कीबोर्ड का सिपाही

मल्टीप्लैक्स कहानियां परोसता सिनेमा

Posted in सिनेजगत by neerajdiwan on November 5, 2006

आमतौर पर नई फ़िल्में देखने के लिए थियेटर जाना ही पसंद करता था. इन दिनों मल्टीप्लैक्स जाता हूं जहां कम से कम तीन स्क्रीन ज़रूर होती हैं. जब से नोएडा आया हूं तब से फ़िल्म देखने मल्टीप्लैक्स ही जा सकता हूं क्योंकि सिंगल स्क्रीन थियेटर यहां नहीं है. घर से दस मिनट की दूरी पर एक सिंगल स्क्रीन थियेटर तो है किंतु यहां या तो द्विअर्थी भोजपुरी या फिर निरर्थक चित्रपट (अश्लील) लगा होता है जो नहीं झेला जा सकता. मजबूरन, अपन डेढ़ सौ रुपए की टिकट ख़रीदकर फ़िल्म देखते है जहां पॉपकॉर्न 55 रुपए और बर्गर की क़ीमत 30 रुपए से कम नहीं होती. मल्टीप्लैक्स वालों की इस मनमानी वसूली पर टीवी चैनलों और दैनिकों में कई ख़बरें आ चुकी हैं लेकिन जब तक इन्हें प्रशासन का आशीर्वाद है तब तक कुछ नहीं होने वाला. पता चला है कि इन मल्टीप्लैक्स वालों को किसी छोटे शहर के सिंगल स्क्रीन थियेटर वालों से भी कम मनोरंजन कर देना होता है. इन मॉल्स को सरकार ने पनपते उद्योगों की श्रेणी में रखा है और ज़मीन से लेकर मनोरंजन करों तक छूट ही छूट होती है. इसे टैक्स हॉलीडे कहा जाता है. यानी आम जनता से कोसों दूर मनोरंजन के ये केंद्र नवधनाड्य और उच्च वर्ग के लिए तफ़रीह का अड्डा बन गए हैं. दूसरी तरफ़ सिंगल स्क्रीन थियेटरों के लिए ऐसी कोई छूट नहीं होती. सिंगल स्क्रीन वाले सत्तर से अस्सी फ़ीसद मनोरंजन कर चुकाते हैं. 

मल्टीप्लैक्स अब ऐसे वर्ग को जन्म दे रहा है जो यहां अपने आने-जाने को स्टेटस सिंबल मानता है. यह वर्ग किसी भी क़ीमत पर शान से ज़ेब से पैसे निकालता है और टिकट, ठंडा, पॉपकॉर्न लेकर अंदर चला जाता है. इस नीश क्लास के लिए सिनेमा भी उसी कोटि का बनता है. इस वर्ग का आका एनआरआइयों के बीच पनप रहा वह वर्ग है जो शाइनिंग इंडिया की तस्वीर देखना और दिखाना चाहता है. इसके लिए माल आपूर्ति का ज़िम्मा यशराज फ़िल्म्स, मुक्ता आर्टस, धर्मा फ़िल्म्स की कारपोरेटिया हस्तियों ने संभाल लिया है. जो विवाहेत्तर संबंधों को भारतीय सामाजिक कसौटी पर खरा उतारने की कुचेष्टा करने वाली कभी अलविदा ना कहना बनाते हैं और चोरी-डकैती में लिप्त अनायकों को महिमामंडित करने की धूम मचाते हैं. इनकी फ़िल्म का एनआरआई नायक पश्चिमी दुनिया की स्वावलंबी नारी से दूर भागता है और भारत आकर उस भोली-भाली वधु की आकांक्षा करता है जो तमाम उम्र उसके चरणों में ज़िंदगी गुज़ारने के लिए अपनी मंजूरी दे सके. सिनेमाई सत्य है कि लेपटॉप थामे इक्कीसवीं सदी के इस नायक के दिल में भी बीसवीं सदी की भारतीय पतिव्रता नारी की मनोकामना होती है. परदे पर नायक की इस कामना पर चतुराई से स्वदेश प्रेम मुलम्मा चढ़ा दिया जाता है. और असल ज़िंदगी का सच यह है.  

