प्रिंस को बचाना है..

July 24, 2006 at 9:44 pm | In भारतनामा | Leave a Comment

५० घंटों तक मौत से जूझने के बाद आख़िरकार प्रिंस बाहर आ गया. प्रिंस हरियाणा के कुरूक्षेत्र ज़िले के हल्देरी गांव के रामचंद्र नाम के दिहाड़ी मज़दूर का बच्चा है. शुक्रवार को पांच साल का यह बच्चा अपने साथियों के साथ पकड़म-पकड़ी खेलते हुए एक फ़ुट चौड़े और ५३ फ़ुट गहरे गढ्ढे में गिर गया था. ग्रामीणों और ज़िला प्रशासन ने शनिवार दोपहर तक उसे बाहर निकालने की भरसक कोशिश की लेकिन नाकामयाब रहे. पंद्रह किलोमीटर दूर अम्बाला छावनी में मौजूद सेना से मदद मांगी गई. सैनिकों ने दोपहर तीन बजे से इस ऑपरेशन की कमान संभाली और रविवार रात आठ बजे तक प्रिंस अपनी मां के आंचल में पहुंच चुका था.

इस घटना ने मुझे द्रवित कर दिया है. पिछले २४ घंटों में कुछ और ख़्याल नहीं था कि दुनिया में कहां-क्या हो रहा है. चिंता तो थी बस यही थी कि प्रिंस को बचाना है. ग़रीब बाप का यह बच्चा प्रिंस जीवन और मौत के बीच जूझते हुए बहुत-सी बातें कह रहा था. मैं उसकी सिसकारियों में जीवन संघर्ष के मायने ढूंढ रहा था. रात ढलते-ढलते तक सारी दुनिया में बसे भारतवासियों तक यह ख़बर मीडिया के ज़रिए पहुंच चुकी थी. कल तक उलजूलूल ख़बरों में डूबा मीडिया आज अपनी सार्थक भूमिका निभाते-निभाते खुद को हैरान पा रहा था. देश के दर्ज़नभर ख़बरिया चैनलों में दुनियाभर से लाखों फ़ोन कॉल्स और इतने ही मैसेज आ रहे थे. मैं देख रहा था और महसूस कर रहा था कि कैसे एक छोटे से बच्चे ने दुनियाभर के भारतवासियों को एक सूत्र में पिरो दिया. मीडिया लाखों-करोड़ों जनों की भावनाओं की ज़बान बन रहा था.

बच्चा गढ्ढे में गिरता है. उसे गढ्ढे से बाहर निकालने के लिए करोड़ो हाथ आसमां की ओर दुआ के लिए उठते हैं. मीडिया पर फ़ोन कालों का सिलसिला शुरू होता है. जयपुर का रमज़ान, लखनऊ का रमाकांत मिश्रा, गुवाहाटी का रमेश, मुंबई का सलीम, बिलासपुर का केदार शर्मा, दुबई से जगजीत वालिया, पटना से केपी झा, अंडमान से कैप्टन सुखबीर– सभी बच्चे के लिए दुआएं करते हैं. ये भारतवासी अलग-अलग नामों के हैं, अलग मज़हब, अलग जाति के हैं. इनमें से शायद ही किसी ने उस मासूम प्रिंस को देखा होगा.

मीडिया कवरेज
स्टार न्यूज़- ऑकलैंड न्यूज़ीलैंड से अनवर और उनकी अहलिया रुंधे गले से रात तीन बजे बताते हैं कि उनने प्रिंस की सलामती के लिए दो रकात नमाज़ पढ़ी है. इस चैनल का एंकर सईद अंसारी रात ग्यारह बजे से दूसरे दिन दस बजे तक बिना रुके कार्यक्रम प्रस्तुत करता है.
ज़ी न्यूज़- इस चैनल ने शनिवार दोपहर पौने दो बजे ख़बर ब्रेक की थी. स्लग दिया- प्रिंस को बचाना है. इस चैनल को नोएडा से मैकेनिकल इंजीनियर निखिल सुझाव देते हैं कि कैसे रसायन-विशेष का इस्तेमाल करते हुए मिट्टी का खिसकना रोका जा सकता है. इसी सीधे प्रसारण के बीच-बीच में यह चैनल कन्या भ्रूण हत्या के ख़िलाफ़ जनजागरण का विज्ञापन चलाता है.
इंडिया टीवी- लखनऊ के नेत्रहीन बच्चों को प्रिंस की सलामती के लिए प्रार्थना करते दिखाता है. घटनास्थल पर पहुंचा रिपोर्टर आशीष सिंह बताता है कि प्रिंस की जीत को वहां मौजूद हर बंदा अपनी निजी जीत मान रहा है. हर किसी के चेहरे पर मुस्कान खिली है.
एनडीटीवी- अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में अरदास, मुंबई के मदर मेरी चर्च में प्रेयर और यहीं की मस्जिद में विशेष नमाज़ अता करते हुए दिखाता है. सीधा प्रसारण सिद्धिविनायक मंदिर से भी होता है जहां बच्चे के लिए गणदेव से पूजा की जा रही है.

