कीबोर्ड का सिपाही

सरकारी सुस्ती और चहेतों का पूंजीवाद

Posted in जहांनामा by neerajdiwan on November 14, 2006

बीच बहस में- सत्ता की साज़िश और भूमंडलीकरण

 

दिनों भूमंडलीकरण पर बहस छिड़ी है. बहस की शुरूआत सृजनशिल्पी जी ने की जिसमें असहमति के स्वर छेड़ते हुए संजय जी ने टीप क्या मारी कुछ लोग नाराज़ हो गए. आप पूछेंगे कि सिपाही को कैसे पता चला? हुआ ये कि नारद ने जब बताया कि सृजनशिल्पी का नया लेख छपा है तो अपन उनके डेरे पर भागे और लेख पढ़ते-पढ़ते आखरी में संजय जी की टिप्पणी पढ़ी. अपना माथा ठनका कि ये क्या कहा संजय भैया ने? सृजन जी के लेख के अंतिम सिरे पर कुछ समाधान की बातें थी. उनका कहना था - हमें यह बताना होगा कि हम अपने संसाधनों के बल पर अपना विकास कर सकते हैं, हमें यह दिखाना होगा कि विकास और प्रगति का हमारा अपना भारतीय मॉडल है। हमें मँहगी विदेशी कारें नहीं, बल्कि सक्षम सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था चाहिए। हमें पेप्सी और कोकाकोला नहीं, बल्कि स्वच्छ पेयजल चाहिए। हमें पाँच सितारा निजी स्कूल और अस्पताल नहीं, बल्कि सबके लिए बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएँ चाहिए। 

संजय जी ने इसी पर अपना सवाल दाग़ा था, – मैं यह नहीं समझ पा रहा हूँ की पेप्सी का विरोध करने से क्या सबको पानी मिल जाएगा या फिर पाँच सितारा स्कुलो को रोक कर सबको शिक्षा मिलना तय हो जाएगा? सच पूछें दोस्तों तो मैं वो शख्स था जो इस टीप से राज़ी नहीं था. किंतु नाराज़ नहीं था क्योंकि इतने दिनों में लेख और टिप्पणियां पढ़ते-पढ़ते हम बहुत-से लेखकों के वैचारिक रुझान और दायरे और दिशाओं को समझ चुके होते हैं. फिर भी इसका सामूहिकीकरण करने से गुरेज़ रखता हूं क्योंकि यह मुझ जैसे के लिए बहुत कष्टकारी होता है कि मुझे कोई वाद के दायरे में सिमटाकर रख दे और फिर उसी वाद को निशाना बना-बनाकर लगातार मुझे उस वाद से पैदा हुए हर बुरे के लिए कोसता फिरे. जब मेरे लिए कष्टकारी हो सकता है तो यह मानकर चलता हूं कि बहुतों के लिए यह पीड़ादायक होता होगा. यूं भी मीडिया में रहने की वजह से वादों के चक्कर से निकलकर सभी को सुनने और पढ़ने का अवसर मिलता है और यह मेरे काम के साथ व्यक्तिगत रुचियों का भी अहम हिस्सा है. चिट्ठाकारी के चलते यह अब और अधिक सुलभ होता जा रहा है.  

संयोग से उसी वक़्त मौजूद सृजनशिल्पी से मेरी नेट पर बात हुई और मैंने कह दिया कि अंतर को समझे बिना की गई संजय जी की टिप्पणी मुझे ठीक नहीं लगी. जवाबन उन्होंने मुझे प्रतिटिप्पणी कर अपनी बात कहने का कहा. बात आयी-गयी हो गई. प्रियंकर जी और अमित जी तेज़ निकले और अपनी-अपनी बातें कह गए. समयाभाव के चलते मैं नहीं कह सका. यूं भी सभी के ब्लॉग पर टिप्पणी करना मुमकिन नहीं होता था. मैंने टिप्पणी नहीं दी और अब अपने विचार प्रकट करना ठीक समझा है.  वापस भूमंडलीकरण पर जारी बहस पर चलें. विचारधारा के तल पर दो परस्पर विपरीत बिंदुओं पर बात करने से बेहतर होगा कि तथ्यों पर जाएं. जिन तथ्यों, तर्कों और अनुभवों के आधार पर विचारधारा जन्म लेती है वहां जाकर देखना होगा कि इन तमाम चर्चाओं में मैंने क्या देखा? सवाल उठता है कि मैं संजय जी के सवाल पर हैरान क्यों हुआ था? बात लंबी नहीं है..बहुत छोटी सी है.. जिस पर पिछले कुछ लेखों में मैंने यही कहने की कोशिश की है. मज़े की बात यह कि जब मैं मल्टीप्लैक्स सिनेमा और सामाजिक सरोकारों को साथ जोड़कर कुछ कह रहा था तब बहुत-से लोग मेरे कहे से सहमत थे क्योंकि उनकी चिंता भी सामाजिक सरोकारों से पल्ला छुड़ाते फ़िल्मकारों को लेकर थी. उसी चर्चा का दूसरा बिंदु सरकारी चहेते बने मल्टीप्लैक्स मालिकों को मिल रहे फ़ायदे और छोटे सिनेमाघर मालिकों की मुश्किलों पर था. इसी तरह कुछ दिनों पूर्व परिचर्चा में उद्योगपतियों की राजनीति में हिस्सेदारी पर मैंने सवाल उठाए और पाठकों की सहमति भी मिली. यानी यह तो तय रहा कि हममें से बहुत-से लोग चिंतन के गहरे तल पर मेरी इन चिंताओं से अवगत हैं किंतु जब बात सीधे तौर पर समाधान की हो तो भेद खड़े कर लेते हैं. यह भेद क्या वाद-विशेष के प्रति आग्रह से आता है? क्या समाजवाद, पूंजीवाद, साम्यवाद जैसे शब्दों का सहारा लेकर हम अपनी राजनीतिक सोच को प्राथमिकता देने लग जाते हैं? नतीजतन, हम आगे उन्हीं शब्दों के वशीभूत सारे विचारों का बंटाधार कर बैठते हैं. सोच का यह स्तर हमें स्पेस नहीं देता और निरर्थक बहस खड़ी कर लेते हैं. जिनमें तथ्य कम और भाषण ज़्यादा होते हैं. राजनीतिक दलों के इतिहास ज़्यादा और आम इंसान पर बीत रहे वर्तमान से सामना कम होता है. 

