कादम्बिनी में ब्लॉगजगत (स्कैन्ड पन्ने)

October 3, 2007 at 5:27 pm | In चिट्ठाजगत | 17 Comments

चिट्ठाजगत के तक़रीबन सभी पाठक जानते हैं कि श्री बालेंदु शर्मा दाधीच (प्रभासाक्षी वाले) ने हिंदी ब्लागिंग से संबंधित लेख लिखा है। यह लेख कादम्बिनी के अक्टूबर अंक में प्रकाशित हुआ है। इस लेख में ब्लागिंग के बारे में विस्तार से जानकारी देते हुये हिंदी ब्लागिंग से जुड़े हुये तमाम मुद्दों पर जानकारी देने की कोशिश की गयी है। आप मूल लेख पढ़ चुके हैं। हालांकि मूल लेख से कुछ अंश हटा दिए गए हैं फिर भी कादम्बिनी के इस लेख को लेकर पाठकों में उत्सुकता बनी हुई थी। अब कादम्बिनी में प्रकाशित लेख के सभी आठ पन्ने पढ़िए। (कादम्बिनी से साभार)



काश हम भी क्रिकेट खेलते

September 26, 2007 at 6:33 pm | In खेल-खिलाड़ी | 14 Comments

बीसीसीआई की भारतीय टीम ने आखिरकार सर उठाकर हिन्दुस्तानी सरज़मी पर क़दम रख ही दिए। इससे पहले अपन आते थे पांचवे-छठवे नंबर पर। कभी-कभार किसी स्पर्धा में खींचतानकर दूसरी पायदान पर नज़र आ जाते थे। हमारी टीम इंडिया की औसत उमर महज़ इक्कीस साल है.. जो स्पर्धा में भाग ले रहे किसी भी देश के जवानों से कम थी। नौजवानों के इस देश में अपन खुद को बूढ़े समझने लगे हैं क्योंकि अपन उन विरले लोगों में से हैं जिन्होंने 1983 की 25 जून को हुआ वो मैच देखा था जिसमें कपिल पाजी ने देश को असली विश्वकप लाकर दिया था। अभी जो मिला है वो फटाफट क्रिकेट का कप है जिसे आईसीसी वर्ल्डकप के समानांतर नहीं रखा जा सकता। विश्वकप तो एक ही होता है और इसे ना जीत पाने की टीस लगातार सालती रहती है। इन सबके बावजूद मेरी नज़र में फ़ाइनल की जीत से भी बड़ी जीत सेमीफा़इनल की जीत रही जिसमें हमारे नौजवानों ने अकड़बाज़ कंगारुओं को सबक सीखाया था। पाकिस्तान से तो अपन तीन सालों में कई दफ़ा जीतते रहे हैं। ऑस्ट्रेलियन्स सबसे खड़ूस और अकड़ू प्लेयर माने जाते रहे हैं। क्रिकेटिया तारीख़ में मेरे लिए यही यादगार दिन माना जाएगा जब हमारी टीम ने अपने मज़बूत इरादों से कंगारुओं को घुटने पर टिकने के लिए मजबूर कर दिया था।

श्रीसंत के तेवर
(सौजन्य-एएफ़पी)

आज टीम इंडिया के स्वागत के लिए मुंबई में जो उत्साह दिखा वो अभूतपूर्व था। 1983 में कपिल की टीम जब मुंबई आयी थी तब बीसीसीआई की माली हालत ठीक नहीं कही जा सकती थी। बल्कि यों कहा जाए कि तिरासी की जीत के बाद ही क्रिकेट ने देश में धर्म की शक्ल लेनी शुरू की थी। बाद में क्या हुआ ये सबको पता है। लेकिन चौबीस साल पहले टीम के स्वागत में लता मंगेशकर ने बीसीसीआई के लिए मुफ्त में प्रोग्राम किया था। इस अहसान को क्रिकेट संघ आज तक नहीं भूला है। मुंबई में होने वाले हर मैच में लता जी के लिए दो टिकटें आरक्षित रखने की परंपरा बनी हुई है।

