संथाराः मोक्ष का मार्ग या आत्महत्या

September 28, 2006 at 11:04 pm | In भारतनामा | 8 Comments

यपुर की विमला देवी जी के निधन और उससे पूर्व तेरापंथी जैन संप्रदाय के संथारे कर्म को लेकर चहुंओर यह बहस छिड़ गई कि संथारे को मोक्ष का मार्ग माना जाए या आत्महत्या.  राजस्थान हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की गुज़ारिश को स्वीकार कर सरकारों को नोटिस जारी किया कि वे कैसे इस प्रथा को सती से अलग ठहरा सकते हैं. बहस बढ़ती चली गई और तरकश के संजय बेंगानी जी ने तरकश पर संतुलिख आलेख प्रस्तुत किया. तदुपरांत मेरे मन में भी कई प्रश्न खड़े हो गए जिसे सुनील दीपक जी ने भी उचित माना. इन सवालों पर विचार करने के उपरांत संजय भाई ने दोबारा विस्तार से   इसी विषय पर प्रकाश डाला. मैं उनका हृदय से आभार व्यक्त करता हूं.

अब संजय भाई के उस आलेख के बाद और उठ रहे कुछ सवालों के साथ मैं पुनः संथारे पर अपने विचार रखना चाहता हूं. संजय भाई लिखते हैं- यूथेनेज़िया, आत्महत्या और संथारे में भेद को समझने के लिए हमें पहले मृत्यु के भेद को वर्गीकृत कर समझना होगामनुष्य की मृत्यु के तीन मार्ग हैं: 1. प्रकृति द्वारा मारा जाना 2.  दूसरों द्वारा मारा जाना और 3. अपने आप को मार देना.

प्राकृतिक मौत पर तो किसी भी तरह से हमारा वश नहीं हो सकता, अतएव इस पर चर्चा की आवश्यकता ही नहीं है. इसी तरह दूसरों द्वारा मारे जाने मे वे कृत्य जो अपराध नहीं है, के अंतर्गत युद्ध और मुठभेड़ और मृत्युदंड का संजय भाई ने समावेश किया है. मेरा प्रेक्षण है कि निरपराध मृत्युवरण के वर्ग में ही आने वाले यूथेनेज़िया को लेकर बेल्जियम, हॉलैंड और ऑस्ट्रेलिया के कुछ राज्यों में कोई विवाद नहीं है. इन देशों में इसे मान्यता मिल चुकी है. अन्य देशो में इस पर आए दिन बहस होती रहती है. यह बहस तब और तीव्र हो चली थी जब डाएन प्रेटी और टैरी शाइवो के मामले दुनिया के सामने आए. अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने भी ओरेगन राज्य में हुए ऐसे ही एक मामले में यूथेनेज़िया को इस शर्त के साथ फैसला दिया कि मृत्यु की कामना करने वाले की राय ही अहम है. अमेरिका में इस तरह के क़ानून वहां की राज्य सरकारें बनाने के लिए भारत की तुलना में ज़्यादा स्वतंत्र हैं. मेरी नज़र में यूथेनेज़िया को सीधे तौर पर इच्छामृत्यु कहना ठीक नहीं होगा क्योंकि यहां मृत्यु को वरण करने की मरीज़ की इच्छा सदैव नहीं होती. पिछले दिनों हुआ भारत का मामला कुछ और था. यहां हैदराबाद के युवक वेंकटेश की इच्छा के बावजूद उसे आंध्रप्रदेश हाईकोर्ट ने मरने की इजाज़त नहीं दी. वेंकटेश असाध्य बीमारियों से पीड़ित अस्पताल में भरती था जो अपने अंगदान करना चाहता था. अंततः वो अधूरी इच्छा लिए दुनिया से चल बसा.

अब चर्चा करें, अपने आप को मारकर मृत्यु को प्राप्त करने के उपायों पर जिन्हें लेकर विवाद होते हैं. पहले आत्महत्या और इसके बाद सती और संथारे का फ़र्क समझेंगे. आत्महत्या विशुद्ध अपराध है. जिसे भारतीय दंड संहिता की धारा 309 के तहत अपराध माना गया है. आत्महत्या ऐसा कृत्य है जो उद्वेग में किया जाता है. इसके कारण विषाद, निराशा, असफलता अथवा ग्लानि के बीच छुपे होते है. आत्महत्या की हर घटना के बाद पूरे समाज के समक्ष भी सवाल खड़ा होता है कि क्या हम अपने बीच के किसी व्यक्ति की चिंताओं को लेकर बेज़ार हो चुके हैं उसकी आत्महत्या का कारण बनते हैं. यहां भारतीय समाज में मनोविज्ञान के महत्व को कम समझने पर भी विचार आवश्यक है. इस विषय पर अलग से चर्चा की जा सकती है.