बोतलबंद पानी पर चर्चा शुरू करता हूं. पानी आज शर्म की चीज़ बन गया है. बचपन में मुहावरा पढ़ा था- रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून. रहीम को क्या सूझी होगी कि पानी और इज़्ज़त दोनों को मिलाकर रख दिया. वे दूरदृष्टा थे क्योंकि अब कंपनियां हमें हमारी ही इज़्ज़त बेच रही हैं. संयोग है कि आज (मंगलवार) देश में गिरते भूजल स्तर और बोतलबंद पानी बेचने वाली कंपनियों पर लगाम लगाने के लिए सरकारी और ग़ैर सरकारी संगठनों की दो दिनी बैठक हो रही है. उस ख़बर को पढ़कर मुझे याद आया कि इसी तरह की कवायद संसद में दो साल पहले शीतलपेय कंपनियों पर लगाम लगाने के लिए भी की गई थी. जो लोग शीतलपेय के विरोध में हैं वे कुछ नहीं कर सकते. हां, यह सच है! क्योंकि ब्यूरो ऑफ़ इंडियन स्टैन्डर्ड ने संसदीय समिति के निर्देशों के अनुरूप इन दो सालों मे शीतलपेय के मानक ही निर्धारित नहीं किए हैं. इन्ही ख़ामियों के चलते कंपनियां कोर्ट के सामने आसानी से बचकर निकल जाती है. सरकारी सुस्ती प्रायोजित होती है ताकि कंपनियों को फ़ायदा मिलता रहे. मज़ाल है कि कोई कोर्ट उनके कामों को ग़ैर वाजिब ठहरा सके. पश्चिम में इसे Crony Capitalism कहा जाता है. प्रसिद्ध लेखक गिरीश मिश्र इसे हिन्दी में चहेतों का पूंजीवाद कहते हैं. सरकारें जब बिलियन-ट्रिलियन डॉलरों वाली कंपनियों के सामने घुटने टेककर नीतियां बनाती है तब हमें चहेतों का पूंजीवाद दिखाई देता है. इसे देखने और फिर समझने के लिए आंखें और दिमाग़ भी चाहिए होते हैं. कुछ इसी तरह की नीतियों के बारे में अपने फ़ोरम परिचर्चा में रिलायंस का ज़िक्र किया गया था. सृजन जी के चिट्ठे पर अतुल जी ने प्रसंगवश बेकटेल का ज़िक्र भी कर दिया. आपको अब पता होगा कि लातिन अमेरिकी देश बोलिविया का कोचाबांबा एक अर्धमरू इलाक़ा है. यहां पानी की बहुत किल्लत है. 1999 में विश्व बैंक ने सिफ़ारिश की कि कोचाबांबा को पानी आपूर्ति करने वाली सरकारी कंपनी का निजीकरण कर दिया जाए. इसके लिए सरकार ने बेकटेल नामक एक विशाल कंपनी को सरकारी स्तर पर काफ़ी रियायतें दी और उसी दौर मे सरकारी सबसिडी भी ख़त्म कर दी गई. नतीजतन, पानी का बिल बीस डॉलर प्रतिमाह तक पहुंच गया. इस शहर में न्यूनतम मज़दूरी सौ डॉलर से भी कम है. असंतोष भड़कना स्वाभाविक था. पानी के निजीकरण के ख़िलाफ़ जनता ने आंदोलन छेड़ दिया. इस पूरे आंदोलन के दौरान मीडिया और संगठनों तक पर पाबंदी लगी थी..लेकिन सरकार को अंततः झुकना ही पड़ा.  गर्मी में हम प्यास बुझाने के लिए कोका कोला या पेप्सी पीते हैं. उसके एक लीटर उत्पादन में दस लीटर पानी ख़र्च होता है. यह पानी उन इलाक़ों से आता है जहां खेती के लिए पानी नहीं मिलता. जब से मै नोएडा आया हूं देखकर परेशान हूं कि सोसायटी के नलों में पीने का साफ़ पानी नहीं आता. मज़े की बात यह कि यहां पानी भी उच्च-मध्यम और निम्न वर्गों में बंट गया है. बिसलेरी की बीस लीटर की बोतल साठ रुपए, उससे सस्ती चालीस और फिर तीस रुपए. कोई बताएं ये अल्ट्रावायलट रे, एन्टी बैक्टरिया ट्रीटमेंट वगैरह काहे का इलाज है? पानी भी ज़ात देखता है!! ये जात अमीरी-ग़रीबी की है. आप ऊंचे दर पर पानी ख़रीदेंगे तो ऊंचा स्टेटस समझा जाएगा.. यानी रहिमन पानी राखिए… इज़्ज़त बढ़ाएगा यह पानी. तेज़ी से हो रहा औद्योगिकीकरण और प्रायोजित सरकारी सुस्ती निजी कंपनियों के लिए उगाही के अवसर खोलते जाते हैं और मज़े की बात यह है कि हम इस खेल में उपभोक्ता बनने में गर्व का अनुभव करते हैं. हम भूल जाते हैं कि किसी ज़माने में हमारे यहां कहावत थी- खुश रहो, आबाद रहो, फ़र्रुखाबाद रहो. आब यानी पानी.. उन दिनों भी पानी से परिपूर्ण होने की कामना की जाती थी. तमाम मानव सभ्यताएं नदियों के किनारे बसीं और पल्लवित हुईं. अब नदियों के किनारे उद्योग पनपते हैं, खेत उजड़ते हैं और नदियां सूखती हैं. किसी ने सही कहा है कि आने वाला युद्ध ज़मीन नहीं पानी के लिए होगा. यहां दिल्ली में गर्मियों के दिन लोगों को पानी के लिए त्राहिमाम करते देखा ही करता हूं.  