टीम इंडिया के खिलाड़ियों को बीसीसीआई की ओर से अस्सी-अस्सी लाख रुपए मिले हैं। आईसीसी ने विजेता टीम को अलग से दे ही दिए थे। इधर नेताओं को भी जीत से उत्साहित जनता में वोटर दिखाई पड़े और उन राज्यों की सरकारों ने ऐलान कर दिया कि फलां खिलाड़ी को दस लाख, किसी को बीस लाख तो किसी को प्लॉट वगैरह दिया जाएगा। नागरिक अभिनंदन होगा और पहले से करोड़पति बन चुके खिलाड़ियों को लाखों रुपए ऐसे दिए जा रहे हैं मानो बहती गंगा में से एक दो लोटा पानी ही निकालकर देना हो। कोई ये बताए भई कि जो पहले से लखपति-करोड़पति बन चुके हैं उनको ये सरकारें इतने उदार हृदय से पैसे क्यों बांटती हैं। सभी जानते हैं कि कोई भी नेता देशभक्ति, क्रिकेटिया ज्वार और जीत की खुशी के बीच वोट जुगाड़ने का मौक़ा नहीं गवां सकता। राज्य सरकारों ने ‘माले मुफ़्त दिले बेरहम’ की तर्ज पर सौगातों की घोषणा कर दी। इनकी ज़ेबों से कुछ जाने वाला नहीं है। टीम इंडिया के खिलाड़ी यूं भी करोड़ कमा चुके और आने वाले दिनों में ये क्रिकेटिया ज्वार सर चढ़कर बोलेगा सो विज्ञापनों से भी करोड़ों की कमाई होगी। अभी नौजवान है और तक़रीबन हर खिलाड़ी के सामने पांच से दस साल का क्रिकेट करियर बाक़ी पड़ा है।

अमीरों को और अमीर बनाने के इस उदारवादी दौर में सरकारें खेलकूद की अधोसरंचना सुधारने के लिए पैसा क्यों खुलकर खर्च नहीं करतीं? क्या मधु कोड़ा ने कभी खुद हॉकी होस्टल की सुध ली कि किस स्तर का खाना वहां की बच्चियों को मिलता है? अकेले एम्सर्टडम में इतने सिंथैटिक टर्फ़ हैं उतने तो पूरे भारत में ही नहीं हैं। हॉकी से वोटों का जुगाड़ नहीं होता। हां सही है.. नहीं हो सकता। हिन्दी बोलना शर्म की बात होती है और अंग्रेज़ी में आप सभ्य मालूम पड़ते हैं.. उसी तर्ज पर हमारे राष्ट्रीय खेल हॉकी की क्या बिसात? इस लेख को पढ़ने वाले कुछ लोग शायद ही जानते होंगे कि हॉकी टीम का कप्तान कौन है? भारतीय क्रिकेट में एक बार हमने विश्व पदक जीता था लेकिन हॉकी में ओलम्पिक के आठ स्वर्ण पदक हासिल कर चुके हैं। एक बार विश्वकप जीत चुके हैं। चैंपियन्स चैलेंज एक बार, एशिया कप दो बार, एशियाई खेलो में दो बार, सैफ़ खेलों में एक बार हम सिरमौर रह चुके हैं। अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हमारी हॉकी ने अब तक 54 बार हिस्सा लिया है और तमाम षडयंत्रों (नियमों में फेरबदल की सोची-समझी साज़िश) के बावजूद 16 बार हम विजेता बने। गोरी ताक़तों ने हमारी क्लासिकी शैली को मुरमी मैदानों में पलीत कर दिया। पानी से भरी प्लास्टिक की चादर पर गोली की गति से भागती गेंद ने हमारी ड्रिबलिंग को गटक लिया। इन सबके बावजूद अपनी हॉकी दौड़ती जा रही है। हाल ही मे हमने चेन्नई में अपने खिलाड़ियों का शानदार अजेय खेल देखा है।

