ग़ज़ल का साज़ उठाओ

February 8, 2007 at 2:56 pm | In दिल से | 29 Comments

जगजीत सिंह के जन्मदिवस पर विशेष 

ग़ज़लों की दुनिया के बादशाह पद्मभूषण जगजीत सिंह जी आज ६६ साल हो गए. हम सुनने वालों की तमन्ना है कि वे इसी तरह अपनी सहराना आवाज़ से लाखों-करोड़ों सुनने वालों के दिलों पर अपना जादू चलाते रहें. खालिस उर्दू जानने वालों की मिल्कियत समझी जाने वाली.. नवाबों, रक्कासाओं की दुनिया में झनकती और शायरों की महफ़िलों में वाह-वाह की दाद पर इतराती ग़ज़लों को आम आदमी तक पहुंचाने का श्रेय अगर किसी को पहले पहल दिया जाना हो तो मैं जगजीत सिंह का ही नाम लूंगा. उनकी ग़ज़लों ने न सिर्फ़ उर्दू के कम जानकारों के बीच शेरो-शायरी की समझ में इज़ाफ़ा किया बल्कि ग़ालिब, मीर, मजाज़, जोश और फ़िराक़ जैसे शायरों से भी उनका परिचय कराया.  

जगजीत जी का जन्म आठ फ़रवरी १९४१ को राजस्थान के गंगानगर में हुआ था. पिता सरदार अमर सिंह धमानी भारत सरकार के कर्मचारी थे. जगजीत जी का परिवार मूलतः पंजाब के रोपड़ ज़िले के दल्ला गांव का रहने वाला है. मां बच्चन कौर पंजाब के ही समरल्ला के उट्टालन गांव की रहने वाली थीं. जगजीत का बचपन का नाम जीत था. करोड़ों सुनने वालों के चलते सिंह साहब कुछ ही दशकों में जग को जीतने वाले जगजीत बन गए. शुरूआती शिक्षा गंगानगर के खालसा स्कूल में हुई और बाद पढ़ने के लिए जालंधर आ गए. डीएवी कॉलेज से स्नातक की डिग्री ली और इसके बाद कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय से इतिहास में पोस्ट ग्रेजुएशन भी किया.

 संगीत का सफ़रबचपन मे अपने पिता से संगीत विरासत में मिला. गंगानगर मे ही पंडित छगन लाल शर्मा के सानिध्य में दो साल तक शास्त्रीय संगीत सीखने की शुरूआत की. आगे जाकर सैनिया घराने के उस्ताद जमाल ख़ान साहब से ख्याल, ठुमरी और ध्रुपद की बारीकियां सीखीं. पिता की ख़्वाहिश थी कि उनका बेटा भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) में जाए लेकिन जगजीत पर गायक बनने की धुन सवार थी. कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान संगीत मे उनकी दिलचस्पी देखकर कुलपति प्रोफ़ेसर सूरजभान ने जगजीत सिंह जी को काफ़ी उत्साहित किया. उनके ही कहने पर वे १९६५ में मुंबई आ गए. यहां से संघर्ष का दौर शुरू हुआ. वे पेइंग गेस्ट के तौर पर रहा करते थे और विज्ञापनों के लिए जिंगल्स गाकर या शादी-समारोह वगैरह में गाकर रोज़ी रोटी का जुगाड़ करते रहे. १९६७ में जगजीत जी की मुलाक़ात चित्रा जी से हुई. दो साल बाद दोनों १९६९ में परिणय सूत्र में बंध गए.   

पहला प्यारबहुतों की तरह जगजीत जी का पहला प्यार भी परवान नहीं चढ़ सका. अपने उन दिनों की याद करते हुए वे कहते हैं, ”एक लड़की को चाहा था. जालंधर में पढ़ाई के दौरान साइकिल पर ही आना-जाना होता था. लड़की के घर के सामने साइकिल की चैन टूटने या हवा निकालने का बहाना कर बैठ जाते और उसे देखा करते थे. बाद मे यही सिलसिला बाइक के साथ जारी रहा. पढ़ाई में दिलचस्पी नहीं थी. कुछ क्लास मे तो दो-दो साल गुज़ारे.” जालंधर में ही डीएवी कॉलेज के दिनों गर्ल्स कॉलेज के आसपास बहुत फटकते थे. एक बार अपनी चचेरी बहन की शादी में जमी महिला मंडली की बैठक मे जाकर गीत गाने लगे थे. पूछे जाने पर कहते हैं कि सिंगर नहीं होते तो धोबी होते. पिता के इजाज़त के बग़ैर फ़िल्में देखना और टाकीज में गेट कीपर को घूंस देकर हॉल में घुसना आदत थी.  

