”आठ पोस्ट डिलीट, दो ब्लॉगों के पासवर्ड चोरी”
February 20, 2007 at 1:34 pm | In चिट्ठाजगत | 26 Commentsइस रचना का किसी से कोई लेना-देना नहीं है अलबत्ता रचना पढ़कर कुछ लोगों को लेने के देने पड़ सकते हैं. यदि आपको इसमें कुछ आपत्तिजनक लग रहा है तो भी आप आपत्ति नहीं जता सकते क्योंकि होली के रंग में भंग डालकर यह रचना लिखी गई है. उखड़ने-उखाड़ने की बातों में उलझकर अपना और लेखक का मूड ना उखाड़े.. आप इसे अन्यथा ना लें क्योंकि लेखक ने अन्यथा ले लिया तो अगला लेख विशेष रूप से आप पर लिखा जाएगा. रचना पढ़ें और कमेंट ज़रूर दें. औरों की कमेंट पढ़कर ना कमेंटियाएं .. धन्यवाद

चित्र सौजन्य- तरकशिया, जो कह न सके
सुबह-सुबह मेल और ब्लॉगजगत की ख़बरें देखने के लिए मुंगेरीलाल ने कम्प्यूटर खोला. अक्षरग्राम पर ताज़ा ख़बर इस तरह थी- ”आठ पोस्ट डिलीट, दो ब्लॉगों के पासवर्ड उड़ा लिए गए” नारद जी बता रहे थे- ”ब्लॉगजगत में होने वाले चुनाव के पहले कुछ जगहों पर हिंसक वारदात हुई है. चुनाव आयोग ने चार ब्लॉगियों को अपशब्दों (बोले तो स्लैंडर कैम्पेन) की वजह से कारण बताओ नोटिस जारी किया है. चुनाव २० तक होने हैं और सभी उम्मीदवार दल-बल के साथ मैदान में कूद चुके हैं. प्रचार कार्य ज़ोरों पर है. आयोग से मिली ख़बरों के अनुसार मुख्य चुनाव अधिकारी देबाशीष ने आठ पोस्ट डिलीट करने वालों का पता लगाने का काम जांच एजंसियों को सौंप दिया है. साथ ही दो ब्लॉगियों के पासवर्ड चोरी करने वाले की तलाश जारी है. हालांकि आयोग ने चुनाव शांतिपूर्वक कराने के लिए सभी इंतज़ाम कर लिए हैं. ब्लॉगचोरी करने के मामले में शक की सुई दिल्ली के उस ब्लॉगर पर जाकर टिक रही है जो एक फ़ोरम में नेट हवलदार के पद पर तैनात है.” ”इधर, ब्लॉग चोरी का खामियाज़ा भुगतने वाले बंधु ने चुनाव आयोग कार्यालय के सामने भूख हड़ताल पर बैठने की धमकी दी है. भुक्तभोगी ब्लॉगिए की मांग की है कि आचार संहिता के उल्लंघन करने वाले उस नेट हवलदार को चुनावी ड्यूटी से हटाया जाए. आयोग ने सभी दलों और उनके प्रत्याशियों को भरोसा दिलाया है कि चुनाव पूरी तरह निष्पक्ष होंगे….”
मुंगेरी ने इतना ही पढ़ा था कि तभी मोबाइल की घंटी घनघना उठी और कम्प्यूटर से गर्दन हटकर मोबाइल की तरफ़ मुड़ी. कान पर फ़ोन टिकाया था कि उधर से आवाज़ गूंजी- ”ऐ मामू.. वोटिंग करने का है अपने भाई के लिए.” मुंगेरी ने पूछा- ”कौन बोल रहा है बे?” उधर से आवाज़ आई- ”ओएsss मामू…. अपुन को नहीं जानता क्या? सर्किट बोल रहा हूं सर्किट!! बताऊं या दिखाऊ? अपना जगदीश भाई खड़ा होरेला है इलेक्शन में.. उसीच्च को वोट देने का है. कल सुबह उठने का और आईना देखकर बस उसीच्च को वोट देने का.. समझा कि नहीं.” हकबकाया मुंगेरी बोला- ”हओ भाई. आप ठीक कहते हो.लेकिन..” सर्किट- ”लेकिन क्या रे?? जादा शानपट्टी कर रेला है क्या? बोला ना जग्गू भाई को ही वोट देने का नहीं तो बताऊं क्या मुन्ना भाई को?” मुंगेरी बोला- ”नहीं नहीं.. भाई वो बात नहीं.. मै भला किसी और को वोट क्यों दूंगा. अपना भाई तो मुन्ना भाई ही है और वो जहां है वहीं वोट दूंगा. ठीक है?”
अभी फ़ोन रखा ही था कि उधर कम्प्यूटर पर मैसेज उछला.. लिखा था– ”हो क्या दादा??” सामने एक और दादा थे. मेरा पन्ना वाले दादा.. मुंगेरी ने जवाब दिया- ”हां भाई, दिख तो यहीं रहा हूं” पन्ना दादा झुंझलाकर बोले- ”अबे.. तो और कहां रहोगे? यहां से कोई गया है क्या?? ब्लॉगजगत से जो जुड़ गया वो कहीं जाने के लायक नहीं रहता. यहीं रहना है अब सारी उमर, किसी और काम के लिए बचे ही नहीं हो तुम. अच्छा सुनो एक काम की बात. वोट दे दिए क्या?” मुंगेरी बोला- ”अभी नहीं दिया हूं भाई.” पन्ना दादा- ”ठीक है. तो जब भी दो याद रखना.. मेरे को वोट देना मत भूलना” मुंगेरी बोला- ”हां भाई. वो तो है आपका तो जवाब ही नहीं. आप लिखते ही इतना अच्छा हो कि हर कोई पढ़ता है और कमेंटाता भी है.”
