सरकारी सुस्ती और चहेतों का पूंजीवाद

November 14, 2006 at 3:03 pm | In जहांनामा | 32 Comments

बीच बहस में- सत्ता की साज़िश और भूमंडलीकरण

 

दिनों भूमंडलीकरण पर बहस छिड़ी है. बहस की शुरूआत सृजनशिल्पी जी ने की जिसमें असहमति के स्वर छेड़ते हुए संजय जी ने टीप क्या मारी कुछ लोग नाराज़ हो गए. आप पूछेंगे कि सिपाही को कैसे पता चला? हुआ ये कि नारद ने जब बताया कि सृजनशिल्पी का नया लेख छपा है तो अपन उनके डेरे पर भागे और लेख पढ़ते-पढ़ते आखरी में संजय जी की टिप्पणी पढ़ी. अपना माथा ठनका कि ये क्या कहा संजय भैया ने? सृजन जी के लेख के अंतिम सिरे पर कुछ समाधान की बातें थी. उनका कहना था - हमें यह बताना होगा कि हम अपने संसाधनों के बल पर अपना विकास कर सकते हैं, हमें यह दिखाना होगा कि विकास और प्रगति का हमारा अपना भारतीय मॉडल है। हमें मँहगी विदेशी कारें नहीं, बल्कि सक्षम सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था चाहिए। हमें पेप्सी और कोकाकोला नहीं, बल्कि स्वच्छ पेयजल चाहिए। हमें पाँच सितारा निजी स्कूल और अस्पताल नहीं, बल्कि सबके लिए बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएँ चाहिए। 

संजय जी ने इसी पर अपना सवाल दाग़ा था, – मैं यह नहीं समझ पा रहा हूँ की पेप्सी का विरोध करने से क्या सबको पानी मिल जाएगा या फिर पाँच सितारा स्कुलो को रोक कर सबको शिक्षा मिलना तय हो जाएगा? सच पूछें दोस्तों तो मैं वो शख्स था जो इस टीप से राज़ी नहीं था. किंतु नाराज़ नहीं था क्योंकि इतने दिनों में लेख और टिप्पणियां पढ़ते-पढ़ते हम बहुत-से लेखकों के वैचारिक रुझान और दायरे और दिशाओं को समझ चुके होते हैं. फिर भी इसका सामूहिकीकरण करने से गुरेज़ रखता हूं क्योंकि यह मुझ जैसे के लिए बहुत कष्टकारी होता है कि मुझे कोई वाद के दायरे में सिमटाकर रख दे और फिर उसी वाद को निशाना बना-बनाकर लगातार मुझे उस वाद से पैदा हुए हर बुरे के लिए कोसता फिरे. जब मेरे लिए कष्टकारी हो सकता है तो यह मानकर चलता हूं कि बहुतों के लिए यह पीड़ादायक होता होगा. यूं भी मीडिया में रहने की वजह से वादों के चक्कर से निकलकर सभी को सुनने और पढ़ने का अवसर मिलता है और यह मेरे काम के साथ व्यक्तिगत रुचियों का भी अहम हिस्सा है. चिट्ठाकारी के चलते यह अब और अधिक सुलभ होता जा रहा है.  