गुज़रा ज़मानाजगजीत सिंह फ़िल्मी दुनिया में प्लेबैक सिंगिंग (पार्श्वगायन) का सपना लेकर आए थे. तब पेट पालने के लिए कॉलेज और ऊंचे लोगों की पार्टियों में अपनी पेशकश दिया करते थे. उन दिनों तलत महमूद, मोहम्मद रफ़ी साहब जैसों के गीत लोगों की पसंद हुआ करते थे. रफ़ी-किशोर-मन्नाडे जैसे महारथियों के दौर में पार्श्व गायन का मौक़ा मिलना बहुत दूर था. जगजीत जी याद करते हैं, ”संघर्ष के दिनों में कॉलेज के लड़कों को ख़ुश करने के लिए मुझे तरह-तरह के गाने गाने पड़ते थे क्योंकि शास्त्रीय गानों पर लड़के हूट कर देते थे.” तब की मशहूर म्यूज़िक कंपनी एच एम वी (हिज़ मास्टर्स वॉयस) को लाइट क्लासिकल ट्रेंड पर टिके संगीत की दरकार थी. जगजीत जी ने वही किया और पहला एलबम ‘द अनफ़ॉरगेटेबल्स (१९७६)’ हिट रहा. जगजीत जी उन दिनों को याद करते हुए कहते हैं, ”उन दिनों किसी सिंगर को एल पी (लॉग प्ले डिस्क) मिलना बहुत फ़ख्र की बात हुआ करती थी.” बहुत कम लोग जानते हैं कि सरदार जगजीत सिंह धीमान इसी एलबम के रिलीज़ के पहले जगजीत सिंह बन चुके थे. बाल कटाकर असरदार जगजीत सिंह बनने की राह पकड़ चुके थे. जगजीत ने इस एलबम की कामयाबी के बाद मुंबई में पहला फ़्लैट ख़रीदा था.  

आम आदमी की ग़ज़ल जगजीत सिंह ने ग़ज़लों को जब फ़िल्मी गानों की तरह गाना शुरू किया तो आम आदमी ने ग़ज़ल में दिलचस्पी दिखानी शुरू की लेकिन ग़ज़ल के जानकारों की भौहें टेढ़ी हो गई. ख़ासकर ग़ज़ल की दुनिया में जो मयार बेग़म अख़्तर, कुन्दनलाल सहगल, तलत महमूद, मेहदी हसन जैसों का था.. उससे हटकर जगजीत सिंह की शैली शुद्धतावादियों को रास नहीं आई. दरअसल यह वह दौर था जब आम आदमी ने जगजीत सिंह, पंकज उधास सरीखे गायकों को सुनकर ही ग़ज़ल में दिल लगाना शुरू किया था. दूसरी तरफ़ परंपरागत गायकी के शौकीनों को शास्त्रीयता से हटकर नए गायकों के ये प्रयोग चुभ रहे थे. आरोप लगाया गया कि जगजीत सिंह ने ग़ज़ल की प्योरटी और मूड के साथ छेड़खानी की. लेकिन जगजीत सिंह अपनी सफ़ाई में हमेशा कहते रहे हैं कि उन्होंने प्रस्तुति में थोड़े बदलाव ज़रूर किए हैं लेकिन लफ़्ज़ों से छेड़छाड़ बहुत कम किया है. बेशतर मौक़ों पर ग़ज़ल के कुछ भारी-भरकम शेरों को हटाकर इसे छह से सात मिनट तक समेट लिया और संगीत में डबल बास, गिटार, पिआनो का चलन शुरू किया..यह भी ध्यान देना चाहिए कि आधुनिक और पाश्चात्य वाद्ययंत्रों के इस्तेमाल में सारंगी, तबला जैसे परंपरागत साज पीछे नहीं छूटे.  