हॉकी का लेखाजोखा

टीम इंडिया की जीत का श्रेय लेने की दौड़ में जनता का पैसा पानी की तरह बहाना शर्म की बात है वह भी ऐसे दौर में जब खेलों के विकास के लिए सरकारें पैसा देने में आना-कानी करती हों। हॉकी की बात क्यों करूं.. फुटबॉल में, निशानेबाज़ी, शतरंज, बैडमिंटन में हमारे लोगों को क्या सुविधाएं हासिल है? ज्यादा दूर की भी ना सोचूं तो लगता है कि क्रिकेट के खेल में ही सरकारी सुविधाओं का क्या हाल है? क्या इन सरकारों की बदौलत हमें सचिन से लेकर धोनी जैसे खिलाड़ी मिले है? सरकारों के भरोसे तो हमें क्रिकेट में भी कामयाबी नहीं मिली है। आज क्रिकेट की शोहरत का श्रेय बीसीसीआई के व्यापारिक नज़रिए को जाता है। सरकारों के भरोसे क्रिकेट चलता होता तो अपन यहां भी क्वालिफ़ाइंग राउंड में ही बाहर हो जाते।

मेरे खेल पत्रकार दोस्त ने कल ही एक वाक़ये का ज़िक्र किया था। उसने याद किया कि बैंकॉक एशियाड में स्वर्ण पदक जीतने के बाद हमारी हॉकी टीम के स्वागत के लिए एयरपोर्ट पर मुटठीभर लोग जुटे थे। टीम डेढ़ घंटे तक एयरपोर्ट पर इंतज़ार कर रही थी। धनराज पिल्ले की आंखो में आंसू छलक आए थे। इसी पत्रकार मित्र ने छह साल पहले वह ख़बर चलायी थी जिसमें महिला हॉकी की राष्ट्रीय टीम को रेलवे स्टेशन पर बने नल से पानी लेकर ट्रेन के टॉयलेट तक जाते हुए दिखाया गया था।

हम सबके लिए शर्म की एक ख़बर आज देख रहा हूं। हाल ही में एशिया कप जीतने वाली हॉकी टीम के कोच और चार खिलाड़ी कर्नाटक के मुख्यमंत्री आवास के सामने भूख हड़ताल पर बैठने जा रहे हैं।

मैं पूरे परिदृश्य में हमारी क्रिकेट टीम की जीत को छोटा नहीं करना चाहता। बल्कि हमारे खिलाड़ियों ने वो हासिल कर लिया है जिसकी ज़रूरत लंबे अरसे से महसूस की जाती रही है। इसे किलर इंस्टिक्ट कहा जाता है। आरपी सिंह, युवराज और श्रीसंत में मुझे वो जज्‍बा दिखाई दे रहा हैं जहां मरने-मारने (खेल भावना से लें) का हौसला होता है। लेंडू क्लासिकी अंदाज़ के प्लेयर अब इतिहास की बात हो चुके हैं। फटाफट क्रिकेट का स्वरूप लेंडू प्लेयरों को मैदान के बाहर ही खड़ा रखता है। शुक्र है कि हॉकी और क्रिकेट दोनों में हमें धाकड़ खिलाड़ी दिखने लगे हैं। कोफ्त उन नेताओं से हो रही है जो इस पूरे परिदृश्य में एक बार फिर अपनी शातिराना हरकत दिखा चुके हैं। अच्छा होता कि अमीर खिलाड़ियों का केवल सम्मान किया जाता और पैसे उन हॉस्टलों, स्टेडियमों और खिलाड़ियों को दिए जाते, जिन्हें ज़रूरत है। आज वे बच्चे ज़रूर अफ़सोस कर रहे होंगे कि काश उनने भी क्रिकेट ही खेला होता।

