कीबोर्ड का सिपाही

ओपी नैयर को श्रद्धांजलि

Posted in सिनेजगत by neerajdiwan on January 29, 2007

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हिन्दी फ़िल्म संगीत के सुनहरे युग का एक अध्याय रचने वाला आज हमारे बीच नहीं रहा. ओंकार प्रसाद नैयर उम्र के ८१वें पड़ाव पर दुनिया से चल बसे.  लता जी से गवाने की ज़िद के लिए जाना जाने वाला यह संगीतकार उस दौर का विद्रोही संगीतकार ही कहा जा सकता है जब लता जी के साथ गाने गवाने की होड़ होती थी. लता जी हिट की ग्यारंटी थीं.. आज भी हैं. कमाल का है वो माद्दा जो नैयर साहब जैसे विद्रोही अपने स्वभाव में लेकर चलते हैं. १६ जनवरी १९२६ में लाहौर मे जन्में नैयर साहब जिन्हें आम सुनने वाला टांगे वाले संगीतकार के नाम से जानता है. उनका नाम आते ही फ़िल्म संगीत की थोड़ी समझ रखने वाला भी बरबस यह कह उठता है- अरे हां.. वो घोड़े की टापों पर संगीत तैयार करते थे. उनके संगीत में पंजाबी मिट्टी का सौंधापन होता था और वे ज़्यादातर गाने आशा जी से गवाते थे. व्यक्तिगत तौर पर कहूं तो मैं १९९४ में इन्हीं जनवरी के दिनों पंचम दा के जाने से दुखी हुआ था.. आज वही दुख मुझे नैयर साहब के जाने से हो रहा है. 

नैयर साहब ने संगीत की कोई तालीम नहीं ली थी. लेकिन कम्पोज़र के तौर पर करियर बनाने की ज़िद उनके साथ थी. मुंबई में पहला ब्रेक १९४९ में उन्हें फ़िल्म कनीज़ से मिला. इस फ़िल्म में उन्होंने बैकग्राउंड स्कोर किया था. तीन साल बाद डी पंचोली ने उन्हें बतौर संगीतकार फ़िल्म आसमान के लिए लिया. बदक़िस्मती से फ़िल्म नहीं चली और ही नैयर का संगीत. गुरूदत्त की बाज़ में वे नाकामयाब हुए. लेकिन गुरूदत्त ने उन्होंने दूसरा मौक़ा १९५४ में बनी फ़िल्म आर-पार में दिया. गुरूदत्त की पत्नी गीता दत्त का गाया बाबूजी धीरे चलना प्यार में ज़रा संभलना ज़बर्दस्त कामयाब रहा. इसी फ़िल्म का एक और गाना युवा दर्शकों के दिल में जगह बना गया.. ये लो मैं हारी पिया. 

गुरूदत्त की इस पहली हिट से नैयर भी इंडस्ट्री में जमे और ऐसे जमे कि इसके बाद दोनों ने तिकड़ी मारी. १९५५ में आई मिस्टर एंड मिसेस ५५ और १९५६ में सीआईडी. सीआईडी गुरूदत्त और नैयर की सफलता थी, साथ ही देव साहब और वहीदा रहमान के लिए भी मील का पत्थर साबित हुई. कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना और लेके पहला पहला प्यार सुपरहिट रहे. इस दौर तक नैयर साहब गीता दत्त और शमशाद बेग़म के सुरों को आकार दे रहे थे.  हालांकि १९५२ में आई फ़िल्म मंगू में उन्होंने आशा जी के साथ एक गीत स्वरबद्ध किया था. १९५६ के आते तक नैयर की मांग बढ़ गई थी और प्रोड्यूसरों का दबाव भी कि लता जी से गीत गवाओ.. लेकिन नैयर ने तब तक आम गायिका मानी जाने वाली आशा जी को लेना ठीक समझा.

१९५७ में आशा-रफ़ी और नैयर की तिकड़ी ने कमाल किया और पंजाबी लोकधुनों में ढले ऐसे सुर छेड़े कि लोग दीवाने हो गए. हिन्दीभाषी इलाक़ों में निकलने वाली शायद ही कोई ऐसी बारात हो जिसमें नैयर का यह गीत बैंड पर न बजता हो ये देश है वीर जवानों का (मो. रफ़ी और बलबीर). इसी फ़िल्म में आशा जी और रफ़ी साहब के युगल गीत उड़े जब जब ज़ुल्फ़ें तेरी और रेशमी सलवार कुर्ता जाली का हिट रहे. नया दौर के लिए उन्हें फ़िल्मफ़ेयर का सर्वश्रेष्ठ संगीतकार अवार्ड हासिल हुआ. 