विषयांतर ना हो इसलिए फ़िल्मी फ़्लैशबैक में चलें. यशराज बैनर की फ़ना और इसके बाद की कुछ फ़िल्मों के प्रदर्शन पर डिस्ट्रीब्यूर्टरों से ज़्यादा मल्टीप्लैक्स के साथ विवाद खड़े हुए हैं. कारपोरेट जगत की उन तमाम हस्तियों का, जिनका ज़िक्र ऊपर में किया गया है, के लिए फ़िल्म बनाने का मकसद पैसा कमाना है. यह प्रवृत्ति बुरी नहीं है किंतु पैसा बटोरना अगर लक्ष्य बनता है तो विभिन्न टेरेटरी (क्षेत्र) का परफ़ॉर्मेंस नहीं देखा जा रहा है. आम भारतीयों की पसंद या नापसंद को नहीं देखा जाता बल्कि फ़िल्म की लांचिग से ही म्यूज़िक राइट्स, ओवरसीज़ राइट और देश के कुछ मल्टीप्लैक्सों से आने वाली मोटी कमाई ध्यान में होती है. यह पैसा बरसाने वाला सौदा न सिर्फ़ लाभकारी है बल्कि़ ये रईस घराने आज मीडिया तक अपनी बात भी तेज़ी से रख सकते हैं और जमकर प्रचारित करवाते हैं. अंत में कस्बों और छोटे शहरों में रहना वाला आम भारतीयों का भारत इसी तर्ज पर अपनी बुद्धि से इसे सच मानकर फ़िल्म को और ज़्यादा कामयाब बनाता है. ऐसे फ़िल्मकारों के लिए सुविधा यह होती है कि उन्हें देश के भीतर की बजाय अपना ध्यान देश के बाहर रह रहे उस धनाड्य वर्ग की ओर आकृष्ट करना है जो अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस है और अपनी पसंद-नापसंद को पलभर में संप्रेषित कर देता है. यह सुगठित और आधुनिक तंत्र फ़िल्मकार को इंटरनेशनल फ़ेम दिलाने और डबिंग-रिमेक, रिंगटोन, स्टेज शो के ज़रिए भी बाज़ार बनाकर देता है.  

कुछ लोगों का मानना है कि ओवरसीज़ राइट और मल्टीप्लैक्स के भरोसे फ़िल्म हिट करा लेना बुरा नहीं है. वे अपने मत के समर्थन में कभी अलविदा ना कहना और डॉन जैसी फ़िल्मों का उदाहरण देते हैं जो भारतीय बाज़ार की बजाय समन्दर-पार सफलता दर्ज करा रही हैं. मैं यह नहीं मानता कि फ़िल्में हिट कराने के लिए ओवरसीज़ मार्केट का ही आसरा लिया जाए. पायरेसी के ख़िलाफ़ कडा क़ानून तमिलनाडु में जयाललिता लेकर आईं थीं. तब से वहां पायरेसी करना दुरूह हो चला है. इस राज्य में सिंगल स्क्रीन थियेटर्स बड़ी तादाद में हैं जहां आम तमिलभाषी बड़े चाव से अपने नायक-नायिकाओं की फ़िल्में कई-कई बार देखते हैं. ताज़ा आंकड़े कहते हैं कि देश के साठ फ़ीसद सिनेमाघर दक्षिणी राज्यों में हैं.चंद्रमुखी गुज़रे साल की इतनी बड़ी हिट रही कि इसने सौ करोड़ से ऊपर का कारोबार किया. आपको शायद हैरत होगी कि इस वक़्त रजनीकांत सोलह करोड़ रुपए लेने वाले देशभऱ के फ़िल्मी नायकों मे अकेले स्टार हैं. हिन्दी फ़िल्म सितारों की कमाई इसकी आधी तक ही पहुंच पायी है. दक्षिण की फ़िल्में तकनीकी तौर पर आम मुंबइया फ़िल्मों से बेहतर होती हैं. यहां नायक-नायिकाएं ईश्वर की तरह पूजे जाते हैं. ज़्यादातर फ़िल्में आमजन के जीवन को छूती हैं जहां आपको नायक लुंगी में भी नज़र आता है. अधिकांश फ़िल्मों में गांव-कस्बों के दृश्य दिखाई पड़ते हैं.  

