परमाणु समझौता- उत्तरदायित्व किसका?

July 31, 2006 at 11:42 pm | In राजपाट | Leave a Comment

मैंने बहुत ज़्यादा तो नहीं लेकिन मोटे तौर पर भारत-अमेरिकी सिविल न्यूक्लियर डील के बारे में पढ़ा है. १९७४ से हम पर अमेरिकी प्रतिबंध है. यानी परमाणु शक्ति के मामले में हम अमेरिका पर निर्भर नही रहे. विगत कई दशकों से हमारे वैज्ञानिकों ने इस दिशा में बिना अमेरिकी मदद के बहुत कुछ हासिल किया जो देश के चुनिंदा मुल्को को हासिल है. इस मामले में हमारा रवैया ज़िम्मेदारी भरा रहा है. १८ जुलाई २००५ को बुश ने हमें भरोसा दिलाया कि प्रस्तावित समझौते को अमेरिकी संसद के दोनों सदनों की मंजूरी दिलाने की दिशा में वे भरसक प्रयत्न करेंगे. इस समझौते के अमल मे आने के बाद भारत को परमाणु संवर्धन सामग्री अमेरिका की ओर से मुहैया कराई जाएगी. एक साल पहले यह बातचीत अमेरिका गए हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और जॉर्ज बुश के बीच हुई थी.

बुश इन दिनों इस समझौते पर मुहर लगवाने के लिए सदन के दोनों सदनों (सीनेट और हाउस ऑफ़ रिप्रेज़ेंटेटिव) में एड़ी चोटी का ज़ोर लगा रहे हैं. भारत विरोधी लॉबी इसमें कुछ शर्तें जोड़ने की कोशिशें कर रही हैं तो कुछ ऐसे भी प्रतिनिधि हैं जो इस समझौते को परमाणु अप्रसार की दिशा में रोड़ा समझते हैं. यानी सुपरपॉवर अमेरिका का सर्वशक्तिशाली राष्ट्रपति इन दिनों समझौते पर मुहर लगवाने के लिए ज़ोर लगा रहा है और मेरे देश का प्रधानमंत्री इस डील के बारे में मौन है. उसका उत्तरदायित्व क्या है ये किसी को नहीं मालूम…सरदार जी मीडिया के सामने कहते हैं कि उन्हें विपक्ष की चिंताओं का पता है और वे इस पर विचार कर रहे हैं. ये कैसा प्रधानमंत्री है जो इतने बड़े समझौते के बारे में खुलासा करना अपना कर्तव्य नहीं समझता. क्या जनता को यह जानने का अधिकार नहीं कि उस समझौते में ऐसा क्या है जो भारत के हित में है या नहीं है? या तो सरकार में बैठे लोग ये मानते हैं कि हमारी संसद इस विषय की बारीक़ियों को समझने का माद्दा नहीं रखती या फिर उन्हें कुर्सी मिलते ही ये गुमां हो गया है कि वे चाहे जो समझौते कर लें- इस देश में कोई रोकने-टोकने वाला नहीं है.

क्या यह सही नहीं है कि इस समझौते के मुताबिक़ अमेरिकी संसद को यह अधिकार होगा कि वह सालाना इसकी समीझा करे और भारत का रुख देखते हुए वह इसके आगे जारी रखे या नहीं रखे- के लिए स्वतंत्र है. यानी बदले में भारत को लगातार अमेरिका के हर अच्छे-बुरे का समर्थन करना ही होगा. यानी हमारी विदेश नीति भी ब्रिटेन की चाटुनीति का ही अनुसरण करेगी? ऐसी चंडाल चौकड़ी (P-5) में जाने से तो बेहतर है कि हम अपने दम पर तटस्थ रहे. रख ले वापस तू अपना सपोर्ट अमेरिका! तू इधर दिल्ली में चाय पीता है तो इस्लामाबाद जाकर शरबत.