संयोग से उसी वक़्त मौजूद सृजनशिल्पी से मेरी नेट पर बात हुई और मैंने कह दिया कि अंतर को समझे बिना की गई संजय जी की टिप्पणी मुझे ठीक नहीं लगी. जवाबन उन्होंने मुझे प्रतिटिप्पणी कर अपनी बात कहने का कहा. बात आयी-गयी हो गई. प्रियंकर जी और अमित जी तेज़ निकले और अपनी-अपनी बातें कह गए. समयाभाव के चलते मैं नहीं कह सका. यूं भी सभी के ब्लॉग पर टिप्पणी करना मुमकिन नहीं होता था. मैंने टिप्पणी नहीं दी और अब अपने विचार प्रकट करना ठीक समझा है.  वापस भूमंडलीकरण पर जारी बहस पर चलें. विचारधारा के तल पर दो परस्पर विपरीत बिंदुओं पर बात करने से बेहतर होगा कि तथ्यों पर जाएं. जिन तथ्यों, तर्कों और अनुभवों के आधार पर विचारधारा जन्म लेती है वहां जाकर देखना होगा कि इन तमाम चर्चाओं में मैंने क्या देखा? सवाल उठता है कि मैं संजय जी के सवाल पर हैरान क्यों हुआ था? बात लंबी नहीं है..बहुत छोटी सी है.. जिस पर पिछले कुछ लेखों में मैंने यही कहने की कोशिश की है. मज़े की बात यह कि जब मैं मल्टीप्लैक्स सिनेमा और सामाजिक सरोकारों को साथ जोड़कर कुछ कह रहा था तब बहुत-से लोग मेरे कहे से सहमत थे क्योंकि उनकी चिंता भी सामाजिक सरोकारों से पल्ला छुड़ाते फ़िल्मकारों को लेकर थी. उसी चर्चा का दूसरा बिंदु सरकारी चहेते बने मल्टीप्लैक्स मालिकों को मिल रहे फ़ायदे और छोटे सिनेमाघर मालिकों की मुश्किलों पर था. इसी तरह कुछ दिनों पूर्व परिचर्चा में उद्योगपतियों की राजनीति में हिस्सेदारी पर मैंने सवाल उठाए और पाठकों की सहमति भी मिली. यानी यह तो तय रहा कि हममें से बहुत-से लोग चिंतन के गहरे तल पर मेरी इन चिंताओं से अवगत हैं किंतु जब बात सीधे तौर पर समाधान की हो तो भेद खड़े कर लेते हैं. यह भेद क्या वाद-विशेष के प्रति आग्रह से आता है? क्या समाजवाद, पूंजीवाद, साम्यवाद जैसे शब्दों का सहारा लेकर हम अपनी राजनीतिक सोच को प्राथमिकता देने लग जाते हैं? नतीजतन, हम आगे उन्हीं शब्दों के वशीभूत सारे विचारों का बंटाधार कर बैठते हैं. सोच का यह स्तर हमें स्पेस नहीं देता और निरर्थक बहस खड़ी कर लेते हैं. जिनमें तथ्य कम और भाषण ज़्यादा होते हैं. राजनीतिक दलों के इतिहास ज़्यादा और आम इंसान पर बीत रहे वर्तमान से सामना कम होता है. 

बोतलबंद पानी पर चर्चा शुरू करता हूं. पानी आज शर्म की चीज़ बन गया है. बचपन में मुहावरा पढ़ा था- रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून. रहीम को क्या सूझी होगी कि पानी और इज़्ज़त दोनों को मिलाकर रख दिया. वे दूरदृष्टा थे क्योंकि अब कंपनियां हमें हमारी ही इज़्ज़त बेच रही हैं. संयोग है कि आज (मंगलवार) देश में गिरते भूजल स्तर और बोतलबंद पानी बेचने वाली कंपनियों पर लगाम लगाने के लिए सरकारी और ग़ैर सरकारी संगठनों की दो दिनी बैठक हो रही है. उस ख़बर को पढ़कर मुझे याद आया कि इसी तरह की कवायद संसद में दो साल पहले शीतलपेय कंपनियों पर लगाम लगाने के लिए भी की गई थी. जो लोग शीतलपेय के विरोध में हैं वे कुछ नहीं कर सकते. हां, यह सच है! क्योंकि ब्यूरो ऑफ़ इंडियन स्टैन्डर्ड ने संसदीय समिति के निर्देशों के अनुरूप इन दो सालों मे शीतलपेय