धुन टीपाकार

October 29, 2006 at 8:58 pm | In सिनेजगत | 16 Comments

धुनें टीपने की आदत हिन्दी फ़िल्मों के संगीतकारों की बड़ी पुरानी है. इनकी इसी आदत की वजह से इन्हें संगीतकार की बजाय आप धुन टीपाकार कह सकते हैं. आप से कोई दो चार नमूनों का पूछ बैठे तो बप्पी लहरी और अनु मलिक का नाम बरबस निकल पड़ेगा. लेकिन ऐसा इन दो के साथ हीं नहीं है. कुछ अंग्रेज़ी अख़बारों और सिने मैगज़ीनों में चोरी की धुनों पर खूब चटखारे लेकर ख़बरें छापी जाती हैं. अपन यहां ज़्यादा कहेंगे नहीं बल्कि धीरे-धीरे पुराने-नए गानों के ओरीजिनल और इनकी टीपी धुनें पाठकों को बताते चलेंगे. 

लीजिए सबसे पहले अनु मलिक की लेटेस्ट फ़िल्म उमराव जान का ये गाना सुनिए

अब ज़रा तीन मिनट इसे सुनिए.

दूसरा गाना नदीम-श्रवण ने अपनी फ़िल्म अंश (2002) में रखा था. अनु मियां ने शादी के इस गीत के बीच के हिस्से को अपने गाने का मुखड़ा बना डाला. नदीम पर पाकिस्तानी धुनें चुराने के इल्ज़ाम खूब लगे हैं. अब नदीम की धुनों को कॉपी करने का राइट अनु मलिक को मिल गया है. कहावत है, चोर का माल चंडाल खाए. 

अपने मुन्नाभाई के शांतनु मोइत्रा को ही देखो. वो तो और भी उस्ताद निकले.. पहली ही फ़िल्म परिणीता (2005) से अपन ख़ुश हुए थे कि वाह शांतनु भाई आपने तो फ़िल्म संगीत का माधुर्य लौटा दिया. ज़रा इन्हें सुनिए-

कैसी पहेली है ये ज़िंदगानी (परिणीता) - बर्ट केल्मर का A Kiss to Build a Dream On (1951)

लेकिन शांतनु ने दोबारा लगे रहो मुन्नाभाई में भी पलीता लगा दिया. इन्होंने क्लिफ़ रिचर्ड के 1961 में आए सदाबहार गाने को जस का तस उठा लिया. और क्लिफ के हिस्से की ताली अब खुद बटोर रहे हैं. हैं कि नहीं? खुद सुन के देख लो.

पल पल हर पल (लगे रहो मुन्नाभाई) Theme For A Dream (Cliff Richard)

चलो अब धूम- धड़ाका पेश करने वाले प्रीतम चक्रवर्ती की सुनो. धूम मचाले धूम मचाले वाह खूब चला था. साल का सुपरहिट रहा. इनका धूम मचाले Jesse Cook के ‘Mario takes a walk’  टीपा गया था. इन्हीं प्रीतम दादा के कुछ हिट गानों को सुन लेते हैं जिन्हें सुनकर हम तो रोमांटिक हो जाते हैं. इन्हें दाद देते थे.. भई वाह, क्या धुनें है गैंगस्टर की. लेकिन अपन को थोड़ी पता था कि ये भी पहुंचे हुए टीपाकार हैं. चलो इनके गाने तौलते हैं-

भीगी भीगी सी हैं रातें का असल है मोहिनीर घोरागुली बैंड का ये गीत पृथिबी

या अली मदद अली का असल है अरेबिक बैंड गिटारा का ये गीत या ग़ली

लम्हा लम्हा रातें को टीपा गया पाकी सिंगर वारिस बेग़ के गाने कल शब देखा(1998) से

नासाछिद्र गायक हिमेश भाई रेशमिया का हिट सॉग मर जावां मिट जावां (आशिक़ बनाया आपने) पाकिस्तानी गायक फ़ाक़िर महमूद के एलबम आतिश के गाने मर जावां की हुबहू नक़ल रही. 

-अनु मलिक का भीगे होंठ तेरे (मर्डर) और पाकिस्तानी गायक नजम सिराज़ का मैनू तेरे नाल

- दिल तू लाया है (क्या कहना) राजेश रोशन ने टीपा नील सेदका का ओ कैरोल से. इसी गीत को एनआरआई बैंड स्टूरियो नेशन भी टीप चुका है.

-अनु मलिक की हेरा फेरी का गीत जब भी कोई हसीना दरअसल मार्क मॉरिसन के रिटर्न ऑफ़ द मैक से लिया गया था.

-यस बॉस का गीत: सुनिए तो रुकिए तो (जतिन-ललित) हिशम अब्बास के अहला मा फ़ेकी से सीधा टीप लिया गया.  

अपन परेशान हैं कि मौलिकता की तारीफ़ करें भी तो किस मुंह से....क्या पता जिसे अपन ओरीजिनल समझे वो उल्लासनगर (USA) ब्रांड की तरह डुप्लीकेट आइटम हो. अब तो तारीफ़ करने से पहले पुराने गानों और अंग्रेज़ी, अरबी या पाकिस्तानी धुनों का ख़्याल भी रखना है. ऐसी सूरत में मुझे मेरा एक शेर याद आता है.