मन ही मन मुंगेरी बुदबुदा रहा था- ”वैसे भी कौन पंगा लेगा पन्ना दादा से.. कहीं नारद पर पोस्ट लापता हो गई तो समझो दो फूटी कमेंट भी नहीं मिलेगी… यूं भी आप अपनी पोस्ट पर नारद को अटकाते हो और दूसरों की बारी मे बेचारों की पोस्ट ही अटक जाती है. बची-खुची कसर आजकल भरमार बंदूक की तरह कविता छापने वाले हथिया लेते हैं”
पन्ना दादा के अलसाते ही मुंगेरी बिज़ीबोर्ड टांगकर बची ख़बर आगे पढ़ने लगा. लिखा था- ”मतदान केंद्र तक नही पहुंचने देने के लिए एक गुट ने कुछ मतदाताओं के सिस्टम में ख़तरनाक वायरस डाले हैं. धमकी दी जा रही है कि नारद को फ्रीज कर दिया जाएगा..आईपी जानकर वोट की गोपनीयता तोड़ने के पूरे इंतज़ाम कर लिए गए हैं. ये भी धमकी दी जा रही है कि अगली दफ़ा ब्लॉगर मीट होगी तो जयपुर के पहाड़ से धक्का दे देंगे. या कानपुर के किसी होटल मे घंटों इंतज़ार करवाएंगे और बिना बिल चुकाए भाग जाएंगे नारद के संवाददाता को मिली अपुष्ट ख़बर के मुताबिक कुछ ब्लॉगियों को अगवा कर लिया गया है और उन्हें बीस के बाद ही रिहा किया जाएगा. माना जा रहा है कि इस तरह की वारदातों में मुन्ना-सर्किट के गुर्गे जुटे हुए हैं”
मुंगेरी इन लाइनों तक ही पहुंचा था कि बिना तीर-कमान का तरकशिया आ गया, कहने लगा- ”मैं तो हैरान हूं कि इन चुनावों को इतना हाईप्रोफ़ाइल क्यों बताया जा रहा है. ये तो ग़लत बात है चुनावों में इस तरह की हिंसा नहीं होनी चाहिए. हमें देखो. हमारे पोल में तो कोई झगड़ा-रगड़ा नहीं हुआ था. और आप लोग रोते हो कि गुजरात में प्रतिक्रियावाद ज़ोरों पर हैं.”
मुंगेरी ने कहा- ”हां भाई ये सही है.. चुनाव के दौरान और चुनावों के पहले हिंसा में कुछ तो फ़र्क होती ही है. ख़ैर छोड़ो, आप बताओ किसके लिए कैंपेन कर रहे हो? तरकशिया बोला- ”काहे करें कैंपेन. हम तो सोच रहे थे कि आप ही खड़े होगे.” यह सुनकर मुंगेरीलाल की आंखें मिचमिचाने लगीं..झूठी तारीफ़ सुनकर खुशी से फूला नहीं समा रहा था. इससे पहले कि मुंगेरी अपनी उज्जवल संभावनाओं पर कुछ और खुलासा करने के लिए तरकशिया को तपासता.. तरकशिया किनारे लग गया और ‘अत्यंत व्यस्त’ का बोर्ड टांगकर गुम हो गया.
मुंगेरी का मोबाइल बज उठा. मुंगेरी के मित्र गुरूगंभीर दूसरी तरफ़ थे. मुंगेरी ने नंबर देख दुआ-सलाम के बाद पूछना शुरू किया.. ”कैसा चल रहा है भाई चुनाव प्रचार”. सृजन और शिल्प में माहिर गुरूगंभीर संभलकर बोले.. ”मैं तो विश्वास ही नहीं करता ये सब चुनाव वगैरह पर कुछ मित्रों ने मेरा नाम प्रस्तावित कर ही दिया है तो मैं आ गया हूं मैदान पर” इस पर चटुता की कला में माहिर मुंगेरी बोला- ”नहीं गुरूजी, आप तो बेमिसाल लिखने वाले हैं आपकी शैली तो लाजवाब है. आप जैसे ही अव्वल रहते हैं.” अपनी उज्जवल संभावनाओं को हाईट पर जाते देख गुरूगंभीर ने आगे कहा- ”ऐसा है मुंगेरी भाई, असफल व्यक्ति ही जानता है कि सफलता किन रास्तों से आती है और हम जैसों को देखते कि फ़ौरन रास्ता बदल लेती है. तो क्या करना चुनाव के चक्कर में पड़कर..अपन मास अपील नहीं रखते यार” इससे पहले कि मुंगेरी गुरूगंभीर के महाजनीनुमा विचार सुनकर उमादी की याद दिलाता गुरूगंभीर के खाते पर ताला लग चुका था.