प्रयोगों का सिलसिला यहीं नहीं रुका बल्कि तबले के साथ ऑक्टोपेड, सारंगी की जगह वायलिन और हारमोनियम की जगह कीबोर्ड ने भी ली. कहकशां और फ़ेस टू फ़ेस संग्रहों में जगजीत जी ने अनोखा प्रयोग किया. दोनों एलबम की कुछ ग़ज़लों में कोरस का इस्तेमाल हुआ. जलाल आग़ा निर्देशित टीवी सीरियल कहकशां के इस एलबम में मजाज़ लखनवी की ‘आवारा’ नज़्म  ‘ऐ ग़मे दिल क्या करूं ऐ वहशते दिल क्या करूं’ और फ़ेस टू फ़ेस में ‘दैरो-हरम में रहने वालों मयख़ारों में फूट न डालो’ बेहतरीन प्रस्तुति थीं. जगजीत ही पहले ग़ज़ल गुलुकार थे जिन्होंने चित्रा जी के साथ लंदन में पहली बार डिजीटल रिकॉर्डिंग करते हुए ‘बियॉन्ड टाइम अलबम’ जारी किया.  

इतना ही नहीं, जगजीत जी ने क्लासिकी शायरी के अलावा साधारण शब्दों में ढली आम-आदमी की जिंदगी को भी सुर दिए. ‘अब मैं राशन की दुकानों पर नज़र आता हूं’, ‘मैं रोया परदेस में’, ‘मां सुनाओ मुझे वो कहानी’ जैसी रचनाओं ने ग़ज़ल न सुनने वालों को भी अपनी ओर खींचा.  

शायर बशीर बद्र जगजीत सिंह जी के पसंदीदा शायरों में हैं. निदा फ़ाज़ली के दोहों का एलबम ‘इनसाइट’ कर चुके हैं. जावेद अख़्तर के साथ ‘सिलसिले’ ज़बर्दस्त कामयाब रहा. लता मंगेशकर जी के साथ ‘सजदा’, गुलज़ार के साथ ‘मरासिम’ और ‘कोई बात चले’ भी ठीक-ठाक रहे. किंतु मेरे पसंदीदा संग्रहों में कहकशां, साउंड अफ़ेयर, डिफ़रेंट स्ट्रोक्स और मिर्ज़ा ग़ालिब अहम हैं. जगजीत जी ने राजेश रेड्डी, कैफ़ भोपाली, शाहिद कबीर जैसे शायरों के साथ भी काम किया है.  

फ़िल्मी सफ़रनामा१९८१ में रमन कुमार निर्देशित ‘प्रेमगीत’ और १९८२ में महेश भट्ट निर्देशित ‘अर्थ’ को भला कौन भूल सकता है. ‘अर्थ’ में जगजीत जी ने ही संगीत दिया था. फ़िल्म का हर गाना लोगों की ज़ुबान पर चढ़ गया था. इसके बाद फ़िल्मों में हिट संगीत देने के सारे प्रयास बुरी तरह नाकामयाब रहे. कुछ साल पहले डिंपल कापड़िया और विनोद खन्ना अभिनीत फ़िल्म लीला का संगीत औसत दर्ज़े का रहा. १९९४ में ख़ुदाई, १९८९ में बिल्लू बादशाह, १९८९ में क़ानून की आवाज़, १९८७ में राही, १९८६ में ज्वाला, १९८६ में लौंग दा लश्कारा, १९८४ में रावण और १९८२ में सितम के गीत चले और न ही फ़िल्में. ये सारी फ़िल्में उन दिनों औसत से कम दर्ज़े की फ़िल्में मानी गईं. ज़ाहिर है कि जगजीत सिंह ने बतौर कम्पोज़र बहुत पापड़ बेले लेकिन वे अच्छे फ़िल्मी गाने रचने में असफल ही रहे. इसके उलट पार्श्वगायक जगजीत जी सुनने वालों को सदा जमते रहे हैं. उनकी सहराना आवाज़ दिल की गहराइयों में ऐसे उतरती रही मानो गाने और सुनने वाले दोनों के दिल एक हो गए हों. कुछ हिट फ़िल्मी गीत ये रहे-

 