हम क्यों चिंता करें प्याऊ घरों की घटती तादाद और बिककर टूटने वाली प्लास्टिक बोतलों से होने वाले पर्यावरण प्रदूषण की? क्या हमारे बाप पर कर्ज़ा था जो हम उतारेंगे? हम तो यूज़ एंड थ्रो पर यक़ीन रखते हैं. लिखो और फेकों वाली पेन से शुरू हुआ ये खेल अब रिश्तों को यूज़ एंड थ्रो मे तब्दील कर रहा है. टूटता है तो टूटने दो प्रकृति से हमारा रिश्ता!!  हम तो भूल ही गए हैं कि एक प्लास्टिक को डिकम्पोज़ होने में पांच सौ बरस लग जाते हैं. मैं, हिमांशु और आप तो नल का पानी पीकर बड़े हुए हैं. लेकिन अब ख़तरे खड़े कर दिए गए हैं जो पानी का गंदा और कम होना औद्योगिक प्रदूषण की वजह से कम और प्रायोजित ज़्यादा लगता हैं. ख़तरे जो इथोपिया में लार्वा की पैदावार बढ़ाकर मच्छरमार दवाइयां बेचने वाले खड़े करते हैं. ख़तरे जो नौकरशाहों को पैसे खिला सरकारी टेलीफ़ोन सेवा में प्रायोजिक सुस्ती कर निजी ऑपरेटरों ने खड़े किए. ख़तरे जो सरकारी डॉक्टरों के गांव में ना जाने की सनक पर खड़े होते हैं. ख़तरे जो खस्ताहाल हो रहे सरकारी अस्पताओं के बजाय डिस्काउंट का ऑफ़र देने वाले नर्सिंग होम्स खड़े करते हैं. ख़तरे जो अब चंदे देकर राज्यसभा पहुंच रहे कारपोरेटिया नेताओं ने संसद में खड़े कर रखे हैं.  कल ये ख़तरे हमें हवा में भी तब दिखाई देंगे जब कोई दैत्याकार कंपनी प्योर ऑक्सीजन चैंबर आपके घरों में लगाने का लुभावना स्लोगन सुनाएगी.  बेकटेल बहुत दूर की बात है. मैं अपने इलाक़े छत्तीसगढ़ का अनुभव बताता हूं. अजीत जोगी सरकार के दौर में रेडियस वॉटर नामक निजी कंपनी ने शिवनाथ नदी पर स्टाप डेम बनाकर इसके पानी पास के औद्योगिक क्षेत्र ग्राम-बोरसी की फ़ैक्ट्रियों तक बेचना शुरू किया. कंपनी ने स्टाप डेम तो बनाया ही लेकिन साथ में वे पूरी नदी को अपने बाप की समझ बैठे और किसानों को पानी लेने से रोकने लगे. इसका विरोध किया गया. कंपनी ने अपने पैर छत्तीसगढ़ से बाहर भी फैलाए. उन दिनों मैं उस विरोध का गवाह बना.. मुझे यह सोचने पर मजबूर होना पड़ा कि जब बिजली निजी कंपनियां दें, पानी निजी कंपनियां दें, नौकरी भी निजी कंपनियां दें, अच्छे स्कूल और अस्पताल निजी कंपनियां चलाएं. बुनियादी सुविधाएं निजी कंपनियां ही दें तो हम सरकार क्यों दें? महज़ इसलिए कि केंद्र में बैठे ये साढ़े सात सौ और राज्यों में बैठे सात हज़ार नेता हमारे जनप्रतिनिधी कहलाएं? ये सुविधाएं सरकारी उड़ाएं और हमें असरकारियों के भरोसे करते जाएं? मोटे चंदे के एवज़ में पूंजीपतियों की खुशामद करते जाएं??  