जब किसी समझौते को कसौटी पर कसने के लिए अमेरिका के राष्ट्रपति को संसद का विश्वास हासिल करना ज़रूरी है तो मेरे देश के प्रधानमंत्री को यह स्वतंत्रता क्या संसद ने दी है? आपको शायद यह जानकर हैरानी होगी कि विपक्षी दलों के एक सांसद से निजी तौर पर हुई बातचीत में उनका इस विषय पर मुझसे कहना था कि हमें तो समझौते के बारे में जानकारी मीडिया के ज़रिए मिलती है. कुछ ऐसा ही मेरे मीडियाकर्मी मित्र का कहना था कि वामदलों में भी इसी बात को लेकर नाराज़गी है. क्या भाजपा, सपा और वामदलों का साझा विरोध महज़ राजनीतिक बवाल है? क्या ये हमारी सरकार की ज़िम्मेदारी नहीं है कि संसद के ज़रिए जनता को हमेशा बताया जाए कि किन देशों के साथ किस तरह का समझौता किया जा रहा है और इन समझौतों पर उठी आशंकाओं का निवारण करें. इतना ही क्यों.. पहले भी दोहा राउंड की डब्ल्यूटीओ वार्ताओं पर देश की सरकार इसी तरह का मौन साधे हुए थी.

न्यूक्लियर समझौते का खुलासा आज इसलिए भी ज़रूरी है कि हमारा भरोसा इन नेताओं पर से उठता जा रहा है. ऊपर से जब पीएमओ में जासूसों की बात सुनते हैं तो यह आशंका और बढ़ जाती है. कुछ दिनो पहले केजीबी के पूर्व लाइब्रेरियन मित्रोखिन की आत्मकथा में हुए खुलासे के बाद अब इन दिनों अमेरिकी जासूस की चर्चा ज़ोरों पर है.

प्रिंस को बचाना है..

July 24, 2006 at 9:44 pm | In भारतनामा | Leave a Comment

५० घंटों तक मौत से जूझने के बाद आख़िरकार प्रिंस बाहर आ गया. प्रिंस हरियाणा के कुरूक्षेत्र ज़िले के हल्देरी गांव के रामचंद्र नाम के दिहाड़ी मज़दूर का बच्चा है. शुक्रवार को पांच साल का यह बच्चा अपने साथियों के साथ पकड़म-पकड़ी खेलते हुए एक फ़ुट चौड़े और ५३ फ़ुट गहरे गढ्ढे में गिर गया था. ग्रामीणों और ज़िला प्रशासन ने शनिवार दोपहर तक उसे बाहर निकालने की भरसक कोशिश की लेकिन नाकामयाब रहे. पंद्रह किलोमीटर दूर अम्बाला छावनी में मौजूद सेना से मदद मांगी गई. सैनिकों ने दोपहर तीन बजे से इस ऑपरेशन की कमान संभाली और रविवार रात आठ बजे तक प्रिंस अपनी मां के आंचल में पहुंच चुका था.

इस घटना ने मुझे द्रवित कर दिया है. पिछले २४ घंटों में कुछ और ख़्याल नहीं था कि दुनिया में कहां-क्या हो रहा है. चिंता तो थी बस यही थी कि प्रिंस को बचाना है. ग़रीब बाप का यह बच्चा प्रिंस जीवन और मौत के बीच जूझते हुए बहुत-सी बातें कह रहा था. मैं उसकी सिसकारियों में जीवन संघर्ष के मायने ढूंढ रहा था. रात ढलते-ढलते तक सारी दुनिया में बसे भारतवासियों तक यह ख़बर मीडिया के ज़रिए पहुंच चुकी थी. कल तक उलजूलूल ख़बरों में डूबा मीडिया आज अपनी सार्थक भूमिका निभाते-निभाते खुद को हैरान पा रहा था. देश के दर्ज़नभर ख़बरिया चैनलों में दुनियाभर से लाखों फ़ोन कॉल्स और इतने ही मैसेज आ रहे थे. मैं देख रहा था और महसूस कर रहा था कि कैसे एक छोटे से बच्चे ने दुनियाभर के भारतवासियों को एक सूत्र में पिरो दिया. मीडिया लाखों-करोड़ों जनों की भावनाओं की ज़बान बन रहा था.

बच्चा गढ्ढे में गिरता है. उसे गढ्ढे से बाहर निकालने के लिए करोड़ो हाथ आसमां की ओर दुआ के लिए उठते हैं. मीडिया पर फ़ोन कालों का सिलसिला शुरू होता है. जयपुर का रमज़ान, लखनऊ का रमाकांत मिश्रा, गुवाहाटी का रमेश, मुंबई का सलीम, बिलासपुर का केदार शर्मा, दुबई से जगजीत वालिया, पटना से केपी झा, अंडमान से कैप्टन सुखबीर– सभी बच्चे के लिए दुआएं करते हैं. ये भारतवासी अलग-अलग नामों के हैं, अलग मज़हब, अलग जाति के हैं. इनमें से शायद ही किसी ने उस मासूम प्रिंस को देखा होगा.