ख़ुदा के वास्ते परदा ना काबे से उठा ज़ालिम,

कहीं ऐसा ना हो यां भी वही काफ़िर सनम निकले.

बहुत निकले मेरे अरमान, लेकिन फिर भी कम निकले. 

देखो अपन ने भी ग़ालिब का शेर टीप लिया.. मौलिकता है ही चीज़ ऐसी जो बैठे बिठाए नहीं मिलती. अगली दफ़ा कुछ पुराने तुर्रमख़ानों की टीपी हुई धुनों पर चर्चा करेंगे. अभी एक बानगी देखिए.. दिल तड़प तड़प के कह रहा है (मधुमति- सलिल चौधरी) असल में पोलिश लोकगीत Szla dzieweczka do gajeczka से प्रभावित था. 

(लेख का मकसद किसी भी संगीतकार की प्रतिभा का अवमूल्यन करना कतई नहीं है. प्रेरणा और टीपने के फ़र्क को समझना है)

स्रोतः इंडियाएफ़एम, इटवोफ़्स, पाकिस्तानीम्यूज़िक, म्यूज़िकइंडियाऑनलाइन, यू ट्यूब व अन्य.

वाह बालेंदु जी

October 13, 2006 at 2:50 pm | In चिट्ठाजगत | 10 Comments

प्रसिद्ध हिन्दी पोर्टल प्रभासाक्षी के संपादक और वाह मीडिया  ब्लॉग वाले हमारे वरिष्ठ साथी बालेंदु शर्मा दधीच जी को सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के लिए माइक्रोसॉफ़्ट कारपोरेशन की ओर से मोस्ट वेल्यूएबल प्रोफ़ेशनल २००७पुरस्कार दिया गया है. ब्लॉगजगत के लिए बालेंदु जी की यह उपलब्धि गर्व का विषय है. मेरी तरफ़ से उन्हें हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं.

जनसत्ता में प्रकाशित समाचार

गांधीगीरी बनाम गांधीवाद

October 11, 2006 at 10:56 pm | In भारतनामा | 16 Comments

 महात्मा गांधी   गांधीगीरी..शब्द सुनने के बाद ऐसा लगा मानो गांधी जी भी दादागीरी की बात कर रहे हों. ये गिरी कब से गीरी बन गया मुझको पता नहीं.. लेकिन इतना ज़रूर है कि जहां ये गीरी जुड़ जाता है वहां एकाधिकार का तत्व जुड़ जाता है. गांधीवाद का गांधी और दादागीरी का गीरी मिलकर गांधीगीरी बना दिए गए. इस चलन को मुन्नाभाई ने चलाया हो ऐसा नहीं है. ऐसा गांधी के जाने के बाद से ही होता आया है. कैमिकल लोचे में आकर फ़िल्मी हीरो गांधी से बात करता है. लोगों ने फ़िल्म देखी और उनमें गांधीगीरी के प्रति आकर्षण जागा.  

मुझे यह बात ठीक नहीं लगती क्योंकि अव्वल तो गांधीगीरी शब्द का प्रयोग मर्यादित नहीं है. दूसरा यह कि किसी मुंबइया भाई के किरदार ने इसे उठाया है. यह गांधीगीरी मुंबई से चलकर लखनऊ, कानपुर जैसे शहरों से होते हुए लंदन तक पहुंच गई है और लोग इसे अपना भी रहे हैं. मीडिया के लिए यह बिकने वाली ख़बर है. ज्वार चढ़ा है जो जल्द उतर भी जाएगा. तब लगेगा कि गांधी को गीरी या वाद में बांधकर इसे कांधे पर ढोना कतई आसान नहीं है. सच्चाई की डगर बहुत कठिन होती है. इस गांधीगीरी में मुन्नाभाई बड़ा हो गया और गांधीवाद छोटा प्रतीत होता है. गांधीगीरी से सहमति की कतार में खड़े लोगों को यही सुखद अहसास हो रहा है कि, चलो इसी बहाने गांधी याद तो किए जा रहे हैं.

दरअसल, मुन्नाभाई दादागीरी छोड़कर गांधीगीरी की बात करता है तो यह महात्मा गांधी की महिमा नहीं है. यह मुन्नाभाई की फ़िल्मी धमक है जो उसके गांधीवाद अपनाने के बाद लोगों के ज़हन में ट्रेलर बनकर सामने आती है. ध्यान दें कि मुन्नाभाई दादागीरी की बजाय गांधी दर्शन की बात कर रहा है तो उसकी बात का वज़न ही इसलिए है कि वो पहले भाई था. वो ऐसे वर्ग का था जो धमकी-चमकी से ही अपना काम कराता है. हिंसा उसकी रोज़ी-रोटी थी. सोचिए, कोई औना-पौना मुन्ना इस समाज में गांधी की बात करे तो लोग क्या उसकी बातों को तरजीह देंगे? कोई सीधा, सरल व्यक्ति गांधी के उपदेश देते हुए गांधीवाद के रास्ते पर ही जीवन जीए तो क्या आप उसे मुन्नाभाई जैसा ही सम्मान देंगे? शायद नहीं. भय बिनु होय न प्रीत. यही वजह है कि छह साल से अहिंसक आंदोलन की प्रतीक बनीं और भूख हड़ताल पर बैठी शर्मीला चानू की गांधीगीरी (गांधीवाद) हमें आकर्षित नहीं करती. हम उसे उसके हाल पर छोड़ देते हैं. गांधी के रास्ते पर चलना दुष्कर है. चंद घंटों के लिए फूल बांटकर और टोपी लगाकर गांधी को फॉलो करना ज़्यादा आसान है.

