ख़बरदार अगर न्यूज़ चैनल देखा तो…
एक ज़माना था.. उन दिनों अपन ने जवानी की दहलीज़ पर क़दम रखा ही था कि देश के आसमां में सेटेलाइट चैनलों ने अटैक शुरू कर दिया. इन्हीं दिनों अमेरिका इराक़ पर अटैक कर रहा था और अपने इलाक़े में दो-तीन चैनल अटैक कर रहे थे. दक्षिणपंथी इसे सांस्कृतिक आक्रमण की संज्ञा देते हुए इनसे बचने की समझाइश दे रहे थे. देश के चारों महानगरों से हज़ार-डेढ़ हज़ार किलोमीटर दूर अपने कस्बे राजनांदगांव में सबसे पहले एटीएन आया और फिर ज़ी टीवी. दुष्टदर्शन की दुष्टता से परेशां हो चुके लोगों के लिए तो मानो मनोरंजन का पिटारा ही खुल गया. अपन हमेशा ख़बरें रेडियो पर सुनने और उनको प्लास्टिक की तरह चबा-चबाकर बहस करने का चर्वणसुख अपने मित्रों के साथ लेते थे. यही प्लास्टिक अपना ड्रग्स होता था.
मीडिया शहंशाह रूपर्ट मर्डोक के स्टार नेटवर्क के कंधे पर बैठकर ज़ी आया, देशी आइटम लेकर एटीएन आया और इन्हीं के साथ बीबीसी टीवी भी आ गया. अपनी आंखें तो तब भौंचक रह गईं जब पहली बार एक ऐसा चैनल देखा जिसमें गरमागरम सीन दिखाई दिए. नाम था एमटीवी. किसी अंग्रेज़ीदां ने बताया कि ये अमेरिका और पश्चिमी मुल्क़ों में युवाओं के बीच बहुत पसंद किया जाता है. वहां के युवाओं की आवाज़ है. अपन ने सोचा चलो अच्छा है अपनी आवाज़ तो ये बाद में सुनेगा लेकिन इसकी पहले सुन-देख लेते हैं. इसे देखकर अपना ड्रेसिंग सेन्स बढ़ने लगा. सिंगल या टू पीस क्या होता है, किसिंग, स्मूच वगैरह-वगैरह. सैक्स की शब्दावली अपने को यहीं समझाई गई. बडे़-बुज़र्गों की नज़रों से छुप-छुपाकर एमटीवी देख ही लेते थे. फिर चार-पांच साल और बीत गए. स्कूल से निकलकर कॉलेज में आ गए. तब तक पंद्रह-बीस चैनल धमक चुके थे. दक्षिणपंथी सरकार में आ गए और जिन चैनलों को वो सांस्कृतिक आक्रमण कहते थे उसे उन्होंने सांस्कृतिक आदान-प्रदान कहना शुरू कर दिया. चैनल चलते रहे. अपने बड़े-बूढ़ों की सख्त हिदायत होती थी कि ख़बरदार अगर टीबी-सिक्स, फ़ैशन टीवी या एमटीवी देखा. बुज़ुर्ग कहते थे- बेटा न्यूज़ चैनल देखा करो. कुछ सीखों, समझों, ज्ञान बढ़ाओं- वही काम आएगा कैरियर में.
अब ज़माना बदल चुका है. अब एक- दो नहीं तीन दर्ज़न न्यूज़ चैनल हमारे टीवी पर दिखाई देते हैं. मेरी तरह ही अब बड़े-बूढ़े इन चैनलों को देखने की बातें नहीं करते. कर भी नहीं सकते क्योंकि कौन लफ़ड़ा पाले? उन दिनों कोई हॉट सीन(कुनकुना कहूं तो अच्छा होगा) अगर टीवी के परदे पर आ गया सब मुंह फेर लेते थे या थोड़ी देर के लिए किसी दूसरे कमरे में झाकर अपनी झिझक मिटा लिया करते थे. अब हमे एमटीवी या किसी हिन्दी फ़िल्म में आ रहे उन कुनकुने सीनों के साथ तक़लीफ़ नहीं. अब तो न्यूज़ चैनलों के साथ मुश्किल हो जाती है. पता नहीं कौन-सा चैनल कब हॉट एमएमएस दिखा दे. मल्लिका शेरावत को इतनी चिंता नहीं हुई जब उनके छद्म नाम का एमएमएस पोर्न वीडियो के मार्केट में आया. लेकिन चैनलवालों ने अपनी पूरी ताक़त झोंककर पता लगा ही लिया कि वो मल्लिका नहीं बल्कि लैटिन पोर्न स्टार लॉली है. तब तक ज़मानेभर को डीपीएस कॉड के ज़रिए बताया जा चुका था कि हॉट एमएमएस क्या होता है. बड़ी चतुराई से इन्हें ऐसे मोज़ेक करके दिखाया गया कि ना छुपे और ना ही दिखे. दूसरे चैनल ने सुबह-सुबह शेन वार्न की काम-क्रीड़ा की सचित्र ख़बरें चला दीं. करीना-शाहिद के चुंबन के सीन टीवी पर ऐसे चल रहे थे मानो किसी राष्ट्रीय समस्या का ज़िक्र हो रहा हो. हाल ही में राखी सावंत ने ठुमके लगाए और वे इन चैनलों की नज़रे जम गईं. तीन-चार चैनल तो राखी-मीका के बीच छिड़े किसिंग विवाद को सुलझाने के लिए पंचायत बिठाने लगे- मानो ये मामला ना सुलझा तो देश संकट में धंस जाएगा. सुबह से लेकर देर रात तक सबके-सब इसी दिमाग़ी कसरत में जुटे थे कि इस गंभीर समस्या का हल कैसे निकले. सोचता हूं कि जब शेन और उनकी प्रेमिकाओं, करीना-शाहिद को आपत्ति नहीं तो इन लोगों के पेट में क्यूं दर्द होता है. अपने छोटे से शहर में एक इलाक़ा हुआ करता है जहां अक्सर पी-खाकर लोग आपस में भिड़ जाते हैं. दिमाग़दार लोगों की समझाइश होती थी कि उनकी लड़ाई में मत पड़ो. जब उतर जाएगी तो यही लड़ने वाले सुबह साथ प्रेमालाप करते दिखाई देंगे. हैरानगी होती है कि न्यूज़ चैनलवाले इन इलाक़ों में अब अपनी नाक घुसा बैठे हैं.
सोचता हूं कि पिताजी क्या सही कहते थे? चलिए आप न्यूज़ चैनल बंद कीजिए.. वरना आपके बड़े-बुज़ुर्ग कहेंगे – ”ख़बरदार न्यूज़ चैनल देखा तो खैर नहीं.”

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