अंत में..
कल रात से दो-तीन चैनल नरेंदर मोदी को गरिया रहे हैं। अपने प्रिय सेकुलर एजेंडे के तहत चैनलों ने इस बार पठान बंधुओं को पैसा न दिए जाने के लिए मोदी को निशाने पर ले लिया है। पेपरों ने छापा..फिर कुछ और चैनल गरियाने लगे तो मोदी ने घबराकर पहले से बने एक करोड़ रुपए के सरकारी फंड में से पांच-पांच लाख रुपए देने की घोषणा कर दी। क्यों भई? पहले कर देते तो इत्ता सुनना पड़ता क्या?
चलिए बात पैसों के लेन-देन की चली ही है तो अपन बता दें कि पेशेवर रवैया क्या होता है। लोगबाग अपने को पेशेवर बनो, पेशेवर बनो की सीख देते हैं। बॉसी एटीट्यूड के लिए ऐसा कहना आज की ज़रूरत माना जाता है। बनना मुमकिन हो ना हो पर बोलना ज़रूरी है। तो इधर, भारत में खबरिया चैनलों ने फटाफट क्रिकेट का प्रसारण कर रहे ईएसपीएन चैनल के फुटेज जमकर काटे। जितनी लिमिट है उससे आगे कूद फांदकर एक-एक ओवर तक दिखा गए। कुछ अतिउत्साहित चैनलों ने पारितोषिक वितरण समारोह का सीधा प्रसारण तक कर दिया। इस काम में दूरदर्शन थोड़ा सहमा-सा था। लेकिन मैं सलाम करता हूं सीएनएन को जिसने बाक़ायदा जोहानिसबर्ग से ईएसपीएन के लोगो के बगैर प्लेन फीड लेकर (खरीदकर) अपनी रिपोर्ट बनायी। इसे कहते हैं पेशेवर रवैया !! ठीक है या नहीं? मोदी से पैसा मांगने वालों.. अब फटाफट ईएसपीएन का हिसाब चुकता कर दो।

क्रांति का मैनेजमेंट

September 17, 2007 at 3:48 pm | In कटाक्ष, राजपाट | 8 Comments

मन अत्यंत दुखी है। एक रमेश (लालू जी तो कै रहे थे रमेसवा..)। उसे शर्म नहीं आई? उसने बजाए इस बात के अपना नाम जयराम के जगह जॉयरम करवा लेता… अम्बिका सोनी पर ही सवाल उठा दिया। इसकी घोर निंदा की जानी चाहिए। कहां से कहां पहुंच गया चमचिस्तां हमारा? इसलिए तो इंडिया डेवलप नहीं हो पा रहा है। एक ज़माना था, जब इशारा पाते ही आस्था अभियान शुरू हो जाता था। लोग जेल जाने से लेकर हवाई जहाज़ का अपहरण करके विधायक बनने तक में अपनी शान समझते थे। अब ये गत आ गई है? इस रमेसवा को पता नही ता कि अम्बिका जी कितनी अच्छी इटैलियन जानती हैं। उनसे ज़्यादा कौन जान सकता है कि राम थे या नहीं थे। कोई कन्फ़्यूज़न होने पर सीधे पूछ सकने की पोज़ीशन में भी सबसे अच्छे ढंग से वो ही विराजमान हैं। ये रमेस क्या जाने इटैलियन? फिर भी इतना बोल गया।


हसे सहा नहीं गया ये दुख… हमने अपने एक साथी को बताया। ये साथी भी बहुत ही ग़ज़ब है। पहले आईबी कवर करता थे, फिर कॉग्रेस कवर करने लगे। हमने अपनी व्यथा उसे सुनाई। बोला- नादान हो, शाम को मिलो फिर रात को बताएंगे।

