हे राष्ट्रपति इसे माफ़ मत करना

October 4, 2006 at 12:34 am | In भारतनामा | 12 Comments

परिचर्चा में कुछ दिनों से मोहम्मद अफ़ज़ल गुरू को फांसी की सज़ा दिए जाने पर बहस चल रही है. यहां किसी ने फांसी की सज़ा का विरोध नहीं किया. सभी एकमत है कि 13 दिसम्बर 2001 को संसद पर हमले के इस दोषी को सज़ा--मौत दी जानी चाहिए.

 

मतैक्यता की वजह से परिचर्चा में बहस की गुंजाइश नहीं थी. इधर, मीडिया में बहस गरमागरम है. बहस तब होती है जब किसी भी विषय के पक्ष और विपक्ष में विचार आते हैं. मामले के दोनों ही पहलुओं पर प्रकाश डाला जाता है. अब चूंकि मीडिया से जुड़ा हूं इसलिए मेरा साबका अक्सर उन लोगों से हो जाता है जो अलग-अलग विचारधाराओं के होते हैं. यहां मंगलवार की शाम उत्तेजना से भरी रही. एक तरफ़ प्रोफ़ेसर एस ए आर गिलानी, फ़ारूक़ अब्दुल्ला और दूसरी तरफ़ मनविंदर सिंह बिट्टा और संसद पर हमले में मारे गए सुरक्षाकर्मियों के परिजन थे. तर्क-कुतर्क का दौर था.

 

मैं अफ़ज़ल को फांसी दिए जाने के पक्ष में हूं. हालांकि इससे पहले मेरी मान्यता यह रही थी कि फांसी की सज़ा सभ्य समाज के लिए ठीक नहीं है. ज़िंदगी देने का हक़ नहीं तो लेने का कैसे हो सकता है. दुनियाभर में capital punishment को लेकर चर्चाएं चलती रहती हैं. आंकडे़ कहते हैं कि 88 देश इसे सिरे से नकार भी चुके हैं. इसके बदले यहां उम्रक़ैद की सज़ा लागू की गई है. जबकि दुनिया के बाक़ी देशों (तक़रीबन 109) ने इसे किसी न किसी अपराध के लिए लागू कर रखा है. इनमें भारत के अलावा अमेरिका, चीन, मलेशिया, पाकिस्तान अहम हैं.

 

यूरोप के ही तीन दर्ज़न के आसपास ऐसे देश हैं जहां capital punishment अब नहीं है. ये संपन्न देश हैं और आतंकी गतिविधियों से कम त्रस्त हैं. भारत के संदर्भ में देखें तो यह मुल्क़ आतंकी गतिविधियों का बड़ा भुक्तभोगी है बावजूद इसके कि यह दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश कहलाता है. हमारा समाज उस क़ाबिल नहीं हुआ कि यहां खूरेंजी के शौक़ीनों को दरियादिली से माफ़ किया जा सके. हो भी नहीं सकता क्योंकि जैसा समाज होगा वहां के क़ानून भी उसी सहूलियत से बनाए जाएंगे. भारत में इतनी उदारता की गुंजाइश नहीं दी जा सकती. यहां पोटा, टाडा, रासुका और अन्य राजद्रोह विरोधी क़ानूनों पर अलग से चर्चा की जा सकती है. किंतु फांसी या किसी भी तरह के capital punishment के विरोध में खड़ा होना मूर्खता ही नहीं बल्कि आत्मघात है.

 

लेकिन ऐसी मूर्खता यहां हो रही है. इसे मैं मूर्खता मानता हूं लेकिन राजनीति के मैदान में इसे चालाकी कहा जा रहा है. फांसी से अफ़ज़ल को बचाने के लिए कश्मीर और दिल्ली में जो नेता राजनीति कर रहे हैं वह सारी कवायद न सिर्फ़ शर्मनाक है बल्कि़ कायराना भी है. इसे देशद्रोह नहीं कहूंगा. लेकिन यह देश को गर्त में ज़रूर लेकर जा सकती है. कश्मीर बच जाए किंतु देश का जनमानस हीनता के भाव से फिर भर उठेगा…जैसे मैं भर रहा हूं.

 

पहले कश्मीर के नेताओं के कुछ बयानों पर नज़र डालें-

·        J&K CM Ghulam Nabi Azad sought Presidential clemency for Afzal, citing the public sentiment in the valley against the verdict.

·        PDP leader Mehbooba Mufti said that if India could appeal for Sarabjeet Singh, an Indian who is on death row for espionage in
Pakistan, then Afzal could be spared too. Nalini, an accused in the Rajiv Gandhi assasination case was spared, and Afzal could be shown clemency too. India was known for its Gandhian values.

