प्रतिभा पाटिल हां तो किरण बेदी क्यों नहीं?

July 25, 2007 at 10:40 pm | In भारतनामा | 17 Comments

 किरण बेदी देश की पहली महिला आईपीएस ऑफ़िसर हैं. यह भी सही है कि वे देश की ऐसी पहली महिला ऑफ़िसर हैं जो चाहें-करें, उसकी चर्चा मीडिया में ज़रूर होती है. वे पुलिस में ना होतीं तो मीडिया या फिर पॉलीटिक्स में ज़रूर होती. हालांकि वे टेनिस प्लेयर बनने का ख़्वाब भी रखती थीं. अच्छे काम का श्रेय लेना भी वे ख़ूब जानती हैं. चाहे तिहाड़ जेल में किए गए सुधार के काम हों या अपने ग़ैर सरकारी संगठननवज्योतिके ज़रिए किए जाने वाले सामाजिक सुधार के काम. पुरुष-प्रधान व्यवस्था महिला आधिपत्य को नहीं स्वीकारती लिहाज़ा वरिष्ठ अफ़सरों से मतभेदों को लेकर वे चर्चा में भी रहीं 

यह भूमिका इसलिए बनाई गई क्योंकि जब कभी देश में महिला सशक्तिकरण की बात होती है श्रीमती बेदी का चेहरा हमारे सामने जाता है. बेहद सुलझी विचारों की और दृढ़-संकल्पित महिला के रूप में उनकी छवि उभरती है. दो साल पहले ही वे संयुक्त राष्ट्र संघ से लौटी थीं. किरण बेदी फ़िलहाल ब्यूरो ऑफ़ पुलिस रिसर्च एण्ड डेवलपमेंट में डीजी के पद पर तैनात है. 

आज ही के दिन महिला सशक्तिकरण के अभियान में नया अध्याय शुरू हुआ है. देश को प्रतिभा पाटिल मिली है हमारी पहली महिला राष्ट्रप्रमुख ! (राष्ट्रपति कहने में लिंगभेद नज़र आता है)…. लोग दबी ज़ुबान कहते रहे कि केंद्र की सरकार ने प्रतिभा जी को जीताने के लिए पूरा ज़ोर लगा दिया और सुपर पीएम कही जाने वाली सोनिया जी की पूरी कॉग्रेस पार्टी और लेफ़्ट इस मुद्दे पर एकमत हो गए. यह बात भी ध्यान देने वाली है कि देश को पांच साल पहले भी कैप्टन लक्ष्मी सहगल के रूप में पहली महिला राष्ट्रपति मिल सकती थी. लेकिन सहगल सोनिया जी के पीछे लगी कतार में नहीं थीं. 

दिल्ली के उप राज्यपाल ने अपनी रिपोर्ट में किरण बेदी को दिल्ली का पुलिस कमीश्नर बनाए जाने की सिफ़ारिश की थी. लेकिन केंद्रीय गृह मंत्रालय नहीं चाहता कि किरण बेदी दिल्ली की पुलिस कमीश्नर बनें. वरिष्ठता के क्रम में भी बेदी ही नवनियुक्त कमीश्नर वाई एस डडवाल से कहीं ज़्यादा अनुभवी और लोकप्रिय हैं. श्रीमती बेदी 1972 बैच की अधिकारी है जबकि डडवाल 1974 के अधिकारी हैयह भी ख़बरें छपी कि डडवाल वही अधिकारी हैं जो जेसिका लाल हत्याकांड की रात टैमरिन कोर्ट की उसी पार्टी में मौजूद थे, जहां हत्या हुई थी.

ईमानदारों से हर शातिर घबराता है और हमारी व्यवस्था में किरण बेदी जैसे लोग फिट नहीं नज़र आते. व्यवस्था में शीर्ष पर बैठे लोग इतने चतुर है कि बेदी जैसे लोगों को किनारे करने का कोई भी मौक़ा नहीं चूकते. सरकारी व्यवस्था में असरकारी कामों के लिए कोई जगह नहीं होती. राजनीति नौकरशाहों को अपना दरख़रीद ग़ुलाम बनाकर रखना चाहती है.

श्रीमती बेदी के साथ किसी पार्टी के लोग नहीं है.. कलाम साहब देश की जनता के राष्ट्रपति थे (हैं). कलाम साहब आज राष्ट्रपति भवन से रिटायर कर गए. किरण बेदी अपने को दिल्ली का पुलिस कमीश्नर ना बनाए जाने से नाराज़ होकर तीन महीने की छुट्टी पर चली गई हैं. प्रतिभा का सम्मान हुआ और किरण का अपमान हुआ.. क्यों? ये सोचने वाली बात है.