आशा जी और रफ़ी साहब के साथ आगे नैयर साहब ने तुमसा नहीं देखा, सोने की चिड़िया, फागुन, हावड़ा ब्रिज और रागिनी जैसी फ़िल्मों में कई हिट गाने दिए. हावड़ा ब्रिज का मेरा नाम चिन चिन चू.. कौन भूल सकता है. तब ट्विस्ट को लोकप्रिय बनाने में इस गीत का बड़ा योगदान था. फागुन का इक परदेसी मेरा दिल ले गया उससे भी ज़्यादा पॉपुलर हुआ था. बीच के तीन-चार साल फिर नाकामयाबी के रहे. १९६२ में जॉय मुखर्जी और साधना की हिट फ़िल्म एक मुसाफ़िर एक हसीना से नैयर साहब फिर हिट हुए.

साठ के दशक में सबसे बड़ी उपलब्धि आशा जी के मस्तीभरे गाने थे. यह अद्भुत प्रयोग नैयर साहब के बस की ही बात थे. इसी दौर में नैयर साहब के संगीत निर्देशन में रफ़ी साहब ने क्लासिकी अंदाज़ के परे अपने सुरों को पर दिए. फ़िल्म थी कश्मीर की कली. जो उस दौर की ज़बर्दस्त हिट रोमांटिक फ़िल्म थी. दीवाना हुआ बादल.. इशारों इशारों में दिल लेने वाले और ये चांद-सा रोशन चेहरा मेरे जीवन के अब तक के बेहतरीन चंद गीतों में जगह रखते हैं. 

उसी दौर में मुकेश के गाए गीत चल अकेला (संबंध) और किशोर दा के गाए गीत तू औरों की क्यों हो गई को कौन भूल सकता है. गुरूदत्त और नैयर साहब फिर एकजुट हुए और बहारें फिर भी आएंगी का संगीत हिट हुआ. आज के दौर के गीतकार समीर के पिता अनजान का लिखा बेहद ख़ूबसूरत गीत आप के हसीन रूख़ पे आज नया नूर है.. आज भी मोहम्मद रफ़ी साहब के सुनने वालों को प्यार में डूबने पर मजबूर करता है. 

बदलते दौर और समीकरणों के बीच नैयर साहब गुमनामी के अंधेरे में ऐसे खोए कि बरसों तक फिर फ़िल्मों में संगीत ना दे सके. वक़्त बीत चुका था. लोग भूल चुके थे. अस्सी के दशक में नैयर साहब ने बांग्लादेश की मशहूर गायिक रुना लैला में आशा जी की छबि देखी और मौक़ा दिया. उनके संगीत निर्देशन में प्राइवेट एलबम लव्स ऑफ़ रूना लैला रिलीज़ हुआ. मेरा बाबू छैल छबीला, दमादम मस्त कलंदर जैसे गीत लोगों की ज़ुबान पर चढ़े..लेकिन एक करिश्मा दोबारा नहीं हो सका. रुना लैला भी इक्का दुक्का फ़िल्मों के बाद इंडस्ट्री से विदा हो गईं. १९८८ में एक तेलुगू फ़िल्म नीराजनम में उन्हें मौक़ा मिला लेकिन मुंबई इंडस्ट्री उन्हें भुला चुकी थी. नब्बे के दशक में उन्होंने फिर वही कमाल करने की कोशिश की. सलमान ख़ान और करिश्मा कपूर की फ़िल्म निश्चय के संगीत को ज़्यादा कामयाबी नहीं मिली. यह दौर नदीम-श्रवण और आनंद मिलिन्द जैसे संगीतकारों का था. इसके बाद नैयर साहब ने प्राणलाल मेहता का फ़िल्म ज़िद का संगीत स्वरबद्ध किया. जिसमें मशहूर तबला वाद उस्ताद ज़ाकिर हुसैन ने अपना हुनर दिखाया था. 

सचिन देव बर्मन, नौशाद, चिदलकर, कल्याणजी-आनंदजी जैसे संगीतकारों के दौर में स्वर साम्राज्ञी लता जी से गुरेज रखते हुए इंडस्ट्री को एक के बाद एक हिट फ़िल्मी गाने देना ओपी नैयर की ही ख़ासियत थी. लता जी की गायकी को निखारने में मदनमोहन का नाम गर्व से लिया जाता है तो यह भी ध्यान देना होगा कि उसी दौर में ओ पी नैयर ऐसे ही सफल प्रयोग आशा भोसले जी के साथ कर रहे थे. पूरे संगीत करियर में लता जी से नैयर साहब ने एक भी गाना रिकॉर्ड नहीं कराया. बक़ौल नैयर, लता जी की आवाज़ उनकी संगीत लहरियों पर तैर नहीं सकती थी. ये तो महारथी जानते हैं कि वे कौन-सी स्वरलहरियां जिन पर लता जी के सुर सवार नहीं हो सके लेकिन इतना हमेशा तय रहा है कि महारथियों की प्रतिद्वंदिता नए गुल खिलाती है. वो चाहे संगीत में हो या साहित्य या फिर किसी और क्षेत्र में. जब यहां ब्लॉगजगत में तनातनी होती है तो मैं सोचता हूं कि भला होगा कि आलेखों से ही ज़ोर आज़माइश होती रहे. व्यक्तिगत चरित्र छिद्रण मन को दुख पहुंचाता हूं. यूं भी क्या ग़ैर कम पड़ गए जो अपने भाई भिड़ने लगे हैं. ख़ैर.. हम नैयर जी को ही याद करते हैं. 