चुनावी पंगेबाज़ी से अब ऊब चुके मुंगेरी को गुटखे की तलब लगी थी.. वो कम्प्यूटर से उतरकर घर के बाहर आया और पान की ठेली की ओर बढ़ चला. तभी चार आदमी उसके पीछे हो लिए.. ऊपी स्टाइल कुर्ता पायजामा पहने पहलवाननुमा वे सारे आपस में बुदबुदा रहे थे..”लगता है यही मुंगेरी है… ” इतना सुनकर मुंगेरी की चाल तेज़ हो गई..सुबह से ही बेचारा धमकी-चमकी से परेशानहाल था. अभी ठेली की तरफ़ बढ़ा ही था कि चारों पहलवानों ने मुंगेरी को घेर लिया और ले गए कार की तरफ़. कार में बिठाकर ढक्कनपुरवा के सुनसान इलाक़े की ओर ले गए.
वहां पहुंचने के बाद एक पहलवान मुंगेरी की ओर लपका. बाक़ी लोग उसे शुकुल उस्ताद कह रहे थे. शुकुल बोला, ”हां बेटा, ये बताओ किसे वोट दे रहे हो?” मौक़े की नज़ाकत देख मुंगेरी ने फ़ौरन कहा- ”अपना तो फ़ेवरिट फुरसतिया है.” शुकुल बोला- ”काहे?” मुंगेरी ने कहा- ”अरे उस्ताद, उनके लेख वज़नदार होते हैं.. ब्लॉग अच्छा, लेख अच्छे तो वोट भी उनको दूंगा ना..” शुकुल- ”अबे तुम कमेंट दिया करो. फुरसतिया के साबूनुमा लेख काहे पढ़ते हो?” मुंगेरी बोला- ”नहीं नहीं जी, बिना लेख पढ़े कोई कमेंट देता है क्या?” शुकुल- ”हम देते हैं ना.. तुम्हारी मति मारी गई है क्या? इतने लंबे लंबे साबूनुमा लेख पढ़ते हो? हमारी तरह कमेंट पढ़कर अपनी कमेंट मारा करो. मान लो किसी ने लिखा है कि ‘सुंदर रचना’… तो तुम लिखो ‘बेहतरीन.’. किसी ने दोनो लिख मारा तो तुम लिखो- ‘अल्टीमेट’. समझे कि नहीं.. अब देखो मनीष को वो कैसे अपनी अच्छी-भली कविताएं पढ़वाने के लिए बेचारा गली-गली के कवियों की रचनाओं के नीचे कमेंटखानों में तारीफ़ों के पुल बांधता है. तुम भी वैसा ही करो.” हैरान मुंगेरी इस गीता-रहस्य से पहली बार परिचित हो रहा था. वो खुश हुआ और बोला- ”वाह उस्ताद, क्या बात किए हो.. इसी खुशी में उड़नतश्तरी नामक एक कुन्डली मेरी तरफ़ से सुनो.”
अभी दो पंक्तियां ही बांची थी कि शुकुल चिल्ला पड़ा- “अबे…ये रचना उड़नतश्तरी की नहीं हैं.. ये डॉक्टर टंडन की स्लीप थैरेपी है.” मुंगेरी को अपने अज्ञानी होने पर भरोसा न हुआ. वो बोला- “नहीं उस्ताद, ये रचनाएं उड़नतश्तरी नामक पन्ने से उठाई गईं है. इस खुशी के मौक़े पर आपकी खिदमत में सुना रहा था” इस पर शुकुल के बगल में खड़ा कालिया बोला- “उस्ताद पिछले हफ़्ते जब आपको नींद नहीं आने की बीमारी हुई थी तब डॉक्टर टंडन ने यह रचना पुड़िया में दी थी. आजकल तो हम सब इसी पुड़िया का सेवन करते हैं और मस्त खर्राटे मारते हैं.” शुकुल का माथा चढ़ चुका था.. उसने गुर्गों को हुकुम दिया कि मुंगेरी को वापस छोड़ आएं.
मुंगेरी को वापस घर तक छोड़ दिया गया. थककर पलंग पर लेटा टीवी का रिमोट हाथ में लेकर फुल्लीफालतू चैनल सैट कर दिया.. चैनल पर ख़बर आ रही थी- “और अब ख़बरें चुनावी चकल्लस की. ब्लॉगजगत के चुनावी दंगल में प्रचार कार्य ज़ोरों पर है. आज मतदान का आख़री दिन है और इटली के बोलोनोया शहर में भारी तादाद में इकट्ठा हुए लोगों ने वरिष्ठ नेतनेता दीपक के समर्थन में विशाल रैली (रैली का चित्र साइड मे देखें) का आयोजन किया. इस रैली में अच्छी-खासी तादाद उन समलैंगिकों और सेक्स वर्करों की भी थी जिनके बारे में नेटनेता अक्सर सहानुभूतिपूर्वक लिखते आए हैं. माना जा रहा है कि इन चुनावों में मुख्य मुक़ाबला रतलाम और बोलोग्ना के बीच ही होगा.” चुनावी चकल्लस से अब पूरी तरह पक चुके मुंगेरी को नींद आ जाती है.

