बीच बहस में – वंदेमातरम्
हिन्दी सिनेजगत के मशहूर गीतकार जावेद अख़्तर की देशभक्ति पर शंका करना न सिर्फ़ निरर्थक होगा बल्कि मूर्खता भी होगी. खुद देशभक्ति के कई तराने लिख चुके जावेद अख़्तर ने वंदेमातरम् पर सारगर्भित बयान दिया है जो मुझे पसंद आया. कुछ ऐसे हैं जो इससे गुरेज़ रखें किंतु वे भी मानेंगे कि जावेद अख़्तर जैसों की हिम्मत सिर्फ़ हिन्दू चरमपंथियों के सामने ही नहीं दिखती बल्कि वे मुस्लिम नेताओं के कई दफ़ा आए उलजुलूल बयानों पर तीखा कटाक्ष करते रहते हैं. वंदेमातरम् पर क्या कहा है जावेद अख़्तर ने, यहां देखें-
”उलेमा-मौलवी वगैरह फ़तवा जारी करेंगे कि मुसलमानों को वंदेमातरम् नहीं गाना है तो मैं वंदेमातरम् ज़रूर गाउंगा. जब संघ परिवार वाले कहें कि भारत में अगर रहना है तो वंदेमातरम् कहना होगा, तो मैं बिलकुल नहीं गाउंगा.”
आज देश-दुनियाभर में वंदेमातरम् गाया जाएगा. गाया जाना चाहिए. किंतु जो नहीं गाना चाहते उनकी देभक्ति का पैमाना इसके गायन से जुड़ा नहीं है. दरअसल, वंदेमातरम् में वंदे शब्द का अर्थ प्रार्थना से जुड़ा है. इस्लाम में प्रार्थना सिर्फ़ खुदा की होती है. यहां तक कि मक्का-मदीना और दरगाहों पर भी झुककर सजदा नहीं किया जाता है. किंतु फ़तवे जारी कर मुस्लिम पालकों को अपने बच्चों को इस दिन स्कूल ना भेजने का मूर्खतापूर्ण ऐलान करना विभाजनवादी मानसिकता है. यह बच्चों की निर्मलता और अबोधपन को छीनने का प्रयास है. इस मामले में दारुल-उलूम देवबंद ने अपने को यह कहते हुए किनारे किया है कि फ़तवा जारी नहीं किया गया है. अलबत्ता सूचना जारी की गई है कि प्रार्थना सिर्फ खुदा की ही हो सकती है. फिर भी कुछ उलेमाओं ने ऐसा मूर्खतापूर्ण ऐलान किया. सिखों की शिरोमणि गुरूद्वारा प्रबंधक कमेटी ने भी वंदेमातम् को हिन्दू धर्म विशेष की प्रार्थना (दुर्गा की) बताया है. ये तो एसजीपीसी ही जानता है कि उनकी इस चेतावनी को सरदार कितनी गंभीरता से लेंगे.
मोटे तौर पर हम सब जानते हैं कि बंकिमचंद्र चटर्जी ने अपनी रचना आनंदमठ में जो कहानी गढ़ी थी उसके नायक वे संन्यासी थे जो मुस्लिम और ब्रिटिश शासकों के ख़िलाफ़ धर्मयुद्ध करते हैं. इसी रचना में लिखा वंदेमातरम् गान संन्यासियों को संघर्ष की प्रेरणा देता है. बाद में स्वाधीनता आंदोलन में अग्रणी रही कॉग्रेस ने इसे अपने अधिवेशनों में गाना शुरू किया. कुछ मुस्लिम नेताओं को यह गीत धर्मविशेष की देवी की आराधना करता प्रतीत हुआ. सुभाषचंद्र बोस को गुरूदेव रविन्द्रनाथ टैगौर का लिखा पत्र पढ़ें -
“The core of ‘Vande Mataram’ is a hymn to goddess Durga: this is so plain that there can be no debate about it. Of course Bankim does show Durga to be inseparably united with
Bengal in the end, but no Mussulman [Muslim] can be expected patriotically to worship the ten-handed deity as ‘Swadesh’ [the nation]. This year many of the special [Durga] Puja numbers of our magazines have quoted verses from ‘Vanda Mataram’ – proof that the editors take the song to be a hymn to Durga. The novel Anandamath is a work of literature, and so the song is appropriate in it. But Parliament is a place of union for all religious groups, and there the song can not be appropriate. When Bengali Mussulmans show signs of stubborn fanaticism, we regard these as intolerable. When we too copy them and make unreasonable demands, it will be self-defeating.” In a postscript to this same letter Rabindranath says: “Bengali Hindus have become agitated over this matter, but it does not concern only Hindus. Since there are strong feelings on both sides, a balanced judgement is essential. In pursuit of our political aims we want peace, unity and good will – we do not want the endless tug of war that comes from supporting the demands of one faction over the other.” (Letter #314, Selected Letters of Rabindranath Tagore, edited by K. Datta and A. Robinson, Cambridge University Press). (साभार- हिन्दुस्तान टाइम्स)
यह भी उल्लेखनीय है कि बहुत से मुसलमान ठीक उसी तरह वंदेमातरम् गाएँगे जैसे वे पहले गाते रहे हैं और जैसे हिन्दू या अन्य धर्मावलंबी गाते रहे हैं. मेरे साथ काम करने वाले नब्बे फ़ीसद मुसलमान मित्र इसे गाएंगे, ऐसा वो कहते रहे हैं. उन्हें कोई तक़लीफ़ नहीं. अपने शोएब भाईजान गाएंगे. अल्लाहरखा रहमान जब देश की पचासवी वर्षगांठ पर वंदेमातरम् का गायन करते हैं तो सारा देश झूमता है. उन्हीं के कई गीतों के रचयिता कवि महबूब कहते हैं कि हदीस पाक में लिखा है कि ”हज़रत मोहम्मद का कहना था कि मादरे वतन से मोहब्बत भी खुदा की आधी इबादत के बराबर है.” आप सवाल करेंगे कि हदीस में लिखा है तो बाक़ियों को क्यों मंज़ूर नहीं तो जवाब आएगा कि देवबंद के सारे फ़ैसले क़ुरआन की रौशनी में लेकर ही किए जाते हैं. हदीस के संकलनों पर विवाद होता रहा है.