मीडिया कवरेज
स्टार न्यूज़- ऑकलैंड न्यूज़ीलैंड से अनवर और उनकी अहलिया रुंधे गले से रात तीन बजे बताते हैं कि उनने प्रिंस की सलामती के लिए दो रकात नमाज़ पढ़ी है. इस चैनल का एंकर सईद अंसारी रात ग्यारह बजे से दूसरे दिन दस बजे तक बिना रुके कार्यक्रम प्रस्तुत करता है.
ज़ी न्यूज़- इस चैनल ने शनिवार दोपहर पौने दो बजे ख़बर ब्रेक की थी. स्लग दिया- प्रिंस को बचाना है. इस चैनल को नोएडा से मैकेनिकल इंजीनियर निखिल सुझाव देते हैं कि कैसे रसायन-विशेष का इस्तेमाल करते हुए मिट्टी का खिसकना रोका जा सकता है. इसी सीधे प्रसारण के बीच-बीच में यह चैनल कन्या भ्रूण हत्या के ख़िलाफ़ जनजागरण का विज्ञापन चलाता है.
इंडिया टीवी- लखनऊ के नेत्रहीन बच्चों को प्रिंस की सलामती के लिए प्रार्थना करते दिखाता है. घटनास्थल पर पहुंचा रिपोर्टर आशीष सिंह बताता है कि प्रिंस की जीत को वहां मौजूद हर बंदा अपनी निजी जीत मान रहा है. हर किसी के चेहरे पर मुस्कान खिली है.
एनडीटीवी- अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में अरदास, मुंबई के मदर मेरी चर्च में प्रेयर और यहीं की मस्जिद में विशेष नमाज़ अता करते हुए दिखाता है. सीधा प्रसारण सिद्धिविनायक मंदिर से भी होता है जहां बच्चे के लिए गणदेव से पूजा की जा रही है.

र कोई जुटा था प्रिंस को बचाने की जद्दोजहद में. जो सेना रणमोर्चे पर लड़ते हुए शत्रुओं को पलभर में मौत की नींद सुला देती है या अपनी जान न्यौछावर कर देती है, वह सेना आज एक नन्हे बालक को ज़िंदगी दे रही थी. अंततः भारतीय सेना और उसके साथ सहयोग कर रहे सैकड़ों ग्रामीण प्रिंस को बचाने में कामयाब होते हैं.

मुंबई धमाकों के बाद किन्हीं लोगों के मानस पटल पर एक दरार-सी पड़ी थी. उन्हें लगा था कि अब बस.. बहुत हो गया… ये क़ौम हमें चैन से जीने नहीं देगी. हम बदला लेंगे. कुछ ने कोशिश की कि उन धमाकों के थमे गुबार से खून की ज्वाला भी उठे. लेकिन हम ख़ामोश रहे. तमाम तर्कवादियों ने भरसक कोशिशें की थीं कि प्रतिक्रियावाद का ज्वार उठे लेकिन हम ख़ामोश रहे. इज़रायल का हवाला दिया गया कि एक वो मुल्क़ है और एक हम मुल्क़ हैं लेकिन हम ख़ामोश रहे. दरअसल, ऐसी प्रतिक्रियाएँ किसी राष्ट्रवादी का दूसरे राष्ट्र के प्रति झलक रहा ग़ुस्सा कम बल्क़ि इसकी आड़ में धर्म-विशेष के मतावलंबियों को निशाना बनाए जाने की घिनौनी साज़िशें ज़्यादा रहीं. इन कोशिशों पर धूर्तता से देशभक्ति का मुलम्मा चढ़ाया जाता है. जिहादी जंग से लेकर हंटिग्टन थ्योरी और राजनीतिक सत्यता तक के तर्क गढ़े जाते हैं. क़ौम के ख़तरे में होने का नारा लगाकर जिहाद के नाम पर आत्मघाती क़दम के लिए हज़ारों युवाओं को भड़काने पर उतारू किया जाता है. कोशिश पूरी होती है कि किसी तरह तनाव फैले, दंगे हों, उन्माद हो.

