कीबोर्ड का सिपाही

प्रतिभा पाटिल हां तो किरण बेदी क्यों नहीं?

Posted in भारतनामा by neerajdiwan on July 25, 2007

 किरण बेदी देश की पहली महिला आईपीएस ऑफ़िसर हैं. यह भी सही है कि वे देश की ऐसी पहली महिला ऑफ़िसर हैं जो चाहें-करें, उसकी चर्चा मीडिया में ज़रूर होती है. वे पुलिस में ना होतीं तो मीडिया या फिर पॉलीटिक्स में ज़रूर होती. हालांकि वे टेनिस प्लेयर बनने का ख़्वाब भी रखती थीं. अच्छे काम का श्रेय लेना भी वे ख़ूब जानती हैं. चाहे तिहाड़ जेल में किए गए सुधार के काम हों या अपने ग़ैर सरकारी संगठननवज्योतिके ज़रिए किए जाने वाले सामाजिक सुधार के काम. पुरुष-प्रधान व्यवस्था महिला आधिपत्य को नहीं स्वीकारती लिहाज़ा वरिष्ठ अफ़सरों से मतभेदों को लेकर वे चर्चा में भी रहीं 

यह भूमिका इसलिए बनाई गई क्योंकि जब कभी देश में महिला सशक्तिकरण की बात होती है श्रीमती बेदी का चेहरा हमारे सामने जाता है. बेहद सुलझी विचारों की और दृढ़-संकल्पित महिला के रूप में उनकी छवि उभरती है. दो साल पहले ही वे संयुक्त राष्ट्र संघ से लौटी थीं. किरण बेदी फ़िलहाल ब्यूरो ऑफ़ पुलिस रिसर्च एण्ड डेवलपमेंट में डीजी के पद पर तैनात है. 

आज ही के दिन महिला सशक्तिकरण के अभियान में नया अध्याय शुरू हुआ है. देश को प्रतिभा पाटिल मिली है हमारी पहली महिला राष्ट्रप्रमुख ! (राष्ट्रपति कहने में लिंगभेद नज़र आता है)…. लोग दबी ज़ुबान कहते रहे कि केंद्र की सरकार ने प्रतिभा जी को जीताने के लिए पूरा ज़ोर लगा दिया और सुपर पीएम कही जाने वाली सोनिया जी की पूरी कॉग्रेस पार्टी और लेफ़्ट इस मुद्दे पर एकमत हो गए. यह बात भी ध्यान देने वाली है कि देश को पांच साल पहले भी कैप्टन लक्ष्मी सहगल के रूप में पहली महिला राष्ट्रपति मिल सकती थी. लेकिन सहगल सोनिया जी के पीछे लगी कतार में नहीं थीं. 

दिल्ली के उप राज्यपाल ने अपनी रिपोर्ट में किरण बेदी को दिल्ली का पुलिस कमीश्नर बनाए जाने की सिफ़ारिश की थी. लेकिन केंद्रीय गृह मंत्रालय नहीं चाहता कि किरण बेदी दिल्ली की पुलिस कमीश्नर बनें. वरिष्ठता के क्रम में भी बेदी ही नवनियुक्त कमीश्नर वाई एस डडवाल से कहीं ज़्यादा अनुभवी और लोकप्रिय हैं. श्रीमती बेदी 1972 बैच की अधिकारी है जबकि डडवाल 1974 के अधिकारी हैयह भी ख़बरें छपी कि डडवाल वही अधिकारी हैं जो जेसिका लाल हत्याकांड की रात टैमरिन कोर्ट की उसी पार्टी में मौजूद थे, जहां हत्या हुई थी.

ईमानदारों से हर शातिर घबराता है और हमारी व्यवस्था में किरण बेदी जैसे लोग फिट नहीं नज़र आते. व्यवस्था में शीर्ष पर बैठे लोग इतने चतुर है कि बेदी जैसे लोगों को किनारे करने का कोई भी मौक़ा नहीं चूकते. सरकारी व्यवस्था में असरकारी कामों के लिए कोई जगह नहीं होती. राजनीति नौकरशाहों को अपना दरख़रीद ग़ुलाम बनाकर रखना चाहती है.

श्रीमती बेदी के साथ किसी पार्टी के लोग नहीं है.. कलाम साहब देश की जनता के राष्ट्रपति थे (हैं). कलाम साहब आज राष्ट्रपति भवन से रिटायर कर गए. किरण बेदी अपने को दिल्ली का पुलिस कमीश्नर ना बनाए जाने से नाराज़ होकर तीन महीने की छुट्टी पर चली गई हैं. प्रतिभा का सम्मान हुआ और किरण का अपमान हुआ.. क्यों? ये सोचने वाली बात है.