विवाद तब खड़ा होता है जब किसी राजनीतिक मकसद से भावनात्मक मामलों को उलझाया जाता है. इतिहास के भूतों को कब्र से उखाड़कर वर्तमान में लाकर राजनीतिक भविष्य की ज़मीन तलाशना संघ परिवार का शगल रहा है. वो चाहे वंदेमातरम् हो या बाबरी या फिर जिन्ना विवाद. काठ की हांडी बारबार चढ़ाने का असफल प्रयास किया जाता है. इन्हीं नेताओं से जब वंदेमातम् गाने के लिए कहा गया तो बगलें झांकते नज़र आते हैं. (देखें पोलखोल-स्टारन्यूज़) इस पर प्रतिक्रिया तो आनी ही थी. संघ परिवार मुंह खोले और मुस्लिम कट्टरपंथियों की प्रतिक्रिया ना आए ऐसा तो हो नहीं सकता. कभी इसका उल्टा भी होता है कि पहले वो बोलें तो ये भी बोलें. लिहाज़ा विवाद को अब राजनीतिक मसला बना दिया गया है. अगले साल होने वाले यूपी के चुनाव में इसे भुनाए जाने का संकल्प भी ले लिया गया है.
पिछले दिनों गणेशोत्सव के आयोजन पर एनडीटीवी के विनोद दुआ महाराष्ट्र के कुछ कस्बाई इलाक़ों का दौरा कर रहे थे. मुंबई-नासिक हाइवे पर बसे एक क़स्बे में देखा कि कुछ मुसलमान भी गणेश जी की वंदना कर रहे हैं. ऐसी कई ख़बरें हमें पहले भी मिलती रही हैं. बीबीसी की यह खबर भी देखें. यहां उन मुसलमानो से मुख़ातिब होकर विनोद जी ने पते की बात की. उन्होंने कहा- ”ये (नाम लिया) हैं और ये गणपति महाराज की वंदना करते हैं. ये इनकी संस्कृति है. जो धीरे-धीरे मिलती-जुलती गई है. पचास साल बहुत नहीं होते किसी लोकतांत्रिक देश के लिए. (भारत जैसे विशाल देश के लिए यक़ीनन कम हैं) इन्हें (नाम लिया) गणपति वंदना करने में कोई दिक्कत नहीं क्योंकि यहां बाध्यता नहीं है. यदि क़ानून बना दिया गया या फिर फ़तवे जारी कर दिए गए कि गणपति वंदना करना ही होगा तो मुश्किल खड़ी हो जाएगी. यही है हमारा देश.” कुछ बरस पहले केरल में इस तरह का फ़ैसला हाईकोर्ट सुना चुका था किंतु सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए उस फ़ैसले को पलट दिया कि राष्ट्रगान गाना अनिवार्य नहीं किया जा सकता. अलबत्ता इसे ना गाते हुए भी सावधान रहकर सम्मान दिया जाना चाहिए. यही है नवलोकतंत्र और इसी संदर्भ में वैचारिक लोकतंत्र का वातावरण बनाया जाना चाहिए. ब्रिटेन में जो लोग राजशाही का विरोध करते रहे हैं क्या वे God save our gracious Queen जैसा राष्ट्रगीत गाते होंगे? फिर भी क्या हम उनकी देशभक्ति पर संदेह कर सकते हैं?
मैं वंदेमातरम् का सुस्वर पाठ करता हूं. गुरूवार को भी करूंगा. किंतु यह मेरी देशभक्ति का प्रमाण नहीं होगा. भ्रष्टाचार, सांप्रदायिकता, जातिगत भेदभाव, आर्थिक विषमता, सामंतवादी-ब्राह्मणवादी सोच के बीच झूल रहे देश में यदि वंदेमातरम गाकर ही देशभक्ति का प्रमाणपत्र बीजेपी वालों से हासिल कर लिया तो देश का कल्याण नहीं हो जाएगा. हां, ये ज़रूर है कि वे लोग मुझे देशभक्तों की श्रेणी में लाकर खड़ा कर देंगे. मैं उन देशभक्तों की कतार में खड़ा नहीं चाहता. मैं सात सितम्बर गुरूवार ग्यारह बजे (भारतीय समयानुसार) देशभर के लोगों के साथ और अपने चिट्ठाकार साथियो के सुर में सुर मिलाउंगा और संकल्प लूंगा कि उक्त तमाम विसंगतियों को दूर करने में अपना भरसक योगदान दे सकूं.

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