·        Farooq Abdullah said pleading for presidential clemency for Guru did not mean supporting militants. “I strongly believe that hanging Guru will provide no solution. In fact, it will disturb the ongoing peace process.”

 

बात कश्मीर के नेताओं की ही होती तो ठीक था किंतु इनके आका जो दिल्ली में बैठे हैं जैसे कॉग्रेस और सीपीएम के हाईकमान पूरी तरह मौन में चले गए हैं. उनकी हालत यों हो गई है जैसे सांप के मुंह में छछूंदर.. ना निगलते बने ना उगलते. यह मौन रहने का वक़्त नहीं है. कश्मीर के नेताओं की मांग के पीछे इंसानियत की दुहाई कम और राजनीतिक मजबूरियां ज़्यादा है. दिल्ली में मुझे वामदल के एक बड़े नेता ने अनाधिकारिक तौर पर जब यह कहा कि अफ़ज़ल को फांसी दिए जाने से कश्मीर में हाहाकार मच सकता है, भारत सरकार के लिए क़ानून-व्यवस्था कायम रखने में परेशानी आएगी.. तो मुझे हैरानगी हुई. वे सब मौन हैं.. वोटों की राजनीति है. इसी राजनीति ने कट्टरपंथ को बढ़ावा दिया है. क्रिया की प्रतिक्रिया होती है और देश वैचारिक तौर पर भी बंटता जा रहा है. मौन रहना उससे भी बड़ा अपराध है. चाहे तटस्थ ही क्यों न रहें.

 

 

मैंने कुछ सवाल उठाएं हैं जो फांसी का विरोध करने वालों से पूछे जाने चाहिए-

 

·        पोटा कोर्ट ने फ़ैसला दिया. इस मामले में दो लोग (शौकत गुरू और प्रोफ़ेसर एस ए आर गिलानी) निर्दोष भी साबित हुए. यानी इन दोनों के साथ न्याय हुआ है.

 

·        अफ़ज़ल गुरू की सज़ा सुप्रीम कोर्ट ने भी बरक़रार रखी. फांसीविरोधी गिलानी कहते हैं कि अफ़ज़ल का कोई वक़ील नहीं था. मैं पूछता हूं कि किसने रोका था? बिना बचाव के कोई अभियोजन शुरू नहीं होता. अफ़ज़ल ख़ुद अपना बचाव कर रहे था. उसे अपने बचाव का भरपूर मौक़ा मिला तो ऐसे में अब किस तरह के न्याय की उम्मीद है?

 

·        ये कैसा व्यक्ति है जो एक तरफ़ सरेआम कोर्ट में नारे लगा देता है. भारतीय संविधान और संप्रभुता पर कटाक्ष करता है और अब क्षमादान की अपील करने जा रहा है?

 

·        जब हाईकोर्ट ने शौकत गुरू और गिलानी को निर्दोष रिहा किया तब क्या किसी भारतीय ने कोर्ट के फ़ैसले के विरोध में रैलियां की थीं? नहीं.. क्योंकि हमारी आस्था न्याय प्रणाली पर है. फिर आज अफ़ज़ल की फांसी का विरोध क्यों?

 

·        क़ानून में Capital punishment को abolish करने की मांग तभी क्यों सामने आ रही है जब अफ़ज़ल को फांसी दिए जाने का फ़ैसला आया है? कश्मीर से ये आवाज़ सर्वजीत सिंह को फांसी दिए जाने के फ़ैसले के ख़िलाफ़ क्यों नहीं आई?

 

·        उसी वादी से एक आवाज़ कश्मीरी पंडितों की भी है जिन्होंने ज्वाइंट स्टेटमेंट दिया है कि अफ़ज़ल पर किसी तरह का कोई रहम नहीं किया जाना चाहिए.

 

·        दुनिया में पहले से ही यह परसेप्शन बन रहा है कि हिन्दुस्तान एक soft state है. ऐसे में अफ़ज़ल को माफ़ किए जाने या सज़ा कम किए जाने से कैसा मैसेज जाएगा?

 

·        फ़ारूक़ साहब, जब पार्लियामेंट पर अटैक हुआ था. आपके बेटे उमर भी उन दिनों भी संसद में ही थे.

 

·        जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री ग़ुलाम नबी आज़ाद साहब, आप भी उन दिनों संसद के सदस्य थे. आप लोगो की जान बचाते हुए ही सुरक्षा कर्मियों ने अपनी जान दी थी. सोचिए ज़रा कि यदि इन बहादुरों ने आपकी जान न बचायी होती तो आपकी मैयत में ये चरमपथी कश्मीरी शामिल भी न होते. उल्टे हमारी व्यवस्था ही आप लोगों को शहीद का दर्ज़ा देती.

