नंदिता हक्सर और यासीन मलिक जवाब दो
October 5, 2006 at 11:20 pm | In भारतनामा | 16 Commentsहे राष्ट्रपति इसे माफ़ मत करना – भाग दो.
इन दिनों मोहम्मद अफ़ज़ल को फांसी दिए जाने के विरोधियों की सक्रियता अपने चरम पर पहुंच गई है. अपने तर्कों से ये चरमपंथियों के पैरोकार नज़र आ रहे हैं. तीन-चार दिनों में ख़बरिया चैनलों और अख़बारों में इन बुद्धिजीवियों (?) ने अफ़ज़ल के बचाव में बयान देने और अपने तर्कों के माध्यम से कुछ कहने की कोशिश की है. सभ्य समाज में हर किसी को अपनी बात कहने का अधिकार है. हम रायशुमारी में यक़ीन करने वाले मुल्क़ में रहते हैं. लेकिन हमारी यह कोशिश होनी चाहिए कि जो कुछ ग़लत लगे, उसके ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ उठाएं. चैनलों पर पिछले दो दिनों में मेरा सामना उन विचारों से हुआ जो अफ़ज़ल के बहाने कश्मीर समस्या और कटु हो चुके भारत-पाक संबंधों पर आधारित थे. फांसी विरोधी इन्हीं बिंदुओं पर अपने तमाम तर्क पेश कर रहे हैं. बीजेपी को छोड सभी राजनीतिक दल या तो मौन हैं या फिर वही बातें कर रहे हैं जो उनके राजनीतिक वोटबैंक को मज़बूत करती हैं. पिछले दो दिनों में मैंने जनमत पर यासीन मलिक, इंडिया टीवी पर नेशनल कॉर्फ़ेंस नेता फ़ारूक़ अब्दुल्ला, आईबीएन पर जेकेएलएफ़ लीडर यासीन मलिक, एनडीटीवी पर संसद हमले में बरी हुए एसएआर गिलानी और बीबीसी हिन्दी पर वक़ील और मानवाधिकार कार्यकर्ता नंदिता हक्सर के विचार सुने. इसे शो एंकरों की जानकारी का अभाव कहा जाए या समय की कमी लेकिन फांसी विरोधियों के कुछ तर्कों के जवाब और उनसे किए जा सकने वाले सवाल इन बहस में अनकहे रह गए. मैं फांसी विरोधियों के उन तमाम तर्कों के जवाब और उन पर नए सवाल खड़े करना चाहता हूं.
यासीन मलिक कहते हैं कि अफ़ज़ल को फांसी दिए जाने से भारत-पाक के बीच शांति वार्ता पर रुकावट आएगी. क्या मलिक यह कहना चाहते हैं कि अफ़ज़ल का पाकिस्तान से कोई नाता है? क्या पाकिस्तान के भरोसे पर यह आतंकी पल रहा था. क्यों नाराज़ होगा पाकिस्तान? नंदिता हक्सर तर्क देती हैं- ”संसद पर हमले के असली मास्टरमाइंड मसूद अज़हर, ग़ाज़ी बाबा और तारीक़ अहमद हैं.” नंदिता जी क्या तब भी मानेंगी कि पाकिस्तान में खुलेआम घूम रहे मसूद अज़हर की वापसी के बिना हम शांति वार्ता शुरू कर दे?