विवादों में रहे जगजीत बहुत कम लोगों को पता होगा कि अपने संघर्ष के दिनों में जगजीत सिंह इस कदर टूट चुके थे कि उन्होंने स्थापित प्लेबैक सिंगरों पर तीखी टिप्पणी तक कर दी थी. हालांकि आज वे इसे अपनी भूल स्वीकारते हैं. स्टेट्टमैन लिखता है कि, किशोर दा ने जगजीत सिंह के उस बयान पर कमेंट किया था how dare these so-called ghazal singers criticize an icon that Manna Dey, Mukesh and I dare not criticize. Rafi was unique. ज़ाहिर है जगजीत जी ने महान पार्श्व गायक मोहम्मद रफ़ी साहब पर जो कहा वो उचित नहीं होगा. ये भी देखने वाली बात है कि जगजीत जी ने अपनी पसंद के जिन फ़िल्मी गानों का कवर वर्सन एलबम क्लोज़ टू माइ हार्ट में किया था.. उसमें रफ़ी साहब का कोई गाना नहीं था. ख़ैर, इसके बाद उनकी दिलचस्पी राजनीति में भी बढ़ी और भारत-पाक करगिल लड़ाई के दौरान उन्होंने पाकिस्तान से आ रही गायकों की भीड़ पर एतराज किया. तब जगजीत सिंह जी का कहना था कि उनके आने पर बैन लगा देना चाहिए. दरअसल, जगजीत जी को पाकिस्तान ने वीज़ा देने से इंकार कर दिया था.. लेकिन जब पाकिस्तान से बुलावा आया तब जगजीत सिंह जी की नाराज़गी दूर हो गई. ये इस शख़्स की भलमनसाहत थी कि जगजीत ने ग़ज़लों के शहंशाह मेहदी हसन के इलाज के लिए तीन लाख रुपए की मदद की.. उन दिनों मेहदी हसन साहब को पाकिस्तान की सरकार तक ने नज़रअंदाज़ कर रखा था.  

घुड़दौड़ का शौकग़ज़ल गायकी जैसे सौम्य शिष्ट पेशे में मशहूर जगजीत जी का दूसरा शगल रेसकोर्स में घुड़दौड़ है. कन्सर्ट के बाद कहीं सुकून मिलता है तो वो है मुंबई महालक्ष्मी इलाक़े का रेसकोर्स. १९६५ में मुंबई मे जहां डेरा डाला था उस शेर ए पंजाब हॉटल में कुछ ऐसे लोग थे जिन्हें घोड़ा दौड़ाने का शौक था. संगत ने असर दिखाया और इन्हें ऐसा चस्का लगा कि आज तक नहीं छूटा है. (स्रोत-आउटलुक) इसी तरह लॉस वेगास के केसिनो भी उन्हें ख़ूब भाते हैं.  

मेरी शाम जगजीत जी के साथ यूं तो कई दफ़ा जगजीत जी की महफ़िल में जाने का मौक़ा मिला है लेकिन पहली मुलाक़ात हमेशा याद रहती है. १९९४ में जगजीत सिंह जी प्रोग्राम पेश करने छत्तीसगढ़ के रायपुर आए थे. मैं उन दिनों राजनांदगांव में रहा करता था. मेरे दोस्त मनीष रेड्डी ने मुझे बताया कि ‘जग्गू दादा आ रहे हैं.’ मैं बल्लियों उछल पड़ा. मैं पूछा, ‘कब?’ उसका जवाब था ‘परसों!! मैंने पूछा, ‘टिकट?’ उसका जवाब था, ‘सारी बिक गईं.. कोई जुगाड़ नहीं हो रहा है.’ मैंने कहा, ‘चल कोई बात नहीं..अपन को तो जाना है हर हाल मे.’ हम दोनों एक दिन बाद सुबह रायपुर के लिए रवाना हो गए. शाम को दोनों थियेटर के सामने जुगाड़ लगाने की कोशिशो में भिड़े थे. कि अचानक मैंने देखा कि गिटारिस्ट अरशद अहमद साहब कार से उतर रहे हैं. उनके साथ वायलिनिस्ट दीपक पंडित, तबला वादक अभिनव उपाध्याय और अन्य भी थे. मैं अरशद भाई की ओर लपका. मैं पहले से किताबों और अख़बारों में कन्सर्ट के बारे में पढ़ा करता था. लिहाज़ा मैंने उन्हे पहचान लिया था. एक मित्र से सुन रखा था कि अरशद भाई माणिकचंद गुटखा खाने के शौकीन थे. मैंने पेशकश की और दुआ-सलाम किया. दो मिनट में ऐसा परिचय बढ़ाया कि वे जान गए थे कि बच्चे दीवाने हैं और अपने साथ हमें सीधे स्टेज तक ले गए. फिर कहा कि सामने की कतार में आराम से बैठो… हमारे तो जैसे भाग ही खुल गए थे. सच तो यह था कि हम टिकट ख़रीदने को तैयार थे लेकिन कोई बेचने को तैयार होता तब ना!!