के मानक ही निर्धारित नहीं किए हैं. इन्ही ख़ामियों के चलते कंपनियां कोर्ट के सामने आसानी से बचकर निकल जाती है. सरकारी सुस्ती प्रायोजित होती है ताकि कंपनियों को फ़ायदा मिलता रहे. मज़ाल है कि कोई कोर्ट उनके कामों को ग़ैर वाजिब ठहरा सके. पश्चिम में इसे Crony Capitalism कहा जाता है. प्रसिद्ध लेखक गिरीश मिश्र इसे हिन्दी में चहेतों का पूंजीवाद कहते हैं. सरकारें जब बिलियन-ट्रिलियन डॉलरों वाली कंपनियों के सामने घुटने टेककर नीतियां बनाती है तब हमें चहेतों का पूंजीवाद दिखाई देता है. इसे देखने और फिर समझने के लिए आंखें और दिमाग़ भी चाहिए होते हैं. कुछ इसी तरह की नीतियों के बारे में अपने फ़ोरम परिचर्चा में रिलायंस का ज़िक्र किया गया था. सृजन जी के चिट्ठे पर अतुल जी ने प्रसंगवश बेकटेल का ज़िक्र भी कर दिया. आपको अब पता होगा कि लातिन अमेरिकी देश बोलिविया का कोचाबांबा एक अर्धमरू इलाक़ा है. यहां पानी की बहुत किल्लत है. 1999 में विश्व बैंक ने सिफ़ारिश की कि कोचाबांबा को पानी आपूर्ति करने वाली सरकारी कंपनी का निजीकरण कर दिया जाए. इसके लिए सरकार ने बेकटेल नामक एक विशाल कंपनी को सरकारी स्तर पर काफ़ी रियायतें दी और उसी दौर मे सरकारी सबसिडी भी ख़त्म कर दी गई. नतीजतन, पानी का बिल बीस डॉलर प्रतिमाह तक पहुंच गया. इस शहर में न्यूनतम मज़दूरी सौ डॉलर से भी कम है. असंतोष भड़कना स्वाभाविक था. पानी के निजीकरण के ख़िलाफ़ जनता ने आंदोलन छेड़ दिया. इस पूरे आंदोलन के दौरान मीडिया और संगठनों तक पर पाबंदी लगी थी..लेकिन सरकार को अंततः झुकना ही पड़ा.  गर्मी में हम प्यास बुझाने के लिए कोका कोला या पेप्सी पीते हैं. उसके एक लीटर उत्पादन में दस लीटर पानी ख़र्च होता है. यह पानी उन इलाक़ों से आता है जहां खेती के लिए पानी नहीं मिलता. जब से मै नोएडा आया हूं देखकर परेशान हूं कि सोसायटी के नलों में पीने का साफ़ पानी नहीं आता. मज़े की बात यह कि यहां पानी भी उच्च-मध्यम और निम्न वर्गों में बंट गया है. बिसलेरी की बीस लीटर की बोतल साठ रुपए, उससे सस्ती चालीस और फिर तीस रुपए. कोई बताएं ये अल्ट्रावायलट रे, एन्टी बैक्टरिया ट्रीटमेंट वगैरह काहे का इलाज है? पानी भी ज़ात देखता है!! ये जात अमीरी-ग़रीबी की है. आप ऊंचे दर पर पानी ख़रीदेंगे तो ऊंचा स्टेटस समझा जाएगा.. यानी रहिमन पानी राखिए… इज़्ज़त बढ़ाएगा यह पानी. तेज़ी से हो रहा औद्योगिकीकरण और प्रायोजित सरकारी सुस्ती निजी कंपनियों के लिए उगाही के अवसर खोलते जाते हैं और मज़े की बात यह है कि हम इस खेल में उपभोक्ता बनने में गर्व का अनुभव करते हैं. हम भूल जाते हैं कि किसी ज़माने में हमारे यहां कहावत थी- खुश रहो, आबाद रहो, फ़र्रुखाबाद रहो. आब यानी पानी.. उन दिनों भी पानी से परिपूर्ण होने की कामना की जाती थी. तमाम मानव सभ्यताएं नदियों के किनारे बसीं और पल्लवित हुईं. अब नदियों के किनारे उद्योग पनपते हैं, खेत उजड़ते हैं और नदियां सूखती हैं. किसी ने सही कहा है कि आने वाला युद्ध ज़मीन नहीं पानी के लिए होगा. यहां दिल्ली में गर्मियों के दिन लोगों को पानी के लिए त्राहिमाम करते देखा ही करता हूं.  