गांधीगीरी का फ़ार्मूला बहुत पुराना है. यह नाम आज पड़ा है. समाज के सैकड़ों अपराधी इसी गांधीगीरी को अरसे से इस्तेमाल कर रहे हैं. फ़िल्म में चाहे जो किया गया हो लेकिन असल में गांधी के नाम पर राजनीतिक रोटियां चालाकी से सेंक ली जाती हैं और हम उल्लू बन जाते हैं. पिछले हफ़्ते माफ़िया डॉन बबलू श्रीवास्तव को गांधीगीरी पसंद आ गई. इन्हीं दिनों मुझे चैनलों पर कई चिल्हरछाप क्रिमिनल गांधी टोपी लगाए लोगों के बीच फूल बांटते नज़र आए. ऐसे क्रिमिनल जब राजनीति की राह पकड़ते हैं तो पहले गांधी टोपी ही सिर पर चढ़ाते हैं और लोगों को गांधी का संदेश देते हैं. हम भी चुप रहते हैं क्योंकि हमें पता है कि उनकी गांधीगीरी हमें नहीं लुभा रही है बल्कि यह क्रिमिनल की भाईगीरी का असर है कि हम उन्हें चुनने पर मजबूर हो जाते हैं. दूसरा और कोई रास्ता नहीं है. इसके उलट कई ऐसे भी हैं जो बिना किसी लाग-लपेट और प्रपंचों के गांधीवाद का रास्ता अपनाते हैं लेकिन हम उन्हें नज़रअंदाज़ कर देते हैं. तब लगता है कि शायद हमें मुन्नाभाई की गांधीगीरी ही पसंद आती है. और जब तक हमें यह पसंद आती रहेगी तब तक संसद में कई भाई मज़े करते रहेंगे.

असहमत

October 8, 2006 at 9:29 pm | In संकलन | 5 Comments

असहमत

लेखक- हरिशंकर परसाई   ह सिर्फ़ दो आदमियों की बातचीत है  

भारतीय सेना लाहौर की तरफ़ बढ़ गयी- अंतर्राष्ट्रीय सीमा पार करके।

 हां, सुना तो। छम्ब में पाकिस्तानी सेना को रोकने के लिए यह ज़रूरी है। खाक़ ज़रूरी है! जहां वे लड़ें, वहां लड़ना चाहिए या हर कही घुसना चाहिए? 

हां, उधर नहीं बढ़ना था।  मगर मैं कहता हूं क्यों नहीं बढ़ना था? उधर से दबाव पड़ेगा तो इधर तुम्हारे बाप रोक सकते हैं उन्हें? फिर तो उधर बढ़ना ही ठीक हुआ। 

ठीक हुआ! ठीक हुआ! कुछ समझते भी हो इसका क्या मतलब होता है? इसका मतलब होता है- टोटल वार! पूर्ण युद्ध! हमला!”

हां जी, यह तो हमला जैसा ही हो गया।

 मगर मैं कहता हूं, जो इसे हमला कहता है, वह बेवकूफ़ है। हम तो हमले का मुक़ाबला करने के लिए बढ़े हैं।  इस दृष्टि से तो हमारा बढ़ना सुरक्षात्मक कार्रवाई हुआ। मगर सुरक्षात्मक कार्रवाई कहकर तुम दुनिया की नज़रों में धूल नहीं झोंक सकते जो हुआ है, वह सबको दिख रहा है। 

हां, विल्सन ने तो ऐसा कुछ कहा भी है।

 तुम विल्सन के कहने की परवाह क्यों करते हो? जो तुम्हें सही दिखे, करो। बिल्कुल ठीक है। जो देश के हित में हो, वही हमें करना चाहिए। 

देशहित की बात करते हो! देशहित कोई समझता भी है? सिर्फ़ देशहित देखोगे या अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिक्रिया का भी ख़्याल रखोगे? ठीक कहते हो। आज की दुनिया में अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिक्रिया देखना भी ज़रूरी है। 

मगर मैं कहता हूं, अन्तर्राष्ट्रीय रुख़ ही देखते होगे या देश के भले की भी कुछ सोचोगे? अन्तर्राष्ट्रीयता की धुन में ही तो तुम लोगों ने देश को गारत में डाल रखा है!”