नंदिता जी का अगला तर्क है- अफ़ज़ल को बचाव का मौक़ा नहीं मिला. मैं पूछता हूं कि आज आप अफ़ज़ल को बचाने के लिए सड़कों पर धरने तक दे रही हैं. जब ये मामला कोर्ट में था तब आपने एसएआर गिलानी की पैरवी की और उसे छुड़ा भी लिया.. लेकिन तब आपने अफ़ज़ल का क्यों नहीं सोचा? देश की जेलों में बंद हज़ारों क़ैदी बिना क़ानूनी सहायता के सालों क़ैद ग़ुज़ारने पर मजबूर हैं. आप तो मानवाधिकार कार्यकर्ता भी हैं. आपको उनकी फ़िक्र क्यों नहीं होती?आप आज एनडी पंचोली के बारे में कह रही हैं कि उन्हें फौजदारी मुक़दमों का अनुभव कम था, तो मैं आपसे पूछना चाहता हूं कि तब अफ़ज़ल ने किस बिनाह पर गवाहों से पूछताछ के अधिकार ले लिए थे? आप उसी वक़्त उनके बचाव मे आगे क्यों नहीं आईं? नंदिता जी ये भी बताएं कि ये कैसा राज्य हैं जहां सेक्स स्कैंडल के नाम से सनसनीखेज़ आरोप लगे. घाटी में इस स्कैंडल का चरमपंथियों समेत अधिकांश लोगों ने जांच कराने के लिए भारी ग़ुस्से का इज़हार किया. रातों-रात कई ग़िरफ़्तार किए गए. चूंकि कश्मीर के लोगों की भावनाएं थी इसलिए जम्मू-कश्मीर बार एसोसिएशन के वक़ीलों ने आरोपियों के मुक़दमें लड़ने से इंकार कर दिया. तब कहां गई न्याय दिलाने की बात? ये कैसा बार एसोसिएशन हैं जो सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद भी पैरवी करने से इंकार कर देता है? मजबूरन पूरा केस चंडीगढ़ कोर्ट में ट्रांसफ़र करना पड़ा. क्या आरोपी को अपने बचाव का मौक़ा देने और वक़ील करने के अधिकार को सुनिश्चित किया गया? मैं सीधे तौर यही कहना चाहता हूं कि कश्मीर के आतंकी राज में वक़ीलों ने अपनी जान की ज़्यादा की फ़िक्र की.
नंदिता जी, आप सुप्रीम कोर्ट की लॉयर हैं. बीबीसी पर आपका बयान छपा है- “अमरीका में 9/11 के अभियुक्त ज़कारियास मुसावी के मामले में जूरी और अदालत ने भारतीय अदालत के मुकाबले में ज़्यादा संवेदनशील रवैया अपनाया.” आप क्या कहना चाहती हैं? क्या आप सुप्रीम कोर्ट की निष्पक्षता और प्रक्रिया पर सवाल उठाना चाह रही है? क्या ये देश की सर्वोच्च अदालत का अपमान नहीं है? दुनियाभर में दादागिरी कर रहे अमेरिका की व्यवस्था पर आपका विश्वास है लेकिन सिर्फ़ अफ़ज़ल के मामले में आपको अब भारतीय अदालतों की निष्पक्षता पर भी संदेह होने लगा है? क्या इसी न्यायिक तंत्र के चलते आप प्रोफ़ेसर गिलानी को छुड़ाने में कामयाब हो गईं? यासीन मलिक साहब, आपने जनमत पर कहा है कि महात्मा गांधी भी ब्रिटिश पासपोर्ट पर दुनिया घूमते थे. यानी कि आप जो भारतीय पासपोर्ट लेकर दुनिया घूमते हैं और अपने को गांधी के समकक्ष खड़ा करना चाहते हैं. उस महात्मा ने अहिंसा की ख़ातिर भगत सिंह तक का खुलेआम बचाव करने से इंकार कर दिया था. वो चाहते तो अनशन उपवास रखकर देशभर में आंदोलन खड़ा करवा लेते लेकिन वे हिंसा के रास्ते से आज़ादी नहीं लाना चाहते थे. बहुत फ़र्क है आपके और गांधी में.. ज़मीन और आसमान का.