प्रोग्राम शुरू हुआ.. हम तो खो गए और एक एक कर बेहतरीन ग़ज़लें, नज़में और भांगड़ा सब कुछ हुआ. जैसे ही जगजीत जी ने झलकियां गाना शुरू किया, मैंने मनीष से कहा कि अब हमें निकल लेना चाहिए. मनीषा बोला कि कहां तो मैने बताया कि जगजीत जी जिस होटल में ठहरे हैं वहां चलते हैं.

 

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हम होटल में डेरा डालकर बैठ गए. अंदर घुसने का भी जुगाड़ झूठ बोलकर किया. मैं नागपुर इंडियन एक्सप्रेस का रिपोर्टर बन गया और रिसेप्शनिस्ट को बोलकर जगजीत सिंह के कमरे के ठीक सामने उनका इंतज़ार करने लगा. एक घंटे बाद वे आए तो उस वक़्त सिर्फ़ मैं, मनीष और जगजीत सिंह साहब थे. हमने उनके पैर छुए और ऑटोग्राफ़ लिया. फिर फोटो सेशन हुआ. जगजीत जी ने हमारे बारे में पूछा.. तो मैंने साफ़ तौर पर बताया कि हम दोनों आपके फ़ैन है और मिलना चाहते थे. वे हंस पड़े. उन्होंने पूछा कि कहां से आए हो.. हमने जब राजनांदगांव कहा तो जगजीत जी का कहना था- ”हम्म.. राजनांदगांव और भाटापारा से.. मतलब, तुम अमीन सयानी को सुनने वाले हो.” मै समझ गया.. दरअसल, बिनाका गीतमाला, मराठा दरबार के कार्यक्रमों में अमीन सयानी को बहुत-सी चिट्ठियां इन्हीं कस्बों से आया करती थीं” कुछ पलों तक और भी बातें हुईं. उन्होंने अपने हाथों से मुझे चिकन चिली पेश की. मैं तो गदगद था. वो दिन अविस्मरणीय रहेगा. इसके बाद मुंबई, नागपुर, दोबारा रायपुर में उनकी महफ़िल में जाने का मौक़ा मिला. डेढ़ साल पहले वो यहां इंडिया टीवी के स्टूडियो मे आपकी अदालत में हमारे मेहमान बने थे. अब तक की आख़री वही मुलाक़ात थी. दुआ करता हूं कि वे बरसों-बरस हमारे बीच रहेंगे.    

मेरी पसंदीदा ग़ज़लें-नज़्में

 

(जगजीत सिंह जी के बारे में अंग्रेज़ी मे यहां विस्तार से पढ़ा जा सकता है. उनकी ग़ज़लें सुनने के लिए यहां और यहां चटका लगाएं.)

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  1. भई जगजीत सिंह जी के तो हम भी मुरीद है। उनके जन्मदिन पर उन्हे बहुत बहुत बधाई।

    इस जानकारी पूर्ण लेख के द्वारा हमे जगजीत सिंह जी के बारे मे बहुत कुछ जानने को मिला। गज़ल गायकी मे सरलता और सहजता लाने के लिए जगजीत सिंह जी का योगदान सदैव याद रखा जाएगा।

    जगजीत सिंह जी, तुम जियो हजारो साल, साल के दिन हो पचास हजार।

  2. वाह! जगजीत सिंहजी के जीवन के हर पहलू को छुने की कामयाब कोशिश की है.
    मैं गज़ले सुनता नहीं मगर जगजीतसिंह की गायी एक-दो गज़ले जरूर पसन्द है.

  3. जगजीत सिंह जी को उनके जन्मदिन की बधाई और आपको यह सुन्दर लेख लिखने के लिये।
    जगजीत सिंहजी की बात हो और उनके एल्बम इन सर्च और समवन समवेयरकी बात ना हो तो लेख अधूरा नहीं कहा जायेगा?
    समवन समवेयर उनके एकमौते पुत्र राहुल के देहांत के बाद उन्होने गाया था और इन सर्च के अपने होठों पर सजाना चाहता हूँ

  4. बहुत लम्बी टिप्पणी लिखी थी पर पता नहीं क्यों अधूरी ही प्रकाशित हुई है।

  5. जगजीत ने हिंदी और उर्दू के अलावा पंजाबी में भी अच्छा गाया है। मरासिम और मिर्जा ग़ालिब मेरे सबसे मनपसंद एलबम हैं, पुराने गजलों में सम वन सम वेयर तथा अनफोर्गेटेबल। दुआ करते हैं कि वे सदा ऐसे ही गाते रहें।
    ईंडिया टीवी पर अनका यह कार्यक्र्म मैंने भी देखा था जब ज्यूक बक्स की तरह मूंह खोल कर बोले “आप डाल दो पैसे तो आपके लिये गा देता हूं” :(

  6. जग्गु दा जियो हजारो साल !