सवाल किसी भी पूंजीवाद और समाजवाद का नहीं है. कतई नहीं है. शब्दों के मायाजाल में न उलझिए और ना ही उलझाइए. सिर्फ़ फ़र्क देखिए. राजा-महाराजाओं के ज़माने को मैं राष्ट्र के लिए आदर्श नहीं मानता. उन दिनों राजा-महाराजाओं के बच्चों के लिए आला दर्ज़े के स्कूल हुआ करते थे. आम आदमी के अलग. लोकतंत्र मे सभी को समान अवसर दिए जाने की बात हम करते हैं. परिचर्चा में आरक्षण पर हुई बहस में आम सहमति तो इस बात पर थी ही कि अध्ययन के समान अवसरों से आरक्षण की विसंगतियों को दूर किया जा सकता है लेकिन फिर वही सरकारी सुस्ती और चहेतों का पूंजीवाद आड़े आता है. लोग पूछते हैं कि सरकारी स्कूलों की दशा का पंचतारा स्कूलों के खुलने से क्या संबंध? देखिए..सीधा संबंध है. मसलन, दिल्ली में तक़रीबन पांच सौ स्कूलों को इस शर्त पर सरकारी ज़मीनें दी गई थीं कि वे अपने संस्थानों में ग़रीब बच्चों को एडमिशन देंगे. सालों बीत गए किसी स्कूल ने सुध नहीं ली. कोई ना कोई बहाना बनाकर सरकारी मदद लेते रहे और अपने वादों से मुकरते रहे. दो साल हुए हाईकोर्ट को फ़रमान जारी किए हुए और स्कूलों को अपना वादा याद दिलाए.. कोई नतीजा नहीं. अब बताएं क्या ये चहेतों का पूंजीवाद नहीं कहलाता? सरकारी ज़मीन क्या नेताओं के बाप-दादा की थी जो कौड़ियों के दाम बेच दी और आलीशान अंग्रेज़ी स्कूल खुलवा दिए? अकेली दिल्ली ही नहीं देश में लाखों गांव और कस्बें हैं जहां इस तरह की सरकारी चाहत दिखाई देती है.. हम खुश होते हैं कि वाह भई.. अब अपने बच्चों के लिए हाईस्टैंडर्ड स्कूल खुल गए हैं जहां बच्चे अंग्रेज़ियत में पलेंगे-बढ़ेंगे. बाक़ी ग़रीब जाएं भाड़ में. पूरे बजट का महज़ ढाई फ़ीसद हिस्सा शिक्षा पर खर्च करने वाली सरकार के गांव में खुले स्कूलो की हालत क्या आपसे छुपी है?  अरे खोलने दो ना.. पंचतारा स्कूल, मल्टीप्लैक्स, मॉल्स और स्पेशल इकॉनॉमिक ज़ोन. किसने मना किया है. हमने? कतई नहीं!! हम तो चाहते हैं कि पूंजी लगे और कारखाने चलें ताकी रोज़गार बढ़े.. लेकिन किन शर्तों पर? तेरे और मेरे जैसों को सरकार एक फुट ज़मीन मुफ़्त नहीं देगी..हज़ारों करोड़ का कारोबार करने वालों को कौड़ियों के दाम पर ज़मीन काहे देते हो? उनके पास कौन-सा पैसों का टोटा है अपनी तरह? कौन सुनेगा? मीडिया को क्यों फ़िकर हो हमारी? उसे मार्केट में टिकना है और बिकना है वो भले ही राखी सावंत का पल्लू बेचे या बलात्कृत बालिका के कपड़ों के तार, वो कारपोरेटिया चालीसा का अखंड पाठ पढ़े या दलालों की दिल्लगी दिखाए. गुलाबी अख़बार भूमंडलीकरण को अपरिहार्य बताएं और ज़्यादा गले तक बन जाए तो इसे आवश्यक बुराई बताकर पल्लू झाड़ लें. हैरत की बात यह है कि गाहे-बगाहे हम मीडिया को लपेटने से बाज़ नहीं आते.. किंतु यह भूल जाते हैं कि यह वही मीडिया है जिस पर भूमंडलीकरण के दौर मे गहरा असर पड चुका है. मीडिया से वो सारे मुद्दे छूट जाते हैं जो मेरी और आपकी ज़िंदगी पर दूरगामी असर डालते हैं. लेकिन जिन मुद्दों (?) से हमारा दूर तक कोई नाता नहीं होता वे सारे ख़बरों में छा जाते हैं.  चाणक्य का कहना था कि राजा जब व्यवसाय करने लगे तो समझो राज्य की प्रजा का बंटाधार होने वाला है आज राजनीतिक ग़ुलामी के दिन नहीं है लिहाज़ा हमें अपना देश आज़ाद, अपने नेता और अपना शासन दिखाई देता है..किंतु नई वैश्विक व्यवस्था आर्थिक साम्राज्यवाद की है. यदि यह खुली आंखों से दिखाई नहीं दे रही है तो समझें कि दिखाने वाला मीडिया चंद मज़बूत हाथों की कठपुतली बन चुका है. गुलाबी अख़बारों ने अपनी क़लम बेचकर सिर्फ़ विज्ञापनों को ही ताक़त मान लिया है. अगर किसी ने असलियत दिखाने की कोशिश भी की तो हमारी आंखें करोड़ों के सपनों से चुंधियाई जाएगी. किश्तों में सपने बेचने वाले हमको चैन से सोचने का मौक़ा नहीं देंगे. सारा तामझाम खड़ा किया जाएगा जो व्यवस्था नहीं तक़दीर बदलने पर ज़ोर देगा. हम सिमट जाएंगे और व्यवस्था से बेख़बर होकर अपनी ही तक़दीर बदलने में जुट जाएंगे…हम अपनी औक़ात जानते हुए उनके चहेते तो नहीं बन सकेंगे लेकिन चाटुकार ज़रूर बन जाएंगे. हम आज सब्ज़ी-परचून बेचते हैं, कल रिलायंस वाले हमें अपनी दुकान पर काम देंगे बशर्ते कि हम टाई-सूट पहनना सीख जाएं. हम आज सरकारी कर्मचारी हैं लेकिन कल हम हायर एंड फ़ायर के शिकार भी बनेंगे. हम आज पत्रकार हैं… कल हम भांड भी बनेंगे.