अगले ही पलों में मोबाइल घनघना उठता है. मुंगेरी फ़ोन कान पर सटाता है तो आवाज़ गूंजती है- “अबे वोट दिया किया नहीं..??” दूसरी तरफ़ स्वामी है. मुंगेरी कहता है- “नहीं अभी नहीं.. इतनी जल्दी क्या है?” स्वामी चिल्लाता है- “अबे, तुम्हें हिन्दी की दशा का कुछ भान है भी कि नहीं.. कचरा कर डाला है तुम जैसे लोगों ने हिन्दी का. जाओ और उठकर वोट दो. वरना देश भी गढ्ढे में होगा और हिन्दी भी. तुम साले नॉनसीरियस टाइप के चैनल वाले लोग क्या जानो कि हिन्दी की दशा बिगाड़ने मे तुम्हारा कितना बड़ा कॉन्ट्रीब्यूशन है. हमें देखो..हम हिन्दी का विकास चाहते हैं.. हम फ़ॉरेन में रहकर हिन्दी और हिन्दुत्व को नहीं भूले हैं. तुम इंडिया में रहकर ही दोनों चीज़ें भूल गए? लानत है तुम पर. तुम टोटली लेज़ी टाइप के पर्सन हो.”
मुंगेरी ग़रीब-गुरबा टाइप इस नेटनेता का भाषण सुन रहा था. मुंगेरी को पता है कि उसकी क्या बिसात इस हाईटेक प्राणी के सामने. वो ठहरा सेलरॉन ब्रांड का आदमी जिसका रेम घिसघिसकर सांसें उखड़ने की कगार पर पहुंच चुका है. वो उठा और मतदान केंद्र की ओर चल पड़ा. देखता है कि बूथ के बाहर शामियाना लगाकर रतलामी बैठे हैं और भीतर जाने वाले वोटरों को अपने लेटेस्ट व्यंजल सुना रहे हैं. मुंगेरी को देखते ही छुटते हुए रतलामी बोले- “हां बेटाss अब आ गया ना… सुन कान खोलकर.. अगर हमें वोट नहीं दोगे तो सारे लेख प्रिन्ट करके तुम्हारे घर भेज देंगे. दो-चार ट्रक तो निकल ही आएगा. फिर तुम जानों और श्रीमती… घर से नहीं निकलना तो हमें वोट दो.”
मुंगेरी आगे बढ़ा ही था कि हाथ जोड़े बिहारी मिल गए. वो भी चुनावी दंगल में उतरे हैं. मुंगेरी ने पूछा, “का हो बिहारी बाबू, ये आपको कौन सा शौक चर्रा गया.” बिहारी बोले- “हम तो चुनावी गणित लगाकर उतरा हूं. अपना सीधा दांव है कि इन बड़ा-बड़ा सूरमाओं के बीच कहीं क्रॉस वोटिंग हो गई तो अपना फ़ायदा उसी तरह हो जाएगा जइसे कॉग्रेस-भाजपा की लड़ाई में बसपा का होता है.”
मुंगेरी को बिहारी बाबू का गणित समझ नहीं आया..उसकी नज़र अगले पंडाल पर पड़ी जहां गिरीराज अपने कविमित्रों के साथ मिलकर मतदाताओं को पुरानी-बासी रचनाएं सुना रहे थे. सब जानते थे कि गिरीराज का चुनावों से कोई लेना-देना नहीं है लेकिन होलसेल में श्रोताओं को पाकर कोई भी कवि मंत्रमुग्ध हो सकता है. सो गिरीराज ने मौक़े का भरपूर फ़ायदा उठाने के लिए तड़के ही पंडाल तान लिया था. मुंगेरी नज़र बचाकर पोलिंग बूथ की ओर लपका और वोट देने के लिए लाइन में लग गया.. पीछे से आवाज़ आई.. “पहलीच्च बार दे रहे हो क्या?” मुंगेरी ने पलटकर देखा और पूछा- “क्यों पांच-दस बार मतदान भी हो रहा है क्या?” पीछे खड़े श्रीष कह रहे थे- “और क्या सागर, नीलिमा और पंकज सुबह से अब तक आठ-दस बार लाइन में लग चुके है.”
बेचारे मुंगेरी को यहां भी अपने बैकवर्ड होने का अफ़सोस हुआ. वो बिना वोट डाले ही कतार से अलग हो लिया और चल पड़ा घर की ओर वापस.
ग़ज़ल का साज़ उठाओ
February 8, 2007 at 2:56 pm | In दिल से | 29 Commentsजगजीत सिंह के जन्मदिवस पर विशेष
ग़ज़लों की दुनिया के बादशाह पद्मभूषण जगजीत सिंह जी आज ६६ साल हो गए. हम सुनने वालों की तमन्ना है कि वे इसी तरह अपनी सहराना आवाज़ से लाखों-करोड़ों सुनने वालों के दिलों पर अपना जादू चलाते रहें. खालिस उर्दू जानने वालों की मिल्कियत समझी जाने वाली.. नवाबों, रक्कासाओं की दुनिया में झनकती और शायरों की महफ़िलों में वाह-वाह की दाद पर इतराती ग़ज़लों को आम आदमी तक पहुंचाने का श्रेय अगर किसी को पहले पहल दिया जाना हो तो मैं जगजीत सिंह का ही नाम लूंगा. उनकी ग़ज़लों ने न सिर्फ़ उर्दू के कम जानकारों के बीच शेरो-शायरी की समझ में इज़ाफ़ा किया बल्कि ग़ालिब, मीर, मजाज़, जोश और फ़िराक़ जैसे शायरों से भी उनका परिचय कराया.