 

·        महबूबा मुफ़्ती गांधी के मूल्यों की दुहाई दे रही हैं. Capital punishment के प्रति गांधी जी के विरोध की बात करती हैं. गांधी जी ने शहीद भगत सिंह की सज़ा पर अपने संतुलित विचार रखे थे. एक तरह से violent crime against state तो उनकी नज़र में अपराध था ही.  फिर भी वो तो भगत सिंह था.. और ये आतंकी अफ़ज़ल है जिसने देश की सम्प्रभुता पर हमला किया.

 

Gandhi, during his lifetime, always maintained that he was a great admirer of Bhagat Singh’s patriotism, but that he simply disapproved of his violent methods. He also said that he was opposed to Singh’s execution (and, for that matter, capital punishment in general) and proclaimed that he had no power to stop it. On Singh’s execution, Gandhi said, “The government certainly had the right to hang these men. However, there are some rights which do credit to those who possess them only if they are enjoyed in name only,” a statement that many see as evidence of Gandhi’s opposition to Singh’s execution and that others see as only a mild chiding of the British government by a man who supported the execution. (Source: wikipedia.org)

 

 

·        मैं यह भी पूछना चाहता हूं कि यह कैसी इंसानियत की दुहाई है जहां फांसी के विरोध में निकली रैलियों में दीनी नारे (religious slogans) और भारत विरोधी नारे बुलंद किए जा रहे हैं? ये किस तरफ़ इशारा कर रहे हैं. सिवाय देश के बंटवारे के?

 

कश्मीर के नेताओं और दिल्ली में बैठे उनके आकाओं को ये जान लेना चाहिए कि भारत की संप्रभुता पर हमला करने वाले को यदि सुप्रीम कोर्ट ने गुनाहगार मान लिया है तो इसका विरोध करना देश की न्यायिक व्यवस्था का अपमान है. ये कैसे नपुंसक नेता है जो भारतीय संविधान की क़सम खाकर पद संभालते हैं और वोटों के लालच में आकर सरेराह और बाक़ायदा रैलियों में संविधान को तार-तार होता देखने पर मजबूर हो जाते हैं.

 

मैं संसद की सुरक्षा में जान गंवा चुके नौ शहीदों के परिवारों के प्रति हार्दिक संवेदना व्यक्त करते हुए यही कहना चाहता हूं कि, अफ़सोस तुम्हारे संबंधियों की शहादत व्यर्थ जाती दिख रही है.. नाहक ही तुमने उन्हें देश पर जान न्यौछावर करने के लिए प्रेरित किया. ये राजनेता इस लायक ही नहीं हैं कि इनकी ख़ातिर जान दी जाए.

 

फिर मुझे एक आवाज़ सुनाई देती है, हम इनकी नहीं संसद की गरिमा के लिए मर मिटे.. दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के मंदिर को लहूलुहान होता नहीं देख सकते थे.”

 

देखो वीर जवानों अपने ख़ून पे ये इल्ज़ाम न आए…… गीत बज रहा है.

-०-०-

 

 

ब्लॉगजगत के तमाम भाइयों से अपील है कि राष्ट्रपति को ईमेल भेजकर उन्हें संविधान के अनुच्छेद 72 का प्रयोग नहीं करने की अपील करें. हम अपने दस मिनट देकर तमाम भारतीयों की तरफ़ से आवाज़ उठा सकते हैं. औरों को भी प्रेरित करें ताक़ि वे भी आतंकवाद के ख़िलाफ़ जनता की इस लड़ाई में हाथ से हाथ मिला सकें.

 

 

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  1. [...] मोहम्मद अफ़ज़ल गुरु को सुनाई फ़ाँसी की सज़ा के विरोध से नीरज गुस्सा हैं और विरोधियों से कुछ सवाल पूछ रहे हैं. मैं यह भी पूछना चाहता हूँ कि यह कैसी इंसानियत की दुहाई है जहाँ फ़ाँसी के विरोध में निकली रैलियों में दीनी नारे (religious slogans) और भारत विरोधी नारे बुलंद किए जा रहे हैं. [...]

