कीबोर्ड का सिपाही

बर्बाद तमन्ना पे अताब और ज़्यादा

Posted in दिल से by neerajdiwan on August 12, 2005

मजाज़ लखनवीः छोटा-सा परिचय

उत्तरप्रदेश के बाराबांकी ज़िले के रुदौली में १९०९ में जन्में असरार उल हक़ की शुरूआती तालीम लखनऊ और बाद आगरा में हुई. १९३६ में आपने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से बीए किया. ये वो दौर था जब अलीगढ़ यूनीवर्सिटी में प्रगतिशील आंदोलन की शुरूआत हुई थी. मजाज़ खुद इससे प्रभावित थे. आपने ऑल इंडिया रेडियो में भी काम किया लेकिन बाद किन्हीं मतभेदों के चलते इसे छोड़ दिया.

आप प्रगतिशील (प्रोगेसिव मूवमेंट) आंदोलन की पत्रिका नया अदब के संस्थापकों में से एक थे. माना जाता है कि फनी बदायूंनी आपके उस्ताद थे. शायद पढ़नेवालों को पता हो कि मजाज़ आज के दौर के मशहूर गीतकार जावेद अख़्तर के मामा हैं. ये तो पता ही होगा कि जावेद साहब अपने ज़माने के मशहूर गीतकार जां निसार अख़्तर के बेटे हैं. मजाज़ पर वापस लौटें, मजाज़ का पहला ग़ज़ल संग्रह आहंग१९३८ में आया. इसके बाद १९४५ में शब--ताबऔर साज़--नौभी प्रकाशित हुए. मक़बूल नज़मों में आवारा‘, ‘रात और रेलके अलावा अंधेरी रात का मुसाफ़िरभी अहम है. पांच दिसम्बर १९५५ को लखनऊ में मजाज़ इस दुनिया से चल बसे. 

असरार उल हक़ मजाज़की ये ग़ज़ल दिखाई पढ़ी. पेश है-

बर्बाद तमन्ना पे अताब और ज़्यादा

हां मेरी मोहब्बत का जवाब और ज़्यादा। 

रोए ना अभी अहल--नज़र हाल पे मेरे

होना है अभी मुझको ख़राब और ज़्यादा।

आवारा-वा-मजनूं ही पे मौक़ूफ़ नहीं कुछ

मिलने हैं अभी मुझको ख़िताब और ज़्यादा। 

उठेंगे अभी और भी तूफ़ां मेरे दिल से

देखूंगा अभी इश्क़ के ख़्वाब और ज़्यादा। 

टपकेगा लहू और मेरे दीदा--तर से

धधकेंगे दिल--ख़ाना-ख़राब और ज़्यादा। 

मुतरिब--बेबाक कोई और भी नग़मा

साक़ी--फ़याज़ शराब और ज़्यादा।

 (अताब- ग़ुस्सा; मौक़ूफ़-निर्भर; दीदा तर- नम आंखें; मुतरिब- गायक)