जगजीत जी का जन्म आठ फ़रवरी १९४१ को राजस्थान के गंगानगर में हुआ था. पिता सरदार अमर सिंह धमानी भारत सरकार के कर्मचारी थे. जगजीत जी का परिवार मूलतः पंजाब के रोपड़ ज़िले के दल्ला गांव का रहने वाला है. मां बच्चन कौर पंजाब के ही समरल्ला के उट्टालन गांव की रहने वाली थीं. जगजीत का बचपन का नाम जीत था. करोड़ों सुनने वालों के चलते सिंह साहब कुछ ही दशकों में जग को जीतने वाले जगजीत बन गए. शुरूआती शिक्षा गंगानगर के खालसा स्कूल में हुई और बाद पढ़ने के लिए जालंधर आ गए. डीएवी कॉलेज से स्नातक की डिग्री ली और इसके बाद कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय से इतिहास में पोस्ट ग्रेजुएशन भी किया.
संगीत का सफ़रबचपन मे अपने पिता से संगीत विरासत में मिला. गंगानगर मे ही पंडित छगन लाल शर्मा के सानिध्य में दो साल तक शास्त्रीय संगीत सीखने की शुरूआत की. आगे जाकर सैनिया घराने के उस्ताद जमाल ख़ान साहब से ख्याल, ठुमरी और ध्रुपद की बारीकियां सीखीं. पिता की ख़्वाहिश थी कि उनका बेटा भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) में जाए लेकिन जगजीत पर गायक बनने की धुन सवार थी. कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान संगीत मे उनकी दिलचस्पी देखकर कुलपति प्रोफ़ेसर सूरजभान ने जगजीत सिंह जी को काफ़ी उत्साहित किया. उनके ही कहने पर वे १९६५ में मुंबई आ गए. यहां से संघर्ष का दौर शुरू हुआ. वे पेइंग गेस्ट के तौर पर रहा करते थे और विज्ञापनों के लिए जिंगल्स गाकर या शादी-समारोह वगैरह में गाकर रोज़ी रोटी का जुगाड़ करते रहे. १९६७ में जगजीत जी की मुलाक़ात चित्रा जी से हुई. दो साल बाद दोनों १९६९ में परिणय सूत्र में बंध गए.
पहला प्यारबहुतों की तरह जगजीत जी का पहला प्यार भी परवान नहीं चढ़ सका. अपने उन दिनों की याद करते हुए वे कहते हैं, ”एक लड़की को चाहा था. जालंधर में पढ़ाई के दौरान साइकिल पर ही आना-जाना होता था. लड़की के घर के सामने साइकिल की चैन टूटने या हवा निकालने का बहाना कर बैठ जाते और उसे देखा करते थे. बाद मे यही सिलसिला बाइक के साथ जारी रहा. पढ़ाई में दिलचस्पी नहीं थी. कुछ क्लास मे तो दो-दो साल गुज़ारे.” जालंधर में ही डीएवी कॉलेज के दिनों गर्ल्स कॉलेज के आसपास बहुत फटकते थे. एक बार अपनी चचेरी बहन की शादी में जमी महिला मंडली की बैठक मे जाकर गीत गाने लगे थे. पूछे जाने पर कहते हैं कि सिंगर नहीं होते तो धोबी होते. पिता के इजाज़त के बग़ैर फ़िल्में देखना और टाकीज में गेट कीपर को घूंस देकर हॉल में घुसना आदत थी.
गुज़रा ज़मानाजगजीत सिंह फ़िल्मी दुनिया में प्लेबैक सिंगिंग (पार्श्वगायन) का सपना लेकर आए थे. तब पेट पालने के लिए कॉलेज और ऊंचे लोगों की पार्टियों में अपनी पेशकश दिया करते थे. उन दिनों तलत महमूद, मोहम्मद रफ़ी साहब जैसों के गीत लोगों की पसंद हुआ करते थे. रफ़ी-किशोर-मन्नाडे जैसे महारथियों के दौर में पार्श्व गायन का मौक़ा मिलना बहुत दूर था. जगजीत जी याद करते हैं, ”संघर्ष के दिनों में कॉलेज के लड़कों को ख़ुश करने के लिए मुझे तरह-तरह के गाने गाने पड़ते थे क्योंकि शास्त्रीय गानों पर लड़के हूट कर देते थे.” तब की मशहूर म्यूज़िक कंपनी एच एम वी (हिज़ मास्टर्स वॉयस) को लाइट क्लासिकल ट्रेंड पर टिके संगीत की दरकार थी. जगजीत जी ने वही किया और पहला एलबम ‘द अनफ़ॉरगेटेबल्स (१९७६)’ हिट रहा. जगजीत जी उन दिनों को याद करते हुए कहते हैं, ”उन दिनों किसी सिंगर को एल पी (लॉग प्ले डिस्क) मिलना बहुत फ़ख्र की बात हुआ करती थी.” बहुत कम लोग जानते हैं कि सरदार जगजीत सिंह धीमान इसी एलबम के रिलीज़ के पहले जगजीत सिंह बन चुके थे. बाल कटाकर असरदार जगजीत सिंह बनने की राह पकड़ चुके थे. जगजीत ने इस एलबम की कामयाबी के बाद मुंबई में पहला फ़्लैट ख़रीदा था.