उधर जहां लता मदनमोहन एक के बाद एक बेहतरीन गीतों से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर रहे थे तो दूसरी तरफ़ आशा- ओपी नैयर की जोड़ी फ़िल्म संगीत के नए आयाम गढ़ रही थी. अल्हड़ता, मस्ती, शोखपन- अगर ये ज़ेवर आशा जी के सुरों में किसी ने सजाए हैं तो वो ओपी नैयर साहब ही हैं. मोहम्मद रफ़ी साहब के गलों के निकली बेजोड़ हरकत और मुरकियों का बेहतरीन इस्तेमाल करने वाले नैयर साहब ही हैं. रोमांटिक गीतों का दौर कभी ख़त्म नहीं होता. वो तब के चिदलकर हों या आज के जतिन-ललित. लेकिन नैयर की रूमानी मौसिक़ी ने जवां दिलों पर ऐसा जादू बिखेरा था वो आज के युवाओं के दिलों में गहराई तक असर करता है.  रुमानी पलों से गुंथा वह गीत जिसे ‘माशूक’ बड़ी नज़ाकत से किलर सॉग कहता है; वो है- आपके हसीन रूख़ पे आज नया नूर है. नैयर साहब की इस कृति को सुनकर तो कोई भी मदहोशी के आलम में डूब जाए या फिर कोई भी आशिक़ मिज़ाज आशाजी के गाए इस गीत का दीवाना हो जाए ये है रेशमी ज़ुल्फ़ों का अंधेरा ना घबराइये.. दोनों रचनाएं नैयर साहब की ही हैं. ये वो दौर था जहां मौसिक़ी में पाक मोहब्बत के जज़्बात झलकते थे. गीतों के ज़रिए आशिक़ी होती थी अय्याशी नहीं. प्रेम की कोमल संवेदनाओं को आकार मिलता था. 

नैयर साहब की संगीतबद्ध की गई फ़िल्में और निधन का समाचार

11 Responses

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  1. Pratik Pandey said, on January 30, 2007 at 1:04 pm

    नैयर साहब के निधन पर कई लेख अख़बारों में प्रकाशित हुए, लेकिन इतना अच्छा लेख कहीं पढ़ने को नहीं मिला। यह लेख उनके व्यक्तित्व की आभा को और प्रखर कर रहा है। इस बेहतरीन लेख के‍ लिए बहुत-बहुत धन्यवाद।

  2. PRAMENDRA PRATAP SINGH said, on January 29, 2007 at 9:57 pm

    हार्दिक श्रद्धांजली

  3. समीर लाल said, on January 29, 2007 at 7:19 pm

    जानकारी के लिये धन्यवाद। भावभीनी श्रद्धाँजलि।

  4. Raj Gaurav said, on January 29, 2007 at 7:15 pm

    ओ.पी. नायर जी को श्रद्धान्जली..
    भगवान उनकी आत्मा को शांति दें..

  5. सागर चन्द नाहर said, on January 29, 2007 at 5:55 pm

    नौशाद साहब के जाने के बाद नैयर जी अकेले बचे थे उस संगीतमय जमाने की कड़ी के रूप में, अब एक शून्य सा छा गया है।
    ओ. पी नैयर जी को श्रद्धान्जली

  6. सृजन शिल्पी said, on January 29, 2007 at 2:48 pm

    आपके जन्म-दिन की खुशी और नैयर साहब के जाने का ग़म– इन दोनों तरह के परस्पर-विरोधी मनोभावों से एक साथ गुजरते हुए आपने नैयर साहब को इतने सुन्दर ढंग से संगीतमय श्रद्धांजलि दी है, इसे पढ़-सुन कर मन भावविभोर है।

  7. आशीष said, on January 29, 2007 at 12:15 pm

    नैयर साहब को मेरी हार्दिक श्रद्धांजली !

  8. pankaj said, on January 29, 2007 at 8:58 am

    नीरजबाबु,

    नैयर साहब के बारे में सुन तो रखा था, पर ज्यादा जानकारी नहीं थी। आज समाचारपत्र में उनके कम्पोज किए गीतों की लिस्ट देखी तब पता चला कि कितना प्रतिभाशाली संगीतकार अब हमारे बीच नहीं रहे।

    उनकी आत्मा को शांति मिले।

  9. जगदीश भाटिया said, on January 29, 2007 at 8:13 am

    अच्छी और विस्तारपूर्वक जानकरी ।
    लिखने में इतने दिन न लगाया करें, हम जैसे लोग आपका लिखा पढ़ने को बेताब रहते हैं।

  10. जानकारी के लिये धन्यवाद। नैयर साहब को श्रद्धाँजलि।

  11. Shrish said, on January 29, 2007 at 1:56 am

    धन्यवाद उनके बारे में विस्तृत जानकारी देने के लिए।

    भगवान उनकी आत्मा को शांति दे !


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