दूसरी बात यासीन कहते हैं कि “संसद पर हमले के षडयंत्र में अफ़ज़ल का भूमिका मामूली थी. जिन्होंने हमला किया वो तो तुरंत मारे गए थे.“ यही तर्क फ़ारूक़ अब्दुल्ला भी देते है. क्या मास्टरमाइंड होना सज़ा देने के लिए काफ़ी नहीं. क्या ओसामा बिन लादेन और जरकावी ने खुद हवाई जहाज़ लेकर ट्विन टॉवर उड़ाए थे? फ़ारुक़ ने ही कुछ दिनों पहले यह खुलासा किया था कि मसूद अज़हर की रिहाई का उन्होंने विरोध किया था. तो आदरणीय फ़ारूक़ जी अब ये बताएं कि अफ़ज़ल पर दया क्यों आ रही है? वो मसूद तो पाकिस्तान में बैठा है. आए दिन चैनलों पर तक़रीरें देता घूमता-फिरता दिखता है. तब भी हम क्या शांति वार्ता करते रहेंगे? अब मलिक का एक और बचाव देखें.. वो कहते हैं भगत सिंह ने संसद में बम फेंका था. उसे तो लोग आतंकवादी नहीं कहते हैं. वाह मलिक साहब, चलिए मैं मान भी लूं कि हिन्दुस्तानी हुक़ूमत से आपकी नहीं बनती. आपका यहां की व्यवस्था पर यक़ीन नहीं तो मैं यह बताना चाहूंगा कि भगत सिंह ने संसद में बम इस तरीक़े से फेंका था कि किसी को चोट ना लगे.. वो अंग्रेज़ सरकार तक अपनी बात पहुंचाना चाहते थे इसलिए उन्होंने संसद के भीतर पर्चे फेंके. इस भगत सिंह ने कभी क़ौमी नफ़रत की बातें नहीं की. आपको सपोर्ट करने वाले दुनियाभर में क़ौम के नौजवानो को जन्नत के सपने दिखा रहे हैं और बदले में इस दुनिया को दोजख बनाने पर तुले हुए हैं.
आप अपने आंदोलन को अब अहिंसक बता रहे हैं लेकिन समर्थन आप हिंसावादियों का करते हैं ये कैसा विरोधाभास है. आपके इतिहास पर ग़ौर करूं तो पाता हूं कि अमानुल्ला ख़ान को किनारे लगाने के लिए आप ही को पाकिस्तान ने मोहरा बनाया था. क्या आप भूल गए कि पिछले साल ही आपने यह कबूल किया था कि पाकिस्तान ही आपको हथियार मुहैया कराता था. मलिक साहब, आपको दूध में से मक्खी की तरह जब पाकिस्तान ने किनारे लगा दिया तो आप अहिंसावादी होने की दुहाई दे रहे हैं? बंदूक छोड़ने के बाद क्यों आपको विदेशी धन की ज़रूरत आन पड़ी? कैसे भूल जाएं कि आपके बंदूक थामने के बाद ही तीन लाख कश्मीरी पंडितों को अपनी धरती छोड़नी पड़ी. कैसे भूल जाएं कि उनकी मां-बेटियों पर क्या क्या अत्याचार किए आपके जेकेएलएफ़ ने? उनकी वापसी पर आप यह कहते हुए शर्त लगाते हैं- “They are welcome provided they stay neutral in the ongoing (freedom) struggle”. इसे क्या समझा जाए..? यही कि आप जो करो वो ठीक है, हमारे सैनिक सीमाओं की रक्षा के दौरान और आत्मरक्षा के लिए आपकी उन्मादी भीड़ पर गोली चला दें तो अत्याचार हो गया? आपने कश्मीर मे सिरे से कश्मीरी पंडितों की ethnic cleansing कर दी और तब नंदिता हक्सर जैसे मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को तरस नहीं आया?
16 Comments »
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test test
Comment by test — October 5, 2006 #
हिला के रख दिया आपने तो!!!
Comment by जगदीश भाटिया — October 6, 2006 #
बहुत बढिया ,तर्क संगत लेख
Comment by pratyaksha26 — October 6, 2006 #
बहुत अच्छे।
ऐसे सवाल टीवी पर दिखने वाले पत्रकार क्यों नहीं पूछते?
Comment by hitendra — October 6, 2006 #
लगता है अब आपको सामने आकर एंकरिंग का मौका देना ही होगा
बेहतरीन तर्कपरक, सत्य आलेख.
Comment by रवि — October 6, 2006 #
लगता है अब आपको सामने लाकर एंकरिंग का मौका देना ही होगा
बेहतरीन तर्कपरक, सत्य आलेख.
Comment by रवि — October 6, 2006 #
मेरी समझ मे नही आता आखिर विरोधि चाहते क्या हैं? अफज़ल को नेता बना दें?
बहुत खूब नीरज जी, बढिया लिखा आपने
Comment by SHUAIB — October 6, 2006 #
आत्मा से निकली आवाज़ जैसा लेख लिखा है। (मीडिया के) अन्य लोग भी यदि यूँ हीं निर्भीकता से लिखें तो लोकतंत्र का चौथा पाया भी मजबूत हो और प्रजातंत्र की चौकी में किसी भी ओर ज़्यादा झुकाव ना रहे। साधुवाद।
– प्रेमलता
Comment by प्रेमलता — October 6, 2006 #
bahut shandar tark hain…un sabhi bevkoof manav adhikarvadiyon ki bolti band kar di aapne…bahut bahut badhai…aise hi likhte rahe
Comment by vivek gupta — October 6, 2006 #
जबरदस्त प्रश्न लगे आपके नीरज ! शानदार लेख !