अब अहम बिंदु पर आते हैं. विषय संथारे पर केंद्रित है. संजय भाई लिखते हैं कि आत्महत्या के ऐसे प्रयास जो अपराध नहीं है उसमे समाधि, संथारा  और सती महत्वपूर्ण हैं. मेरे विचार से संथारे और सती के बीच का फ़र्क यह है कि सती होना अपने दिवंगत पति के पीछे दुनिया त्यागने की चाह की परिणति है. सती प्रथा को हमारा क़ानून अपराध मानता है. मध्यकाल में इसका ज़बर्दस्त दुरूपयोग हुआ है. आज भी यदा-कदा इस तरह के मामले हमारे सामने आते हैं. विडम्बना ही है कि कोई पति कभी सता नहीं होता. फिर इस प्रथा को हमने त्याग दिया. जब सती मे एक तरफ़ पति का मोह है तो दूसरी तरफ़ क्या संथारे में मोक्ष का मोह है? सनातनी परंपरा के अनुसार भी जीवन-मृत्यु के चक्र से मुक्ति का एकमेव उपाय है मोक्ष. क्या संथारा इसी की कामना में मृत्यु का वरण करने का कर्म है?

तेरापंथी जैन समाज इसे जीवन के प्रति मोह न मानकर मृत्यु को खुशी से अंगीकार करने वाला कर्म बताता है. जैन आचार्य मुनि महाप्रज्ञ के अनुसार संथारा एक तप है जो असाध्य बीमारी की दशा में अथवा मोक्ष की प्राप्ति के लिए की एक तपस्या है.महाप्रज्ञ जी के विचार हैं कि यह आत्मशोधन का प्रयोग है. जिसके लिए बाध्य नहीं किया जाता है. हम उन्हें ही संथारे की अनुमति देते हैं जो पूर्ण मनोबल के साथ इस तप को करने के लिए प्रतिबद्ध होता है.यह भी कहा जाता है कि इस तप के चलते कुछ लोग जीवन को वापस जीने के लायक बना लेते हैं. राजस्थान के बीकानेर से संथारे के समाचार आए दिन सुनने मिलते हैं. विमला देवी बुज़ुर्ग महिला थीं. वे कैंसर से पीड़ित थी और मेडिकल साइंस की भाषा में वह Terminally ill थीं. उनकी मृत्यु क़रीब थी.

संथारे के विरोधी कहते हैं कि युवा संथारा क्यों नहीं करते? जिसके जवाब में कहा जाता है कि जिनके उत्तरदायित्व पूरे हो गए हों उन्हें संथारा लेना चाहिए. यह सवाल भी उठाया जाता है कि जो बच्चे अपने बूढ़े मां-बाप या रिश्तेदारों को अलग-थलग कर देते हैं यानी उनकी परवाह करना नहीं चाहते ऐसे में तिरस्कार से बचने के लिए बुज़ुर्ग मजबूरी में इस प्रथा का सहारा लेते हैं. मेरी चिंता भी यही है कि इसका अतिप्रचार इस अद्भुत आध्यात्मिक महत्व की परंपरा का दुरूपयोग बढ़ा सकता है. किंतु विमला देवी जी के मृत्यु को गले लगाने के फ़ैसले को मैं विशुद्ध रूप से संथारा मानता हूं जहां चिकित्सकों ने उन्हें मृत्युशैया पर घोषित कर दिया था. पंद्रह दिनों के अन्न-त्याग के उपरांत उनका जग त्यागना उस पीड़ा से बेहतर है जो जीते-जी उन्हें झेलनी पड़ती.

मृत्यु परम सत्य है. संथारा इसे अंगीकार करने का अद्भुत कर्म है जिसके लिए आपका भौतिक उत्तरदायित्वों से निवृत होना परम आवश्यक है. संथारा कर्म के पहले आपकी जिजीविषा समाप्त हो जानी चाहिए.   

जेपी दत्ता की उमराव जान

September 24, 2006 at 2:53 pm | In सिनेजगत | 6 Comments

एश्वर्या राय बनीं उमराव जान

जेपी दत्ता की फ़िल्म का एक गाना है- ऐसा लगता है जो ना हुआ, होने को है. रेगिस्तान की रेत में संवेदनाओं के फूल खिलाने वाले ज्योति प्रकाश दत्ता इस बार अवध की उमराव जान पर फ़िल्म ला रहे हैं. यह फ़िल्म अक्टूबर के तीसरे शुक्रवार को रिलीज़ होगी. सरहद से लेकर एलओसी तक जेपी दत्ता की हरेक फ़िल्म में रेगिस्तान का होना अनिवार्य रहा है. उनकी आने वाली फ़िल्म उमराव जान अवध की कथा है लेकिन इसे दत्ता का रेगिस्तान प्रेम ही कहा जाएगा कि उमराज जान के कई दृश्यों की शूटिंग जोधुपर में हुई है. राजपूत राजघरानों की आन-बान और देशभक्ति से ओतप्रोत बजती रणभेरियां अवध की उमराव जान से कोसो दूर हैं. लखनऊ की अपनी नफ़ासत है. दत्ता के लिए यह चुनौती होगी कि वे अपने इन लगाव को उमराव जान से कितना दूर रख पाए.

