जड़ों पर प्रहार जारी रखो

April 17, 2007 at 4:23 pm | In ख़बरदार | 20 Comments

क्ष्मी के वाहनों की सरस्वती वंदना सुनते हुए दिन गुज़र रहे हैं. यदा-कदा तांडव भी देखा और पन्नों पर स्याही की जगह नफ़रत का ज़हर उगालता नाट्य लेखन भी देखा. जब जब हमने इनकी पोल खोली, इनका विद्रूप चेहरा जनता को दिखाया. तब तब इनका क्रोध सातवें आसमां पर पहुंच गया और ये फिलीस्तीन से लेकर इंडोनेशिया और सोमनाथ से लेकर अयोध्या तक के मसले हमें गिनाते रहे. ऐसे रोए मानो बूढ़ी वेश्या को अपने कौमार्य खोने की खीज सालों बाद टीस रही हो. वे अपने ऊपर हुए हमारे हर कटाक्ष को ख़ास तरह के हिन्दुत्व से जोड़कर गरिमा और अस्मिता का सवाल खड़ा करते रहे. वे अपने गुंडों के माथे पर चंदन का टीका टिकाकर अपनी शाखाओं में उनका उपनयन करते हैं. वक़्त आने पर भीड़ के बीच छोड़ते रहे. इनकी भीड़ अपना आपा खोती है और हर अच्छे-बुरे का फ़ैसला सड़क पर करना चाहती है. इनके तर्क वितर्क का सिलसिला जहां ख़त्म हो जाता है. ये त्रिशूल-गदा लेकर सड़कों पर उतर आते हैं. बाबरी ध्वंस से लेकर स्टार न्यूज़ पर हमले सैकड़ों वारदात इसकी मिसाल है. इन्होंने सैकड़ों बार अपने गुरुओं को दक्षिणा में हज़ारों मासूमों का शीश काटकर दिया है. ये मुस्लिम चरमपंथियों की हरकतों का जवाब पूरे मुस्लिम समाज के खिलाफ़ देते हैं. 

इनके बस में पूरी सरकार हो तो ये राज्यों और देश को प्रयोगशाला बना लेते हैं जहां लोकतांत्रिक-पंथनिरपेक्षता में भरोसा रखने वाले लोग इन्हें अपशिष्ट पदार्थ दिखाई पड़ते हैं. हिन्दुस्तानी तहज़ीब और मिली-जुली संस्कृति के पैरोकार इन्हें जानी दुश्मन नज़र आते हैं. इनकी लेबोरेटरी में इनका कूड़ा-करकटनुमा साहित्य उन शिष्यों के लिए उत्प्रेरक का काम करता है. यदि आपने इनसे रोज़ी-रोटी का सवाल किया तो ये स्वाभिमान की बातें करने लगेंगे. यदि आपने इनसे स्वाभिमान की बातें की तो ये हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना में सभी समस्याओं का हल ढूंढते दिखाई देंगे. फिर ये अपने तर्क में बताएंगे- ‘’दुनिया में दर्ज़नों मुस्लिम राष्ट्र हैं और उनमें कोई भी लोकतांत्रिक राष्ट्र नहीं है.’’

ये भूल जाएंगे कि कल तक दुनिया का अकेला हिन्दू राष्ट्र रहा नेपाल कभी विकास की दौड़ में शामिल तक नहीं हो सका. जहां लोकतंत्र की जड़ें कभी गहरी हो सकीं और जहां के शाही राजपरिवार पर अपने मुल्क में दाउद इब्राहिम और उसके गुर्गों को पनाह देने की खुफ़िया रिपोर्ट आती रहीं. पिछले पंद्रह सालों में वहां किस तरह मुस्लिम चरमपंथियों ने इफ़रात दौलत खड़ी कर ली, खुरापाती अड्डे बना लिए. फिर ये क्यों भूलते हैं कि दुनिया में हमारा मुक़ाबला क्या उन राष्ट्रों से हैं जो अब भी मध्युगीन और बर्बर समाज में जी रहे हैं?

ये अगला तर्क देंगे- सरकारें अल्पसंख्यकवाद की राजनीति करती है. तो क्या ये बहुसंख्यकवाद की राजनीति को इस आधार पर सही ठहरा रहे हैं? क्या एक ग़लत को दूसरे ग़लत से जोड़कर सही बनाया जा सकता है? फिर अतीत देखूं तो लगता है कि ये भी हिमायत कमेटी और दो करोड़ उर्दू शिक्षकों के साथ करोड़ों के पैकेज अल्पसंख्यकों के लिए मुहैया कराने का ऐलान करते हैं? आपके मुखौटे गोआ में कहते हैं कि मुसलमान जहां है वहां शांति से नहीं रहना चाहते तो यही मुखौटा हरी टोपी लगाकर दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में मुस्लिमों को अपने लिए वोट करने का आह्वान करता नज़र आता है. इसी मुखौटे को शाही इमाम के फतवे की दरकार होती है. है ना उलटबासियां? 