हम क्यों चिंता करें प्याऊ घरों की घटती तादाद और बिककर टूटने वाली प्लास्टिक बोतलों से होने वाले पर्यावरण प्रदूषण की? क्या हमारे बाप पर कर्ज़ा था जो हम उतारेंगे? हम तो यूज़ एंड थ्रो पर यक़ीन रखते हैं. लिखो और फेकों वाली पेन से शुरू हुआ ये खेल अब रिश्तों को यूज़ एंड थ्रो मे तब्दील कर रहा है. टूटता है तो टूटने दो प्रकृति से हमारा रिश्ता!!  हम तो भूल ही गए हैं कि एक प्लास्टिक को डिकम्पोज़ होने में पांच सौ बरस लग जाते हैं. मैं, हिमांशु और आप तो नल का पानी पीकर बड़े हुए हैं. लेकिन अब ख़तरे खड़े कर दिए गए हैं जो पानी का गंदा और कम होना औद्योगिक प्रदूषण की वजह से कम और प्रायोजित ज़्यादा लगता हैं. ख़तरे जो इथोपिया में लार्वा की पैदावार बढ़ाकर मच्छरमार दवाइयां बेचने वाले खड़े करते हैं. ख़तरे जो नौकरशाहों को पैसे खिला सरकारी टेलीफ़ोन सेवा में प्रायोजिक सुस्ती कर निजी ऑपरेटरों ने खड़े किए. ख़तरे जो सरकारी डॉक्टरों के गांव में ना जाने की सनक पर खड़े होते हैं. ख़तरे जो खस्ताहाल हो रहे सरकारी अस्पताओं के बजाय डिस्काउंट का ऑफ़र देने वाले नर्सिंग होम्स खड़े करते हैं. ख़तरे जो अब चंदे देकर राज्यसभा पहुंच रहे कारपोरेटिया नेताओं ने संसद में खड़े कर रखे हैं.  कल ये ख़तरे हमें हवा में भी तब दिखाई देंगे जब कोई दैत्याकार कंपनी प्योर ऑक्सीजन चैंबर आपके घरों में लगाने का लुभावना स्लोगन सुनाएगी.  बेकटेल बहुत दूर की बात है. मैं अपने इलाक़े छत्तीसगढ़ का अनुभव बताता हूं. अजीत जोगी सरकार के दौर में रेडियस वॉटर नामक निजी कंपनी ने शिवनाथ नदी पर स्टाप डेम बनाकर इसके पानी पास के औद्योगिक क्षेत्र ग्राम-बोरसी की फ़ैक्ट्रियों तक बेचना शुरू किया. कंपनी ने स्टाप डेम तो बनाया ही लेकिन साथ में वे पूरी नदी को अपने बाप की समझ बैठे और किसानों को पानी लेने से रोकने लगे. इसका विरोध किया गया. कंपनी ने अपने पैर छत्तीसगढ़ से बाहर भी फैलाए. उन दिनों मैं उस विरोध का गवाह बना.. मुझे यह सोचने पर मजबूर होना पड़ा कि जब बिजली निजी कंपनियां दें, पानी निजी कंपनियां दें, नौकरी भी निजी कंपनियां दें, अच्छे स्कूल और अस्पताल निजी कंपनियां चलाएं. बुनियादी सुविधाएं निजी कंपनियां ही दें तो हम सरकार क्यों दें? महज़ इसलिए कि केंद्र में बैठे ये साढ़े सात सौ और राज्यों में बैठे सात हज़ार नेता हमारे जनप्रतिनिधी कहलाएं? ये सुविधाएं सरकारी उड़ाएं और हमें असरकारियों के भरोसे करते जाएं? मोटे चंदे के एवज़ में पूंजीपतियों की खुशामद करते जाएं??  