 

उमराव विशुद्ध संवेदनाओं की कथा है. उस स्त्री की व्यथा कथा है जो औरों के ग़म भुलाने के एवज में खुद ग़मों का सागर अपने दामन में समेट लेती है. यह मुस्कान के बदले आंसुओं का सौदा है. शहरयार का गीत ये क्या जगह है दोस्तों ये कौन-सा दयार है, अमीरन से उमराव जान अदा बनने की व्यथा कथा का निचोड़ है. बहुतों के लिए दत्ता का उमराव जान को हाथ लगाना दुस्साहस लग रहा है. दत्ता की उमराव नाचेगी ! इतनी गुंजाइश निर्देशक निकाल सकता है. वे लखनऊ में ही जन्में मुज़फ़्फ़र अली की भांति साहित्य मर्मज्ञ नहीं जो मिर्ज़ा मोहम्मद हदी रुसवा के नॉवेल को जस का तस पर्दे पर उतार दे. जब संजय लीला भंसाली की पारो और चंद्रमुखी नाच सकती हैं तो उमराव क्यों नहीं? साठ के दशक में निर्देशक रहे और जेपी के पिता ओपी दत्ता ने कहानी में मामूली फेरबदल किया है. पिता का साथ जेपी के लिए हमेशा उत्साहवर्धक रहा है. उनका कड़ा अनुशासन पूरी यूनिट को लय देता है. गति और ऊर्जा देता है. तभी ग़ुलामी, रिफ्यूजी और बॉर्डर जैसी कृति परदे पर अवतरित होती हैं.    

ओपी दत्ता ने फ़िल्म के संगीत के लिए फिर अनु मलिक पर भरोसा जताया है. मीडिया में बने परसेप्शन से परे अनु पर उनका भरोसा सफलता के साथ कई दफ़ा आज़माया जा चुका है. बक़ौल ओपी, अनु इस टीम के मोजार्ट हैं और उमराव जान का संगीत उनके लिए बड़ी चुनौती. अनु मलिक का अपनी प्रतिभा से दुश्मनी का रिश्ता है. अनु ने अपने शुरूआती दौर में भीषण संघर्ष किया है और सफलता को किसी भी शर्त पर छोड़ना नहीं चाहते. जिन दिनों बच्चे खेलकूद में डूबे होते हैं, उन दिनों अनु काम मांगने के लिए दर-दर ठोकर खाते थे. पर्दे की रुपहली दुनिया का यह सच स्याह है. 18 साल की छोटी-सी उम्र में अनु ने सोहनी महिवाल का संगीत दिया जो उस दौर का हिट संगीत था.  

अनु पर छीटांकशी होती है- धुनें चुराने की. संगीत के जानकार इसे प्रेरणा कहते हैं तो बाज़ार के नुमांइदे इसे सफलता का आज़माया गुर कहते हैं. फिर भी अनु के उन गीतों को ताक पर रखें जो विवादों मे रहे तो रिफ्यूजी का ‘’ऐसा लगता है जो ना हुआ‘’ गीत सब पर भारी पड़ता है. मौलिकता से भरपूर बहुत कुछ है उनके पास.    अनु ने अपने प्रतिभाशाली पिता सरदार मलिक का संघर्ष और नैराश्य देखा है. वह उनके रास्ते पर नहीं चलते हुए बाज़ार के तेवर के अनुरूप अपनी माला गढ़ता है और अपनी नैसर्गिक प्रतिभा को भी अनदेखा करता है. अनु के सामने चुनौती थी कि वे जेपी दत्ता की उमराव जान के संगीत में जान डाल दें. डेढ़ दशक पहले आई उमराव जान में खैय्याम की मौसिक़ी और शहरयार के बोलों ने सुनने वालों की रूह को छू लिया था. अनु मलिक अगर दुनियादारी से आज़ाद होकर सृजन में खो जाएं तो कुछ भी संभव है. ठीक जेपी दत्ता की तरह अनु का निष्णात सृजन अब भी भविष्य के गर्भ में है. इस पूरे परिदृश्य में जावेद अख़्तर का अहम किरदार है. वे उमराव जान के होठों पर बोल सजाएंगे. जिसे अलका याज्ञिक के सुरों से एश्वर्या राय के होठों पर गुनगुनाया जाएगा. उन्नीसवीं सदी की उमराव को यह इक्कीसवीं सदी की श्रद्धांजलि होगी. पूरी यूनिट को उम्मीद है कि उनका प्रयोग दर्शकों को पसंद आएगा. अब दत्ता, अनु, जावेद और एश्वर्या कसौटी पर कसे जाएंगे.

शताब्दी वर्ष?

September 10, 2006 at 11:12 pm | In भारतनामा | 3 Comments

बीच बहस में- वंदेमातरम् (भाग चार)  

वंदेमातरम् पर हुई राजनीति पर बहुत से आलेख पिछले दिनों लिखे गए. यहां कोशिश की गई कि इतिहास की तारीख़ों पर नज़र डालते हुए कुछ संशय आपके सामने रखूं.  

