कीबोर्ड का सिपाही

जेपी दत्ता की उमराव जान

Posted in सिनेजगत by neerajdiwan on September 24, 2006

एश्वर्या राय बनीं उमराव जान

जेपी दत्ता की फ़िल्म का एक गाना है- ऐसा लगता है जो ना हुआ, होने को है. रेगिस्तान की रेत में संवेदनाओं के फूल खिलाने वाले ज्योति प्रकाश दत्ता इस बार अवध की उमराव जान पर फ़िल्म ला रहे हैं. यह फ़िल्म अक्टूबर के तीसरे शुक्रवार को रिलीज़ होगी. सरहद से लेकर एलओसी तक जेपी दत्ता की हरेक फ़िल्म में रेगिस्तान का होना अनिवार्य रहा है. उनकी आने वाली फ़िल्म उमराव जान अवध की कथा है लेकिन इसे दत्ता का रेगिस्तान प्रेम ही कहा जाएगा कि उमराज जान के कई दृश्यों की शूटिंग जोधुपर में हुई है. राजपूत राजघरानों की आन-बान और देशभक्ति से ओतप्रोत बजती रणभेरियां अवध की उमराव जान से कोसो दूर हैं. लखनऊ की अपनी नफ़ासत है. दत्ता के लिए यह चुनौती होगी कि वे अपने इन लगाव को उमराव जान से कितना दूर रख पाए.

 

उमराव विशुद्ध संवेदनाओं की कथा है. उस स्त्री की व्यथा कथा है जो औरों के ग़म भुलाने के एवज में खुद ग़मों का सागर अपने दामन में समेट लेती है. यह मुस्कान के बदले आंसुओं का सौदा है. शहरयार का गीत ये क्या जगह है दोस्तों ये कौन-सा दयार है, अमीरन से उमराव जान अदा बनने की व्यथा कथा का निचोड़ है. बहुतों के लिए दत्ता का उमराव जान को हाथ लगाना दुस्साहस लग रहा है. दत्ता की उमराव नाचेगी ! इतनी गुंजाइश निर्देशक निकाल सकता है. वे लखनऊ में ही जन्में मुज़फ़्फ़र अली की भांति साहित्य मर्मज्ञ नहीं जो मिर्ज़ा मोहम्मद हदी रुसवा के नॉवेल को जस का तस पर्दे पर उतार दे. जब संजय लीला भंसाली की पारो और चंद्रमुखी नाच सकती हैं तो उमराव क्यों नहीं? साठ के दशक में निर्देशक रहे और जेपी के पिता ओपी दत्ता ने कहानी में मामूली फेरबदल किया है. पिता का साथ जेपी के लिए हमेशा उत्साहवर्धक रहा है. उनका कड़ा अनुशासन पूरी यूनिट को लय देता है. गति और ऊर्जा देता है. तभी ग़ुलामी, रिफ्यूजी और बॉर्डर जैसी कृति परदे पर अवतरित होती हैं.    

ओपी दत्ता ने फ़िल्म के संगीत के लिए फिर अनु मलिक पर भरोसा जताया है. मीडिया में बने परसेप्शन से परे अनु पर उनका भरोसा सफलता के साथ कई दफ़ा आज़माया जा चुका है. बक़ौल ओपी, अनु इस टीम के मोजार्ट हैं और उमराव जान का संगीत उनके लिए बड़ी चुनौती. अनु मलिक का अपनी प्रतिभा से दुश्मनी का रिश्ता है. अनु ने अपने शुरूआती दौर में भीषण संघर्ष किया है और सफलता को किसी भी शर्त पर छोड़ना नहीं चाहते. जिन दिनों बच्चे खेलकूद में डूबे होते हैं, उन दिनों अनु काम मांगने के लिए दर-दर ठोकर खाते थे. पर्दे की रुपहली दुनिया का यह सच स्याह है. 18 साल की छोटी-सी उम्र में अनु ने सोहनी महिवाल का संगीत दिया जो उस दौर का हिट संगीत था.  

अनु पर छीटांकशी होती है- धुनें चुराने की. संगीत के जानकार इसे प्रेरणा कहते हैं तो बाज़ार के नुमांइदे इसे सफलता का आज़माया गुर कहते हैं. फिर भी अनु के उन गीतों को ताक पर रखें जो विवादों मे रहे तो रिफ्यूजी का ‘’ऐसा लगता है जो ना हुआ‘’ गीत सब पर भारी पड़ता है. मौलिकता से भरपूर बहुत कुछ है उनके पास.    अनु ने अपने प्रतिभाशाली पिता सरदार मलिक का संघर्ष और नैराश्य देखा है. वह उनके रास्ते पर नहीं चलते हुए बाज़ार के तेवर के अनुरूप अपनी माला गढ़ता है और अपनी नैसर्गिक प्रतिभा को भी अनदेखा करता है. अनु के सामने चुनौती थी कि वे जेपी दत्ता की उमराव जान के संगीत में जान डाल दें. डेढ़ दशक पहले आई उमराव जान में खैय्याम की मौसिक़ी और शहरयार के बोलों ने सुनने वालों की रूह को छू लिया था. अनु मलिक अगर दुनियादारी से आज़ाद होकर सृजन में खो जाएं तो कुछ भी संभव है. ठीक जेपी दत्ता की तरह अनु का निष्णात सृजन अब भी भविष्य के गर्भ में है. इस पूरे परिदृश्य में जावेद अख़्तर का अहम किरदार है. वे उमराव जान के होठों पर बोल सजाएंगे. जिसे अलका याज्ञिक के सुरों से एश्वर्या राय के होठों पर गुनगुनाया जाएगा. उन्नीसवीं सदी की उमराव को यह इक्कीसवीं सदी की श्रद्धांजलि होगी. पूरी यूनिट को उम्मीद है कि उनका प्रयोग दर्शकों को पसंद आएगा. अब दत्ता, अनु, जावेद और एश्वर्या कसौटी पर कसे जाएंगे.