फिर भी तमाम तर्कों को धता बताते हुए मुंबई ख़ामोश रहा और चल पड़ा अपनी उस पुरानी राह पर जहां उसे लंबा सफ़र तय करना है शक्तिशाली और समृद्ध भारत का. इधर, प्रिंस की घटना ने भी मीडिया के ज़रिए बहुतेरे लोगों ने यह जता दिया कि कोई ताक़त उनकी एकता को तोड़ नहीं सकती.

बच्चा गहरे गढ्ढे में गिरा था. बाहर आ गया. लेकिन मुझे चिंता उनकी होती है जो
विचारों के रसातल में गिर चुके हैं. ऐसे गहरे गढ्ढों में गिर गए हैं जो सांप्रदायिक, जातिवादी, रंग और नस्लभेदियों ने खोदकर रखे हैं. शायद उन्हें इस घटना ने सबक सिखाया होगा.

यह दिखाया होगा कि संवेदनाओं की सीमा नहीं होती.. मज़हबीं, जातीय, नस्ली सीमाएं मायने नहीं रखतीं. उन्हीं संवेदनाओं को विस्तार देते हुए मैं इज़रायल-लेबनान युद्ध में मारे जा रहे और जान बचाने की जद्दोजहद मे जुटे लाखों लोगों के प्रति अपनी हार्दिक संवेदना व्यक्त करता हूं. यह घटना हमें प्रेरणा दे रही है कि संवेदनाओँ को विस्तार दें.. क्योंकि बहुत-से प्रिंस है जो अब भी ज़िंदगी के लिए संघर्ष कर रहे हैं. देश की सड़कों पर बने फुटपाथों पर.. चाय की ठेलियों पर.. टोकरियां थामे कचरे के ढेरों पर. ज़रूरी है इन प्रिंसों को बचाना.

तेरा दर्द मेरे दर्द से ज़्यादा कैसे?

July 12, 2006 at 12:03 am | In भारतनामा | Leave a Comment

बुधवार सुबह के अख़बारों की सुर्ख़ियों में एक शब्द बार-बार दिखाई पड़ा- 7/11. ये शब्द मानो अमेरिका के 9/11 की याद दिला रहा है. पहले पहल चैनलवालों ने इस शब्द का इस्तेमाल किया. इससे तुकबंदी मालूम होती है. लेकिन पीछे का मर्म यह है कि हम दुनिया को बता रहे हैं कि अमेरिकी और उनके चाटूकार मित्र देख लें कि भारत भी आतंकवाद की आग में झुलस रहा है. मुझे याद पड़ता है ट्विन टॉवर पर अटैक के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति ने एक लाइन का बयान जारी किया था- Either you are with us, or you are with the terrorists.

सभ्यता के प्रसार के नाम पर हमले कर रहा एक शक्तिशाली देश एकध्रुवीय दुनिया के छोटे-मोटे देशों को मानो ललकार रहा हो कि या तो हमारे साथ आओ वरना आतंकवादियों में गिने जाओगे. भारतीय वक़्त के मुताबिक़ शाम का वो हादसा था और थोड़ी ही देर में जॉर्ज बुश दुनिया को एक मायने से ललकार ही चुके थे कि उसके फ़ौरन बाद हमारी सरकार को जाने कौन-सी आस बंध गई कि वाजपेयी साहब ने कह दिया- भारत आतंकवाद के ख़िलाफ़ है, हम अमेरिका को सपोर्ट देते है. तब किसी दोस्त के घर बैठा हादसे की लाइव तस्वीरें देखते हुए मैं सोच रहा था शायद वाजपेयी साहब को आस थी कि इसी बहाने पाकिस्तान के ख़िलाफ़ कुछ कर गुज़रने का मौक़ा मिलेगा. रात ढलते तक मुशर्ऱफ़ भी टीवी पर आए और दो बातें कह गए. पहली पाकिस्तान इस्लाम का क़िला है, देशवासी बुद्धिमानी से काम लें और दूसरी यह कि अमेरिका में हुए हादसे में हम पाकिस्तानी उनके साथ हैं. तीनों राष्ट्रप्रमुखों ने अपने राष्ट्र की ज़रूरत के मुताबिक़ बातें कह दीं थी.