निर्देशानुसार प्रेस क्लब में हम भी पहुंच गए। वहां का माहौल देखकर हमें डर लगने लगा। जिस तरह मुर्ग़े टूट रहे थे, जिस तरह पैग बढ़ते थे और खाली होते थे। उसे देखकर हमें डर ये लगा कि कहीं हमारी भागीदारी की शिनाख़्त परेड पेमेंट काउंटर तक पहुंच गई, तो इस महीने की तनख्वाह तो खामख्वाह हो जाएगी। वहां मौजूद लोगों से यह कहकर हाथ जोड़ लिए कि डॉक्टर ने खाने-पीने को मना कर रखा है… किसी ने ज़्यादा आग्रह भी नहीं किया और हमने हिम्मतपूर्वक हर मोह पर क़ाबू पाए रखा। पहली बार हमें बहुत आसानी से विश्वास हो गया कि गौतम बुद्ध ने एकदम सही बात कही थी। इच्छा ही सारे दुखों का मूल है।

शराब का नशा दो तरीक़े से होता है। एक जब आप इसे पीते हैं और दूसरे तब जब आप इसे सिर्फ़ देखते हैं। हम दूसरे ट्रांस में थे। ऐसे में प्रतिक्रियावादी विचार ज़्यादा कौंधते हैं। क्रांति सस्पेंड हो जाती है। वहीं पहला ट्रांस क्रांतिकारी होता है और जब तक हैंगओवर रहेगा, क्रांति तेरा नाम रहेगा के नारे लगवाता रहता है।

इच्छा और दुखों का विचार हमारी प्रतिक्रियावादी कुठा को गौतम बुद्ध तक तो ले ही जा चुका था। दिमाग़ में ये भी आने लगा कि अगर कल को केंद्र सरकार ने कह दिया कि गौतम बुद्ध कोई थे ही नहीं तो.. फिर हम जैसे लोग क्या करेंगे। ग़म गलत न करने की ग़लती भी गलत नहीं की जा सकेगी। इससे फिर याद आया कि हम आखिर यहां क्यों आए हैं। वैसे ये बहुत मौलिक सवाल है और अपना मानना है कि हर इंसान को सुबह से शाम तक ये सवाल कम से कम दस बार अपने आप से पूछना चाहिए। खैर क्लब यात्रा समाप्त होने की कगार पर थी। आसपास की बत्तियां बुझ चुकी थीं। पेमेंट का झंझट भी नहीं बचा था। एक नेतानुमा पत्रकार, पत्रकारनुमा ठेकेदार और ठेकेदारनुमा अख़बार मालिक, मालिकनुमा नेता जी, जो लगातार इस खिलाई-पिलाई को बाहर से समर्थन देते आ रहे थे। उन्होंने हमारे मन का बोझ बहुत हल्का कर दिया। यहां तक कि वेटर भी बिल लेकर उन्हीं के पास आया था। पता चला कि अपना खुद का अख़बार निकालते हैं, बहादुरगढ़ से, पाक्षिक है।

बाल-बाल जान बचना इसे कहते हैं। इससे हमारा प्रतिक्रियावादी हैंगओवर ट्रांस टू थोड़ा कम हुआ। हम फिर अपने सवालों से लैस हो गए। बॉस, ये रमेश को क्या हो गया? बॉस को कुछ समझ में नहीं आया। बोले- कुछ तो नहीं, एकदम फिट है। अभी शाम को ही मिला था।
नहीं.. नहीं, वो अम्बिका से इस्तीफ़ा मांग रहा है।
है तो… ठीक तो है।
माने अब ये दिन आ गए? – हमने अपनी पीड़ा व्यक्त कर दी।
नहीं भाई.. उससे कहा गया था कि तुम ऐसा कह दो, तो उसने कह दिया।
इससे क्या होगा। हमारी लघुशंकाओं की तो मानो झड़ी लगी हुई थी। प्रेस क्लब का पिछवाड़ा उपयुक्त स्थान भी है। ऑबिवियस है.. मुद्दा कहीं अपोज़ीशन के हाथ न लग पाएं… और सोनियाजी तक कोई बात ना आ पाए।
एक बात और है… इससे ये भी साफ़ हो जाएगा कि कॉग्रेस के अंदर कहीं कोई खिचड़ी पकाने की हिमाकत तो नहीं कर रहा है।
लगा कि ट्रांस वन कभी-कभी ज़्यादा बुलवा देता है।
खिचड़ी…. कैसी खिचड़ी??
अरे पता चल जाएगा ना कि कहीं किसी ने रमेश के सुर में सुर तो नहीं मिलाया। पार्टी सुरक्षित तो है ना।
बड़ी तसल्ली हुई। लगा कि अपने देश का ही नहीं बल्कि इटली भी सुरक्षित हैं।

