है वो फासीवादियों के लिए बांछे खिलाने वाला है। दूसरी ओर वे मामले हमारी व्यवस्था में दबा दिए गए हैं जो हिन्दुओं को कटघरे में खड़ा करते हैं। गुजरात दंगों के आरोपी छुट्टे सांड की तरह घूम रहे हैं। मुंबई दंगों की जांच रिपोर्ट कचरा पेटी में पड़ी है। जिस पर तथाकथित सेकुलर पार्टी कॉग्रेस तक ने मौन साध रखा है।
Original Article written by Sagarika Ghose
Courtesy: Hindustan Times
There is a certain chilling predictability about the list of convicts, a dreadful Orwellian litany of sameness. After a mammoth 14 years of trial and the dramatic sentencing of Sanjay Dutt, the Bombay blasts case of 1993 is closed. Of the 123 accused, 100 have been sentenced, 12 have been sentenced to death, 20 given life terms, 15 of them with rigorous imprisonment (RI). What are the names of those who will die? Among others, Memon, Turk, Tarani, Shaikh, Mukadam, Ghansar, Malik, Pawle, and Khan. What are the names of those who will serve life terms with RI? Among others, Shaikh, Khairulla, Qureshi, Memon, Rehman and Kadar.
In the 1998 Coimbatore blast verdict this week, the main accused Abdul Nazar Mahdani has been acquitted, but SA Basha, founder of al-Umma has been found guilty, along with 157 others. Muslim after Muslim has stepped up to be convicted and sentenced. Soon India’s jails will be choc-a-block with Muslims.
The conspiracy that bombed Mumbai in 1993 and took 257 lives was demonic and destroyed lives. But after the conspiracy of terror, has come a surreal conspiracy of silence. There is a deathly quiet, a floating shroud of bemused acceptance. There is not a shred of sympathy, no trace of introspection, no question of benefit of doubt given to any of the accused in the court of public opinion. To voice any doubts about the long delayed trial is considered ‘anti-national’, ‘unpatriotic’ or ‘pseudo-secular’. Yet senior lawyers have publicly cast doubt on how the blast case is a shame on the judiciary. How can justice be thoroughly done through the mountains of documentation, the sheer bulk of facts and contradictions, the long delayed trial and lapses in human memory that must have faced poor Justice PD Kode. A senior counsel has called the case a “mistrial” and a case of “playing to the gallery”.
Yet, apart from the high voltage debate on Sanjay Dutt, among the larger public, there is only silence. The guilty are Muslims, after all. They killed innocent people, they’ve been brought to justice and that’s the end of that. A softly floating cloud engulfs us in its comforting yet toxic fumes. Is it a phantom? A phantom that is lulling Indian society into a deadly illness of certainty. A society that does not ask questions of itself, a society that does not take itself to task, but wallows in convenient ‘truths’, is a society doomed to death. Hindus and Muslims whisper among themselves in their own ghettos. The cross-religion and cross-community debate is dead or dying.
Judge PD Kode is justifiably hailed as a tough and idealistic judge and his own fairness is not in doubt. The prosecution of Special Public prosecutor Ujwal Nikam has been determined. Yet, in a case where far too many cases were bunched up together, where the sheer volume of paperwork was so huge, isn’t it expecting too much of a single human being to be perfectly conversant with each case? In the prevailing silence, a few voices have sounded. As Muslim after Muslim has walked to his death, as ‘terrorist’ after ‘terrorist’ has been taken away for life, what about the Hindu mobs and Hindu police officers who were named and indicted by the Justice Srikrishna Commission that inquired into the bloodcurdling 1992-93 riots of Mumbai in which 900 died? That horrifying report, indicts 31 “trigger-happy” policemen: among others, the names here are sub-inspector Vasant Madhukar More, police inspectors Patankar and Wahule, Jt Commissoner of Police RD Tyagi, not to mention political names like Gopinath Munde, Madhukar Sarpotdar and Ram Naik of the BJP all accused of inciting mobs. Aren’t riots too not an act of terror? A terrorist is defined as one who kills innocent civilians for a political purpose. So aren’t those Hindu rioters too not ‘terrorists’ and shouldn’t they too face the same law as Muslim ‘terrorists’?
Let’s try and break the conspiracy of silence a little. Rubina Memon is not a celebrity. Instead she is the wife of Tiger Memon’s older brother Sulaiman. She has been given rigorous imprisonment for life. Rubina was the woman in the brown burqa who we all saw on television. Rubina has been found guilty under Tada because it was the van registered under her name that was used to carry arms and ammunition for the blasts. She also allowed her house to be used for ‘terror activities’ and had arranged funds from her bank account for the conspirators. But is there any proof that Rubina actually bought the car that was registered in her name? Did she use the car? Did she actually know what her husband’s brothers were planning to do? Or was it kept a secret from her, as men all over India, keep important secrets from their wives and sisters-in- law?