 इस बातचीत में जो लगातार सहमत होने की कोशिश करता रहा, वह मैं हूं। मैं उससे बहस नहीं करता, मतभेद ज़ाहिर नहीं करता, सिर्फ़ सहमत होना चाहता हूं। पर वह सहमत होने नहीं देता। वह कभी किसी को सहमत नहीं होने देता। अगर कोई सहमत होने लगता है तो वह झट से असहमति पर पहुंच जाता है। सहमति से भी वह नाराज़ होता है और असहमति से भी। पर असहमति का विस्फोट बड़ा भयंकर होता है। इसलिए मैं सहमत होते-होते निकल जाता हूं, जैसे आंधी आने पर आदमी ज़मीन पर लेट जाए। उसने मेरी तरफ़ देखा। मैं कुछ नहीं बोला। दूसरी तरफ़ देखने लगा। वह खिसियाया- कैसे बेवकूफ़ से पाला पड़ा है! खीजा- कैसे बेईमान लोग हैं! क्रोधित हुआ- सबको देखूंगा! तना- मैं किसी की परवाह नहीं करता! ढीला हुआ- कैसा दुर्भाग्य है दुःखी हुआ- ऐसों की चलती है, मेरी नहीं चलती मन में फिर तनाव आया। वह अंगुलियों के कटाव गिनता हुआ जल्दी-जल्दी चला गया।  

सारी दुनिया ग़लत है। सिर्फ़ मैं सही हूं, यह अहसास बहुत दुःख देता है। इस अहसास में आगे की अपेक्षा होती है कि मुझे सही होने का श्रेय मिले, मान्यता मिले, क़ीमत भी मिले। दुनिया को इतनी फ़ुरसत होती नहीं है कि वह किसी कोने में बैठे उस आदमी को मान्यता देती जाए जो सिर्फ़ अपने को हमेशा सही मानता है। उसकी अवहेलना होती है। अब सही आदमी क्या करे। वह सबसे नफ़रत करता है। खीजा रहता है। दुःख-भरे तनाव में दिन गुज़ारता है।  इसकी दुनिया से इसी तरह की लड़ाई है। पर वह मुझसे ही क्यों उलझता है? हर बार मुझे ही ग़लत क्यों सिद्ध करता है? बात यह है कि पूरी दुनिया से एक साथ लड़ा नहीं जा सकता। दुनिया के हज़ारों मोर्चे हैं और करोड़ों लड़ने वाले हैं। मगर दो देशों की लड़ाई में पूरे देश आपस में नहीं लड़ते। सिपाही से सिपाही लड़ता है। लड़ने के मामले में सिपाही देश का प्रतिनिधि होता है। उन कुछ लोगों को, जिनसे उसकी अक्सर भेंट होती है, उसने दुनिया का प्रतिनिधि मान लिया है। इनमें भी सबसे ज़्यादा मुलाक़ात मुझसे होती है, इसलिए इन कुछ का प्रतिनिधि मैं हुआ। इस तरह दुनिया का प्रतिनिधि मैं बन गया। मुझे ग़लत बताता है तो दुनिया ग़लत होती है। मुझे गाली देता है तो दुनिया को गाली लगती है। मुझ पर नाराज़ होता है तो दुनिया पर नाराज़गी ज़ाहिर होती है। मैं दबता हूं तो दुनिया को दबा देने का सुख उसे मिलता है। सारी दुनिया की तरफ़ से इस मोर्च पर मैं खड़ा हूं और पिट रहा हूं। वह मुझसे नफ़रत करता है। मगर मुझे ढूंढता है। कुछ दिन नहीं मिलूं, तो वह परेशान होता है। जिससे नफ़रत है, उससे मिलने की इतनी ललक प्रेम-सम्बन्ध में भी नहीं होती। मुझसे मिलकर मुझे ग़लत बताकर, मुझ पर खीजकर और मुझे दबाकर जो सुख उसे मिलता है, उसके लिए वह मुझे तलाशता है। विश्व-विजय के गौरव और सन्तोष के लिए योद्धा दुनियाभर की खाक़ छानते थे। वह कुल चार-पांच मील सड़कों पर मुझे खोजता है तो दुनिया को जीतने के लिए कोई ज़्यादा नहीं चलता।  

अगर सारी दुनिया ग़लत और वह सही है तो मैं ग़लत हूं और वह सही है। मैं पहले उससे असहमत भी हो जाता था। तब वह भयंकर रूप से फूट पड़ता था। उसे ग़लत माने जाने पर ग़ुस्सा आता था। वह लड़ बैठता था। गाली-गलौज पर आ जाता था। मैंने सहमत होने की नीति अपनायी। मैं सहमत होता हूं तो वह सोचता है, यह कैसे हो सकता है कि मैं और दुनिया, दोनों ही सही हों। दुनिया सही हो ही नहीं सकती। वह झट से ठीक उल्टी बात कहकर असहमत हो जाता है। तब वह एकमात्र सही आदमी और दुनिया ग़लत हो जाती है। मैं फिर सहमत हो जाता हूं तो वह फिर उस बात पर आ जाता है जिसे वह खुद काट चुका है।  बहुत भ्रष्टाचार फैला है। 

हां, बहुत फैला है।  लोग हल्ला ज़्यादा मचाते हैं। इतना भ्रष्टाचार नहीं है। यहां तो सब सियार हैं। एक ने कहा, भ्रष्टाचार! तो सब कोरस में चिल्लाने लगे भ्रष्टाचार!”  

