परमाणु समझौता- उत्तरदायित्व किसका?
July 31, 2006 at 11:42 pm | In राजपाट | Leave a Comment
मैंने बहुत ज़्यादा तो नहीं लेकिन मोटे तौर पर भारत-अमेरिकी सिविल न्यूक्लियर डील के बारे में पढ़ा है. १९७४ से हम पर अमेरिकी प्रतिबंध है. यानी परमाणु शक्ति के मामले में हम अमेरिका पर निर्भर नही रहे. विगत कई दशकों से हमारे वैज्ञानिकों ने इस दिशा में बिना अमेरिकी मदद के बहुत कुछ हासिल किया जो देश के चुनिंदा मुल्को को हासिल है. इस मामले में हमारा रवैया ज़िम्मेदारी भरा रहा है. १८ जुलाई २००५ को बुश ने हमें भरोसा दिलाया कि प्रस्तावित समझौते को अमेरिकी संसद के दोनों सदनों की मंजूरी दिलाने की दिशा में वे भरसक प्रयत्न करेंगे. इस समझौते के अमल मे आने के बाद भारत को परमाणु संवर्धन सामग्री अमेरिका की ओर से मुहैया कराई जाएगी. एक साल पहले यह बातचीत अमेरिका गए हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और जॉर्ज बुश के बीच हुई थी.
बुश इन दिनों इस समझौते पर मुहर लगवाने के लिए सदन के दोनों सदनों (सीनेट और हाउस ऑफ़ रिप्रेज़ेंटेटिव) में एड़ी चोटी का ज़ोर लगा रहे हैं. भारत विरोधी लॉबी इसमें कुछ शर्तें जोड़ने की कोशिशें कर रही हैं तो कुछ ऐसे भी प्रतिनिधि हैं जो इस समझौते को परमाणु अप्रसार की दिशा में रोड़ा समझते हैं. यानी सुपरपॉवर अमेरिका का सर्वशक्तिशाली राष्ट्रपति इन दिनों समझौते पर मुहर लगवाने के लिए ज़ोर लगा रहा है और मेरे देश का प्रधानमंत्री इस डील के बारे में मौन है. उसका उत्तरदायित्व क्या है ये किसी को नहीं मालूम…सरदार जी मीडिया के सामने कहते हैं कि उन्हें विपक्ष की चिंताओं का पता है और वे इस पर विचार कर रहे हैं. ये कैसा प्रधानमंत्री है जो इतने बड़े समझौते के बारे में खुलासा करना अपना कर्तव्य नहीं समझता. क्या जनता को यह जानने का अधिकार नहीं कि उस समझौते में ऐसा क्या है जो भारत के हित में है या नहीं है? या तो सरकार में बैठे लोग ये मानते हैं कि हमारी संसद इस विषय की बारीक़ियों को समझने का माद्दा नहीं रखती या फिर उन्हें कुर्सी मिलते ही ये गुमां हो गया है कि वे चाहे जो समझौते कर लें- इस देश में कोई रोकने-टोकने वाला नहीं है.
क्या यह सही नहीं है कि इस समझौते के मुताबिक़ अमेरिकी संसद को यह अधिकार होगा कि वह सालाना इसकी समीझा करे और भारत का रुख देखते हुए वह इसके आगे जारी रखे या नहीं रखे- के लिए स्वतंत्र है. यानी बदले में भारत को लगातार अमेरिका के हर अच्छे-बुरे का समर्थन करना ही होगा. यानी हमारी विदेश नीति भी ब्रिटेन की चाटुनीति का ही अनुसरण करेगी? ऐसी चंडाल चौकड़ी (P-5) में जाने से तो बेहतर है कि हम अपने दम पर तटस्थ रहे. रख ले वापस तू अपना सपोर्ट अमेरिका! तू इधर दिल्ली में चाय पीता है तो इस्लामाबाद जाकर शरबत.
जब किसी समझौते को कसौटी पर कसने के लिए अमेरिका के राष्ट्रपति को संसद का विश्वास हासिल करना ज़रूरी है तो मेरे देश के प्रधानमंत्री को यह स्वतंत्रता क्या संसद ने दी है? आपको शायद यह जानकर हैरानी होगी कि विपक्षी दलों के एक सांसद से निजी तौर पर हुई बातचीत में उनका इस विषय पर मुझसे कहना था कि हमें तो समझौते के बारे में जानकारी मीडिया के ज़रिए मिलती है. कुछ ऐसा ही मेरे मीडियाकर्मी मित्र का कहना था कि वामदलों में भी इसी बात को लेकर नाराज़गी है. क्या भाजपा, सपा और वामदलों का साझा विरोध महज़ राजनीतिक बवाल है? क्या ये हमारी सरकार की ज़िम्मेदारी नहीं है कि संसद के ज़रिए जनता को हमेशा बताया जाए कि किन देशों के साथ किस तरह का समझौता किया जा रहा है और इन समझौतों पर उठी आशंकाओं का निवारण करें. इतना ही क्यों.. पहले भी दोहा राउंड की डब्ल्यूटीओ वार्ताओं पर देश की सरकार इसी तरह का मौन साधे हुए थी.
न्यूक्लियर समझौते का खुलासा आज इसलिए भी ज़रूरी है कि हमारा भरोसा इन नेताओं पर से उठता जा रहा है. ऊपर से जब पीएमओ में जासूसों की बात सुनते हैं तो यह आशंका और बढ़ जाती है. कुछ दिनो पहले केजीबी के पूर्व लाइब्रेरियन मित्रोखिन की आत्मकथा में हुए खुलासे के बाद अब इन दिनों अमेरिकी जासूस की चर्चा ज़ोरों पर है.
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