    मेरे पास जग्गु दा के लगभग ४०० से ज्यादा गजले है। कुछ गजलो के तो ५-६ अलग अलग अंदाज से गाये हुये वर्शन है।

  7. [...] जगजीत सिंह आज 66 साल के हो गए. नीरज से सुनिये उनका परिचय नवाबों, रक्कासाओं की दुनिया में झनकती और शायरों की महफ़िलों में वाह-वाह की दाद पर इतराती ग़ज़लों को आम आदमी तक पहुंचाने का श्रेय अगर किसी को पहले पहल दिया जाना हो तो मैं जगजीत सिंह का ही नाम लूंगा. उनकी ग़ज़लों ने न सिर्फ़ उर्दू के कम जानकारों के बीच शेरो-शायरी की समझ में इज़ाफ़ा किया बल्कि ग़ालिब, मीर, मजाज़, जोश और फ़िराक़ जैसे शायरों से भी उनका परिचय कराया. [...]

  8. बहुत अच्छा रहा ये आलेख ! करीबन उनसे जुड़े सारे पहलुओं को आपने छुआ ।
    जगजीत जी के साथ एक त्रासदी ये भी हुई कि सड़क दुर्घटना में वो अपने पुत्र को खो बैठे । समवन समवेयर एकबम अपने बेटे की याद में समर्पित किया था उन्होंने । चित्रा जी ने उसके बाद से ही उनके साथ गाना पहले कम और फिर छोड़ ही दिया ।.

  9. अब यहाँ पर हम अनाड़ी हैं भाई, गजलों की समझ ही नहीं। हाँ जगजीत जी की गाई कुछ गजलें पसंद हैं।

    बहुत अच्छी और विस्तार से जानकारी दी है, आम तौर पर मैं इस तरह के लंबे लेख पढ़ नहीं पाता पर ये पूरा पढ़ा। धन्यवाद !

  10. Jagjit jee ke fan a/c jo bhi keh lo. Magar itni jaankaari nahi hai. Iteffaq ki baat hai ki unhi ki gazal,” Tu nahi toa zindagi mei” chal rahi hai. Words not enough for such a great personality.

    Happy birthday Jaggu ji.

  11. जगजीत सिंह की ग़ज़लें तो बहुत मशहूर हैं और उनकी जैसी आवाज़ दूसरी कोई नहीं। मगर जब मैं यहाँ उनका प्रोग्राम देखने गई तो बहुत ज़्यादा खुशी नहीं हुई। माइक को लएकर काफ़ी शिकायतें करते रहे वो पूरे प्रोग्राम में और सभी श्रोता विरक्त थे। मगर हाँ उनकी आवाज़ और गायकी अपने में एक अलग ही स्थान रखती है इसमें क्या शक है।

  12. बहुत अच्‍छा नीरज भईया, आलख पढ कर मजा आ गया, अपचका जगजीत सिंह के साथ मिलने का वाक्‍या भी मजेदार था, ईश्‍वर आपको तथा लाखों दिलो पर राज करने वाले जगजीत जी को अपार सौहरत प्रदान करे

  13. जगजीत सिंह जन्मदिन पर उन्हे बहुत बहुत बधाई। बहुत अच्छा आलेख है, नीरज भाई

  14. बहुत बढ़िया लेख. जगजीत सिंह सा’ब के हम भी बहुत बड़े भक्त हैं.

  15. नीरज जी, जगजीत सिंह जी के बारे मे नहुत ही बढिया लेख लिखा। सनृ 1975 मे मैने हाई स्कूल किया था तब से जो जगजीत जी की खुमारी छायी तो ऐसी छायी कि छूटने का नाम ही नही ले रही है। उनकी हर गजल, कैसेटस, सीडी और गीत मेरे पास धरोहर के रुप मे हैं। जगजीत जी के जन्म्दिन पर बधाई और आप को भी इतना सुन्दर लेख लिखने के लिये एक बार फ़िर बहुत-2 बधाई।

  16. जगजीत सिंह जन्मदिन पर उन्हे बहुत बहुत बधाई। बहुत अच्छा लेख लिखा है, बहुतेरी जानकारी के साथ.