हमें आस थी कि अमेरिका 1991 की तरह हमारे एयरबेस इस्तेमाल करेगा. लेकिन अमेरिका का तात्कालिक दुश्मन पाकिस्तान नहीं था. उसे तलाश थी लादेन की. कुछ अरसे पहले रूसी चंगुल से छूटे और तालीबानी हुकुमरानों में फंसे अफ़ग़ानिस्तान पर अमेरिकी प्रभुत्व जमाने का अच्छा मौक़ा था. बुश ने भारत को नज़रअंदाज़ किया और पाकिस्तान की बांहें मरोड़कर उससे वह काम करवा लिया जो पाकी राष्ट्रपति मुशर्रफ़ के लिए टेढ़ी खीर था.

हम बात कर रहे थे 9/11 और 7/11 की. मुंबई में मंगलवार को हुई वारदात की ख़बर आते ही मुस्लिम चरमपंथियों पर शक़ की सुई दौड़ गई. इस तरह की वारदात उन्हीं की कारगुज़ारी हो सकती है. देश की यूपीए सरकार के पास जादुई चिराग़ नहीं है जो इन शैतानों को तुरंत-फुरत पकड़कर फांसी पर चढ़ा दे. चिराग़ तो बुश के पास भी नहीं था लेकिन हौसला था. परमाणु बम बना लेना बहादुरी की बात नहीं होती. जैसे ज़ेब में चाकू रखने से चाकू चलाने की हिम्मत नहीं आ जाती. हम होंगे परमाणु शक्ति लेकिन हिम्मत तो अपनी चाकू चलाने की भी नहीं है. संसद पर हमले के वक़्त भी वाजपेयी साहब ने आर-पार का ऐलान किया था. लेकिन वे आर ही आर रहे, कुछ दिनों में हम फिर पाकिस्तान के पार हो गए.

इस वक़्त हमारे गृहमंत्री शिवराज पाटिल से लेकर प्रधानमंत्री सरदार मनमोहन सिंह सिर्फ़ आंसू बहा रहे हैं. दुनिया जानती है, भारत का बच्चा-बच्चा जानता है कि पाकिस्तान के कट्टरपंथियों ने हमारा जीना हराम कर रखा है. लेकिन उस पाकिस्तान को फटकार लगाते हुए एक लफ़्ज़ हमने नहीं कहा है. सीबीआई और रॉ जैसी एजंसियां यहां तक कि मोसाद और अमेरिकी एजंसियां भी कई दफ़ा कह चुकी हैं कि सीमापार आतंकियों के ट्रेनिंग कैंप चल रहे हैं.

हम भी जानते हैं कि आतंकी किसी धर्म-ईमान के नहीं होते. मज़हब का तो बहाना है. मुंबई में ख़ून हिन्दू का बहा है तो मुसलमान का भी. मैंने कल देखा कि कैसे कुछ मुसलमान भी हादसे के दौरान कंधे से कंधा मिलाकर अपने इंसान होने का सुबूत दे रहे थे. लेकिन पाकिस्तान के उन चरमपंथियों को मैं मुसलमान भी नहीं मानता. इनका ग़िरेबां पकड़कर पूछा जाना चाहिए कि ये सब करके वे क्या हासिल करते हैं. क्या वे यह समझते हैं कि देश के पंद्रह करोड़ मुसलमान उनके बहकावे में आ जाएंगे? जिन हिंदुओं को भी यह बदगुमानी है कि मुसलमान पाकिस्तान का ही साथ देंगे तो वे अशफ़ाक़ उल्लाह खां से लेकर राष्ट्रपति कलाम तक लंबी-चौड़ी लिस्ट बना सकते हैं. वे यह भी देख सकते हैं कि कैसे तीन-तीन युद्धों के दौरान उन्होंने पाकिस्तान के ख़िलाफ़ आवाज़ें बुलंद की हैं. कुछ सुझाव सुनने में आएं हैं कि सीमापार के वे कैंप जहां अरसे से आतंकियों को तैयार किया जा रहा है उन पर हमले करने चाहिए. तब क्या अमेरिका हमें इसकी इजाज़त देगा? शायद नहीं क्योंकि पाकिस्तान से गुरेज़ रखना बुश की नीति नहीं है. वो पुचकार के चलता है मुशर्रफ़ सरकार को. बल्क़ि होना तो यह चाहिए कि हमारी सरकार ही यह ऐलान करे कि पाक सरकार ही हमें उन ठिकानों को नष्ट करने में सहयोग करे. ऐसा करते हुए हम कूटनीतिक हमले करेंगे. अमेरिका और उसके मित्र देश जब दुनियाभर में अपने हमले को जायज़ बताने के लिए साम-दाम-दंड का सहारा ले सकते हैं तो हम क्यों नहीं? हमें बातचीत के सारे रास्ते बंद करने की धमकी देनी चाहिए. अमेरिका के सामने ही यह बात रखी जाए कि आपका दर्द, दर्द है तो हमारा क्यों नहीं? पिछले पंद्रह सालों में साठ हज़ार से ज़्यादा लोगों को हमने कश्मीर में खो दिया. देशभर में कई वारदातो में हज़ारों मारे गए. फिर भड़के दंगों में करोड़ों की धनहानि और जानें गईं. किसकी शह पर? ज़ाहिर है पाकिस्तानी कट्टरपंथियों की वजह से.

