बाज़ार में ख़र्च होते बिग बी
ख़बरें फिर गर्म हो गईं अमिताभ के आयकर संबंधी विवादों की. लड़ाई समाजवादी पार्टी और सत्तारूढ़ कॉग्रेस की लेकिन निशाने पर अमिताभ हैं. यहां वे अर्धराजनीतिक व्यक्तित्व दिखाई देते हैं. उनकी अर्धांगिनी अमिताभ जया बच्चन सपा से हाल में दोबारा सांसद बनीं हैं. अमिताभ का राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है- ये साफ़-साफ़ नहीं कहा जा सकता. सत्ता के गलियारों में व्यापारियों का आना-जाना लगा रहता है. व्यापार के रास्ते में आने वाली बाधाओं को दूर करने के नुस्खे इन्हीं गलियारों में ढूंढे जाते हैं.
अमिताभ की अभिनय प्रतिभा पर सवाल खड़े करना बचकाना होगा लेकिन अमिताभ के साथ दो दशक तक त्रासदी यही रही कि उनकी छवि अभिनेता अमिताभ से बड़ी होती गई. वे व्यवस्था में पिस रहे आम आदमी का प्रतिनिधि नहीं कर पाए. वे एंग्रीमैन बन गए. प्रकाश मेहरा और मनमोहन देसाई ने अमिताभ को एंग्रीमैन की इमेज दी. नब्बे के दशकांत में अमिताभ गुमनामी के अंधेरे में खोते गए. दर्ज़नों हिट फ़िल्म देने वाले अमिताभ की फ़िल्में पिटती गईं.
अपने दोस्त राजीव गांधी के कहने पर उन्होंने राजनीति को गले लगाया था उसी राजनीति ने उनके दामन पर बोफ़ोर्स का दाग़ लगा दिया. इलाहाबाद चुनाव लड़ने से पहले अमिताभ ने सार्वजनिक जीवन में किसी तरह की वैचारिक प्रतिबद्धता नहीं जताई थी. सामाजिक समस्याओं के समाधान की दिशा में उनका कोई निजी नज़रिया भी नहीं था. पॉलिटिशियन अमिताभ के रचनाकार राजीव थे. छब्बे जी बनने चले चौबे जी आख़िरकार दुबे बनकर लौटे. हालांकि बाद में ब्रिटिश कोर्ट के फ़रमान से दामन पर लगा बोफ़ोर्स का दाग़ मिटा लिया गया लेकिन तब तक अमिताभ राजनीति को अलविदा कह चुके थे.
देश में उदारीकरण का दौर शुरू हुआ और फ़िल्मी सितारों से लेकर खेल सितारें, यहां तक कि नेता तक ब्रांड में तब्दील होने लगे. अमिताभ को ब्रांड बनाने की पहली कोशिश एबीसीएल के तौर पर हमारे सामने आई. कंपनी और इसकी बनाई फ़िल्मों का भट्ठा बैठ गया. कहा गया कि बिज़नेसमैन बनने निकले अमिताभ को उनके ही रणनीतिकार ले डूबे. पहले मेहरा-देसाई एंग्रीमैन अमिताभ के रचनाकार थे. इन्हीं दोनों की आख़री दौर की फ़िल्मों में अमिताभ भी अंधेरे में डूब गए. फिर एबीसीएल की टीम ने उन्हें डुबोया. अमिताभ वित्तीय संकटों से जूझ रहे थे. इस दौर में अमर सिंह उनके साथ आए. कहा गया कि समाजवादी पार्टी के थैलीशाहों ने अमिताभ को संकटों से उबारा. अमिताभ का सिक्का फिर चल निकला.
जीवन के सांध्यकाल में अमिताभ आख़िरकार ब्रांड बन ही गए. नाम मिला ‘बिग बी’. बिग बी दुनिया के बाज़ार में बिकने वाली हर चीज़ के साथ दिखाई देने लगे. जिन्होंने संकटों से उबारा वो दोस्ती के बदले बहुत कुछ लेते चले गए. बिग बी का बाज़ार सजा तो सियासत ने भी बदले में कुछ मांगा और बिग बी ने समाजवादियों के लिए भी मार्केटिंग की. ये अमिताभ के नए रचनाकार हैं. अमिताभ चुनाव चिन्ह लेकर साथ नहीं चले लेकिन चुनावों के दौर में सपा नेताओं के साथ नज़र आए. वे नेता नहीं हैं लेकिन नेताओं के साथ नज़र आए. वे किसान नहीं हैं लेकिन ज़मीन ख़रीदने के लिए किसान बने नज़र आए. वो सिगरेट नहीं पीते लेकिन सिगरेट पीते नज़र आए. सियासत से सितारों की दुनिया तक जैसा रचनाकार मिला वैसा अमिताभ नज़र आया. बाज़ार में ख़र्च होते अमिताभ यह तय नहीं कर सके कि ख़ुद वे क्या हैं.

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