  1. १८७६ में इस गीत की रचना हुई. बंकिमचंद्र चटर्जी ने इसे लिखा उसके छह साल बाद यानी १८८२ में आनंदमठ प्रकाशित हुई. १८७६ से १९७६ तक के सौ साल और उसके बाद १२५ साल २००१ मे पूरे हुए.
  2. १८९६ में कोलकाता अधिवेशन में गुरूदेव रविन्द्रनाथ टैगोर ने इसे गाया. इस लिहाज़ से १९९६ में इसके १०० साल पूरे हुए.
  3. १९०५ (अथवा १९०६) में सात सितम्बर को बनारस में हुए कॉग्रेस अधिवेशन में इसे टैगोर की भतीजी सरला देवी चौधरानी ने तत्कालीन अध्यक्ष लोकमान्य तिलक के अनुरोध पर गाया. कहा जाता है कि इसी अधिवेशन में कॉग्रेस ने इसे अपना आधिकारिक गीत अंगीकार किया.
  4. इतिहासकार सुमीत सरकार ने सवाल उठाया है कि कॉग्रेस के अधिवेशन अमूमन दिसम्बर में होते रहे हैं. मेरा (ब्लॉगर) स्वयं का प्रेक्षण रहा है कि कॉग्रेस का सालाना अधिवेशन हमेशा दिसम्बर में होता आया है. फिर सितम्बर में अंगीकार करने के सवाल पर सफाई अब कॉग्रेस को देनी है.
  5. आज ही मैंने अखिल भारतीय कॉग्रेस कमेटी की आधिकारिक साइट पर जाकर देखा तो हैरानगी हुई कि जिस अधिवेशन की बात कॉग्रेस सरकार के मानव संसाधन मंत्रालय के अर्जुन सिंह यह बताते हुए कह रहे हैं कि इसी साल (२००६) में इसके सौ साल पूरे हुए तो लगा कि या तो सरकार के तथ्य सही नहीं है या फिर साइट झूठ बोल रही है. साइट के मुताबिक़ बनारस अधिवेशन १९०५ में हुआ था. यानी १०० साल तो २००५ में ही हो चुके थे.

उससे भी बड़ी हैरानगी तब होती है जब मानव संसाधन मंत्रालय बिना इतिहासकारों की राय लिए या दस्तावेजी प्रमाण हासिल किए एक फ़रमान जारी कर दे और संघ परिवार उसका स्वामिभक्ति से पालन करने लग जाए. इससे पहले सौ या सवा सौ सालों पर किसी सरकार (कॉग्रेस, एनडीए और यूपीए) ने कोई उत्सव नहीं मनाया.

बीच बहस में वंदेमातरम् (भाग तीन)

September 10, 2006 at 10:44 pm | In भारतनामा | 1 Comment

पिछले दिनों वंदेमातरम् पर बहस तीखी हो चली थी. मैंने जब अपने विचार दिए तो कुछ असहमत थे. कुछ का मानना था कि राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान करना चाहिए. मैंने भी सोचा.. हां करना चाहिए. मेरा ऐसा सोचना इसलिए ठीक मालूम पड़ा क्योकि मुझे लगता है कि आज़ादी के आंदोलन के उस दौर में धार्मिक प्रतीकों को ही राष्ट्रीयता का पर्याय मानकर देखा जा सकता था. ना तो हम नए प्रतीक तय कर सके थे और न ही इसके लिए हम तैयार थे. राष्ट्रीय स्वरूप तो बहुत हद तक हमारी परिकल्पना में ही नहीं था. यह विवादित सत्य हो सकता है कि मौर्यकाल में भारत के राष्ट्रीय स्वरूप की कल्पना कौटिल्य कर चुके थे किंतु बाद के दिनों में कोई अवधारणा या इससे उपजी कोई आधुनिक व्याख्या हमारे बीच नहीं थे. ऐसे दौर में धार्मिक प्रतीक ही हमारे लिए राष्ट्रीय प्रतीक बनते चले गए.

धार्मिक प्रतीक हमेशा सांप्रदायिक नहीं होते ये हम सत्यमेव जयते, परित्राणाय साधुनाम्, सत्यं शिव सुन्दरम् जैसे सारगर्भित वाक्यांशों से समझ सकते हैं. किंतु बात जब विवादित प्रतीकों की होती है तो सिर्फ़ उनके बारे में यह मान लेना कि यही राष्ट्रीय प्रतीक हैं, हठधर्मिता कही जाती है.

एक धर्म, एक संगठन अथवा किसी व्यक्ति विशेष की ओर से इन विवादास्पद प्रतीकों का इस्तेमाल होता हो तो इसे उसकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ जोड़कर देखा जा सकता है बशर्ते कि वह संवैधानिक तौर पर किसी अन्य के ख़िलाफ़ न जा रहा हो. लेकिन जब बात राष्ट्र की हो, राष्ट्र के आधिकारिक प्रतीकों की हो तो समूचे तथ्यों पर विशद विचारप्रणाली अपनानी चाहिए.  