पिछली दफ़ा दिल्ली दहली थी तब भी कुछ इसी तरह का मंज़र था. कोई शिक्षा नहीं ली गई. आज मुंबई फिर तड़प उठा है. कुछ दिन का हल्ला मचेगा और फिर शुरू हो जाएगा हमारा किरकिटिया उन्माद… अगले महीने श्रीलंकाई दौरे की चर्चा में हम डूबेंगे और भूल जाएंगे कि कभी मुंबई दहली थी. तब हमारी सरकार सीबीएम टाक की प्लानिंग लेकर इस्लामाबाद जाएगी और खाली हाथ वापस आ जाएगी.

बाज़ार में ख़र्च होते बिग बी

July 11, 2006 at 10:25 pm | In सिनेजगत | Leave a Comment

ख़बरें फिर गर्म हो गईं अमिताभ के आयकर संबंधी विवादों की. लड़ाई समाजवादी पार्टी और सत्तारूढ़ कॉग्रेस की लेकिन निशाने पर अमिताभ हैं. यहां वे अर्धराजनीतिक व्यक्तित्व दिखाई देते हैं. उनकी अर्धांगिनी अमिताभ जया बच्चन सपा से हाल में दोबारा सांसद बनीं हैं. अमिताभ का राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है- ये साफ़-साफ़ नहीं कहा जा सकता. सत्ता के गलियारों में व्यापारियों का आना-जाना लगा रहता है. व्यापार के रास्ते में आने वाली बाधाओं को दूर करने के नुस्खे इन्हीं गलियारों में ढूंढे जाते हैं.
अमिताभ की अभिनय प्रतिभा पर सवाल खड़े करना बचकाना होगा लेकिन अमिताभ के साथ दो दशक तक त्रासदी यही रही कि उनकी छवि अभिनेता अमिताभ से बड़ी होती गई. वे व्यवस्था में पिस रहे आम आदमी का प्रतिनिधि नहीं कर पाए. वे एंग्रीमैन बन गए. प्रकाश मेहरा और मनमोहन देसाई ने अमिताभ को एंग्रीमैन की इमेज दी. नब्बे के दशकांत में अमिताभ गुमनामी के अंधेरे में खोते गए. दर्ज़नों हिट फ़िल्म देने वाले अमिताभ की फ़िल्में पिटती गईं.
अपने दोस्त राजीव गांधी के कहने पर उन्होंने राजनीति को गले लगाया था उसी राजनीति ने उनके दामन पर बोफ़ोर्स का दाग़ लगा दिया. इलाहाबाद चुनाव लड़ने से पहले अमिताभ ने सार्वजनिक जीवन में किसी तरह की वैचारिक प्रतिबद्धता नहीं जताई थी. सामाजिक समस्याओं के समाधान की दिशा में उनका कोई निजी नज़रिया भी नहीं था. पॉलिटिशियन अमिताभ के रचनाकार राजीव थे. छब्बे जी बनने चले चौबे जी आख़िरकार दुबे बनकर लौटे. हालांकि बाद में ब्रिटिश कोर्ट के फ़रमान से दामन पर लगा बोफ़ोर्स का दाग़ मिटा लिया गया लेकिन तब तक अमिताभ राजनीति को अलविदा कह चुके थे.
देश में उदारीकरण का दौर शुरू हुआ और फ़िल्मी सितारों से लेकर खेल सितारें, यहां तक कि नेता तक ब्रांड में तब्दील होने लगे. अमिताभ को ब्रांड बनाने की पहली कोशिश एबीसीएल के तौर पर हमारे सामने आई. कंपनी और इसकी बनाई फ़िल्मों का भट्ठा बैठ गया. कहा गया कि बिज़नेसमैन बनने निकले अमिताभ को उनके ही रणनीतिकार ले डूबे. पहले मेहरा-देसाई एंग्रीमैन अमिताभ के रचनाकार थे. इन्हीं दोनों की आख़री दौर की फ़िल्मों में अमिताभ भी अंधेरे में डूब गए. फिर एबीसीएल की टीम ने उन्हें डुबोया. अमिताभ वित्तीय संकटों से जूझ रहे थे. इस दौर में अमर सिंह उनके साथ आए. कहा गया कि समाजवादी पार्टी के थैलीशाहों ने अमिताभ को संकटों से उबारा. अमिताभ का सिक्का फिर चल निकला.
जीवन के सांध्यकाल में अमिताभ आख़िरकार ब्रांड बन ही गए. नाम मिला ‘बिग बी’. बिग बी दुनिया के बाज़ार में बिकने वाली हर चीज़ के साथ दिखाई देने लगे. जिन्होंने संकटों से उबारा वो दोस्ती के बदले बहुत कुछ लेते चले गए. बिग बी का बाज़ार सजा तो सियासत ने भी बदले में कुछ मांगा और बिग बी ने समाजवादियों के लिए भी मार्केटिंग की. ये अमिताभ के नए रचनाकार हैं. अमिताभ चुनाव चिन्ह लेकर साथ नहीं चले लेकिन चुनावों के दौर में सपा नेताओं के साथ नज़र आए. वे नेता नहीं हैं लेकिन नेताओं के साथ नज़र आए. वे किसान नहीं हैं लेकिन ज़मीन ख़रीदने के लिए किसान बने नज़र आए. वो सिगरेट नहीं पीते लेकिन सिगरेट पीते नज़र आए. सियासत से सितारों की दुनिया तक जैसा रचनाकार मिला वैसा अमिताभ नज़र आया. बाज़ार में ख़र्च होते अमिताभ यह तय नहीं कर सके कि ख़ुद वे क्या हैं.