बदले की भावना से उपजा अनर्थ – जयप्रकाश चौकसे

July 20, 2007 at 7:01 pm | In इधर-उधर | 11 Comments

Sonu Nigam निष्णात् सिने-समीक्षक जयप्रकाश चौकसे का ताज़ा लेख जो सोनू निगम और सुभाष झा विवाद पर केंद्रित है यहां जस का तस प्रकाशित कर रहा हूं उम्मीद है कि चौकसे जी का फ़लसफ़ाई अंदाज़ रूचिकर लगेगा. (साभार- दैनिक भास्कर)

  फिल्म पत्रकार द्वारा कथित तौर पर गायक सोनू निगम को धमकी और अश्लील संदेश भेजने का जो प्रकरण सामने आया और आपस में आरोप-प्रत्यारोपों का जो दौर चला, उसे देखकर एक लोककथा याद आती है।

लोककथा कुछ इस तरह की है कि एक महात्मा और शिकारी पड़ोसी थे। अच्छे पड़ोसी होने के नाते दोनों के घरों से वस्तुओं का आदान-प्रदान भी होता रहता था। एक दिन महात्मा ने देखा कि शिकारी उनके घर से आई थाली में गोश्त खा रहा है। यह देखकर उन्हें गुस्सा गया और उन्होंने शिकारी मित्र से कहा, ‘कल तुम मेरे घर आकर देखना कि मैं तुम्हारे घर से आई थाली में क्या खाता हूं।महात्मा बहुत क्रोध में थे और उन्हें समझ नहीं रहा था कि गोश्त से भी गिरी हुई कौन सी चीज खाकर वे अपना बदला पूरा करें। उनकी नजर में गोश्त से ज्यादा निकृष्ट तो केवल मानव अवशिष्ट ही हो सकता था, परंतु सवाल यह भी था कि क्या बदले की भावना से वशीभूत होकर वे अभक्ष्य वस्तु को खा लें?

आखिर में उनका विवेक जाग गया और उन्होंने शिकारी मित्र को अपनी थाली भेंट कर दी। उधर महात्मा के इस संयम से प्रभावित होकर शिकारी ने भी मांस खाना छोड़ दिया। इसका अर्थ यह है कि क्रोध और बदले की भावना आपसे अनर्थ करा सकती है। 

गायक सही है या गलत है, पत्रकार निर्दोष है या दोषी, इस पर कोई राय नहीं दी जा सकती, परंतु फिल्म उद्योग में शोषण की बात का इसलिए कोई अर्थ नहीं है, क्योंकि यहां हर क्षेत्र में शोषण होता है। सारी प्रगति तथा विकास के बावजूद समाज में बलिष्ठ को लाभ और कमजोर को हानि का नियम जारी है।

मुंबई की लोकल ट्रेन में चर्चगेट से बोरीवली तक का सफर तय करती मध्यम वर्ग की लड़की को कितने अनजान लोगों के चाहे-अनचाहे स्पर्श से गुजरना पड़ता होगा। फिल्म उद्योग में आने वाली लड़कियां बहुत चतुर होती हैं। वे जानती हैं कि कहां कितना समझौता कैसे लाभप्रद हो सकता है। कहीं कोई जोर-जबरदस्ती नहीं है, सारे मामले आपसी सुविधा से सुलझाए जाते हैं। कालेज कैंपस की उच्छृंखलता के मुकाबले स्टूडियो में शोषण कम ही होता है। समलैंगिकता के मामले आजकल प्राय: इस तरह उछाले जाते हैं, मानो यह आज के दौर में जन्मी विकृति है। 

आजादी की अलसभोर में ही इस्मत चुगताई की लिहाफनामक कथा प्रकाशित हुई थी, जिसमें समलैंगिकता की ओर कलात्मक इशारा था। असल में यह विकृति हमेशा से ही समाज में मौजूद थी, परंतु इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने इसे अपने लाभ के लिए खूब उछाला, जो स्वयं में भी एक अलग किस्म की विकृति है। सेना और लंबी यात्राओं पर जाने वाले समुद्री जहाजों पर ये विकृतियां सदियों से जारी हैं। इसका स्पष्ट अर्थ है कि अकेलापन विकृतियों को जन्म दे सकता है। भारत में इस समय सेक्स शिक्षा को भी विवादास्पद बना दिया गया है, जबकि यह आवश्यक है। टेलीविजन पर प्रस्तुत भयावह तमाशे के दुष्परिणामों से युवा वर्ग को बचाने के लिए शायद यह जरूरी भी है। किसी भी क्षेत्र में ज्ञान को पैर पसारने से कैसे रोका जा सकता है। 

विकृतियों को कैसे और कितना उजागर किया जाए, यह मीडिया को स्वयं ही तय करना है। इससे भी ज्यादा आवश्यक यह है कि अवाम खुद यह तय करे कि उसे क्या और कितना देखना है। सच्ची समानता और निर्भीक स्वतंत्रता के अभाव में शोषण के दायरे फैल जाते हैं।

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