आम आदमी की ग़ज़ल जगजीत सिंह ने ग़ज़लों को जब फ़िल्मी गानों की तरह गाना शुरू किया तो आम आदमी ने ग़ज़ल में दिलचस्पी दिखानी शुरू की लेकिन ग़ज़ल के जानकारों की भौहें टेढ़ी हो गई. ख़ासकर ग़ज़ल की दुनिया में जो मयार बेग़म अख़्तर, कुन्दनलाल सहगल, तलत महमूद, मेहदी हसन जैसों का था.. उससे हटकर जगजीत सिंह की शैली शुद्धतावादियों को रास नहीं आई. दरअसल यह वह दौर था जब आम आदमी ने जगजीत सिंह, पंकज उधास सरीखे गायकों को सुनकर ही ग़ज़ल में दिल लगाना शुरू किया था. दूसरी तरफ़ परंपरागत गायकी के शौकीनों को शास्त्रीयता से हटकर नए गायकों के ये प्रयोग चुभ रहे थे. आरोप लगाया गया कि जगजीत सिंह ने ग़ज़ल की प्योरटी और मूड के साथ छेड़खानी की. लेकिन जगजीत सिंह अपनी सफ़ाई में हमेशा कहते रहे हैं कि उन्होंने प्रस्तुति में थोड़े बदलाव ज़रूर किए हैं लेकिन लफ़्ज़ों से छेड़छाड़ बहुत कम किया है. बेशतर मौक़ों पर ग़ज़ल के कुछ भारी-भरकम शेरों को हटाकर इसे छह से सात मिनट तक समेट लिया और संगीत में डबल बास, गिटार, पिआनो का चलन शुरू किया..यह भी ध्यान देना चाहिए कि आधुनिक और पाश्चात्य वाद्ययंत्रों के इस्तेमाल में सारंगी, तबला जैसे परंपरागत साज पीछे नहीं छूटे.
प्रयोगों का सिलसिला यहीं नहीं रुका बल्कि तबले के साथ ऑक्टोपेड, सारंगी की जगह वायलिन और हारमोनियम की जगह कीबोर्ड ने भी ली. कहकशां और फ़ेस टू फ़ेस संग्रहों में जगजीत जी ने अनोखा प्रयोग किया. दोनों एलबम की कुछ ग़ज़लों में कोरस का इस्तेमाल हुआ. जलाल आग़ा निर्देशित टीवी सीरियल कहकशां के इस एलबम में मजाज़ लखनवी की ‘आवारा’ नज़्म ‘ऐ ग़मे दिल क्या करूं ऐ वहशते दिल क्या करूं’ और फ़ेस टू फ़ेस में ‘दैरो-हरम में रहने वालों मयख़ारों में फूट न डालो’ बेहतरीन प्रस्तुति थीं. जगजीत ही पहले ग़ज़ल गुलुकार थे जिन्होंने चित्रा जी के साथ लंदन में पहली बार डिजीटल रिकॉर्डिंग करते हुए ‘बियॉन्ड टाइम अलबम’ जारी किया.
इतना ही नहीं, जगजीत जी ने क्लासिकी शायरी के अलावा साधारण शब्दों में ढली आम-आदमी की जिंदगी को भी सुर दिए. ‘अब मैं राशन की दुकानों पर नज़र आता हूं’, ‘मैं रोया परदेस में’, ‘मां सुनाओ मुझे वो कहानी’ जैसी रचनाओं ने ग़ज़ल न सुनने वालों को भी अपनी ओर खींचा.
शायर बशीर बद्र जगजीत सिंह जी के पसंदीदा शायरों में हैं. निदा फ़ाज़ली के दोहों का एलबम ‘इनसाइट’ कर चुके हैं. जावेद अख़्तर के साथ ‘सिलसिले’ ज़बर्दस्त कामयाब रहा. लता मंगेशकर जी के साथ ‘सजदा’, गुलज़ार के साथ ‘मरासिम’ और ‘कोई बात चले’ भी ठीक-ठाक रहे. किंतु मेरे पसंदीदा संग्रहों में कहकशां, साउंड अफ़ेयर, डिफ़रेंट स्ट्रोक्स और मिर्ज़ा ग़ालिब अहम हैं. जगजीत जी ने राजेश रेड्डी, कैफ़ भोपाली, शाहिद कबीर जैसे शायरों के साथ भी काम किया है.