    मैं उनको भारत में और यहाँ भी कई बार सुन चुका हूँ. उनके तबला वादक अभिनव उपाध्याय मेरे व्यक्तिगत मित्र हैं और जबलपुर के ही रहने वाले हैं, उस वजह से उनके हर प्रोग्राम में यहां जाना हो जाता है. :)

    अच्छे आलेख के लिये बधाई.

  17. @संजय भाई, सुनते रहिए.. कुछ पुराने एलबम्स ज़रूर सुनिए.. और क्लासिकल मूड में हों तो डिफ़रेंट स्ट्रोक्स ज़रूर सुनिएगा.

    @जगदीश भाई… यह तो सही है कि वे ज़रूरत से ज़्यादा प्रोफ़ेशनल हो गए हैं. किंतु चैरिटी के कामो में भी आगे हैं. क्राई (बच्चों के लिए काम करने वाले एनजीओ) के लिए काफ़ी काम करते हैं.

    @आशीष भाई, दो-चार बानगी हमें भी सुना दो.. जीमेल पर मुझे एड कर लो..

    @मनीष भाई, मैंने स्व. विवेक जी का प्रसंग जानबूझकर छोड दिया. वो जन्मदिवस के मौक़े पर उल्लेख करना उचित प्रतीत नही हो रहा था.

    @मानुषी जी, आपकी कमेंट देखकर प्रसन्नता हुई. आपके ब्लॉग पर जाकर संगीत शिक्षा का ब्लॉग मन को हर्षित कर गया. आप जीमेल पर आमंत्रित हैं. मेरी आईडी neerajdiwan at gmail है.

    @ समीर भाई, जबलपुर तो संस्कारधानी नगरी है. आप उसी से निखरकर कनाडा की शोभा बढ़ा रहे हैं. अभिनव से चर्चा नेट पर संभव हो तो पता दीजिएगा. हालांकि मैं कई दिनों से मुलाक़ात नहीं कर सका हूं.

  18. you are the god of silence i never seem but i can feel u when i listen hhanth choote bhi to riste nahi choota karte.i wish u wiil sing till u wiil be in world.thenx

  19. वाह भाई नीरज, मजा आ गया, अच्छी जानकारी दी तुमने, जगजीत साहब को लाईव सुनने का मौका एक ही बार मिला है जब राजकुमार कालेज के मैदान में सुनते हुए रात, भोर में बद्ली थी.

  20. kya bat hai sir…. i really impresd u…. bhut badiya….

  21. [...] upcoming hindi portal from Google!! On the other hand, Neeraj wished Gazal King Jagjit Singh a very happy birthday & long life. The hunt for truth about Netaji’s death continues for Srijan Shilpi as he [...]

  22. ‘अनफरगटेबल्स’ के बाद से ही मैं जगजीत सिंह का प्रशंषक बन गया था. कई दशक तक रहा पर अब शायद वो असर नहीं रह गया है. अब जगजीत सिंह की हर नई गज़ल थकी थकी सी और पुरानी सी लगती है.

  23. mai wohi harpreet kaur hu jisne apko love is blind ke ghazal likh ke diya the agar aap mujhe se baat karna chate hai to mujhe mail kar de mai apki mail ka intezar karongi sir

  24. Wah Wah…Bahut khub likha aapne Niraj ji. Waah aap logo ko batana chahuga ki pahle mujhe ghazalas bilkul achi nah lagti thi parantu jab maine pahle baar jagjit singh ji ki Pyar ka pahla khat likhne mein waqt to lagta hai ghazal suni tabhi se unka murid ho gaya. aapke lekh ko padhkar kafi jankari badhi. bahut bahut dhanyawaad aapka!!!!!!!!!

  25. i m just want to say about u , u r really awesome singer with sweet voice…….

  26. nice writeup

  27. I am great admirer of jagjit singh ghazals and his personality. I wish jagjit singh live long and his golden voice and his ghazals & nazams always spread in atmosphare of world of music.
    Naval Sagar.

  28. check out this blog also N thanks for this.

  29. sir jagit singh


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