मल्टीप्लैक्स जाना मेरी मजबूरी है. यहां से बीस किलोमीटर दूर सिनेमाघर जाने के लिए मुझे वक़्त और कुछ पैसे अलग से देने होंगे जो तक़लीफ़ देता है. इस मल्टीप्लैक्स मजबूरी के सामने झुकना भी गवारा ना हो तो एक ही चारा बचता है पायरेसी का… जितने रुपयों में मैं मल्टीप्लैक्स की चमचमाती दुनिया का आनंद उठाता हूं उतने में मुझे पांच फ़िल्मों की सीडी आसानी से घर से सौ क़दम की दूरी पर मिल जाती है. लेकिन सोचता हूं कि क्या पायरेटेड फ़िल्म देखकर मैं समाज का और फ़िल्मोद्योग का नुकसान तो नहीं कर रहा हूं? हालांकि फ़िल्मोद्योग का तो भला मेरे करने या ना करने से नहीं होगा.. अलबत्ता समाज का बुरा इसलिए होगा क्योंकि पायरेसी का पूरा धंधा भारत-विरोधी ताक़तों के हाथों में है. सदफ़ के सीडी कारोबार की नकेल दाउद इब्राहिम और छोटा शकील जैसे गैंगस्टर के हाथ में हैं. इस जालसाज़ी के धंधे में भी टेरेटरी दी जाती है, पाकिस्तान इसका गढ़ है जहां से सीडी और डीवीडी अरब और यूरोप के बाज़ार में भेजी जाती है.  

देश में 16 हज़ार थियेटर हैं इनमें मल्टीप्लैक्स की तादाद बमुश्किल पांच सौ तक ठहरती है. एक तरफ़ तमिल-मलयालम राज्यों में सिनेमा के लिए दीवानगी है और वहां का सिनेमा मिट्टी की सुगंध लिए आम जनता के बीच पल रहा है. तो दूसरी तरफ़ हिन्दी सिनेमा ओवरसीज़ और मल्टीप्लैक्स के भरोसे पर ही करोड़ो के वारे-नारे कर रहा है. बावजूद इसके कि तीन हज़ार करोड़ के इस उद्योग को सालाना एक हज़ार करोड़ नुकसान पायरेसी से ही होता है.  अब किसी हृषिकेष मुखर्जी, मोहन कुमार, विमल कुमार का फ़िल्म बना लेना और उसे हिट करा लेना टेढ़ी खीर साबित हो गया है. समूचा मीडिया इन्ही कारपोरेट हस्तियों के लपेटे में है जो अलविदा.., डॉन, मोहब्बतें सरीखी सतही फ़िल्मों को हिट करा देता है और स्वदेश, मंगल पाण्डेय या उमराव जान पिटवा देता है. पहले ही दिन से ऐसे रिव्यू छपते हैं मानों सब कुछ रणनीति के तहत किया जा रहा हो. कोई बताए कि डॉन में भला क्या है जो अमिताभ की डॉन से ज़्यादा बेहतर हो? यदि तुलना ही जा रही है तो नई डॉन क्यों आगे बढ़ जाती है और नई उमराव जान पर लोग बरसते हैं? बेशक़ दोनों पुरानी कहानियां अपने दौर की हिट फ़िल्में थीं लेकिन इस दौर में बनी एक हिट तो दूसरी पिट रही है. यह दौर बाज़ार का है, हिट कराने की मार्केटिंग का है. ऐसे दौर में आम भारतीय की आवाज़ बनने वाला नायक परदे पर दिखाई नहीं देता. ऐसी आवाज़ नहीं आती जो श्रम की महत्ता प्रतिपादित करे. अलबत्ता मिनटों में करोड़पति बनने का सपना देखने वाले मालामाल वीकली और हेराफेरी के नायक उछलकूद करते हिट नज़र आते हैं. ये बाज़ार का ही दौर है जहां यशराज बैनर श्रमेव जयते का अलख जगाने वाली फ़िल्म काला पत्थर से 21वीं सदी में आकर चोर-लुटेरों की फ़िल्म धूम लेकर आता है. कारपोरेट कलेवर में बंध रही फ़िल्म इंडस्ट्री के ख़तरे तब और गंभीर हो जाएंगे जब नायकों को दूना-तिगुना मेहताना देकर सालों तक बुक कर लिया जाएगा. यह फ़िल्म जगत के छोटे-मोटे फ़िल्मकारों में हताशा को जन्म देगा.

