बर्बाद तमन्ना पे अताब और ज़्यादा
August 12, 2005 at 7:51 pm | In दिल से | 1 Comment
मजाज़ लखनवीः छोटा-सा परिचय
उत्तरप्रदेश के बाराबांकी ज़िले के रुदौली में १९०९ में जन्में असरार उल हक़ की शुरूआती तालीम लखनऊ और बाद आगरा में हुई. १९३६ में आपने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से बीए किया. ये वो दौर था जब अलीगढ़ यूनीवर्सिटी में प्रगतिशील आंदोलन की शुरूआत हुई थी. मजाज़ खुद इससे प्रभावित थे. आपने ऑल इंडिया रेडियो में भी काम किया लेकिन बाद किन्हीं मतभेदों के चलते इसे छोड़ दिया.
आप प्रगतिशील (प्रोगेसिव मूवमेंट) आंदोलन की पत्रिका नया अदब के संस्थापकों में से एक थे. माना जाता है कि फनी बदायूंनी आपके उस्ताद थे. शायद पढ़नेवालों को पता हो कि मजाज़ आज के दौर के मशहूर गीतकार जावेद अख़्तर के मामा हैं. ये तो पता ही होगा कि जावेद साहब अपने ज़माने के मशहूर गीतकार जां निसार अख़्तर के बेटे हैं. मजाज़ पर वापस लौटें, मजाज़ का पहला ग़ज़ल संग्रह ‘आहंग‘ १९३८ में आया. इसके बाद १९४५ में ‘शब-ए-ताब‘ और ‘साज़-ए-नौ‘ भी प्रकाशित हुए. मक़बूल नज़मों में ‘आवारा‘, ‘रात और रेल‘ के अलावा ‘अंधेरी रात का मुसाफ़िर‘ भी अहम है. पांच दिसम्बर १९५५ को लखनऊ में मजाज़ इस दुनिया से चल बसे.
असरार उल हक़ ‘मजाज़‘ की ये ग़ज़ल दिखाई पढ़ी. पेश है-
बर्बाद तमन्ना पे अताब और ज़्यादा
हां मेरी मोहब्बत का जवाब और ज़्यादा।
रोए ना अभी अहल-ए-नज़र हाल पे मेरे
होना है अभी मुझको ख़राब और ज़्यादा।
आवारा-वा-मजनूं ही पे मौक़ूफ़ नहीं कुछ
मिलने हैं अभी मुझको ख़िताब और ज़्यादा।
उठेंगे अभी और भी तूफ़ां मेरे दिल से
देखूंगा अभी इश्क़ के ख़्वाब और ज़्यादा।
टपकेगा लहू और मेरे दीदा-ए-तर से
धधकेंगे दिल-ए-ख़ाना-ख़राब और ज़्यादा।
ऐ मुतरिब-ए-बेबाक कोई और भी नग़मा
ऐ साक़ी-ए-फ़याज़ शराब और ज़्यादा।
(अताब- ग़ुस्सा; मौक़ूफ़-निर्भर; दीदा ए तर- नम आंखें; मुतरिब- गायक)
क़ातिल का फ़ैसला है ख़ुद क़ातिल के हाथ.
August 10, 2005 at 8:12 pm | In भारतनामा | 1 Commentसोमवार ८ अगस्त को सिख दंगों की जांच के लिए बने नानावटी आयोग की रिपोर्ट देश की संसद के पटल पर रखी गई. ८४ के दंगों में अकेली दिल्ली में तीन हज़ार सरदार मारे गए थे. वेद मारवाह कमेटी से नानावटी आयोग तक कुल नौ आयोग और कमेटियां बन चुके हैं और तीन हज़ार लोगों की हत्या के लिए सिर्फ़ नौ लोगों को अब तक दोषी क़रार दिया गया है. यानी हमारी वो सरकार जो ८४ से लेकर ८९ और फिर ९१ से ९६ तक सत्ता में रही और २००४ में सरदार मनमोहन सिंह की अगुवाई में फिर सत्ता पर काबिज़ होती है उसी सरकार ने इन २१ सालों मे ये जांच करके बताया कि ३ हज़ार लोगों को सिर्फ़ ९ लोगों ने मार दिया वो भी तीन दिनों तक ये लोग दिल्ली की गलियों मे घूम घूम कर सरदारों के सर कलम कर रहे थे और सरकारी अमला नपुंसकों के जैसे हाथ बांधे खडा था.
नानावटी को दंगों में शामिल लोगों के खिलाफ़ कोई सुबूत नहीं मिलते हैं. जिन रसूखदारों पर उंगलियां उठती हैं, जिन पर शक़ ज़ाहिर किया जाता है तो सरकार उन्हें बचा ले जाती है. इन मंत्रियों के ख़िलाफ़ अगर कोई सर उठा ले और गवाही देने आगे आ भी जाय तो धन- बल से उसका मुंह बंद कर दिया जाता है. ठीक वैसे जैसे बेस्ट बेकरी मामले में होता है. कैसे सर्वोच्च न्यायालय की लताड सुनकर भी इन्हें शर्म ना आती हो . कैसे कल तक मोदी को मुस्लिम द्रोही बताने वाली ज़ाहिरा पलटकर तीस्ता सीतलवाड को ही कटघरे में ले आती है. कैसे इन बेशर्मों को ये कहने से भी गुरेज़ नही होता कि गुजरात को हिन्दुत्व की प्रयोगशाला बनाया जा रहा है. ये है हिन्दुत्व की एक सरकार और दूजी है सेक्यूलरिज़्म का दंभ भरने वाली कांग्रेस सरकार ! जिसके बारे में नानावटी आज ये तो कह ही देते हैं कि ८४ के दंगों मे कांग्रेस की स्थानीय इकाइयों का हाथ था. अब इसी नानावटी के ज़िम्मे गुजरात दंगों की जांच भी हो रही है.