सवाल किसी भी पूंजीवाद और समाजवाद का नहीं है. कतई नहीं है. शब्दों के मायाजाल में न उलझिए और ना ही उलझाइए. सिर्फ़ फ़र्क देखिए. राजा-महाराजाओं के ज़माने को मैं राष्ट्र के लिए आदर्श नहीं मानता. उन दिनों राजा-महाराजाओं के बच्चों के लिए आला दर्ज़े के स्कूल हुआ करते थे. आम आदमी के अलग. लोकतंत्र मे सभी को समान अवसर दिए जाने की बात हम करते हैं. परिचर्चा में आरक्षण पर हुई बहस में आम सहमति तो इस बात पर थी ही कि अध्ययन के समान अवसरों से आरक्षण की विसंगतियों को दूर किया जा सकता है लेकिन फिर वही सरकारी सुस्ती और चहेतों का पूंजीवाद आड़े आता है. लोग पूछते हैं कि सरकारी स्कूलों की दशा का पंचतारा स्कूलों के खुलने से क्या संबंध? देखिए..सीधा संबंध है. मसलन, दिल्ली में तक़रीबन पांच सौ स्कूलों को इस शर्त पर सरकारी ज़मीनें दी गई थीं कि वे अपने संस्थानों में ग़रीब बच्चों को एडमिशन देंगे. सालों बीत गए किसी स्कूल ने सुध नहीं ली. कोई ना कोई बहाना बनाकर सरकारी मदद लेते रहे और अपने वादों से मुकरते रहे. दो साल हुए हाईकोर्ट को फ़रमान जारी किए हुए और स्कूलों को अपना वादा याद दिलाए.. कोई नतीजा नहीं. अब बताएं क्या ये चहेतों का पूंजीवाद नहीं कहलाता? सरकारी ज़मीन क्या नेताओं के बाप-दादा की थी जो कौड़ियों के दाम बेच दी और आलीशान अंग्रेज़ी स्कूल खुलवा दिए? अकेली दिल्ली ही नहीं देश में लाखों गांव और कस्बें हैं जहां इस तरह की सरकारी चाहत दिखाई देती है.. हम खुश होते हैं कि वाह भई.. अब अपने बच्चों के लिए हाईस्टैंडर्ड स्कूल खुल गए हैं जहां बच्चे अंग्रेज़ियत में पलेंगे-बढ़ेंगे. बाक़ी ग़रीब जाएं भाड़ में. पूरे बजट का महज़ ढाई फ़ीसद हिस्सा शिक्षा पर खर्च करने वाली सरकार के गांव में खुले स्कूलो की हालत क्या आपसे छुपी है?  अरे खोलने दो ना.. पंचतारा स्कूल, मल्टीप्लैक्स, मॉल्स और स्पेशल इकॉनॉमिक ज़ोन. किसने मना किया है. हमने? कतई नहीं!! हम तो चाहते हैं कि पूंजी लगे और कारखाने चलें ताकी रोज़गार बढ़े.. लेकिन किन शर्तों पर? तेरे और मेरे जैसों को सरकार एक फुट ज़मीन मुफ़्त नहीं देगी..हज़ारों करोड़ का कारोबार करने वालों को कौड़ियों के दाम पर ज़मीन काहे देते हो? उनके पास कौन-सा पैसों का टोटा है अपनी तरह? कौन सुनेगा? मीडिया को क्यों फ़िकर हो हमारी? उसे मार्केट में टिकना है और बिकना है वो भले ही राखी सावंत का पल्लू बेचे या बलात्कृत बालिका के कपड़ों के तार, वो कारपोरेटिया चालीसा का अखंड पाठ पढ़े या दलालों की दिल्लगी दिखाए. गुलाबी अख़बार भूमंडलीकरण को अपरिहार्य बताएं और ज़्यादा गले तक बन जाए तो इसे आवश्यक बुराई बताकर पल्लू झाड़ लें. हैरत की बात यह है कि गाहे-बगाहे हम मीडिया को लपेटने से बाज़ नहीं आते.. किंतु यह भूल जाते हैं कि यह वही मीडिया है जिस पर भूमंडलीकरण के दौर मे गहरा असर पड चुका है. मीडिया से वो सारे मुद्दे छूट जाते हैं जो मेरी और आपकी ज़िंदगी पर दूरगामी असर डालते हैं. लेकिन जिन मुद्दों (?) से हमारा दूर तक कोई नाता नहीं होता वे सारे ख़बरों में छा जाते हैं.  चाणक्य का कहना था कि राजा जब व्यवसाय करने लगे तो समझो राज्य की प्रजा का बंटाधार होने वाला है आज राजनीतिक ग़ुलामी के दिन नहीं है लिहाज़ा हमें अपना देश आज़ाद, अपने नेता और अपना शासन दिखाई देता है..किंतु नई वैश्विक व्यवस्था आर्थिक साम्राज्यवाद की है. यदि यह खुली आंखों से दिखाई नहीं दे रही है तो समझें कि दिखाने वाला मीडिया चंद मज़बूत हाथों की कठपुतली बन चुका है. गुलाबी अख़बारों ने अपनी क़लम बेचकर सिर्फ़ विज्ञापनों को ही ताक़त मान लिया है. अगर किसी ने असलियत दिखाने की कोशिश भी की तो हमारी आंखें करोड़ों के सपनों से चुंधियाई जाएगी. किश्तों में सपने बेचने वाले हमको चैन से सोचने का मौक़ा नहीं देंगे. सारा तामझाम खड़ा किया जाएगा जो व्यवस्था नहीं तक़दीर बदलने पर ज़ोर देगा. हम सिमट जाएंगे और व्यवस्था से बेख़बर होकर अपनी ही तक़दीर बदलने में जुट जाएंगे…हम अपनी औक़ात जानते हुए उनके चहेते तो नहीं बन सकेंगे लेकिन चाटुकार ज़रूर बन जाएंगे. हम आज सब्ज़ी-परचून बेचते हैं, कल रिलायंस वाले हमें अपनी दुकान पर काम देंगे बशर्ते कि हम टाई-सूट पहनना सीख जाएं. हम आज सरकारी कर्मचारी हैं लेकिन कल हम हायर एंड फ़ायर के शिकार भी बनेंगे. हम आज पत्रकार हैं… कल हम भांड भी बनेंगे.