नैतिकता और सामाजिक प्रतिबद्धता को बिसरा चुके इन कारपोरेटिया हस्तियों की फ़िल्में देखना मैं ज़रूरी नहीं समझता. इसलिए मल्टीप्लैक्स नहीं जाता लेकिन अच्छी फ़िल्में इन नामी थियेटरों का जब मुंह तक नहीं देख पाती तो मैं वंचितों की कगार में आ जाता हूं और मन मसोसकर रह जाता हूं. क्योंकि मैंने वो दौर देखा है जब गोलमाल, रंग बिरंगी, चश्मे बद्दूर, किसी से ना कहना, खूबसूरत, झूठी, जाने भी दो यारों, रजनीगंधा, नरम गरम जैसी छोटे बजट की लेकिन आम भारतीय के जीवन पर बनी फ़िल्में भी थियेटरों में प्रदर्शित होती थीं.  इन दो सालों में मातृभूमि, रेनकोट, डोर, 15 पार्क एवेन्यू सरीखी फ़िल्मों को मल्टीप्लैक्स के दर्शन भी नहीं हुए. दूसरी तरफ़ सिंगल स्क्रीन थियेटरों में वे फ़िल्में लगती हैं जो पहले ही महानगरों में हिट हो जाती हैं. लिहाज़ा समानांतर सिनेमा कही जाने वाली फ़िल्में या तो सिर्फ़ टीवी पर दिखती हैं या फिर इनके पायरेटेड सीडी बाज़ार में बहुत बार कहने-बोलने पर मिल पाते हैं. बची-खुची कसर आंचलिक सिनेमा पूरी कर देता हैं जो सिंगल स्क्रीन थियेटरों में जनता के बीच पैठ बनाता जा रहा है. हिन्दी जगत का वो दर्शक जो सिनेमा को बोलियों में सिमटता नहीं देख सकता या चमक-दमक वाले मल्टीप्लैक्स कल्चर के छलावे में नहीं आता.. वो हाथ मलता रह जाता है तब वो भी पागलपन के दौरे में ज़ोर-ज़ोर से गाने लगता है.. धूम मचाले धूम मचाले धूम..

9 Responses

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  1. jayesh said, on October 20, 2008 at 5:44 pm