संबंध खंगालने का गुर

July 10, 2006 at 9:46 pm | In कटाक्ष | Comments Off

फ़ुटबॉल में अपनी उम्मीदें ख़त्म हो गईं. हिन्दुस्तान की बात नहीं हो रही है. अपना तो नंबर ११७वां है. दुनिया में तक़रीबन २०४ देश फ़ुटबॉल खेलते हैं. सोचो यदि इतने ही देश क्रिकेट खेलते तो अपना नंबर क्या होता. यक़ीनन अपन १०० के बाहर होते. मैं बात कर रहा हूं फ़ुटबॉल विश्वकप में ब्राज़ील और अर्जेंटीना की. दोनों लैटिन देशों से उम्मीद लगाए करोड़ों लोगों की आशाओं पर पानी फेर दिया इन यूरोपियन्स ने. अपन की ब्राज़ील और अर्जेंटीना से हमदर्दी क्यों हैं. हां भई ये समर्थन नहीं हमदर्दी ही कहो. दर्द हमारा और उनका एक-सा है. अव्वल तो अपनी और उनकी चमड़ी एक जैसी है. उनका सांबा तो अपना भांगड़ा. दोनों में ज़बर्दस्त फाकां-मस्ती. तीसरा यह कि अपने यहां भी आम आदमी बसता है और उनके यहां भी. तीनों कर्ज़दार. सुना तो ये भी है कि अर्जेंटीना की माली हालत पिछले दिनों बड़ी ख़राब थी, मेरी तो अभी भी नहीं सुधरी. इंसान बड़ी आसानी से अपनी बिरादरी या बिरादरी-सा ढूंढ लेता है. इस दर्द को अपने एनआरआई साथी अच्छी तरह समझ सकते हैं.

एक कहानी याद आई- गुरू-चेला ठहरे अफ़ीमची. जा पहुंचे किसी शहर में.. शहर उनके लिए नया था सो अफ़ीम कहां मिले ये पता ना था. तभी गुरू ने अपनी घंटाली दिखाई और चेले को कहा- तू राह की दूसरी तरफ़ जाकर खड़ा हो जा, मैं इधर खड़ा होता हूं. गुरू ने पतंग उड़ाने की मुद्रा बनाई और आसमान की ओर देखने लगा. चेले ने काल्पनिक चकरी संभाल ली और ढील देने लगा गुरू को. आसपास के लोग आते-जाते रहे, किसी ने ध्यान न दिया. तभी एक आदमी दोनों के बीच में आया और धागे (जो था ही नहीं) को ऊपर उठाकर आगे बढ़ गया. गुरू-चेले ने उसको दबोचा और पूछ बैठे- बता अफ़ीम कहां मिलेगी? तो ऐसे बनता है काम.