मैंने पिछले दो-तीन दिनों में वंदेमातरम् पर आधारित लेखों और पूर्व में प्रकाशित लेखों को अख़बारों और नेट पर पढ़ा तो इसी निष्कर्ष पर पहुंचा कि वो कौन-सी वजहें थी जिसे जानते हुए गुरूदेव रविन्दनाथ टैगोर ने सुभाष चंद्र बोस जी को पत्र लिखकर यह समझाइश देने की कोशिश की थी कि वंदेमातरम् को राष्ट्रगान क्यों नहीं चुना जा सकता और यह क्यों संसदीय लोकतंत्र के इस देश मे वो दर्जा नहीं रखता जो इसे देने की मांग की जाती रही है. टैगोर का वह पत्र हम पिछले लेख पढ़ चुके हैं अब टैगोर के पत्र को ध्यान में रखते हुए इन तथ्यों को समझने की चेष्टा करें.

१८८२ में प्रकाशित बंकिमचंद्र चटर्जी की आनंदमठ के कुछ अंश-

 मुसलमान राजा क्या हमारी रक्षा कर रहा है? धर्म गया, जाति गई, मान गया, अब तो प्राणों पर बाज़ी आ गई है. इन नशेबाज़ दाढ़ीवालों को बिना भगाए क्या हिन्दू हि्न्दू रह जाएंगे?.. हम लोग राज्य नहीं चाहते. केवल मुसलमान भगवान के विद्वेषी हैं, इसलिए उनका समूल विनाश करना चाहते हैं… एक अंग्रेज़ प्राण जाने पर भी भागता नहीं, लेकिन मुसलमान पसीना आते ही भागता है, शर्बत की खोज करता है… अंग्रेज़ों में लगन होती है, लेकिन मुसलमान आरामतलब होते हैं, रुपयो के लिए प्राण देते हैं.. 

उपन्यास का एक किरदार विद्रोही संन्यासी अंग्रेज़ सेनापति थॉमस को पकड़कर कहता है, कप्तान साहब, मैं तुम्हें मारूंगा नहीं. अंग्रेज़ हमारे शत्रु नहीं. क्यों तुम मुसलमान की सहायता करने आए? तुम्हें प्राणदान देता हूं. अंग्रेज़ों की जय हो, तुम हमारे मित्र हो.

उपन्यास के आखरी हिस्से में सत्यानंद सफलता हाथ नहीं लगने पर चिल्लाकर पूछता है, प्रभु, यदि हिन्दू राज्य स्थापित नहीं होगा तो कौन-सा राज्य होगा. तब सत्यानंद को जवाब मिलता है- नहीं अब अंग्रेज़ राज्य होगा.. अंग्रेज़ों के बिना राजा हुए सनातन धर्म का उद्धार नहीं हो सकेगा. वास्तविक सनातन धर्म का लोप हो गया है… बाहर देशों से ज्ञान भारत में फिर से लाना पड़ेगा. अंग्रेज़ उस ज्ञान में होशियार हैं. लोक शिक्षा में पटु हैं. जब तक उस ज्ञान से हिन्दू ज्ञानवान, गुणवान और बलवान न होंगे, अंग्रेज़ राज्य रहेगा. उस राज्य में प्रजा सुखी होगी. अंग्रेज़ राजदंड लें, इसलिए संतानों का विद्रोह हुआ है.  

ज़ाहिर है, शब्दों के बीच का अर्थ बताता है कि उपन्यास में सिर्फ़ शोषक राजा और शोषित प्रजा का झगड़ा नहीं है. हिन्दू धर्म-जाति की परवाह है, मुसलमानों के प्रति हिकारत का भाव है.. और अंग्रेज़ों की जय-जयकार है. यह भी जान लें कि ब्रिटिश सरकार ने १८९२ में बंकिम चंद्र चटर्जी को रायबहादुर की उपाधि से सम्मानित किया था.  

यहां उपन्यास के कुछ अंशों का ज़िक्र है. इसकी सत्यता पर कुछ संदेह हो तो डायमंड पॉकेट बुक्स में प्रकाशित आनंदमठ का हिन्दी रुपांतर अवश्य पढ़ें.,

यह राष्ट्रीयता की कसौटी नहीं है

September 10, 2006 at 7:30 pm | In संकलन | 2 Comments

 बीच बहस में वंदेमातरम् (भाग दो)