    Okay… i know you are an anglophobe, but i am much more comfortable in this language….. and thats not all that seperates us. See, i have seen Hyderabad blues, 15 Park avenue, raincoat, iqbal, dor, taare zameen par, and several other movies that would never have succeded in any single theatre. The beauty of multiplexes is that there are smal theatres, and can run with a very small clientele. As far as movies in 80’s are concerned, if you want me t give you a list of films that were superhit in 80’s and utterly horrible, i’d be glad to do so. Just reserve a few hunde=red pages worth of space. Similarly, the entire 70-90’s were spent with the “meaningful” cinema being sidelined and ignored my the public. What was superhit was not “mrigaya”, but “himmatwala”. The people you call eo-rich are profesionals like me who want an intelligent film, and entertainment thats not based on melodrama. Is that so wrong? I have rarely met a friend in a multiplex, simply because they are so large. I don’t go there for “status” of to be seen, i go there because i like watching a movie in a comfortable seat, where i dont have to sweat, nor ask the peron in front of me to crouch so i cann see the screen. I also want quality picture and sound, and all this costs money. The popcorn is expensive because it is a part of the business model. Given the cost of making and running a multiplex, the tickets are not enough to make them profitable. (check a few sources to verify this statement. The multiplexes are a very low margin business. The are profitable in very long term)

    Above all, i can now atch movies that are not made for the lowest commo denominator. Remember the flop Silsila and super-hit Ram teri ganga maili? that was the world of 80’s. I dont want that world, i like this one better. By the way, no one forced me to watch dhoom, but i loved salaam namaste, and that would never be made in your golden 80’s.

  2. मैथिली said, on January 31, 2007 at 10:19 pm

    श्री नीरज दीवान जी;
    हम समाचारों से परे, हिन्दी रचनाओं की एक वेबसाईट (www.cafehindi.com) बना रहें हैं. इस वेबसाईट का उद्देश्य कोई भी लाभ कमाना नहीं है.

    यह दिखाने के लिये कि इस वेबसाईट का स्वरूप कैसा होगा, हमने प्रायोगिक रूप से कुछ लेख इस वेबासाईट पर डाले हैं
    क्या हम आपके ब्लोग रचनायें इस वेबसाईट पर उपयोग कर सकते हैं?

    उत्तर के इन्तज़ार में

    आपका
    मैथिली गुप्त
    maithily@cafehindi.com

  3. Shrish said, on November 24, 2006 at 2:25 am

    काफी विचारोतेजक लेख है। अच्छी फिल्में अब बननी लगभग बंद हो गई हैं, आजकल की फिल्में तीन घंटे देखकर आनंद उठाने के बाद याद रखने लायक नहीं होतीं।

  4. SHUAIB said, on November 7, 2006 at 2:51 pm

    पहले तो इस विषय पर आवाज़ उठाने के लिए आपका धन्यवाद।
    फिल्म रिलीज़ होने से पहले ही यहां दुबई मे पाकिस्तान से पेयरेटड सीडी और डीवीडी आजाती है। एक सच्ची बात ये है कि सब लोग इसे खरीदते हैं हालांकि ये गैरकानूनी है। क्योंकि यहां सिनेमा मे फिल्म देखने के Dhs 25 (300 रूपये) लगते हैं और पेयरेटड डीवीडी सिर्फ Dhs. 10 (120 रूपये) मे मिलजाती है।
    ताजुब की बात ये है कि फिल्म रिलीज़ होने से पहले ही पाकिस्तान मे सीडी तैयार बन जाती है।

  5. bhuvnesh said, on November 7, 2006 at 12:23 am

    नीरजजी बिल्कुल सटीक विश्लेषण है आपका।
    आज मीडिया का प्रचार तंत्र इतना हावी हो चुका है कि वो बड़े बैनरों की फ़िल्मों की तारीफ़ में ऐसे कसीदे गढ़ता है कि एक आम आदमी की आंखें चौंधिया जाती हैं और वो सम्मोहित हो उसे ही सच मानने लगता है।
    डॉन, फ़ना और कभी अलविदा….. जैसी बेहद घटिया और फ़ूहड़ फ़िल्मों को रिलीज होने से पहले ही हिट करा दिया गया। कुछ फ़िल्मकार कहते हैं कि दर्शक यही सब चाहते हैं पर जब दर्शक ये चाहते हैं तो फ़िर इस प्रकार की अंधाधुंध मार्केटिंग की क्या जरूरत फ़िल तो हिट हो ही जायेगी।
    शायद इसी सब का परिणाम है कि आज भोजपुरी सिनेमा की पैठ पंजाब तक के कस्बों में हो चुकी है। भले ही इन पर द्विअर्थी और घटिया सिनेमा रचने का आरोप लगे पर इनमें आम-जनजीवन तो झलकता ही है।