मुझे भी लगता है, लोग भ्रष्टाचार का हल्ला ज़्यादा उड़ाते हैं।  मगर बिना कारण लोग हल्ला नहीं मचाएंगे जी? होगा तभी तो हल्ला करते हैं। लोग पागल थोड़े ही हैं।  

हां, सरकारी कर्मचारी भ्रष्ट तो हैं।  सरकारी कर्मचारी को क्यों दोष देते हो? उन्हें तो हम-तुम ही भ्रष्ट करते हैं।  

हां, जनता खुद घूस देती है तो वे लेते हैं।  जनता क्या ज़बरदस्ती उनके गले में नोट ठूंसती है? वे भ्रष्ट न हों तो जनता क्यों दे?  

कोई घटना होती है तो वह उसके बारे में एक दृष्टिकोण बना लेता है और उससे उसका उल्टा दृष्टिकोण पहले ही मन में हमारे ऊपर मढ़ देता है। फिर वह हमसे उस आरोपित दृष्टिकोण के लिए नफ़रत करता है। नफ़रत इतनी इकट्ठी हो जाती है कि वह उस घटना के लिए ज़िम्मेदार भी हमें मान लेता है। चीन ने भारत को तीन दिन का अल्टीमेटम दिया तो उसे लगा, जैसे अल्टीमेटम हमने दिया हो। बस्तर में आदिवासियों पर गोली हमने ही चलायी। रोडेशिया में गोरी तानाशाही कायम हो गयी तो, उसे लगा, जैसे हमने ही इयान स्मिथ की सरकार बनवा दी हो। वियतनाम पर अमेरिकी बमबारी फिर शुरू हो गयी तो उसने मान लिया कि हमने ही बम-वर्षा का हुक्म दिया है। कुछ दिन वह खूब भन्नाता रहा। मिला नहीं। एक दिन वह मिल गया। ऐसे मिला, जैसे युद्ध-अपराधियों से मिल रहा हो। मिलते ही फूट पड़ा-  तुम्हारे अमेरिका ने फिर बम बरसाना शुरू कर दिया है। उसने हमें ऐसे देखा, जैसे पुलिस हत्यारे को देखती है।  

हमने कहा, यह बहुत बुरा किया। इससे क्रान्ति की आशा फिर नष्ट हो गयी।  वह एक क्षण को सहम गया। वह कई दिनों से हमें बमबारी का समर्थक मानकर हमसे नफ़रत कर रहा था। मगर हम तो बमबारी की निन्दा कर रहे थे। अब वह क्या रुख़ अपनाए! उसे संभलने में ज़्यादा देर नहीं लगी। खीजकर बोला, शान्ति? वॉट डू यू मीन बाइ शान्ति? यह शब्द झूठा है। सब साले शान्ति की बात करते हैं और लड़ाई की तैयारी करते हैं!” 

हम चुप। उसे सन्तोष नहीं हुआ। उसने साफ़ रुख़ अपना लिया, कह दिया, बुरा किया क्या बुरा किया? उत्तर से दक्षिण में फौज आती हैं, चीनी हथियार आते हैं। उसके ठिकानों पर बम गिराये बिना कैसे काम चलेगा?  इस दृष्टि से तो बमबारी ठीक मालूम होती है।  

क्यों ठीक है? नागरिक क्षेत्रों पर बम बरसाना ठीक है, यह कहते शर्म आनी चाहिए!”

हां, नागरिक क्षेत्र पर अलबत्ता बम नहीं गिराना चाहिए।

 मैं कहता हूं, कहीं भी क्यों गिराना चाहिए? अमेरिका को क्या हक़ है इधर आने का? यह उसके राज्य का हिस्सा नहीं है।  ठीक कहते हो। एशिया में अमेरिका को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।  

मगर बहुत-से बेवकूफ़ इस नारे को बिना समझे लगाते हैं। वे भूल जाते हैं कि इधर चीन बैठा है जो सबको निगल जाएगा।  हम चुप हो गए। वह कुछ भुनभुनाता रहा। फिर झटके से उठा और अंगुलियों के कटाव गिनता हुआ फुर्ती से चला गया।  