ऐसी पार्टी जिसका प्रधानमंत्री (अब दिवंगत) कहता है - जब कोई बडा वृक्ष गिरता है तो आसपास की धरती हिलती ही है ! वो मुख्यमंत्री है जो कहता है कि गुजरात का तांडव गोधरा की परिणीति है – एक्शन का रिएक्शन !! एक लोकतांत्रिक देश जो अपने धर्म निरपेक्ष होने का दावा करता हो जहां की सरकारें दंगों को वोट बटोरने वाला प्रायोजित कार्यक्रम बनाती हों – जहां सरकारी तंत्र षडयंत्र का हिस्सा बन जाता हो – जहां चुन चुनकर मुसलमानों, सिखों और दलितों को निशाना बनाया जाता हो, गवाह रातों-रात बदल दिये जाते हों और आरोपी बा इज़्ज़त बरी हो जाते हों - वहां किस इंसाफ़ की उम्मीद करें ?
इंसाफ़ क्या मिलेगा किसी दादेख़्वा को,
क़ातिल का फ़ैसला है ख़ुद क़ातिल के हाथ।
गधों के बिना दिल्ली में कैसा मज़ा
August 8, 2005 at 4:26 pm | In कटाक्ष | Leave a Commentजब यह ख़बर अपने सामने आई तो भरोसा करना मुश्किल था. दिल्ली में बस एक गधा?
लानत है हम पर.. सैकड़ों बड़े नेताओं से भरी दिल्ली में इस प्रजाति की तादाद में कमी कैसे हो गई. अपन को लगता है कि गधों ने यहां से पलायन कर लिया है. वे शर्मशार है अब इससे ज़्यादा गधाई उनके बस की बात नहीं रही और वे पीछे रह गए. बेचारे गधे हमसे बिछड़ गए. कुछ बरस पहले सुना था कि कौए लुप्त हो रहे हैं. कौओ को गू खाने की आदत होती है. गजक और गू के बीच वे गू को ही वरीयता देते हैं. अब दिल्ली में कौए भी दिखाई नहीं देते. कौअत्व में वे भी पिछड़ गए. उनके हिस्से का गू कोई और खा जाता है. बेचारे वे भी पलायन कर गए.
भागे हुए इन गधों को कम से कम अपने पूर्वज से सबक लेना था. कृष्णचंदर की लिखी ”गधे की आत्मकथा” में पढ़ा था कि कैसे इनके परदादा गधे ने पंडित नेहरू का आशीर्वाद पाकर न सिर्फ़ सियासत में अहम मुकाम हासिल किया बल्कि धनी खानदान की सुंदर सलोनी से ब्याह करने का अवसर भी लपेट लिया. वो गधा महान था.. वो परम गधत्व को उपलब्ध हुआ.
सरकारी रपट बताती है कि दिल्ली में बस एक ही गधा बचा है. मुझे गधों पर कभी भरोसा नही रहा अलबत्ता सरकार पर पूरा भरोसा है. कैसे ना करूं? मैं ही तो सरकार को चुनता हूं. गधों को चुनने का अधिकार हमें संविधान ने थोड़ी दिया है. लिहाज़ा में इस रपट पर भरोसा कर रहा हूं. आप इसे पढ़े और तय करें कि सरकार सही है या गधे.
फिर भी पत्रकारिता की खुजली उठी और मामले की तह में जाने का निश्चय किया. आउटलुक पत्रिका वालों से संपर्क करने के बाद मैंने यह पता लगा ही लिया है कि यह गधा संसद मार्ग के आसपास नज़र आता है. किंतु सिर्फ़ सत्र के दौरान. उन्होंने यह भी बताया कि कुछ गधे और भी हो सकते हैं लेकिन सरकार उनकी गारंटी नहीं ले सकती. क्योंकि वे संसद से दूर रहते हैं. तभी तो सरकारी आदेश पर गधगणना (गधों की जनगणना) करने वालों ने आस-पास में ही गिनती करके खानापूर्ति कर ली और रपट बना दी कि बॉस, बस एक ही गधा बचा है.
मुझे तो इस गधे में आध्यात्मिक अथवा राजनीतिक उत्कर्ष की संभावनाएं दिखाई दे रही हैं. ये मामूली गधा नहीं होगा. मुझे इस गधे का इंटरव्यू लेना चाहिए. किंतु इसके लिए अच्छी खासी रिसर्च करनी होगी. यह गधा है कोई मनुष्य नहीं जिससे लपककर पूछ लूं कि, ”कैसा लग रहा है आपको? फ़िल्म या पॉलिटिक्स में जाने का कोई इरादा है क्या?” वगैरह-वगैरह. आपको इस गधे से कोई गंभीर सवाल पूछने की जिज्ञासा हो तो टिप्पणी दीजिएगा.

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