फ़िल्मी सफ़रनामा१९८१ में रमन कुमार निर्देशित ‘प्रेमगीत’ और १९८२ में महेश भट्ट निर्देशित ‘अर्थ’ को भला कौन भूल सकता है. ‘अर्थ’ में जगजीत जी ने ही संगीत दिया था. फ़िल्म का हर गाना लोगों की ज़ुबान पर चढ़ गया था. इसके बाद फ़िल्मों में हिट संगीत देने के सारे प्रयास बुरी तरह नाकामयाब रहे. कुछ साल पहले डिंपल कापड़िया और विनोद खन्ना अभिनीत फ़िल्म लीला का संगीत औसत दर्ज़े का रहा. १९९४ में ख़ुदाई, १९८९ में बिल्लू बादशाह, १९८९ में क़ानून की आवाज़, १९८७ में राही, १९८६ में ज्वाला, १९८६ में लौंग दा लश्कारा, १९८४ में रावण और १९८२ में सितम के गीत चले और न ही फ़िल्में. ये सारी फ़िल्में उन दिनों औसत से कम दर्ज़े की फ़िल्में मानी गईं. ज़ाहिर है कि जगजीत सिंह ने बतौर कम्पोज़र बहुत पापड़ बेले लेकिन वे अच्छे फ़िल्मी गाने रचने में असफल ही रहे. इसके उलट पार्श्वगायक जगजीत जी सुनने वालों को सदा जमते रहे हैं. उनकी सहराना आवाज़ दिल की गहराइयों में ऐसे उतरती रही मानो गाने और सुनने वाले दोनों के दिल एक हो गए हों. कुछ हिट फ़िल्मी गीत ये रहे-
- ‘प्रेमगीत’ का ‘होठों से छू लो तुम मेरा गीत अमर कर दो’
- ‘खलनायक’ का ‘ओ मां तुझे सलाम’
- ‘दुश्मन’ का ‘चिट्ठी ना कोई संदेश’
- ‘जॉगर्स पार्क’ का ‘बड़ी नाज़ुक है ये मंज़िल’
- ‘साथ-साथ’ का ‘ये तेरा घर, ये मेरा घर’ और ‘प्यार मुझसे जो किया तुमने’
- ‘सरफ़रोश’ का ‘होशवालों को ख़बर क्या बेख़ुदी क्या चीज़ है’
- ट्रैफ़िक सिगनल का ‘हाथ छुटे भी तो रिश्ते नहीं छूटा करते’ (फ़िल्मी वर्ज़न)
- ‘तुम बिन’ का ‘कोई फ़रयाद तेरे दिल में दबी हो जैसे’
- ‘वीर ज़ारा’ का ‘तुम पास आ रहे हो’ (लता जी के साथ)
- ‘तरक़ीब’ का ‘मेरी आंखों ने चुना है तुझको दुनिया देखकर’ (अलका याज्ञिक के साथ)
विवादों में रहे जगजीत बहुत कम लोगों को पता होगा कि अपने संघर्ष के दिनों में जगजीत सिंह इस कदर टूट चुके थे कि उन्होंने स्थापित प्लेबैक सिंगरों पर तीखी टिप्पणी तक कर दी थी. हालांकि आज वे इसे अपनी भूल स्वीकारते हैं. स्टेट्टमैन लिखता है कि, किशोर दा ने जगजीत सिंह के उस बयान पर कमेंट किया था – ”how dare these so-called ghazal singers criticize an icon that Manna Dey, Mukesh and I dare not criticize. Rafi was unique.” ज़ाहिर है जगजीत जी ने महान पार्श्व गायक मोहम्मद रफ़ी साहब पर जो कहा वो उचित नहीं होगा. ये भी देखने वाली बात है कि जगजीत जी ने अपनी पसंद के जिन फ़िल्मी गानों का कवर वर्सन एलबम क्लोज़ टू माइ हार्ट में किया था.. उसमें रफ़ी साहब का कोई गाना नहीं था. ख़ैर, इसके बाद उनकी दिलचस्पी राजनीति में भी बढ़ी और भारत-पाक करगिल लड़ाई के दौरान उन्होंने पाकिस्तान से आ रही गायकों की भीड़ पर एतराज किया. तब जगजीत सिंह जी का कहना था कि उनके आने पर बैन लगा देना चाहिए. दरअसल, जगजीत जी को पाकिस्तान ने वीज़ा देने से इंकार कर दिया था.. लेकिन जब पाकिस्तान से बुलावा आया तब जगजीत सिंह जी की नाराज़गी दूर हो गई. ये इस शख़्स की भलमनसाहत थी कि जगजीत ने ग़ज़लों के शहंशाह मेहदी हसन के इलाज के लिए तीन लाख रुपए की मदद की.. उन दिनों मेहदी हसन साहब को पाकिस्तान की सरकार तक ने नज़रअंदाज़ कर रखा था.
घुड़दौड़ का शौकग़ज़ल गायकी जैसे सौम्य शिष्ट पेशे में मशहूर जगजीत जी का दूसरा शगल रेसकोर्स में घुड़दौड़ है. कन्सर्ट के बाद कहीं सुकून मिलता है तो वो है मुंबई महालक्ष्मी इलाक़े का रेसकोर्स. १९६५ में मुंबई मे जहां डेरा डाला था उस शेर ए पंजाब हॉटल में कुछ ऐसे लोग थे जिन्हें घोड़ा दौड़ाने का शौक था. संगत ने असर दिखाया और इन्हें ऐसा चस्का लगा कि आज तक नहीं छूटा है. (स्रोत-आउटलुक) इसी तरह लॉस वेगास के केसिनो भी उन्हें ख़ूब भाते हैं.