गोरे और सुडौल इस जवान के कपाल पर तीन रेखाएं खिंची रहती हैं। हमेशा तनाव में रहता है। नौकरी उसकी साधारण है। एक कॉलेज में पढ़ाता है। कॉलेज से नफ़रत करता है। लौटता है तो जैसे पाप करके लौट रहा हो। प्रिंसिपल से, साथियों से, विद्यार्थियों से नफ़रत करता है। बगीचे में खिले फूलों से भी उसे नफ़रत है। मकान मालिक से इसलिए नाराज़ है कि मकान उसका है। नगरपालिका से सड़क के लिए नाराज़ है। नाले से मच्छरों के लिए नाराज़ है। दुनिया से क्यों नाराज़ है, यह ठीक वही जानता होगा। मैं अन्दाज़ ही लगा सकता हूं।   शुरू में ही उसने दुनिया से कुछ ज़्यादा ही उम्मीद कर ली होगी। बहुत-से नौजवान मौजूदा हालात के संदर्भ में महत्वाकांक्षा नहीं बनाते। वह अनुपात से ज़्यादा हो जाती है। बहुत-से तो अपने पिता के ज़माने के सन्दर्भ में महत्वाकांक्षा बना लेते हैं- पिता के ज़माने में हर एम.ए. पास प्रोफ़ेसर हो जाता था, अब नहीं होता। मगर उस सन्दर्भ में जो एम.ए. होकर प्रोफ़ेसर बनने का तय कर लेता है, वह अक्सर निराश होता है। महत्वाकांक्षा के कारण वह स्कूल की नौकरी भी नहीं करता, बेकार रहता है। घुटता है। इस आदमी ने भी जवानी के शुरू मे तय कर लिया होगा कि मुझे दुनिया से इतना मिलना चाहिए, यह मेरा हक़ है। इस हिसाब से कहीं वह गड़बड़ कर गया। उसने योग्यता के हिसाब से महत्वाकांक्षा नहीं बनायी। अपने मूल्य-निर्धारण में वह ज़्यादा ही उदार हो गया। उसने शुरू में ही विशिष्टता से अपने को मण्डित कर लिया। साधारण से विशिष्ट बनने की ज़रूरत उसने नहीं समझी। उसने मौजूदा ज़माने की स्पर्धा, पक्षपात और चतुरता को भी नज़रअंदाज़ कर दिया। कॉलेज में पढ़ाना चाहता था तब इस घटिया कॉलेज में नौकरी मिली। उसने मान लिया कि दुनिया ने उसकी क़ीमत नहीं दी। उसके साथ अन्याय किया और सिर्फ़ उसी के साथ। वह आसपास आगे बढ़ते हुए तुच्छ लोगों की भीड़ देखता और सबसे नफ़रत करता है। उसका व्यक्तित्व टूटता है, वह उसे जैसे-तैसे समेटकर दुनिया के सामने चुनौती देकर खड़ा होता है। स्थायी असहमति उसका अपने आपको जोड़ने का प्रयत्न है। इससे वह विशिष्ट बने रहने की कोशिश करता है क्योंकि विशिष्ट हुए बिना वह जी नहीं सकता। एक बार ही मैंने उसे समहत होते पाया है। उसने केन्द्रीय सरकार में किसी बड़ी नौकरी के लिए आवेदन किया था। वह उसे नहीं मिली। मुझे मिला तो मैंने पूछा।  

उसने कहा, नहीं मिली

 

मैं डर रहा था कि कहीं इसने इसके लिए भी मुझे ही ज़िम्मेदार न मान लिया हो। पर उसकी आंखों में ऐसा आरोप-भाव नहीं था। मेरी हिम्मत बढ़ी। मैंने कहा, आजकल पक्षपात बहुत चलता है।   वह सहमत हो गया। बोला, ठीक कहते हो। ऊपर के लोग अपनों को अच्छी जगह फिट करते हैं।  

और योग्य आदमियों की अवहेलना होती है।  हां, और नालायक ऊंचे पदों पर बिठाये जाते हैं।  

तभी तो सब जगह स्तर गिर रहा है।   अरे भाई, स्तर तो कुछ रहा ही नहीं।  पता नहीं, कब तक यह अन्धेर चलेगा!” 

मैं भी यही सोचता हूं कि आख़िर ऐसा कब तक!”

सहमति के इस दुर्लभ क्षण को मैं बिगड़ने नहीं देना चाहता था। इसलिए इससे पहले कि वह किसी बात पर असहमत हो उठे, मैं चल दिया। वह भी मुड़ा। मगर वह अंगुलियों के कटाव नहीं गिन रहा था।   (भारतीय ज्ञानपीठ से साभार)

नंदिता हक्सर और यासीन मलिक जवाब दो

October 5, 2006 at 11:20 pm | In भारतनामा | 16 Comments

हे राष्ट्रपति इसे माफ़ मत करना भाग दो.   