मल्टीप्लैक्स कहानियां परोसता सिनेमा

November 5, 2006 at 11:26 pm | In सिनेजगत | 9 Comments

आमतौर पर नई फ़िल्में देखने के लिए थियेटर जाना ही पसंद करता था. इन दिनों मल्टीप्लैक्स जाता हूं जहां कम से कम तीन स्क्रीन ज़रूर होती हैं. जब से नोएडा आया हूं तब से फ़िल्म देखने मल्टीप्लैक्स ही जा सकता हूं क्योंकि सिंगल स्क्रीन थियेटर यहां नहीं है. घर से दस मिनट की दूरी पर एक सिंगल स्क्रीन थियेटर तो है किंतु यहां या तो द्विअर्थी भोजपुरी या फिर निरर्थक चित्रपट (अश्लील) लगा होता है जो नहीं झेला जा सकता. मजबूरन, अपन डेढ़ सौ रुपए की टिकट ख़रीदकर फ़िल्म देखते है जहां पॉपकॉर्न 55 रुपए और बर्गर की क़ीमत 30 रुपए से कम नहीं होती. मल्टीप्लैक्स वालों की इस मनमानी वसूली पर टीवी चैनलों और दैनिकों में कई ख़बरें आ चुकी हैं लेकिन जब तक इन्हें प्रशासन का आशीर्वाद है तब तक कुछ नहीं होने वाला. पता चला है कि इन मल्टीप्लैक्स वालों को किसी छोटे शहर के सिंगल स्क्रीन थियेटर वालों से भी कम मनोरंजन कर देना होता है. इन मॉल्स को सरकार ने पनपते उद्योगों की श्रेणी में रखा है और ज़मीन से लेकर मनोरंजन करों तक छूट ही छूट होती है. इसे टैक्स हॉलीडे कहा जाता है. यानी आम जनता से कोसों दूर मनोरंजन के ये केंद्र नवधनाड्य और उच्च वर्ग के लिए तफ़रीह का अड्डा बन गए हैं. दूसरी तरफ़ सिंगल स्क्रीन थियेटरों के लिए ऐसी कोई छूट नहीं होती. सिंगल स्क्रीन वाले सत्तर से अस्सी फ़ीसद मनोरंजन कर चुकाते हैं. 

मल्टीप्लैक्स अब ऐसे वर्ग को जन्म दे रहा है जो यहां अपने आने-जाने को स्टेटस सिंबल मानता है. यह वर्ग किसी भी क़ीमत पर शान से ज़ेब से पैसे निकालता है और टिकट, ठंडा, पॉपकॉर्न लेकर अंदर चला जाता है. इस नीश क्लास के लिए सिनेमा भी उसी कोटि का बनता है. इस वर्ग का आका एनआरआइयों के बीच पनप रहा वह वर्ग है जो शाइनिंग इंडिया की तस्वीर देखना और दिखाना चाहता है. इसके लिए माल आपूर्ति का ज़िम्मा यशराज फ़िल्म्स, मुक्ता आर्टस, धर्मा फ़िल्म्स की कारपोरेटिया हस्तियों ने संभाल लिया है. जो विवाहेत्तर संबंधों को भारतीय सामाजिक कसौटी पर खरा उतारने की कुचेष्टा करने वाली कभी अलविदा ना कहना बनाते हैं और चोरी-डकैती में लिप्त अनायकों को महिमामंडित करने की धूम मचाते हैं. इनकी फ़िल्म का एनआरआई नायक पश्चिमी दुनिया की स्वावलंबी नारी से दूर भागता है और भारत आकर उस भोली-भाली वधु की आकांक्षा करता है जो तमाम उम्र उसके चरणों में ज़िंदगी गुज़ारने के लिए अपनी मंजूरी दे सके. सिनेमाई सत्य है कि लेपटॉप थामे इक्कीसवीं सदी के इस नायक के दिल में भी बीसवीं सदी की भारतीय पतिव्रता नारी की मनोकामना होती है. परदे पर नायक की इस कामना पर चतुराई से स्वदेश प्रेम मुलम्मा चढ़ा दिया जाता है. और असल ज़िंदगी का सच यह है.  

विषयांतर ना हो इसलिए फ़िल्मी फ़्लैशबैक में चलें. यशराज बैनर की फ़ना और इसके बाद की कुछ फ़िल्मों के प्रदर्शन पर डिस्ट्रीब्यूर्टरों से ज़्यादा मल्टीप्लैक्स के साथ विवाद खड़े हुए हैं. कारपोरेट जगत की उन तमाम हस्तियों का, जिनका ज़िक्र ऊपर में किया गया है, के लिए फ़िल्म बनाने का मकसद पैसा कमाना है. यह प्रवृत्ति बुरी नहीं है किंतु पैसा बटोरना अगर लक्ष्य बनता है तो विभिन्न टेरेटरी (क्षेत्र) का परफ़ॉर्मेंस नहीं देखा जा रहा है. आम भारतीयों की पसंद या नापसंद को नहीं देखा जाता बल्कि फ़िल्म की लांचिग से ही म्यूज़िक राइट्स, ओवरसीज़ राइट और देश के कुछ मल्टीप्लैक्सों से आने वाली मोटी कमाई ध्यान में होती है. यह पैसा बरसाने वाला सौदा न सिर्फ़ लाभकारी है बल्कि़ ये रईस घराने आज मीडिया तक अपनी बात भी तेज़ी से रख सकते हैं और जमकर प्रचारित करवाते हैं. अंत में कस्बों और छोटे शहरों में रहना वाला आम भारतीयों का भारत इसी तर्ज पर अपनी बुद्धि से इसे सच मानकर फ़िल्म को और ज़्यादा कामयाब बनाता है. ऐसे फ़िल्मकारों के लिए सुविधा यह होती है कि उन्हें देश के भीतर की बजाय अपना ध्यान देश के बाहर रह रहे उस धनाड्य वर्ग की ओर आकृष्ट करना है जो अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस है और अपनी पसंद-नापसंद को पलभर में संप्रेषित कर देता है. यह सुगठित और आधुनिक तंत्र फ़िल्मकार को इंटरनेशनल फ़ेम दिलाने और डबिंग-रिमेक, रिंगटोन, स्टेज शो के ज़रिए भी बाज़ार बनाकर देता है.  