साभार- जनसत्ता, लेखक- प्रभाष जोशी

ल आपने देखा कि जिसे गाना था उसने वंदेमातरम् गाया जिसे नहीं गाना था उसने नहीं गाया. जिन राज्यो में भारतीय जनता पार्टी का राज है और जहां वह दूसरी पार्टी के साथ राज कर रही है, वहां की सरकारों ने वंदेमातरम् गाने का अनिवार्य कर दिया था. लेकिन जहां कॉग्रेस और दूसरी पार्टियों का राज है वहां इसके गाने न गाने की छूट थी. जिन भाजपाई सरकारों ने इसे अनिवार्य किया वे भी दावा नहीं कर सकतीं कि जो मुसलमान, ईसाई और सिख इसे गाना नहीं चाहते थे उनसे भी वंदेमातरम् गवा लिया गया है. आदमी अगर ऐसा ही मशीनी होता और गाना रेकॉर्ड बजवाने जैसा मैकेनिकल काम होता तो न तो महान गीत होते न महान संगीत. अपनी मां, मातृभूमि और देश से आप सहज और स्वैच्छिक प्रेम करते हैं. कोई करवा नहीं सकता. सहजता और स्वैच्छिकता संस्कृति की महान उपलब्धियों की कुंजी है. जो राष्ट्र अपने नागरिकों की सहजता और स्वैच्छिकता का आदर करता है और उन पर कोई चीज़ थोप कर उन्हें मजबूर नहीं करता सभ्यता और संस्कृति में वह उतना ही विकसित होता है.

कोई प्रेरित व्यक्ति जितने बड़े काम कर सकता है मजबूर आदमी नहीं कर सकता है. अगर इस सत्य को आप समझते हैं तो लोगों को प्रेरित करेंगे, जो वे मन से और सहजता से कर सकते हैं उसे करने की छूट देंगे और इस स्वतंत्र और स्वैच्छिक वातावरण में जो प्राप्त होगा उसका गौरव गान करेंगे.  वंदेमातरम् के राष्ट्रगीत होने की जैसे भी और जैसी भी मनाई गई शताब्दी पर अगर देशप्रेम, शहीदों और स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के प्रति कृतज्ञता और समर्पण को ऊंचा उठा देने वाली भावना सर्वव्यापी नहीं हुई तो दोष उन्हीं का है जो इसका गाना अनिवार्य करना चाहते थे. यह पहली बार नहीं हुआ है कि मुसलमानों के एक तबके ने वंदेमातरम् के गाने को इस्लाम विरोधी कहा हो. वैसे ही यह भी पहली बार नहीं हुआ है कि संघ परिवारियों ने इसके गाने को मुसलमानों के लिए अनिवार्य करने का हल्ला मचाया हो. मुस्लिम लीग, हिन्दू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बीच यह झगड़ा आज़ादी के बहुत पहले से चला आ रहा है. आज़ादी के आंदोलन की मुख्यधारा तो कॉग्रेस की ही थी और उसी ने वंदेमातरम् को बाक़ायदा अपनाया भी. लेकिन उसी ने इसे गाते हुए भी इसका गाना स्वैच्छिक रखा. कॉग्रेस का सन १९३७ के अधिवेशन का प्रस्ताव इसका प्रमाण है. उसी ने इसे स्वतंत्र लोकतांत्रिक गणराज्य भारत का राष्ट्रगीत भी बनाया.

अल्पसंख्यकों खासकर मुसलमानों के लिए वंदेमातरम् का गाना अनिवार्य करने की मांग संघ परिवारियों की ही रही है. ये वही लोग हैं जिनने उस स्वतंत्रता संग्राम को ही स्वैच्छिक माना है जिसमें से वंदेमातरम् निकला है. अगर भारत माता की स्वतंत्रता के लिए क़ुरबान हो जाना ही देशभक्ति की कसौटी है तो संघ परिवारी तो उस पर चढ़े भी नहीं, खरे उतरने की तो बात ही नहीं है. लालकृष्ण आडवाणी ने कहा कि ऐसा नहीं हो सकता कि राष्ट्रभक्ति का कोई प्रतीक स्वैच्छिक हो. तो फिर आज़ादी की लड़ाई के निर्णायकभारत छोड़ो आंदोलनके दौरान वे खुद क्या कर रहे थे?  उनने खुद ही कहा है-मैं संघ में लगभग उन्हीं दिनों गया जब भारत छोड़ो आंदोलन छिड़ा था क्योंकि मैं मानता था कि कॉग्रेस के तौर-तरीक़ों से तो भारत आज़ाद नहीं होगा. और भी बहुत कुछ करने की ज़रूरत थी.संघ का रवैया यह था कि जब तक हम पहले देश के लिए अपनी जान क़ुरबान कर देने वाले लोगों का मज़बूत संगठन नहीं बना लेते, भारत स्वतंत्र नहीं हो सकता. लालकृष्ण आडवाणी भारत छोड़ो आंदोलन को छोड़कर करांची में आरम-दक्ष करते देश पर क़ुरबान हो सकने वाले लोगों का संगठन बनाते रहे. पांच साल बाद देश आज़ाद हो गया. इस आज़ादी में उनके संगठन संघ- के कितने स्वयंसेवकों ने जान की क़ुरबानी दी? ज़रा बताएं.

एक और बड़े देशभक्त स्वयंसेवक अटल बिहारी वाजपेयी हैं. वे भी भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान बच्चे नहीं संघ कार्य करते स्वयंसेवक ही थे. एक बार बटेश्वर में आज़ादी के लिए लड़ते लोगों की संगत में पड़ गए. उधम हुआ. पुलिस ने पकड़ा तो उत्पात करने वाले सेनानियों के नाम बताकर छूट गए. (दस्तावेजी प्रमाण के लिए यहां देखें) आज़ादी आने तक उनने भी देश पर क़ुरबान होने वाले लोगों का संगठन बनाया जिन्हें क़ुरबान होने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी क्योंकि वे भी आज़ादी के आंदोलन को राष्ट्रभक्ति के लिए स्वैच्छिक समझते थे.  

अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने को देशभक्तों का महान संगठन कहे और देश पर जान न्योछावर करने वालों की सूची बनाए तो यह बड़े मज़ाक का विषय है. सन् १९२५ में संघ की स्थापना करने वाले डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार को बड़ा क्रांतिकारी और देशभक्त बताया जाता है. वे डॉक्टरी की पढ़ाई करने १९१० में नागपुर से कोलकाता गए जो कि क्रांतिकारियों का गढ़ था. हेडगेवार वहां छह साल रहे. संघवालों का दावा है कि कोलकाता पहुंचते ही उन्हें अनुशीलन समिति की सबसे विश्वसनीय मंडली में ले लिया गया और मध्यप्रांत के क्रांतिकारियों को हथियार और गोला-बारूद पहुंचाने की ज़िम्मेदारी उन्हीं की थी. लेकिन ना तो कोलकाता के क्रांतिकारियों की गतिविधियों के साहित्य में उनका नाम आता है तब के पुलिस रेकॉर्ड में. (इतिहासकारों का छोड़े क्योंकि यहां इतिहासकारों का उल्लेख करने पर कुछ को उनकी निष्पक्षता पर सवाल खड़ा करने का अवसर मिल सकता है)  खैर, हेडगेवार ने वहां कोई महत्व का काम नहीं किया ना ही उन्हें वहां कोई अहमियत मिली. वे ना तो कोई क्रांतिकारी काम करते देखे गए और ना ही पुलिस ने उन्हें पकड़ा. १९१६ में वे वापस नागपुर गए.  

लोकमान्य तिलक की मृत्यु के बाद वे कॉग्रेस और हिन्दू महासभा दोनों में काम करते रहे. गांधीजी के अहिंसक असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलनों में भाग लेकर ख़िलाफ़त आंदोलन के वे आलोचक हो गए. वे पकड़े भी गए और सन् १९२२ में जेल से छूटे. नागपुर में सन् १९२३ के दंगों में उनने डॉक्टर मुंजे के साथ सक्रिय सहयोग किया. अगले साल सावरकर काहिन्दुत्वनिकला जिसकी एक पांडुलिपी उनके पास भी थी. सावरकर के हिन्दू राष्ट्र के सपने को साकार करने के लिए ही हेडगेवार ने सन् १९२५ में दशहरे के दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की. तब से वे निजी हैसियत में तो आज़ादी के आंदोलन और राजनीति में रहे लेकिन संघ को इन सबसे अलग रखा.  सारा देश जब नमक सत्याग्रह और सिविल नाफ़रमानी आंदोलन में कूद पड़ा तो हेडगेवार भी उसमें आए लेकिन राष्टीय स्वयंसेवक संघ की कमान परांजपे को सौंप गए. वे स्वयंसेवकों को उनकी निजी हैसियत में तो आज़ादी के आंदोलन में भाग लेने देते थे लेकिन संघ को उनने सशस्त्र क्रांतिकारी गतिविधियों में लगाया अहिंसक असहयोग आंदोलनों में लगने दिया. संघ ऐसे समर्पित लोगों के चरित्र निर्माण का कार्य कर रहा था जो देश के लिए क़ुरबान हो जाएंगे. सावरकर ने तब चिढ़कर बयान दिया था, ”संघ के स्वयंसेवक के समाधि लेख में लिखा होगा- वह जन्मा, संघ में गया और बिना कुछ किए धरे मर गया. 

हेडगेवार तो फिर भी क्रांतिकारियों और अहिंसक असहयोग आंदोलनकारियों में रहे दूसरे सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर तो ऐसे हिन्दू राष्ट्रनिष्ठ थे कि राष्ट्रीय आंदोलन, क्रांतिकारी गतिविधियों और ब्रिटिश विरोध से उनने संघ और स्वयंसेवकों को बिल्कुल अलग कर लिया. वाल्टर एंडरसन और श्रीधर दामले ने संघ पर जो पुस्तक द ब्रदरहुड इन सेफ़्रॉन- लिखी है उसमें कहा है, ”गोलवलकर मानते थे कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर पाबंदी लगाने का कोई बहाना अंग्रेज़ों को न दिया जाए.” अंग्रेज़ों ने जब ग़ैरसरकारी संगठनों में वर्दी पहनने और सैनिक कवायद पर पाबंदी तो संघ ने इसे तत्काल स्वीकार किया. २९ अप्रैल १९४३ को गोलवलकर ने संघ के वरिष्ठ लोगों के एक दस्तीपत्र भेजा. इसमें संघ की सैनिक शाखा बंद करने का आदेश था. दस्तीपत्र की भाषा से पता चलता है कि संघ पर पाबंदी की उन्हें कितनी चिंता थी- ”हमने सैनिक कवायद और वर्दी पहनने पर पाबंदी जैसे सरकारी आदेश मानकर ऐसी सब गतिविधियां छोड़ दी हैं ताकि हमारा काम क़ानून के दायरे में रहे जैसा कि क़ानून को मानने वाले हर संगठन को करना चाहिए. ऐसा हमने इस उम्मीद में किया कि हालात सुधर जाएंगे और हम फिर ये प्रशिक्षण देने लगेंगे. लेकिन अब हम तय कर रहे हैं कि वक़्त के बदलने का इंतज़ार किए बिना ये गतिविधियां और ये विभाग समाप्त ही कर दें.(ये वो दौर था जब नेताजी सुभाषचंद्र बोस जैसे क्रांतिकारी अपने तरीक़े से संघर्ष कर रहे थे)  पारंपरिक अर्थों में गोलवलकर क्रांतिकारी नहीं थे. अंग्रेज़ों ने इसे ठीक से समझ लिया था.