र कोई जुटा था प्रिंस को बचाने की जद्दोजहद में. जो सेना रणमोर्चे पर लड़ते हुए शत्रुओं को पलभर में मौत की नींद सुला देती है या अपनी जान न्यौछावर कर देती है, वह सेना आज एक नन्हे बालक को ज़िंदगी दे रही थी. अंततः भारतीय सेना और उसके साथ सहयोग कर रहे सैकड़ों ग्रामीण प्रिंस को बचाने में कामयाब होते हैं.

मुंबई धमाकों के बाद किन्हीं लोगों के मानस पटल पर एक दरार-सी पड़ी थी. उन्हें लगा था कि अब बस.. बहुत हो गया… ये क़ौम हमें चैन से जीने नहीं देगी. हम बदला लेंगे. कुछ ने कोशिश की कि उन धमाकों के थमे गुबार से खून की ज्वाला भी उठे. लेकिन हम ख़ामोश रहे. तमाम तर्कवादियों ने भरसक कोशिशें की थीं कि प्रतिक्रियावाद का ज्वार उठे लेकिन हम ख़ामोश रहे. इज़रायल का हवाला दिया गया कि एक वो मुल्क़ है और एक हम मुल्क़ हैं लेकिन हम ख़ामोश रहे. दरअसल, ऐसी प्रतिक्रियाएँ किसी राष्ट्रवादी का दूसरे राष्ट्र के प्रति झलक रहा ग़ुस्सा कम बल्क़ि इसकी आड़ में धर्म-विशेष के मतावलंबियों को निशाना बनाए जाने की घिनौनी साज़िशें ज़्यादा रहीं. इन कोशिशों पर धूर्तता से देशभक्ति का मुलम्मा चढ़ाया जाता है. जिहादी जंग से लेकर हंटिग्टन थ्योरी और राजनीतिक सत्यता तक के तर्क गढ़े जाते हैं. क़ौम के ख़तरे में होने का नारा लगाकर जिहाद के नाम पर आत्मघाती क़दम के लिए हज़ारों युवाओं को भड़काने पर उतारू किया जाता है. कोशिश पूरी होती है कि किसी तरह तनाव फैले, दंगे हों, उन्माद हो.

फिर भी तमाम तर्कों को धता बताते हुए मुंबई ख़ामोश रहा और चल पड़ा अपनी उस पुरानी राह पर जहां उसे लंबा सफ़र तय करना है शक्तिशाली और समृद्ध भारत का. इधर, प्रिंस की घटना ने भी मीडिया के ज़रिए बहुतेरे लोगों ने यह जता दिया कि कोई ताक़त उनकी एकता को तोड़ नहीं सकती.

बच्चा गहरे गढ्ढे में गिरा था. बाहर आ गया. लेकिन मुझे चिंता उनकी होती है जो
विचारों के रसातल में गिर चुके हैं. ऐसे गहरे गढ्ढों में गिर गए हैं जो सांप्रदायिक, जातिवादी, रंग और नस्लभेदियों ने खोदकर रखे हैं. शायद उन्हें इस घटना ने सबक सिखाया होगा.

यह दिखाया होगा कि संवेदनाओं की सीमा नहीं होती.. मज़हबीं, जातीय, नस्ली सीमाएं मायने नहीं रखतीं. उन्हीं संवेदनाओं को विस्तार देते हुए मैं इज़रायल-लेबनान युद्ध में मारे जा रहे और जान बचाने की जद्दोजहद मे जुटे लाखों लोगों के प्रति अपनी हार्दिक संवेदना व्यक्त करता हूं. यह घटना हमें प्रेरणा दे रही है कि संवेदनाओँ को विस्तार दें.. क्योंकि बहुत-से प्रिंस है जो अब भी ज़िंदगी के लिए संघर्ष कर रहे हैं. देश की सड़कों पर बने फुटपाथों पर.. चाय की ठेलियों पर.. टोकरियां थामे कचरे के ढेरों पर. ज़रूरी है इन प्रिंसों को बचाना.

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