मेरी शाम जगजीत जी के साथ यूं तो कई दफ़ा जगजीत जी की महफ़िल में जाने का मौक़ा मिला है लेकिन पहली मुलाक़ात हमेशा याद रहती है. १९९४ में जगजीत सिंह जी प्रोग्राम पेश करने छत्तीसगढ़ के रायपुर आए थे. मैं उन दिनों राजनांदगांव में रहा करता था. मेरे दोस्त मनीष रेड्डी ने मुझे बताया कि ‘जग्गू दादा आ रहे हैं.’ मैं बल्लियों उछल पड़ा. मैं पूछा, ‘कब?’ उसका जवाब था ‘परसों!!‘ मैंने पूछा, ‘टिकट?’ उसका जवाब था, ‘सारी बिक गईं.. कोई जुगाड़ नहीं हो रहा है.’ मैंने कहा, ‘चल कोई बात नहीं..अपन को तो जाना है हर हाल मे.’ हम दोनों एक दिन बाद सुबह रायपुर के लिए रवाना हो गए. शाम को दोनों थियेटर के सामने जुगाड़ लगाने की कोशिशो में भिड़े थे. कि अचानक मैंने देखा कि गिटारिस्ट अरशद अहमद साहब कार से उतर रहे हैं. उनके साथ वायलिनिस्ट दीपक पंडित, तबला वादक अभिनव उपाध्याय और अन्य भी थे. मैं अरशद भाई की ओर लपका. मैं पहले से किताबों और अख़बारों में कन्सर्ट के बारे में पढ़ा करता था. लिहाज़ा मैंने उन्हे पहचान लिया था. एक मित्र से सुन रखा था कि अरशद भाई माणिकचंद गुटखा खाने के शौकीन थे. मैंने पेशकश की और दुआ-सलाम किया. दो मिनट में ऐसा परिचय बढ़ाया कि वे जान गए थे कि बच्चे दीवाने हैं और अपने साथ हमें सीधे स्टेज तक ले गए. फिर कहा कि सामने की कतार में आराम से बैठो… हमारे तो जैसे भाग ही खुल गए थे. सच तो यह था कि हम टिकट ख़रीदने को तैयार थे लेकिन कोई बेचने को तैयार होता तब ना!!
प्रोग्राम शुरू हुआ.. हम तो खो गए और एक एक कर बेहतरीन ग़ज़लें, नज़में और भांगड़ा सब कुछ हुआ. जैसे ही जगजीत जी ने झलकियां गाना शुरू किया, मैंने मनीष से कहा कि अब हमें निकल लेना चाहिए. मनीषा बोला कि कहां तो मैने बताया कि जगजीत जी जिस होटल में ठहरे हैं वहां चलते हैं.

हम होटल में डेरा डालकर बैठ गए. अंदर घुसने का भी जुगाड़ झूठ बोलकर किया. मैं नागपुर इंडियन एक्सप्रेस का रिपोर्टर बन गया और रिसेप्शनिस्ट को बोलकर जगजीत सिंह के कमरे के ठीक सामने उनका इंतज़ार करने लगा. एक घंटे बाद वे आए तो उस वक़्त सिर्फ़ मैं, मनीष और जगजीत सिंह साहब थे. हमने उनके पैर छुए और ऑटोग्राफ़ लिया. फिर फोटो सेशन हुआ. जगजीत जी ने हमारे बारे में पूछा.. तो मैंने साफ़ तौर पर बताया कि हम दोनों आपके फ़ैन है और मिलना चाहते थे. वे हंस पड़े. उन्होंने पूछा कि कहां से आए हो.. हमने जब राजनांदगांव कहा तो जगजीत जी का कहना था- ”हम्म.. राजनांदगांव और भाटापारा से.. मतलब, तुम अमीन सयानी को सुनने वाले हो.” मै समझ गया.. दरअसल, बिनाका गीतमाला, मराठा दरबार के कार्यक्रमों में अमीन सयानी को बहुत-सी चिट्ठियां इन्हीं कस्बों से आया करती थीं” कुछ पलों तक और भी बातें हुईं. उन्होंने अपने हाथों से मुझे चिकन चिली पेश की. मैं तो गदगद था. वो दिन अविस्मरणीय रहेगा. इसके बाद मुंबई, नागपुर, दोबारा रायपुर में उनकी महफ़िल में जाने का मौक़ा मिला. डेढ़ साल पहले वो यहां इंडिया टीवी के स्टूडियो मे आपकी अदालत में हमारे मेहमान बने थे. अब तक की आख़री वही मुलाक़ात थी. दुआ करता हूं कि वे बरसों-बरस हमारे बीच रहेंगे.
मेरी पसंदीदा ग़ज़लें-नज़्में
- मेरी तनहाइयों मुझको लगा लो सीने से
- मैं रोया परदेस में भीगा मां का प्यार
- अपनी आग को जिंदा रखना
- अब अक्सर चुप चुप से रहे हम
- मुंह की बात सुने हर कोई
- शोला हूं भड़कने की गुज़ारिश नहीं करता
- हुज़ूर आपका भी एहतराम करता चलूं
- अब मेरे पास तुम आई हो तो क्या
- ए ग़मे दिल क्या करूं
- बाज़ीचा ए अत्फ़ाल ज़माना मेरे आगे
- कभी गुंचा कभी शोला कभी शबनम की तरह
- बाबुल मोरा नैहर छुटो ही जाए
(जगजीत सिंह जी के बारे में अंग्रेज़ी मे यहां विस्तार से पढ़ा जा सकता है. उनकी ग़ज़लें सुनने के लिए यहां और यहां चटका लगाएं.)
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