न दिनों मोहम्मद अफ़ज़ल को फांसी दिए जाने के विरोधियों की सक्रियता अपने चरम पर पहुंच गई है. अपने तर्कों से ये चरमपंथियों के पैरोकार नज़र रहे हैं. तीन-चार दिनों में ख़बरिया चैनलों और अख़बारों में इन बुद्धिजीवियों (?) ने अफ़ज़ल के बचाव में बयान देने और अपने तर्कों के माध्यम से कुछ कहने की कोशिश की है. सभ्य समाज में हर किसी को अपनी बात कहने का अधिकार है. हम रायशुमारी में यक़ीन करने वाले मुल्क़ में रहते हैं. लेकिन हमारी यह कोशिश होनी चाहिए कि जो कुछ ग़लत लगे, उसके ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ उठाएं. चैनलों पर पिछले दो दिनों में मेरा सामना उन विचारों से हुआ जो अफ़ज़ल के बहाने कश्मीर समस्या और कटु हो चुके भारत-पाक संबंधों पर आधारित थे. फांसी विरोधी इन्हीं बिंदुओं पर अपने तमाम तर्क पेश कर रहे हैं. बीजेपी को छोड सभी राजनीतिक दल या तो मौन हैं या फिर वही बातें कर रहे हैं जो उनके राजनीतिक वोटबैंक को मज़बूत करती हैं. पिछले दो दिनों में मैंने जनमत पर यासीन मलिक, इंडिया टीवी पर नेशनल कॉर्फ़ेंस नेता फ़ारूक़ अब्दुल्ला, आईबीएन पर जेकेएलएफ़ लीडर यासीन मलिक, एनडीटीवी पर संसद हमले में बरी हुए एसएआर गिलानी और बीबीसी हिन्दी पर वक़ील और मानवाधिकार कार्यकर्ता नंदिता हक्सर के विचार सुने. इसे शो एंकरों की जानकारी का अभाव कहा जाए या समय की कमी लेकिन फांसी विरोधियों के कुछ तर्कों के जवाब और उनसे किए जा सकने वाले सवाल इन बहस में अनकहे रह गए. मैं फांसी विरोधियों के उन तमाम तर्कों के जवाब और उन पर नए सवाल खड़े करना चाहता हूं. 

यासीन मलिक कहते हैं कि अफ़ज़ल को फांसी दिए जाने से भारत-पाक के बीच शांति वार्ता पर रुकावट आएगी. क्या मलिक यह कहना चाहते हैं कि अफ़ज़ल का पाकिस्तान से कोई नाता है? क्या पाकिस्तान के भरोसे पर यह आतंकी पल रहा था. क्यों नाराज़ होगा पाकिस्तान? नंदिता हक्सर तर्क देती हैं- संसद पर हमले के असली मास्टरमाइंड मसूद अज़हर, ग़ाज़ी बाबा और तारीक़ अहमद हैं. नंदिता जी क्या तब भी मानेंगी कि पाकिस्तान में खुलेआम घूम रहे मसूद अज़हर की वापसी के बिना हम शांति वार्ता शुरू कर दे? 

नंदिता जी का अगला तर्क है- अफ़ज़ल को बचाव का मौक़ा नहीं मिला. मैं पूछता हूं कि आज आप अफ़ज़ल को बचाने के लिए सड़कों पर धरने तक दे रही हैं. जब ये मामला कोर्ट में था तब आपने एसएआर गिलानी की पैरवी की और उसे छुड़ा भी लिया.. लेकिन तब आपने अफ़ज़ल का क्यों नहीं सोचा? देश की जेलों में बंद हज़ारों क़ैदी बिना क़ानूनी सहायता के सालों क़ैद ग़ुज़ारने पर मजबूर हैं. आप तो मानवाधिकार कार्यकर्ता भी हैं. आपको उनकी फ़िक्र क्यों नहीं होती?आप आज एनडी पंचोली के बारे में कह रही हैं कि उन्हें फौजदारी मुक़दमों का अनुभव कम था, तो मैं आपसे पूछना चाहता हूं कि तब अफ़ज़ल ने किस बिनाह पर गवाहों से पूछताछ के अधिकार ले लिए थे? आप उसी वक़्त उनके बचाव मे आगे क्यों नहीं आईं?  नंदिता जी ये भी बताएं कि ये कैसा राज्य हैं जहां सेक्स स्कैंडल के नाम से सनसनीखेज़ आरोप लगे. घाटी में इस स्कैंडल का चरमपंथियों समेत अधिकांश लोगों ने जांच कराने के लिए भारी ग़ुस्से का इज़हार किया. रातों-रात कई ग़िरफ़्तार किए गए. चूंकि कश्मीर के लोगों की भावनाएं थी इसलिए जम्मू-कश्मीर बार एसोसिएशन के वक़ीलों ने आरोपियों के मुक़दमें लड़ने से इंकार कर दिया. तब कहां गई न्याय दिलाने की बात? ये कैसा बार एसोसिएशन हैं जो सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद भी पैरवी करने से इंकार कर देता है? मजबूरन पूरा केस चंडीगढ़ कोर्ट में ट्रांसफ़र करना पड़ा. क्या आरोपी को अपने बचाव का मौक़ा देने और वक़ील करने के अधिकार को सुनिश्चित किया गया? मैं सीधे तौर यही कहना चाहता हूं कि कश्मीर के आतंकी राज में वक़ीलों ने अपनी जान की ज़्यादा की फ़िक्र की. 