32 Responses

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  1. दशहरा मुबारक said, on October 9, 2008 at 5:24 pm

    [...] और फिर नीरज दीवान का बड़ी मेहनत से लिखा विचारोत्तेजक लेख प्रकाशित हुआ तो मुझे एक बार फिर यह लेख [...]

  2. [...] और फिर नीरज दीवान का बड़ी मेहनत से लिखा विचारोत्तेजक लेख प्रकाशित हुआ तो मुझे एक बार फिर यह लेख [...]

  3. [...] और फिर नीरज दीवान का बड़ी मेहनत से लिखा विचारोत्तेजक लेख प्रकाशित हुआ तो मुझे एक बार फिर यह लेख [...]

  4. [...] [सुपरिचित कथाकार अखिलेश का नाम हिंदी कथा पाठकों के लिये जाना-पहचाना नाम है। उनकी कहानी चिट्ठी में देश के तमाम पढ़े-लिखे युवा अपने को या अपने परिवेश को किसी न किसी न रूप में मौजूद पाते हैं। अखिलेश का एक आत्मक्थ्य नुमा लेख मेरे पसंदीदा लेखों में हैं। प्रख्यात साहित्यिक कथापत्रिका, ‘कथादेश’, के फरवरी २००० के अंक में प्रकाशित यह लेख पत्रिका के नियमित स्तम्भ ‘मैं और मेरा समय’में छ्पा था। इस स्तम्भ के अंतर्गत प्रसिद्ध लेखकों के अपने समय के बारे में अनुभव व विचार प्रस्तुत किये जाते हैं। हिंदी ब्लाग जगत में जब सृजन शिल्पी के एक लेख पर संजय बेंगाणी पर की टिप्पणी पर लेख उस पर अमित का लेख और फिर नीरज दीवान का बड़ी मेहनत से लिखा विचारोत्तेजक लेख प्रकाशित हुआ तो मुझे एक बार फिर यह लेख बहुत याद आया। इसलिये मैं अखिलेशजी के इस लेख को यहां प्रस्तुत कर रहा हूं। आशा है कि लेख अपनी पर्याप्त लंबाई के बावजूद आपको पढ़ने और सोचने के लिये मजबूर करेगा] अखिलेश [...]

  5. rachana said, on November 17, 2006 at 9:14 pm

    विचार देने वाला एक बेहतरीन लेख.क्या ये सब बदलने के उपाय रह ही नही गये हैं?

  6. हितेन्द्र said, on November 17, 2006 at 3:37 pm

    “चाहता हूं निज़ाम ए कुहन बदल डालूं,
    मगर ये बात मेरे बस की नहीं.
    हम सब की बात है,
    दो-चार-दस की बात नहीं.”
    ये तो चौपाल सी लगी है यहाँ पर जहाँ हर कोइ पूछ रहा है, “पर कैसे?” अगली पोस्ट में तो आपको बताना ही पड़ेगा कि “कैसे?”
    यूँ हर व्यवस्था में मेरा मानना है कि पावर केंद्रित रहता है मुट्ठी भर लोगों के पास, फ़िर चाहे वो पोलितब्यूरो के सदस्य हों या चुनींदा कार्पोरेट। यह तो छीनने वालों पर है कि वो कैसे छीनना चाहते हैं और छीन लेने के बाद उसी पावर का कैसे पुनर्वितरण करना चाहते हैं।

  7. हितेन्द्र said, on November 17, 2006 at 3:29 pm

    “चाहता हूं निज़ाम ए कुहन बदल डालूं,
    मगर ये बात मेरे बस की नहीं.
    हम सब की बात है,
    दो-चार-दस की बात नहीं.”
    ये तो चौपाल सी लगी है यहाँ पर जहाँ हर कोइ पूछ रहा है, “पर कैसे?” अगली पोस्ट में तो आपको बताना ही पड़ेगा कि “कैसे?”

  8. संदीप कुमार said, on November 16, 2006 at 9:24 pm

    बेबाक किंतु संतुलित तरीके से लिखा है । मेरी राय में एस ई जेड का विरोध ठीक नहीं है किंतु ये ज़रूर देखा जाना चाहिए कि ग़रीब किसानों की ज़मीन का समुचित आंकलन कर उन्हें पहले भुगतान किया जाय । इसी तरह पांच सितारा स्कूलों से भी विरोध नहीं है लेकिन सरकारी ज़मीन लेकर शर्तों को भूल जाना अवसरवाद है । तीसरी बात यह है कि बोतलबंद पानी का भी विरोध नहीं है लेकिन बड़ी बड़ी मशीनें लगाकर पानी (राज्य की संपत्ति) निकालना और बेचना, ऊपर से उसकी क़ीमत तो ये कंपनियां अदा करती नहीं है – इन बातों पर मेरा विरोध है । इससे भूजल कमी होती है । इसी विषय पर आगे और भी लिखिए। इंतजार रहेगा। धन्यवाद