If Afsan Guru, wife of Shaukat Husain Guru, could be acquitted in the Parliament attack case because there was no proof she knew her house was being used for ‘terror activities’, can the same lack of knowledge not have been possible for Rubina? Assuming, she did know, is there proof that Rubina played an active role in the blasts? Or was she the typical uneducated Muslim woman in a household who did what her menfolk asked her to do, even allowing a car to be registered in her name so that her husband could escape tax? For her crimes, Rubina will serve a life term with rigorous imprisonment while her teenage children seek permission to visit their mother in jail. Tragically, justice may not have still been done to Rubina Memon. Zebunissa Qazi is 60 and also held guilty under Tada of abetting terrorist acts. She’s been given five years of rigorous imprisonment. What did she do? She says some boys handed her a bag and told her to keep it in her garage. She did not know what was inside the bag. Are Rubina Memon and Zebunissa Qazi terrorists?
Dr Mohammed Haneef, detained for 27 days in Australia is on the other side too. On the other side, distant, far away from Indian mainstream society, from muted civil society groups, distant from the voices of the intelligentsia, bludgeoned into silence by the spectre and reality of the ‘Islamist terrorist’. What factors should have exercised the Indian conscience about Dr Haneef? That it is not a crime to be related to those who are terrorists, only a conspiracy is a crime. That lending a SIM card is not a criminal offence. That a one-way ticket is not a criminal offence. That a beard is not a criminal offence. Australian civil society took its government head on about Haneef. Indian civil society turned its back on Haneef, instead vilifying the Prime Minister when he made the mistake of confessing he had had a sleepless night about Haneef’s parents.
There is suddenly no doubt left in the minds of the majority of Indian society. Political tokenism of three Muslim vice-presidential candidates sits alongside a covert hidden communalism that does not express itself in riots but in quiet determined segregation. The burqa-clad or lungi-clad figures march into the Tada court, yet apart from the publicity circus around celebrity Sanjay Dutt, we are incurious about the individuals behind the burqas and the lungis. The little stories of mothers and brothers are of no interest. The toxic cloud of silence drifts ever closer, lulling us into a dreamless sleep.
इस लेख को पढ़ने के बाद यह तय करना होगा कि हम दोहरे मापदंड क्यों अपना रहे हैं। एक तरफ़ आतंकी गतिविधियों के लिए थोक के भाव से मुस्लिमों को सज़ा-ए-मौत के फ़रमान सुना रहे हैं और दूसरी तरफ़ हज़ारो मौतों के ज़िम्मेदार नेताओं और हिन्दू चरमपंथियों और दलों को ज़िम्मेदार नहीं ठहरा सकते? ये कैसी धर्मनिरपेक्षता है? ये कैसा समाज और इसका क़ानून है। आप भले ही दोषियों को मिल रही सज़ा पर कुछ ना कहना चाहते हों लेकिन यह स्वीकार करना चाहिए कि राजनीतिक फ़ायदों के एवज में सरकारी सुस्ती पसरी हुई है जो पूरी तरह प्रायोजित है। हमारी व्यवस्था हिन्दू चरमपंथियों को सलाखों के पीछे भेजने से रोकती आयी है। यही बाहुल्यवाद की धमक है। मेरे पिछले लेख पर कुछ पाठकों ने इसी बिंदु पर सवाल किए थे। वे शायद यही कहना चाहते थे कि मेरा ध्यान हमारे दोहरे मापदंडों पर नहीं है। यदि वो मेरे पिछले लेखों पर नज़र डालते तो संभवतः ऐसा न कहते।
श्रीकृष्ण आयोग की रिपोर्ट का एक हिस्सा ये पढ़िए.. (रिपोर्ट के लिए यहां क्लिक करें)

On January 1, 1993, an article appeared in the Shiv Sena organ edited by Bal Thackeray, Saamna, under the heading “Hindunni Akramak Vhayala Have” (Hindus must become aggressors), openly inciting Hindus to violence.
On January 2, 1993 a number of Muslim hutments in M.P. Mill compound within the Tardeo jurisdiction of south Mumbai were set on fire. On the same day, there was an incident in Dharavi where two Muslims were assaulted with iron rods.
On January 3, 1993 there was an attack on a Muslim in Dharavi jurisdiction with a knife. On the same day, several persons claiming to be officials of MHADA, and alleged to be Shiv Sainiks, went around Pratiksha Nagar in Antop Hill jurisdiction surveying the residences of Muslims there.
On January 4, 1993 a big mob of Hindus, led by Shri Gajanan Kirtikar, Shri Ramesh More and other Shiv Sena activists, took a morcha to the Jogeshwari Police Station complaining of lack of security for Hindus. Some of the people in the morcha attacked Chacha Nagar Masjid and the Muslims in the vicinity and injured them. Several Muslim huts in Magdum Nagar in Mahim jurisdiction were set on fire by Hindus.
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