नंदिता जी, आप सुप्रीम कोर्ट की लॉयर हैं. बीबीसी पर आपका बयान छपा है- अमरीका में 9/11 के अभियुक्त ज़कारियास मुसावी के मामले में जूरी और अदालत ने भारतीय अदालत के मुकाबले में ज़्यादा संवेदनशील रवैया अपनाया.आप क्या कहना चाहती हैं? क्या आप सुप्रीम कोर्ट की निष्पक्षता और प्रक्रिया पर सवाल उठाना चाह रही है? क्या ये देश की सर्वोच्च अदालत का अपमान नहीं है? दुनियाभर में दादागिरी कर रहे अमेरिका की व्यवस्था पर आपका विश्वास है लेकिन सिर्फ़ अफ़ज़ल के मामले में आपको अब भारतीय अदालतों की निष्पक्षता पर भी संदेह होने लगा है? क्या इसी न्यायिक तंत्र के चलते आप प्रोफ़ेसर गिलानी को छुड़ाने में कामयाब हो गईं?  यासीन मलिक साहब, आपने जनमत पर कहा है कि महात्मा गांधी भी ब्रिटिश पासपोर्ट पर दुनिया घूमते थे. यानी कि आप जो भारतीय पासपोर्ट लेकर दुनिया घूमते हैं और अपने को गांधी के समकक्ष खड़ा करना चाहते हैं. उस महात्मा ने अहिंसा की ख़ातिर भगत सिंह तक का खुलेआम बचाव करने से इंकार कर दिया था. वो चाहते तो अनशन उपवास रखकर देशभर में आंदोलन खड़ा करवा लेते लेकिन वे हिंसा के रास्ते से आज़ादी नहीं लाना चाहते थे. बहुत फ़र्क है आपके और गांधी में.. ज़मीन और आसमान का.  

दूसरी बात यासीन कहते हैं कि संसद पर हमले के षडयंत्र में अफ़ज़ल का भूमिका मामूली थी. जिन्होंने हमला किया वो तो तुरंत मारे गए थे. यही तर्क फ़ारूक़ अब्दुल्ला भी देते है. क्या मास्टरमाइंड होना सज़ा देने के लिए काफ़ी नहीं. क्या ओसामा बिन लादेन और जरकावी ने खुद हवाई जहाज़ लेकर ट्विन टॉवर उड़ाए थे? फ़ारुक़ ने ही कुछ दिनों पहले यह खुलासा किया था कि मसूद अज़हर की रिहाई का उन्होंने विरोध किया था. तो आदरणीय फ़ारूक़ जी अब ये बताएं कि अफ़ज़ल पर दया क्यों आ रही है? वो मसूद तो पाकिस्तान में बैठा है. आए दिन चैनलों पर तक़रीरें देता घूमता-फिरता दिखता है. तब भी हम क्या शांति वार्ता करते रहेंगे? अब मलिक का एक और बचाव देखें.. वो कहते हैं भगत सिंह ने संसद में बम फेंका था. उसे तो लोग आतंकवादी नहीं कहते हैं. वाह मलिक साहब, चलिए मैं मान भी लूं कि हिन्दुस्तानी हुक़ूमत से आपकी नहीं बनती. आपका यहां की व्यवस्था पर यक़ीन नहीं तो मैं यह बताना चाहूंगा कि भगत सिंह ने संसद में बम इस तरीक़े से फेंका था कि किसी को चोट ना लगे.. वो अंग्रेज़ सरकार तक अपनी बात पहुंचाना चाहते थे इसलिए उन्होंने संसद के भीतर पर्चे फेंके. इस भगत सिंह ने कभी क़ौमी नफ़रत की बातें नहीं की. आपको सपोर्ट करने वाले दुनियाभर में क़ौम के नौजवानो को जन्नत के सपने दिखा रहे हैं और बदले में इस दुनिया को दोजख बनाने पर तुले हुए हैं. 

आप अपने आंदोलन को अब अहिंसक बता रहे हैं लेकिन समर्थन आप हिंसावादियों का करते हैं ये कैसा विरोधाभास है. आपके इतिहास पर ग़ौर करूं तो पाता हूं कि अमानुल्ला ख़ान को किनारे लगाने के लिए आप ही को पाकिस्तान ने मोहरा बनाया था. क्या आप भूल गए कि पिछले साल ही आपने यह कबूल किया था कि पाकिस्तान ही आपको हथियार मुहैया कराता था. मलिक साहब, आपको दूध में से मक्खी की तरह जब पाकिस्तान ने किनारे लगा दिया तो आप अहिंसावादी होने की दुहाई दे रहे हैं? बंदूक छोड़ने के बाद क्यों आपको विदेशी धन की ज़रूरत आन पड़ी? कैसे भूल जाएं कि आपके बंदूक थामने के बाद ही तीन लाख कश्मीरी पंडितों को अपनी धरती छोड़नी पड़ी. कैसे भूल जाएं कि उनकी मां-बेटियों पर क्या क्या अत्याचार किए आपके जेकेएलएफ़ ने? उनकी वापसी पर आप यह कहते हुए शर्त लगाते हैं- “They are welcome provided they stay neutral in the ongoing (freedom) struggle”. इसे क्या समझा जाए..? यही कि आप जो करो वो ठीक है, हमारे सैनिक सीमाओं की रक्षा के दौरान और आत्मरक्षा के लिए आपकी उन्मादी भीड़ पर गोली चला दें तो अत्याचार हो गया? आपने कश्मीर मे सिरे से कश्मीरी पंडितों की ethnic cleansing कर दी और तब नंदिता हक्सर जैसे मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को तरस नहीं आया? 

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