  2. आप की बात बिल्कुल सही है। सभी चिट्ठाकारों को तो इस के विषय में लिखना ही चाहिए, चिट्ठाकारों के अतिरिक्त सभी भारतीयों को राष्ट्रपति को ईमेल लिखना चाहिए। कश्मीरी होने के नाते मीडिया द्वारा इस कातिल के नाम में की गई एक गलती सुधारना चाहता हूँ। सही नाम है गूरू (Gooroo) न कि गुरू। हालाँकि नाम या जाति से अन्तर नहीं पड़ता, पर गुरू से गुरु जैसे पवित्र शब्द का आभास होता है। गूरू शब्द का कश्मीरी में अर्थ है दूध बेचने वाला या ग्वाला, जो इन को या तो पैतृक पेशे के कारण मिला होगा, या किसी और कारणवश नाम पड़ा होगा। नाम तो इस ने गुरु का भी खराब किया है और गूरू का भी।

  3. बहुत अच्छे नीरजबाबु

    राष्ट्रपति को मेल यहाँ से करें :

    http://presidentofindia.nic.in/scripts/writetopresident.

  4. नीरज भाई, आपने केवल चिट्ठा लिखने वालों की ही नहीं, हर भारतिय की आवाज को यहां उतारा है।
    लोग बहुत समझदार हैं, वो मौन को भी समझती है। उनके पास वोट की शक्ति है, वो गिन गिन कर हिसाब लेलेंगे इन राजनीतिबाजों से।

  5. सुना था सत्ता में नशा होता हैं, पर यह नशा व्यक्ति को नपुंसक भी बना देता हैं ऐसा पहली बार देख रहा हूँ.

  6. यार टिप्पणी का भी फोन्ट साइज बड़ा करो, अगर हो सके तो।

    अफजल का किस्सा तो यह है कि यदि उसे सजा ना होती तो कानून की वाह वाही होती, अब जब सजा सुना दी गयी है तो ये सभी #@$%^$$ नेता चीख चीख कर कानून को कोस रहे है। देश का कानून एक है, यदि किसी ने कोई अपराध किया है तो उसे सजा मिलनी ही चाहिए, चाहे वो कोई भी हो।

    यदि अफजल को सजा नही मिलती, देश के सुरक्षाकर्मियों में हीनता की भावना आएगी, फिर कभी भी कोई किसी आतंकवादी पर हाथ डालने की हिम्मत नही करेगा, क्योंकि उसे पता होगा कि सजा मिलने के बावजूद भी ये नेता उसे आजाद करा लेंगे। अफजल को फांसी की सजा मिलनी चाहिए और मै तो कहूंगा कि इसको सबके सामने फाँसी देनी चाहिए, कि बाकी के आतंकवादियों को भी सबक मिले।

    लोग कह रहे है कि यदि अफजल को फांसी दी गयी तो सैकड़ों आतंकवादी पैदा होंगे, मै कहता हूँ यदि उसे फाँसी की सजा नही मिली तो करोड़ों देश्भक्त, आतंकवादियों के नक्शे कदम पर चलने लगेंगे। अब राष्ट्रपति को सोचना है कि वो सैकड़ो की बात सुनते है या करोड़ों की।

  7. सब की बातें एक तरफ और अफ़ज़ल खुद चाहता है कि उसे माफी नही बल्कि फांसी मिले।

    और नीरज भाई आपने बहुत सारी बातों को सामने लाया है, एक दो दिनों से मेरे दिमाग मे जो बातें उठ रही थीं (अफ़ज़ल के बारे मे) वोह भी आपने बयान किया है – बहुत अच्छे अंदाज़ मे लिखा है।

  8. > ..अफ़ज़ल खुद चाहता है कि उसे माफी नहीं फांसी मिले।
    शुएब भाई, यही तो वह बात है जो इन जेहादियों को और खतरनाक बनाती है। न अपनी जान की परवाह, न औरों की। न अपने परिवार की चिन्ता, न देश की। बस एक देशद्रोह का जुनून और धार्मिक अमरत्व की चाह, जिसे जन्नत में हूरों की गारंटी और लुभावना बनाती है। इस तरह के अन्धे जुनून को परास्त करना लगभग असंभव है। ये कहीं भी, कभी भी हमला कर सकते हैं।

  9. धन्यवाद. मैंने राष्ट्रपति को लिखा जाने वाला पत्र तैयार कर लिया है. इसे परिचर्चा में शामिल कर देता हूं. आप सभी भाइयों से अनुरोध है कि इसे राष्ट्रपति की साइट पर जाकर तुरंत प्रेषित करें.

    टिप्पणियों के लिए एवं उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक आभार व्यक्त करता हूं.

  10. I have written e-mail to the Prez. We have full faith on him. He can not let us down.
    मुझे पूरा विश्वास है कि कलाम साहब कायरों की बात नहीं सुनेंगे।

  11. Very good article. Th best thing is that you’ve written everything based on facts. Also the language you’ve used is very vital. Keep it up. Sorry for using English as I’m doing it from cafe.


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