कुछ लोगों का मानना है कि ओवरसीज़ राइट और मल्टीप्लैक्स के भरोसे फ़िल्म हिट करा लेना बुरा नहीं है. वे अपने मत के समर्थन में कभी अलविदा ना कहना और डॉन जैसी फ़िल्मों का उदाहरण देते हैं जो भारतीय बाज़ार की बजाय समन्दर-पार सफलता दर्ज करा रही हैं. मैं यह नहीं मानता कि फ़िल्में हिट कराने के लिए ओवरसीज़ मार्केट का ही आसरा लिया जाए. पायरेसी के ख़िलाफ़ कडा क़ानून तमिलनाडु में जयाललिता लेकर आईं थीं. तब से वहां पायरेसी करना दुरूह हो चला है. इस राज्य में सिंगल स्क्रीन थियेटर्स बड़ी तादाद में हैं जहां आम तमिलभाषी बड़े चाव से अपने नायक-नायिकाओं की फ़िल्में कई-कई बार देखते हैं. ताज़ा आंकड़े कहते हैं कि देश के साठ फ़ीसद सिनेमाघर दक्षिणी राज्यों में हैं.चंद्रमुखी गुज़रे साल की इतनी बड़ी हिट रही कि इसने सौ करोड़ से ऊपर का कारोबार किया. आपको शायद हैरत होगी कि इस वक़्त रजनीकांत सोलह करोड़ रुपए लेने वाले देशभऱ के फ़िल्मी नायकों मे अकेले स्टार हैं. हिन्दी फ़िल्म सितारों की कमाई इसकी आधी तक ही पहुंच पायी है. दक्षिण की फ़िल्में तकनीकी तौर पर आम मुंबइया फ़िल्मों से बेहतर होती हैं. यहां नायक-नायिकाएं ईश्वर की तरह पूजे जाते हैं. ज़्यादातर फ़िल्में आमजन के जीवन को छूती हैं जहां आपको नायक लुंगी में भी नज़र आता है. अधिकांश फ़िल्मों में गांव-कस्बों के दृश्य दिखाई पड़ते हैं.  

मल्टीप्लैक्स जाना मेरी मजबूरी है. यहां से बीस किलोमीटर दूर सिनेमाघर जाने के लिए मुझे वक़्त और कुछ पैसे अलग से देने होंगे जो तक़लीफ़ देता है. इस मल्टीप्लैक्स मजबूरी के सामने झुकना भी गवारा ना हो तो एक ही चारा बचता है पायरेसी का… जितने रुपयों में मैं मल्टीप्लैक्स की चमचमाती दुनिया का आनंद उठाता हूं उतने में मुझे पांच फ़िल्मों की सीडी आसानी से घर से सौ क़दम की दूरी पर मिल जाती है. लेकिन सोचता हूं कि क्या पायरेटेड फ़िल्म देखकर मैं समाज का और फ़िल्मोद्योग का नुकसान तो नहीं कर रहा हूं? हालांकि फ़िल्मोद्योग का तो भला मेरे करने या ना करने से नहीं होगा.. अलबत्ता समाज का बुरा इसलिए होगा क्योंकि पायरेसी का पूरा धंधा भारत-विरोधी ताक़तों के हाथों में है. सदफ़ के सीडी कारोबार की नकेल दाउद इब्राहिम और छोटा शकील जैसे गैंगस्टर के हाथ में हैं. इस जालसाज़ी के धंधे में भी टेरेटरी दी जाती है, पाकिस्तान इसका गढ़ है जहां से सीडी और डीवीडी अरब और यूरोप के बाज़ार में भेजी जाती है.  

