कीबोर्ड का सिपाही

संथाराः मोक्ष का मार्ग या आत्महत्या

Posted in भारतनामा by neerajdiwan on September 28, 2006

यपुर की विमला देवी जी के निधन और उससे पूर्व तेरापंथी जैन संप्रदाय के संथारे कर्म को लेकर चहुंओर यह बहस छिड़ गई कि संथारे को मोक्ष का मार्ग माना जाए या आत्महत्या.  राजस्थान हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की गुज़ारिश को स्वीकार कर सरकारों को नोटिस जारी किया कि वे कैसे इस प्रथा को सती से अलग ठहरा सकते हैं. बहस बढ़ती चली गई और तरकश के संजय बेंगानी जी ने तरकश पर संतुलिख आलेख प्रस्तुत किया. तदुपरांत मेरे मन में भी कई प्रश्न खड़े हो गए जिसे सुनील दीपक जी ने भी उचित माना. इन सवालों पर विचार करने के उपरांत संजय भाई ने दोबारा विस्तार से   इसी विषय पर प्रकाश डाला. मैं उनका हृदय से आभार व्यक्त करता हूं.

अब संजय भाई के उस आलेख के बाद और उठ रहे कुछ सवालों के साथ मैं पुनः संथारे पर अपने विचार रखना चाहता हूं. संजय भाई लिखते हैं- यूथेनेज़िया, आत्महत्या और संथारे में भेद को समझने के लिए हमें पहले मृत्यु के भेद को वर्गीकृत कर समझना होगामनुष्य की मृत्यु के तीन मार्ग हैं: 1. प्रकृति द्वारा मारा जाना 2.  दूसरों द्वारा मारा जाना और 3. अपने आप को मार देना.

प्राकृतिक मौत पर तो किसी भी तरह से हमारा वश नहीं हो सकता, अतएव इस पर चर्चा की आवश्यकता ही नहीं है. इसी तरह दूसरों द्वारा मारे जाने मे वे कृत्य जो अपराध नहीं है, के अंतर्गत युद्ध और मुठभेड़ और मृत्युदंड का संजय भाई ने समावेश किया है. मेरा प्रेक्षण है कि निरपराध मृत्युवरण के वर्ग में ही आने वाले यूथेनेज़िया को लेकर बेल्जियम, हॉलैंड और ऑस्ट्रेलिया के कुछ राज्यों में कोई विवाद नहीं है. इन देशों में इसे मान्यता मिल चुकी है. अन्य देशो में इस पर आए दिन बहस होती रहती है. यह बहस तब और तीव्र हो चली थी जब डाएन प्रेटी और टैरी शाइवो के मामले दुनिया के सामने आए. अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने भी ओरेगन राज्य में हुए ऐसे ही एक मामले में यूथेनेज़िया को इस शर्त के साथ फैसला दिया कि मृत्यु की कामना करने वाले की राय ही अहम है. अमेरिका में इस तरह के क़ानून वहां की राज्य सरकारें बनाने के लिए भारत की तुलना में ज़्यादा स्वतंत्र हैं. मेरी नज़र में यूथेनेज़िया को सीधे तौर पर इच्छामृत्यु कहना ठीक नहीं होगा क्योंकि यहां मृत्यु को वरण करने की मरीज़ की इच्छा सदैव नहीं होती. पिछले दिनों हुआ भारत का मामला कुछ और था. यहां हैदराबाद के युवक वेंकटेश की इच्छा के बावजूद उसे आंध्रप्रदेश हाईकोर्ट ने मरने की इजाज़त नहीं दी. वेंकटेश असाध्य बीमारियों से पीड़ित अस्पताल में भरती था जो अपने अंगदान करना चाहता था. अंततः वो अधूरी इच्छा लिए दुनिया से चल बसा.

अब चर्चा करें, अपने आप को मारकर मृत्यु को प्राप्त करने के उपायों पर जिन्हें लेकर विवाद होते हैं. पहले आत्महत्या और इसके बाद सती और संथारे का फ़र्क समझेंगे. आत्महत्या विशुद्ध अपराध है. जिसे भारतीय दंड संहिता की धारा 309 के तहत अपराध माना गया है. आत्महत्या ऐसा कृत्य है जो उद्वेग में किया जाता है. इसके कारण विषाद, निराशा, असफलता अथवा ग्लानि के बीच छुपे होते है. आत्महत्या की हर घटना के बाद पूरे समाज के समक्ष भी सवाल खड़ा होता है कि क्या हम अपने बीच के किसी व्यक्ति की चिंताओं को लेकर बेज़ार हो चुके हैं उसकी आत्महत्या का कारण बनते हैं. यहां भारतीय समाज में मनोविज्ञान के महत्व को कम समझने पर भी विचार आवश्यक है. इस विषय पर अलग से चर्चा की जा सकती है.