बात हो रही थी ब्राज़ील-अर्जेंटीना की. इन यूरोपीय देशों का सत्यानाश हो. खुद तो १४ टीम मैदान में उतारते हैं और अपने एशिया की चार तो लेटिन अमेरिका की छह. ऊपर से इतने हट्टे-कट्टे और चतुर-सुजान. वैसे तो अफ़्रीकी भी होते हैं इसी डील-डौल के लेकिन बेचारे ग़रीब मुल्क हैं. पेटभर खाना नसीब नहीं. डील-डौल तो भूमध्यरेखा ने नैसर्गिकली दे दिया. हट्टा-कट्टा तो अपना कल्लू रिक्शेवाला भी दिखता है लेकिन बेचारा वही जानता है कि कैसे दो जून की रोटी का जुगाड़ होता है. सत्यानाश हो म्यूनिसिपल कमेटी वालों का जो मेन रोडों पर रिक्शों की आवाजाही पर पाबंदी लगा रहे हैं.

मैं क़िस्सा ए फ़ीफ़ा कप सुना रहा था. ब्राज़ील की हार में डूबी उस रात को देर तक नींद नहीं आई. सुबह देर से सोकर उठा. नित्य कर्मों से निपटने के बाद अख़बार उठाने नीचे दरवाज़े पर आया तो देखा पड़ोसन खुश नज़र आ रही है. पड़ोसन शर्मा आंटी (मुंह पे उनको आंटी कहना ख़तरनाक है) फ़ुटबॉल की अभिजात्य दर्शक हैं. अपने बेटे को तो सारा वक़्त चिल्लाती रहती है- चिंटू !!! डोंट प्ले, इट्स टाइम टू स्टडी. लेकिन इन रातों वे मैचों का भरपूर मज़ा ले रही हैं. आंटी को प्रसन्न देख अपने को उत्सुकता हुई. मैंने पूछ ही लिया, ”आपने रात का मैच नहीं देखा क्या.” जवाब आया- ”गए थे मैं और ये.. ली मेरीडियन में देखा था मैच. मज़ा आ गया.” मैंने पूछा ”इसमें मज़े की बात क्या है जी. अपना ब्राज़ील तो हार गया.” वो बोली- ”तो क्या हुआ. हॉटल में तो खूब एन्जॉय किया ना.” ”लेकिन मैडम शर्मा, अब तो ब्राज़ील नहीं है और अर्जेंटीना भी नहीं. अब काहे का मज़ा. सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया.” आंटी ने कहा- ”पोर्तूगाल है ना. मैंने फिर पूछा- ”क्यों अब इस पुर्तगाल में क्या है अपने जैसा.” आंटी ने कहा- ”क्यों नहीं है. आखिर पुर्तगाल से हमारा पुराना नाता है. वास्कोडिगामा वहीं के तो थे.” मैं समझ गया कि मैडम शर्मा भी रिलेशन मैनेज कर लेती हैं. सुना है कोलकाता वाले दुखी हैं क्योंकि अर्जेंटीना और ब्राज़ील हार गए. लेकिन गोवा वाले इन दिनों पुर्तगाल टीम पर आस लगाए बैठे हैं. पुर्तगाल बुधवार को फ़्रांस से भिड़ेगा. पुर्तगाल हार गया तो गोवा दुखी होगा. लेकिन तब पॉडिचैरी में खुशी का आलम होगा. कभी पॉडिचैरी फ़ांसिसी उपनिवेश था. वाह, क्या संबंध हैं. यही तो गुर होता है संबंध खंगालने का.
सोचो अगर कल इटली फ़ाइनल जीत गया तो कौन झूमेगा. अरे भई.. कॉग्रेसी. वे कहेंगे ”मैडम की होमटीम जीत गई बॉस.”

Next Page »

Blog at WordPress.com. | Theme: Pool by Borja Fernandez.
Entries and comments feeds.