दरअसल, इन बजरंगियों का अस्तित्व किसी हिन्दुत्व के आधार पर नहीं टिका है. इनका अस्तित्व मुस्लिम विरोध पर टिका है. मुस्लिमों के ख़िलाफ़ जितना ज़हर उगला जा सकता है उगलो. अपने हास्यास्पद तर्कों से जनता को बरगलाओ और मीडिया में घुसपैठ करो. जो तटस्थ हैं, जिनकी भारतीय लोकतांत्रिक पंथनिरपेक्षता में आस्था है उन ख़बरनवीसों को निशाने पर रखो. जो चैनल-अख़बार (आज के दौर में ब्लॉग भी) गंगा-जमनी तहज़ीब के तरफ़दार हों, उन्हें हिन्दू विरोधी साबित करो. इनका टारगेट वह मीडिया है जो हिन्दू मुस्लिमों के प्रेम की ख़बरें चलाता है. प्रियंका- उमर(उमेश) और खुशी- क़ादिर इनकी नज़रों में खटकते हैं क्योंकि ये इसी गंगा-जमनी तहज़ीब के वाहक हैं. ये भूल जाते हैं कि इनके रथी आडवाणी की भतीजी ने भी मुस्लिम लड़के से विवाह किया था. सारी मर्यादा और सामाजिक पाबंदियां आम आदमी के लिए बनाते हैं. ये हिन्दुओं को दस-दस बच्चें पैदा करने का आह्वान करते हैं और खुद आजीवन अविवाहित रहने का संकल्प करते हैं. आपस में कौन-सी सिंकदरीयाई संस्कृति विकसित करते हैं यह कहने की दरकार नहीं. 

मीडिया के भस्मासुर

मैं यह मानता हूं कि हिन्दू समाज (व्यापक नहीं) अगर बदल रहा है, अपनी उदार, सहिष्णु और सर्वग्राही परंपरा को अपनी कायरता और अकर्मण्यता समझने लगा है, और संविधान, लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के दुरुपयोग या उनकी तोड़-फोड़ के कारण उनमें विश्वास खो चुका है तो इसका थोड़ा-बहुत अंदाज़ तो प्रेस को होना चाहिए. इसके उलट मीडिया के कुछ गुटों ने अपनी तेज़गीरी के चलते इन दिनों भस्मासुरों को पैदा कर दिया है. कहीं मंदिरा बेदी की अधनंगी पीठ पर बना एकओंकार हो, शिल्पा शेट्टी- रिचर्ड गियर के किस की ख़बरें हो. ऐसे दिखाया जाता है मानो व्यापक राष्ट्रहित का मुद्दा मिल गया हो. इसी दौर में दस-बारह लोगों को पुतला जलाते हुए दिखाकर और उनके बीच रिपोर्टर का यह कहना कि समूचे देश में आग लग गई है. यही पुतला जलाने वाले खाली बैठे उधमी लोग बाद में हिन्दू राष्ट्र सेना में दिखाई देते हैं. स्टार न्यूज़ पर हमले की घटना उसी भस्मासुर की एक कहानी है. मैं इस घटना का सामान्यीकरण कतई नहीं कर रहा हूं. बल्कि यह कह रहा हूं कि जिन बेवकूफ़ों की कोई औक़ात नहीं, जिनका कोई जनाधार नहीं, जो ज़िम्मेदार नहीं ऐसे लोग जब अनुपात से ज़्यादा कवरेज पाते हैं तो गंदे नाले की तरह हल्की बारिश में ही उफनने लगते हैं. वे किसी और के ज़रिए गाइड किए जाते हैं. वे सियासी ताक़तों के इशारों पर किसी भी तरह की घटना को अंजाम दे सकते हैं. इनके आका सामने आते नहीं है. वे हिन्दू राष्ट्र सेना सरीखे नए गुट बनाते हैं. इन गुटों से निपटना होगा. बल्कि उससे पहले इनके आकाओं को निशाने पर लेना होगा. जो इनके ख़िलाफ़ मोर्चा खोले हैं. वे हिम्मत से डटे रहें. आज स्टार न्यूज़ तो कल किसी और पत्रकार, चैनल या अख़बार के दफ़्तर पर हमला करेंगे. हम विरोध करेंगे. लेकिन हमें जड़ों पर प्रहार जारी रखना है.

ख़बरों के बीच ख़बर

 

अनुराग बने रिपोर्टर

April 17, 2007 at 4:19 pm | In चिट्ठाजगत | 12 Comments

वर्जिनिया टेक में दर्ज़नों की मौत की ख़बर मिलते ही मुझे अपने ब्लॉगर साथी अनुराग मिश्रा जी याद आई. अनुराग जी से संपर्क साधा और रात प्रसारित होने वाले न्यूज़ बुलेटिन में उन्होंने हमें ताज़ा हाल और पूरी घटना से अवगत कराया. वर्जिनिया टेक से जुड़े वे पहले शख्स थे जो सबसे पहले किसी भारतीय चैनल पर अपनी बात कह रहे थे.
यह किसी तरह की उपलब्धि तो नहीं किंतु यह पत्रकार की नियति है कि हर मौक़े पर, हर दशा में उसे ख़बर कवर करनी ही होती है. अनुराग जी ने ब्रेकिंग न्यूज़ के एंकर और इंडिया टीवी के एडिटर इन चीफ़ रजत जी से बातचीत के दौरान बताया कि किस तरह हमलावर आया और संस्थान के किस इलाक़े में अंधाधुंध फ़ायरिंग की. कितने लोग अपनी जान गवां बैठे और भारतीयो में इस घटना को लेकर कितनी चिंता है. इसके अलावा भी अन्य महत्वपूर्ण जानकारी उन्होंने हमें दी. बाद में आपसी बातचीत के बीच उन्होंने कई अन्य जानकारी दी. इस तरह एक ब्लॉगर ने रिपोर्टर की संक्षिप्त भूमिका निभायी. हमले की यह घटना अत्यंत दुखद है. सोमवार का दिन दो दुखद घटनाओं के बीच बीता.

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