Comment by मनीष — October 6, 2006 #
शाबास, आपके जोरदार तर्कों के लिए। अफ़ज़ल कोई ‘मोहन जोशी’ (फिल्म ‘फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी’ का निर्दोष आम आदमी) नहीं है कि मीडिया उसके मामले को अब इस मोड़ पर इतना महत्व दे रहा है। मुझे नहीं लगता कि सरकार इस फिजूल की बहस से प्रभावित होकर राष्ट्रपति से अफ़ज़ल को माफी दिए जाने की सिफारिश करेगी।
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों की न्याय चेतना देशद्रोहियों और आतंकवादियों के मामले में ही क्यों सक्रिय होती है, इस रहस्य पर से पर्दा उठना चाहिए। कोई अन्वेषी पत्रकार इसके वास्तविक तथ्य और प्रमाण जुटा सके तो सही मायने में पत्रकारिता होगी।
Comment by सृजन शिल्पी — October 6, 2006 #
हमारे देश के कुछ तथाकथित मानवाधिकारवादी केवल खुद को सुर्खियों में लाने के लिए इन गद्दार कश्मीरियों का साथ देते हैं इनको भी अफजल के साथ फांसी हो तभी सच्चे मायनों में मरने वालों कख आत्मा को सुकून मिलेगा।
नंदिता अक्सर को सरेआम बीच चौराहे पर फांसी हो तब ही ये सामाजिक कार्यकर्ता मानेगे।
लेख के लिए साधुवाद। आशा है आगे भी बहुत कुछ पढने मिलेगा
Comment by bhuvnesh — October 6, 2006 #
bahut acche Niraj Bhai
baut sundar lekh, saduvad
meri ray me to Afazal ki fansi ka virodh karne walo ko giraftar kar un par rashtra droh ka mukadama chalanaa chahiye.
kai dino se jahana chahata tha, jo aaj aapane kah diya gandhiji ne Bhagat Singh ko bachane ki koshis nahi ki jab ki ve aisa kar sakate the, yahi aakar gandhi ji ke nam ke aage laga shabd MAHATMA akharane lagata he, Ahimsa ki dalil dene wale gandhiji ne Bhagat singh ko bacha lete to kya unaki lokapriyata me kamoi ho jane wali thi?
Sanjay Bengani ji sahi kahate he unhe Rashtrapita kahana galat he, Rashtrapita to koi ho hi nahi sakata, agar Rashtraputr ki upadhi bhi di jay to gandhiji uasme khare nahi utarate.
asali rashtraputr to Shahid Bhagat singh, Chandrashekhar, Ram prasad bimil aur Subhash Babu jaise kai bahadur he jinhone apane prano ki ahauti hasate hasate di.
gandhi ji ne kya kiya?
Azadi ke bad apane ladale Neharu ji kp Pradhanamantri banane ke liye Saradar Patel ke sath shadyantr kiya aur us ki saja aaj tak desh bhugat raha he.
Tippani kafi lambi hoti ja rahai he hayad;
baki kabhi citthe par likhenge
Comment by sagar chand nahar — October 8, 2006 #
kai dino se jahana chahata tha,
kai dino se kahana chahata tha, padhe
Comment by sagar chand nahar — October 8, 2006 #
bahut aachcha niraj bhai
bahut dino se afjal guru ke bare me janane ki echcha thi. padth kar bahut si batein malum hui.
Comment by anand raj — March 26, 2008 #
Niraj JI aapne jo likha kabile taarif hai,
ise yahan published kar ke koi phayada nahi hai, isako badhiya se phrem kara ke Mahamahim Rastrapati, Farooque aur Yasin malik ke saath saath sonia, lalu, ramvilash aur Afjal ki phansi dene me der karne wali Shiela Dixit ko bhenje
Hum saare hindustani aapke saath hai
Jai Hind Jai Bharat
Comment by satyendra Kumar — November 28, 2008 #