सन् १९४३ में संघ की गतिविधियों पर तैयार की गई एक सरकारी रपट में गृह विभाग ने निष्कर्ष निकाला था कि संघ से विधि और व्यवस्था को कोई आसन्न संकट नहीं है. १९४२ के भारत छोड़ो आंदोलन में हुई हिंसा पर टिप्पणी करते हुए मुंबई के गृह विभाग ने कहा था, ”संघ ने बड़ी सावधानी से अपने को क़ानूनी दायरे में रखा है. खासकर अगस्त १९४२ में जो हिंसक उपद्रव हुए हैं उनमें संघ ने बिल्कुल भाग नहीं लिया है.”  हेडगेवार सन् १९२५ से १९४० तक सरसंघचालक रहे और उनके बाद आज़ादी मिलने तक गोलवलकर रहे. इन बाईस वर्षों में आज़ादी के आंदोलन में संघ ने कोई योगदान या सहयोग नहीं किया. संघ परिवारियों के लिए संघ कार्य ही राष्ट्र सेवा और राष्ट्रभक्ति का सबसे बड़ा काम था. संघ का कार्य क्या है? हिन्दू राष्ट्र के लिए मर मिटने वाले स्वयंसेवकों का संगठन बनाना. इन स्वयंसेवकों का चरित्र निर्माण करना. उनमें ऱाष्ट्रभक्ति को ही जीवन की सबसे बड़ी प्रेरणा और शक्ति मानने की परम आस्था बैठाना. १९४७ में जब देश आज़ाद हुआ तो देश में कोई सात हज़ार शाखाओं में छह से सात लाख स्वयंसेवक भाग ले रहे थे. आप पूछ सकते हैं कि इन एकनिष्ठ देशभक्त स्वयंसेवकों ने आज़ादी के आंदोलन में क्या किया? अगर ये सशस्त्र क्रांति में विश्वास करते थे तो अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ इनने कितने सशस्त्र उपद्रव किए, कितने अंग्रेज़ों को मारा और उनके कितने संस्थानों को नष्ट किया. कितने स्वयंसेवक अंग्रेज़ों की गोलियों से मरे और कितने वंदेमातरम् कहकर फांसी पर झूल गए? हिन्दुत्ववादियों के हाथ से एक निहत्था अहिंसक गांधी ही मारा गया.

संघ और इन स्वयंसेवकों के लिए आज़ादी के आंदोलन से ज़्यादा महत्वपूर्ण स्वतंत्र हिन्दू राष्ट्र के लिए संगठन बनाना और स्वयंसेवक तैयार करना था. संगठन को अंग्रेज़ों की पाबंदी से बचाना था. इनके लिए स्वतंत्र भारत राष्ट्र अंग्रेज़ों से आज़ाद कराया गया भारत नहीं था. इनका हिन्दू राष्ट्र तो कोई पांच हज़ार साल से ही बना हुआ है. उसे पहले मुसलमानों और फिर अंग्रेज़ों से मुक्त कराना है. मुसलमान हिन्दू राष्ट्र के दुश्मन नंबर एक और अंग्रेज़ नंबर दो थे. सिर्फ़ अंग्रेज़ों को बाहर करने से इनका हिन्दू राष्ट्र आज़ाद नहीं होता. मुसलमानों को भी या तो बाहर करना होगा या उन्हें हिन्दू संस्कृति को मानना होगा. इसलिए अब उनका नारा है- वंदे मातरम् गाना होगा, नहीं तो यहां से जाना होगा.  सवाल यह है कि जब आज़ादी का आंदोलन- संघ परिवारियों के लिए स्वैच्छिक था तो स्वतंत्र धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक भारत में वंदेमातरम् गाना स्वैच्छिक क्यों नहीं हो सकता? भारत ने हिन्दू राष्ट्र को स्वीकार नहीं किया है. यह भारत संघियों का हिन्दू राष्ट्र नहीं है. वंदेमातरम् राष्ट्रगीत है, राष्ट्रीयता की कसौटी नहीं है.

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