  9. Anurag said, on November 16, 2006 at 3:39 am

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  10. Monusoft said, on November 16, 2006 at 2:30 am

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  11. हिमांशु said, on November 16, 2006 at 2:25 am

    पानी की कमी, बिसलेरी की रेट और मेडिया के रेलमपेल बहुत हो गयी।
    अब ये बोलिये हम सब इसके लिये क्या कर सकते हैं और क्या कर रहे हैं। इंटरनेट, टीवी और अखबारों ने हमें बोलने को बहुत दिया और इस चक्कर में शायद हम या तो करना भूल गये या फिर उसके बारे में बात नहीं करते।

  12. नीरज दीवान said, on November 15, 2006 at 11:56 pm

    आपके आशीष, प्रेम और टिप्पणियों के लिए धन्यवाद. सहमति और असहमति के स्वरों के बीच शीघ्र ही अगला लेख लिखूंगा जिसमें आशा है कि असहमत पक्ष से उठे प्रश्नों का जवाब ढूंढने का प्रयास होगा.

    चाहता हूं निज़ाम ए कुहन बदल डालूं,
    मगर ये बात मेरे बस की नहीं.
    हम सब की बात है,
    दो-चार-दस की बात नहीं.

  13. अफलातून said, on November 15, 2006 at 7:21 pm

    तबका तुम्हारा-सँघर्ष बताएगा
    व्यवस्था के साथ हो या और कहीँ-
    यह सँघर्ष बताएगा.

  14. पंकज बेंग़ाणी said, on November 15, 2006 at 3:30 pm

    “आभार.जहां हम शोषित हैं वहां शोषण दिखता है.जब हम शोषण करने वाले होते हैं-तब शोषण नहीं दीखता.एक छोटा तबका निश्चित तौर पर लाभ पा रहा है,उन्हें क्यों दिखेगा ,अन्याय? ”

    आप कौन से तबके के हैं मालिक? छोटे के या बडे के?

    क्या आपको और हमको दिख रहा है अन्याय? अब हम क्या कर रहे हैं? यह भी सोचें. मैं यही कहना चाहता हुँ, नेताओं की तरह भाषण देना ज्यादा सरल है, उपाय खोजने के।

  15. अफ़लातून said, on November 15, 2006 at 2:43 pm

    नीरजभाई,
    आभार.जहां हम शोषित हैं वहां शोषण दिखता है.जब हम शोषण करने वाले होते हैं-तब शोषण नहीं दीखता.एक छोटा तबका निश्चित तौर पर लाभ पा रहा है,उन्हें क्यों दिखेगा ,अन्याय?

  16. प्रियंकर said, on November 15, 2006 at 12:59 pm

    सुकरात ने नैतिक मूल्यबोध और बेचैनी से रहित व्यक्ति को ‘संतुष्ट सुअर’ की संज्ञा दी है . सामाजिक और राष्ट्रीय महत्व के मुद्दे पर चोंच खोलने के पहले मध्यवर्ग का सुखी-संतुष्ट व्यक्ति यदि थोड़ा सोच-विचार कर ले तो फ़ोकट की फ़जीती क्यों हो . कुतर्क से तथ्य और सत्य नहीं बदलते. विकास का मतलब है सबको शिक्षा-स्वास्थ्य और आवास . विकास का अर्थ है सबको समान अवसर . विकास का अर्थ है सबकी अनिवार्य आवश्यकताओं का पूरा होना . पर कई एकआयामी लोग विकास का अर्थ सिर्फ़ फ़्लाईओवर,मॉल, मल्टीप्लेक्स और उपभोक्ता सामानों के अम्बार से लेते हैं . उनकी समझ पर तरस ही खाया जा सकता है .यह अश्लील जीवनशैली वाले सम्पन्न उच्चवर्ग की ओर लोलुप निगाहों से ताकता अवसरवादी मध्यवर्ग है जो वैसा ही बनने की लालसा रखता है. यह वर्ग सोचता है कि तथाकथित विकास के नाम पर हो रही लूट में थोड़ी-बहुत हिस्सेदारी उसकी भी हो. हालांकि उसके हाथ तलछट ही आती है,पर वह उससे ही संतुष्ट है.अपने से संपन्न के आगे रिरियाओ और अपने से कमजोर को लतियाओ,यही इस वर्ग का मूल मंत्र है. और रहा देश तो वह भाड़ में जाए. देश ने हमें दिया ही क्या है. हम आज जो भी हैं अपने बल पर पर हैं. इस तरह की सोच वाले वर्ग से किसी गम्भीर विमर्श की उम्मीद करना बेकार है .

  17. नितिन बागला said, on November 15, 2006 at 12:50 pm

    अत्यन्त विचारोत्तेजक !!!!

  18. आशीष said, on November 15, 2006 at 11:53 am

    निरज भाई,

    आपका एक पत्रकार की दृष्टीकोण से लेख अच्छी है लेकिन संजय भाई के द्वारा उठाये गये सवाल अभी भी अपनी जगह है -

    मैं यह नहीं समझ पा रहा हूँ की पेप्सी का विरोध करने से क्या सबको पानी मिल जाएगा या फिर पाँच सितारा स्कुलो को रोक कर सबको शिक्षा मिलना तय हो जाएगा?

