गांधीगीरी बनाम गांधीवाद
गांधीगीरी..शब्द सुनने के बाद ऐसा लगा मानो गांधी जी भी दादागीरी की बात कर रहे हों. ये ‘गिरी‘ कब से ‘गीरी‘ बन गया मुझको पता नहीं.. लेकिन इतना ज़रूर है कि जहां ये ‘गीरी‘ जुड़ जाता है वहां एकाधिकार का तत्व जुड़ जाता है. गांधीवाद का ‘गांधी‘ और दादागीरी का ‘गीरी‘ मिलकर ‘गांधीगीरी‘ बना दिए गए. इस चलन को मुन्नाभाई ने चलाया हो ऐसा नहीं है. ऐसा गांधी के जाने के बाद से ही होता आया है. कैमिकल लोचे में आकर फ़िल्मी हीरो गांधी से बात करता है. लोगों ने फ़िल्म देखी और उनमें गांधीगीरी के प्रति आकर्षण जागा.
मुझे यह बात ठीक नहीं लगती क्योंकि अव्वल तो गांधीगीरी शब्द का प्रयोग मर्यादित नहीं है. दूसरा यह कि किसी मुंबइया भाई के किरदार ने इसे उठाया है. यह गांधीगीरी मुंबई से चलकर लखनऊ, कानपुर जैसे शहरों से होते हुए लंदन तक पहुंच गई है और लोग इसे अपना भी रहे हैं. मीडिया के लिए यह बिकने वाली ख़बर है. ज्वार चढ़ा है जो जल्द उतर भी जाएगा. तब लगेगा कि गांधी को गीरी या वाद में बांधकर इसे कांधे पर ढोना कतई आसान नहीं है. सच्चाई की डगर बहुत कठिन होती है. इस गांधीगीरी में मुन्नाभाई बड़ा हो गया और गांधीवाद छोटा प्रतीत होता है. गांधीगीरी से सहमति की कतार में खड़े लोगों को यही सुखद अहसास हो रहा है कि, चलो इसी बहाने गांधी याद तो किए जा रहे हैं.
दरअसल, मुन्नाभाई दादागीरी छोड़कर गांधीगीरी की बात करता है तो यह महात्मा गांधी की महिमा नहीं है. यह मुन्नाभाई की फ़िल्मी धमक है जो उसके गांधीवाद अपनाने के बाद लोगों के ज़हन में ट्रेलर बनकर सामने आती है. ध्यान दें कि ‘मुन्नाभाई‘ दादागीरी की बजाय गांधी दर्शन की बात कर रहा है तो उसकी बात का वज़न ही इसलिए है कि वो पहले ‘भाई‘ था. वो ऐसे वर्ग का था जो धमकी-चमकी से ही अपना काम कराता है. हिंसा उसकी रोज़ी-रोटी थी. सोचिए, कोई औना-पौना ‘मुन्ना‘ इस समाज में गांधी की बात करे तो लोग क्या उसकी बातों को तरजीह देंगे? कोई सीधा, सरल व्यक्ति गांधी के उपदेश देते हुए गांधीवाद के रास्ते पर ही जीवन जीए तो क्या आप उसे मुन्नाभाई जैसा ही सम्मान देंगे? शायद नहीं. भय बिनु होय न प्रीत. यही वजह है कि छह साल से अहिंसक आंदोलन की प्रतीक बनीं और भूख हड़ताल पर बैठी शर्मीला चानू की गांधीगीरी (गांधीवाद) हमें आकर्षित नहीं करती. हम उसे उसके हाल पर छोड़ देते हैं. गांधी के रास्ते पर चलना दुष्कर है. चंद घंटों के लिए फूल बांटकर और टोपी लगाकर गांधी को फॉलो करना ज़्यादा आसान है.
गांधीगीरी का फ़ार्मूला बहुत पुराना है. यह नाम आज पड़ा है. समाज के सैकड़ों अपराधी इसी गांधीगीरी को अरसे से इस्तेमाल कर रहे हैं. फ़िल्म में चाहे जो किया गया हो लेकिन असल में गांधी के नाम पर राजनीतिक रोटियां चालाकी से सेंक ली जाती हैं और हम उल्लू बन जाते हैं. पिछले हफ़्ते माफ़िया डॉन बबलू श्रीवास्तव को गांधीगीरी पसंद आ गई. इन्हीं दिनों मुझे चैनलों पर कई चिल्हरछाप क्रिमिनल गांधी टोपी लगाए लोगों के बीच फूल बांटते नज़र आए. ऐसे क्रिमिनल जब राजनीति की राह पकड़ते हैं तो पहले गांधी टोपी ही सिर पर चढ़ाते हैं और लोगों को गांधी का संदेश देते हैं. हम भी चुप रहते हैं क्योंकि हमें पता है कि उनकी गांधीगीरी हमें नहीं लुभा रही है बल्कि यह क्रिमिनल की भाईगीरी का असर है कि हम उन्हें चुनने पर मजबूर हो जाते हैं. दूसरा और कोई रास्ता नहीं है. इसके उलट कई ऐसे भी हैं जो बिना किसी लाग-लपेट और प्रपंचों के गांधीवाद का रास्ता अपनाते हैं लेकिन हम उन्हें नज़रअंदाज़ कर देते हैं. तब लगता है कि शायद हमें मुन्नाभाई की गांधीगीरी ही पसंद आती है. और जब तक हमें यह पसंद आती रहेगी तब तक संसद में कई भाई मज़े करते रहेंगे.

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