  6. reetesh gupta said, on November 6, 2006 at 6:43 pm

    नीरज भाई,

    बहुत सुंदर लेख है । जीवन में समस्याओं को सच्चाई और ईमानदारी से कहने का बहुत सराहनीय प्रयास है ।

    वैसे हम भी होशंगाबाद (म.प्र) के हैं । रोजी-रोटी के चक्कर में अमेरिका में पड़े हैं, माँ-बाप और सबकुछ होशंगाबाद है बस दिमाग को ढ़ोता शरीर अमेरिका में है ।

    रीतेश गुप्ता

  7. सागर चन्द नाहर said, on November 6, 2006 at 12:09 pm

    एक बार फ़िर से अच्छा लेख।
    आपने जब दक्षिण भारतीय फ़िल्मों का जिक्र किया तब आप शायद लिखना भूल गये कि तेलुगु फ़िल्मों के सुपर स्टार चिरंजीवी, नागार्जुन, वेंकटेश और महेश बाबू भी कई हिन्दी फ़िल्मों के सुपर स्टारों से ज्यादा मेहनताना लेते हैं। आश्चर्य की बात यह है कि तेलुगू या दक्षिण भारतीय़ फ़िल्मों के ज्यादातर नायक मोटे है जैसे जूनियर एन टी आर और मोहन बाबू आदि फ़िर भी इनकी ज्यादातर फ़िल्में हिट होती हिन्दी के अधपगले और मुछमुंडे चॊकलेटी नायकों की आधी फ़िल्में भी सफ़ल नहीं होती। जो फ़िल्म सफ़ल होती है उस के सफ़ल होने का कारण आप बता चुके हैं।
    पिछले साल निर्देशक प्रभू देवा ( सुप्रसिद्ध नृत्य निर्देशक) की फ़िल्म “नूवू ओस्ताना अंटे नेनू ओद्दाना अंटाना” सुपर हिट रही और ” चन्द्रमुखी” के बारे में तो आप लिख ही चुके हैं।यह फ़िल्म पूरी तरह से ग्रामीण परिवेश पर आधारित थी।

  8. सृजन शिल्पी said, on November 6, 2006 at 11:27 am

    नीरज जी, आपने मल्टीप्लेक्स थियेटरों और हिन्दी सिनेमा के कारपोरेटीकरण की हक़ीक़त को साफगोई से बेनकाब किया है। आज के दौर में बाजार ने सरोकारों को हाशिये पर धकेल दिया है और मीडिया एवं सिनेमा में सरोकारों के लिए अब बहुत कम जगह बची है। सिनेमा, जो एक जमाने में आम आदमी की आवाज को बुलंदी से रखने का एक सशक्त मंच हुआ करता था, अब आम आदमी के सरोकारों से लगातार दूर होता जा रहा है। बाजार का वर्चस्व स्थापित करने में मीडिया धुरी की भूमिका निभा रहा है। यही वजह है कि मुनाफे और ग्लैमर की गिरफ्त में फँसी पत्रकारिता की विश्वसनीयता दिनोंदिन कम होती जा रही है और ज्यादातर पत्रकार अब दलाल या एजेंट की भूमिका में नजर आते हैं।

  9. संजय बेंगाणी said, on November 6, 2006 at 11:01 am

    बहुत खुब निरजभाई. हम चाह कर भी ऐसा नहीं लिख पाते, क्योंकि हममे एक पत्रकार वाली काबलियत नहीं है. मल्टीप्लेक्ष का विरोध नहीं करता पर छोटे सिनेमागृह जिस तरह बन्द होते जा रहे है देख कर निराशा होती है. अपने शहर में भी हमे पैसे बचाने के लिए ओपन एयर थीयेटर की शरण में जाना पड़ता है.


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