    इन सवालो का जवाब आपकि पोष्ट नही देती है। आक्रोश व्यक्त करना अपनी जगह सही है, लेकिन समस्याओ का समाधान इससे नही होता, ना समाधान सुझाने से होता है। समाधान होता है इसके क्रियान्वन से।
    हममे से कितने लोग है जो राजेन्द्रसिंह का नाम जानते है ?
    कितने लोग है जो पानी के संरक्षण मे योगदान देते है ? कितने लोग है जो घर मे शावर की जगह मग्गे से नहाते है। शुरूवात तो कहीं से करनी होगी, घर से बेहतर कौनसी जगह होगी ?

  19. anil sinha said, on November 15, 2006 at 11:24 am

    impressed. keep going. take care
    anil sinha

  20. SHUAIB said, on November 15, 2006 at 11:07 am

    दिल को छूलेने वाला लेख है। इस लेख पर कुछ टिप्पणी लिखने के लिए मेरे पास अलफाज़ नही – बहुत बढिया लिखा है नीरज भाई।

  21. संजय बेंगाणी said, on November 15, 2006 at 10:14 am

    नीरज भाई इतना लिखना है की टिप्पणी की जगह तथा समय दोनो ही कम पड़ रहे हैं. आपके लेख को समर्पित प्रविष्टी जल्दी ही लिखने का प्रयास करूंगा.
    अच्छा लिखा है. एक पत्रकार के दृष्टिकोण से देखे तो अतिउत्तम. बधाई.

  22. nitin said, on November 15, 2006 at 9:40 am

    बहुत ही बढिया लेख है, बधाई

  23. पंकज बेंग़ाणी said, on November 15, 2006 at 9:20 am

    आपने अपनी बात बहुत सही ढंग से रखी है।

    पर उपाय भी तो बताइए। यहाँ हम सिर्फ सवाल ही सवाल खडे कर रहे हैं। हल कोई नहीं ढुंढता। जिस सरकार को ढुंढना चाहिए वो भी नहीं।

    क्योंकि किसी की भी प्राथमिकता इन प्राथमिक समस्याओं को लेकर है ही नहीं।

    मेरा अभी भी मानना है कि पाँच सितारा विद्यालयों के अस्तित्व में होने का असर सामान्य प्राथमिक स्कूलों पर नहीं पड सकता, बशर्ते सरकार की सोच मजबुत हो, और सरकारी विद्यालय स्तर के हों। यह हो सकता है पर होता नहीं। क्योंकि सरकारी शिक्षकों को पता है कि उन्हे कोई निकाल नही सकता चाहे पढाएँ ना पढाएँ।

    यह मेरा निजि अनुभव रहा है, क्योंकि मेरी शिक्षा किसी पाँच सितारा अंग्रेजी विद्यालय में ना होकर सरकारी विद्यालय में हुई थी जहाँ शिक्षक होते थे, बस होते ही थे, करते कुछ नही थे।

    पेयजल की समस्या भी दूर हो सकती है, पर कुछ करने का माद्दा तो हो पहले! वर्षा का पानी युँही बह जाता है, क्यों? इससे तो हमारे गाँववाले अच्छे थे, एक बुन्द भी व्यर्थ नहीं जाती थी। आज भी वहाँ वर्षा का पानी सिधे जमीन में बने कुण्ड मे जाता है। शहरों में होता है ऐसा?

    सिर्फ विरोध करने से बात नही बनती। हम खुद क्या नेताओं से कम हैं जो सिर्फ भाषण देना जानते हैं। हम करते क्या हैं, समाज के लिए? कुछ नहीं।

    पहले खुद तो कुछ करें। पूंजीपतियों की कारस्तानीयों, सरकार की नाकामीयों, वामपंथियों की नितियों, दक्षिणपंथीयों की फुलझडियों से निबट सकते हैं, पर क्यों ना हम यह सोचें की सार्थक क्या कर सकते हैं?

    एक अनपढ को पढा नहीं सकते क्या हम? कम से कम अपनी सोसाइटी में पानी के अपव्यय को रोक नहीं सकते क्या हम? मार्ग में थुकने वाले को, कचरा फैलाने वाले को रोक नहीं सकते हम? पत्थर हटा नहीं सकते हम?

    पहले खुद को कुछ करें।

    मैं इसको पोस्ट के रूप में भी टंकित कर रहा हुँ।

  24. मनीष said, on November 15, 2006 at 8:59 am

    जबरदस्त हुजूर, जबरदस्त! बहुत दिनों बाद ऐसा विचारोत्तेजक लेख पढ़ने को मिला है ।

  25. दोषी कौन ….. ??

    ….. आप बताईये!!

  26. जगदीश भाटिया said, on November 15, 2006 at 1:28 am

    नीरज भाई, बहुत अच्छा लिखा है। मगर मुन्ना सर्किट मसखरी से बाज नहीं आ रहे। :)