देश में 16 हज़ार थियेटर हैं इनमें मल्टीप्लैक्स की तादाद बमुश्किल पांच सौ तक ठहरती है. एक तरफ़ तमिल-मलयालम राज्यों में सिनेमा के लिए दीवानगी है और वहां का सिनेमा मिट्टी की सुगंध लिए आम जनता के बीच पल रहा है. तो दूसरी तरफ़ हिन्दी सिनेमा ओवरसीज़ और मल्टीप्लैक्स के भरोसे पर ही करोड़ो के वारे-नारे कर रहा है. बावजूद इसके कि तीन हज़ार करोड़ के इस उद्योग को सालाना एक हज़ार करोड़ नुकसान पायरेसी से ही होता है.  अब किसी हृषिकेष मुखर्जी, मोहन कुमार, विमल कुमार का फ़िल्म बना लेना और उसे हिट करा लेना टेढ़ी खीर साबित हो गया है. समूचा मीडिया इन्ही कारपोरेट हस्तियों के लपेटे में है जो अलविदा.., डॉन, मोहब्बतें सरीखी सतही फ़िल्मों को हिट करा देता है और स्वदेश, मंगल पाण्डेय या उमराव जान पिटवा देता है. पहले ही दिन से ऐसे रिव्यू छपते हैं मानों सब कुछ रणनीति के तहत किया जा रहा हो. कोई बताए कि डॉन में भला क्या है जो अमिताभ की डॉन से ज़्यादा बेहतर हो? यदि तुलना ही जा रही है तो नई डॉन क्यों आगे बढ़ जाती है और नई उमराव जान पर लोग बरसते हैं? बेशक़ दोनों पुरानी कहानियां अपने दौर की हिट फ़िल्में थीं लेकिन इस दौर में बनी एक हिट तो दूसरी पिट रही है. यह दौर बाज़ार का है, हिट कराने की मार्केटिंग का है. ऐसे दौर में आम भारतीय की आवाज़ बनने वाला नायक परदे पर दिखाई नहीं देता. ऐसी आवाज़ नहीं आती जो श्रम की महत्ता प्रतिपादित करे. अलबत्ता मिनटों में करोड़पति बनने का सपना देखने वाले मालामाल वीकली और हेराफेरी के नायक उछलकूद करते हिट नज़र आते हैं. ये बाज़ार का ही दौर है जहां यशराज बैनर श्रमेव जयते का अलख जगाने वाली फ़िल्म काला पत्थर से 21वीं सदी में आकर चोर-लुटेरों की फ़िल्म धूम लेकर आता है. कारपोरेट कलेवर में बंध रही फ़िल्म इंडस्ट्री के ख़तरे तब और गंभीर हो जाएंगे जब नायकों को दूना-तिगुना मेहताना देकर सालों तक बुक कर लिया जाएगा. यह फ़िल्म जगत के छोटे-मोटे फ़िल्मकारों में हताशा को जन्म देगा.

नैतिकता और सामाजिक प्रतिबद्धता को बिसरा चुके इन कारपोरेटिया हस्तियों की फ़िल्में देखना मैं ज़रूरी नहीं समझता. इसलिए मल्टीप्लैक्स नहीं जाता लेकिन अच्छी फ़िल्में इन नामी थियेटरों का जब मुंह तक नहीं देख पाती तो मैं वंचितों की कगार में आ जाता हूं और मन मसोसकर रह जाता हूं. क्योंकि मैंने वो दौर देखा है जब गोलमाल, रंग बिरंगी, चश्मे बद्दूर, किसी से ना कहना, खूबसूरत, झूठी, जाने भी दो यारों, रजनीगंधा, नरम गरम जैसी छोटे बजट की लेकिन आम भारतीय के जीवन पर बनी फ़िल्में भी थियेटरों में प्रदर्शित होती थीं.  इन दो सालों में मातृभूमि, रेनकोट, डोर, 15 पार्क एवेन्यू सरीखी फ़िल्मों को मल्टीप्लैक्स के दर्शन भी नहीं हुए. दूसरी तरफ़ सिंगल स्क्रीन थियेटरों में वे फ़िल्में लगती हैं जो पहले ही महानगरों में हिट हो जाती हैं. लिहाज़ा समानांतर सिनेमा कही जाने वाली फ़िल्में या तो सिर्फ़ टीवी पर दिखती हैं या फिर इनके पायरेटेड सीडी बाज़ार में बहुत बार कहने-बोलने पर मिल पाते हैं. बची-खुची कसर आंचलिक सिनेमा पूरी कर देता हैं जो सिंगल स्क्रीन थियेटरों में जनता के बीच पैठ बनाता जा रहा है. हिन्दी जगत का वो दर्शक जो सिनेमा को बोलियों में सिमटता नहीं देख सकता या चमक-दमक वाले मल्टीप्लैक्स कल्चर के छलावे में नहीं आता.. वो हाथ मलता रह जाता है तब वो भी पागलपन के दौरे में ज़ोर-ज़ोर से गाने लगता है.. धूम मचाले धूम मचाले धूम..

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