अब अहम बिंदु पर आते हैं. विषय संथारे पर केंद्रित है. संजय भाई लिखते हैं कि आत्महत्या के ऐसे प्रयास जो अपराध नहीं है उसमे समाधि, संथारा  और सती महत्वपूर्ण हैं. मेरे विचार से संथारे और सती के बीच का फ़र्क यह है कि सती होना अपने दिवंगत पति के पीछे दुनिया त्यागने की चाह की परिणति है. सती प्रथा को हमारा क़ानून अपराध मानता है. मध्यकाल में इसका ज़बर्दस्त दुरूपयोग हुआ है. आज भी यदा-कदा इस तरह के मामले हमारे सामने आते हैं. विडम्बना ही है कि कोई पति कभी सता नहीं होता. फिर इस प्रथा को हमने त्याग दिया. जब सती मे एक तरफ़ पति का मोह है तो दूसरी तरफ़ क्या संथारे में मोक्ष का मोह है? सनातनी परंपरा के अनुसार भी जीवन-मृत्यु के चक्र से मुक्ति का एकमेव उपाय है मोक्ष. क्या संथारा इसी की कामना में मृत्यु का वरण करने का कर्म है?

तेरापंथी जैन समाज इसे जीवन के प्रति मोह न मानकर मृत्यु को खुशी से अंगीकार करने वाला कर्म बताता है. जैन आचार्य मुनि महाप्रज्ञ के अनुसार संथारा एक तप है जो असाध्य बीमारी की दशा में अथवा मोक्ष की प्राप्ति के लिए की एक तपस्या है.महाप्रज्ञ जी के विचार हैं कि यह आत्मशोधन का प्रयोग है. जिसके लिए बाध्य नहीं किया जाता है. हम उन्हें ही संथारे की अनुमति देते हैं जो पूर्ण मनोबल के साथ इस तप को करने के लिए प्रतिबद्ध होता है.यह भी कहा जाता है कि इस तप के चलते कुछ लोग जीवन को वापस जीने के लायक बना लेते हैं. राजस्थान के बीकानेर से संथारे के समाचार आए दिन सुनने मिलते हैं. विमला देवी बुज़ुर्ग महिला थीं. वे कैंसर से पीड़ित थी और मेडिकल साइंस की भाषा में वह Terminally ill थीं. उनकी मृत्यु क़रीब थी.

संथारे के विरोधी कहते हैं कि युवा संथारा क्यों नहीं करते? जिसके जवाब में कहा जाता है कि जिनके उत्तरदायित्व पूरे हो गए हों उन्हें संथारा लेना चाहिए. यह सवाल भी उठाया जाता है कि जो बच्चे अपने बूढ़े मां-बाप या रिश्तेदारों को अलग-थलग कर देते हैं यानी उनकी परवाह करना नहीं चाहते ऐसे में तिरस्कार से बचने के लिए बुज़ुर्ग मजबूरी में इस प्रथा का सहारा लेते हैं. मेरी चिंता भी यही है कि इसका अतिप्रचार इस अद्भुत आध्यात्मिक महत्व की परंपरा का दुरूपयोग बढ़ा सकता है. किंतु विमला देवी जी के मृत्यु को गले लगाने के फ़ैसले को मैं विशुद्ध रूप से संथारा मानता हूं जहां चिकित्सकों ने उन्हें मृत्युशैया पर घोषित कर दिया था. पंद्रह दिनों के अन्न-त्याग के उपरांत उनका जग त्यागना उस पीड़ा से बेहतर है जो जीते-जी उन्हें झेलनी पड़ती.

मृत्यु परम सत्य है. संथारा इसे अंगीकार करने का अद्भुत कर्म है जिसके लिए आपका भौतिक उत्तरदायित्वों से निवृत होना परम आवश्यक है. संथारा कर्म के पहले आपकी जिजीविषा समाप्त हो जानी चाहिए.