  27. [...] “हैलो सरकिट,” “अरे मुन्नाभाई कैसे हो, अब तो तुम्हे बहुत टाईम हो गया चिट्ठा गिरी करते। क्या समाचार हैं चिट्ठा जगत के? ” “अरे कुछ मत पूछ सरकिट, इदर पानी और कोक को लेकर लफड़ा हो गया।” “अरे क्या मुन्ना भाई ! पानी और कोक? अरे दारू पीने का और मस्त रहने का। क्या?” “चुप्प ! दारू का नाम नहीं लेने का ! ये जगदीश भाटिया का ब्लाग है, अभी आ गया तो भोत पिटायी करेगा तेरी। वो तो क्या हुआ कि संजय भाई की एक टिप्पणी से अपने नीरज भाई की भावना को चोट लग गई।” “भाई ये भावना कहां रहती है? ” “अरे रास्कल ! भावना बोले तो विचार ! फीलिंग ! नीरज भाई बोला कि गरीब के वास्ते साफ पानी, एजुकेशन और मेडिकल सर्विस के लिये सरकार को ज्यादा बजट देना चहिये।” “तो भाई इसके लिये सरकार के पास और पैसा किदर से आयेंगा?” “जब टाटा, बिड़ला और अंबानी और इनके जैसी हजारों कम्पनियां ज्यादा मुनाफा कमा कर ज्यादा टेक्स देंगी।” “वो कैसे होगा भाई? ” “जब अधिक से अधिक लोग कोक पेप्सी पीयेंगे, रिलाईंस के मोबाईल खरीदेंगे। नये नये मॉल और एसईज़ेड बनेंगे। पता है सरकिट, इस बार मैं लाईब्रेरी में चाईना की इकोनॉमी स्टडी कर रहा था। वहां का एक एसईजेड ही इतना एक्सपोर्ट कर देता है जितना अक्खा इंडिया भी नहीं करता। और वहां खाली पड़ी बंजर जमीनों पर नये नये कई एसईजेड बन गये हैं जिनके आसपास कई नये शहर बस गये हैं और यह सब हुआ सिर्फ पिछले सात आठ सालों में। उनके एक बैंक की टर्नओवर हमारी अक्खी कंट्री की बैंकिंग ईंडस्ट्री से पांच गुना ज्यादी है। अपनी सरकार को भी कुछ ऐसाइच करना चाहिये। इससे सबको साफ पानी मिल जायेंगा भाई?” “यह तो मुझे पता नहीं मगर इतना जानता हूं कि सरकार अकेली किस किस को नौकरी देगी और किस किस की गरीबी दूर करेगी? रिलायंस के रिटेल आउटलेटस अगर लोगों को नौकरी देते हैं तो क्यों न खुलें?” “पर भाई हमारा कोई अपना सामाजिक इकोनॉमिक मॉडल भी तो होगा जो चाईना से अलग हो?” “हां, हमारा है समाजवादी पूंजीवाद और उनका है पूंजीवादी समाजवाद !” “है ! ! ! ! ! ! ! ! ! ! ! ! ! ! इसमें क्या फर्क है भाई?” “पता नहीं सरकिट !” [...]

  28. bhuvnesh said, on November 15, 2006 at 12:56 am

    दीवानजी वाकई एक पत्रकार के नजरिए से किया गया आपका विश्लेषण शानदार है
    बधाई

  29. समीर लाल said, on November 14, 2006 at 11:47 pm

    बढ़िया लिखा है, विचारणीय. बधाई.

  30. अनूप शुक्ला said, on November 14, 2006 at 11:20 pm

    बहुत अच्छा लेख लिखा है.बधाई.

  31. [...] क्या पेप्सी का विरोध करने से सबको पानी मिल जाएगा? या फिर पाँच सितारा स्कूलों को रोकने से सबको शिक्षा मिलना तय हो जाएगा? सवाल बेमानी नहीं हैं. इनके जवाब में नीरज का कहना है कि बात इतनी सीधी नहीं है. जवाब ज़रा लम्बा है, पर पढ़ जाइये, अपना मुद्दा उन्होंने असरदार ढंग से रखा है. जो लोग शीतलपेय के विरोध में हैं वे कुछ नहीं कर सकते. हां, यह सच है! क्योंकि ब्यूरो ऑफ़ इंडियन स्टैन्डर्ड ने संसदीय समिति के निर्देशों के अनुरूप इन दो सालों मे शीतलपेय के मानक ही निर्धारित नहीं किए हैं. इन्ही ख़ामियों के चलते कंपनियां कोर्ट के सामने आसानी से बचकर निकल जाती है. सरकारी सुस्ती प्रायोजित होती है ताकि कंपनियों को फ़ायदा मिलता रहे. मज़ाल है कि कोई कोर्ट उनके कामों को ग़ैर वाजिब ठहरा सके. पश्चिम में इसे Crony Capitalism कहा जाता है. प्रसिद्ध लेखक गिरीश मिश्र इसे हिन्दी में ‘’चहेतों का पूंजीवाद‘’ कहते हैं. […] चाणक्य का कहना था कि ‘’राजा जब व्यवसाय करने लगे तो समझो राज्य की प्रजा का बंटाधार होने वाला है‘’ आज राजनीतिक ग़ुलामी के दिन नहीं है लिहाज़ा हमें अपना देश आज़ाद, अपने नेता और अपना शासन दिखाई देता है..किंतु नई वैश्विक व्यवस्था आर्थिक साम्राज्यवाद की है. यदि यह खुली आंखों से दिखाई नहीं दे रही है तो समझें कि दिखाने वाला मीडिया चंद मज़बूत हाथों की कठपुतली बन चुका है. [...]

  32. प्रतीक पाण्डे said, on November 14, 2006 at 10:00 pm

    बहुत बढिया… आँखें खोलने वाला लेख है। आपने ठीक मर्म पर चोट की है। नहीं तो लोग हमेशा शब्दों में उलझकर भावनाओं में बह जाते हैं और अपने-अपने ‘वादों’ को तर्कयुक्त ठहराने का यत्न करने लगते हैं।


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