बॉस तक तक रंग में आ चुके थे। बोले- ये जो पॉलीटिक्स है ना.. अब इसमें बहुत बड़े पैमाने पर मैनेजमेंट घुस चुका है। प्रोफ़ेशनल मैनेजर रखने पड़ते हैं। मोटी तनख्वाह लेते हैं। बल्कि तनख्वाह तो कोई इश्यू ही नहीं होती है।

तनख्वाह का ज़िक्र होते ही प्रतिक्रियावादी हैंगओवर ट्रांस टू फिर शुरू हो चुका था.. हमने कहा- बॉस, अब घर चलें.. घर पर वेट हो रहा है।
हां हां बिल्कुल..।
हमने कहा- आप नहीं जा रहे हैं? एक और लघुशंका की अभिव्यक्ति।
नहीं.. कहीं और जा रहा हूं। कोर मैनेजमेंट वालों ने बुलाया है। पत्रकारों के बिना कैसे मैनेजमेंट करेंगे। बॉस का ड्राइवर आ गया था, ट्रांस वन चरम पर था। हमने देखा मैनेजमेंट का नाम भी बड़ी आसानी से ट्रांस वन के सुरूर की दिशा बदलवा देता है। हम फिर लघुशंका के मूड में आ गए। बॉस की कार उन्हें लेकर चली गई… सवाल चले गए… जवाब मैनेज हो चुके थे… क्रांति शुरू होने वाली है… कोई कह रहा था… अगले साल तक हो ही जाएगी। करात ने ऊपर बात कर ली है।

लेखक- ज्ञानेंद्रनाथ, सीनियर कॉपी एडीटर, इंडिया टीवी

कैमिकल लोचा… हे राम

September 15, 2007 at 6:52 pm | In कटाक्ष | 29 Comments

व्यंग्य रचनाओं में उस्ताद फुरसतिया को उनके जन्मदिवस पर सप्रेम भेंट.

फ़िस से घर की ओर पैदल जाना होता है.. बीस मिनट की दूरी पैदल चलते पूरी हो जाए तो दो फ़ायदे और एक मजबूरी होती है। एकमात्र मजबूरी यह कि अपनी ऑफ़िशियल औकात के लोग अब कारों में चलते हैं और अपने पास पैसा नहीं तो कार नहीं। दो अनॉफ़िशयल फ़ायदे गिनाकर मैं इस इकलौती मजबूरी को ढांक लेता हूं। पहला फ़ायदा यह कि इससे सेहत बनी रहती है और दूसरा गली-कूचों से निकलते हुए मेरे पत्रकारी मन की संवेदनाओं को बड़ी राहत मिलती है। अपने जागरुक और संवेदनशील होने का भ्रम बना रहता है। यहां से गुज़रते हुए अपने ज़मीनी जुड़ाव के सरोकारवादी दंभ में कभी-कभी इतना चूर हो जाता हूं कि नाली से भी जुड़ाव महसूस करने लगता हूं।

फ़िल्मसिटी से वाया रजनीगंधा चौक होते हुए अपने सेक्टर की ओर पैदल जा रहा था। बीच में एक पुल पड़ता है, जिसके किनारे पसरे अंधेरे से पगडंडी पर चलते हुए जाना होता है। कुछ ही दूर चला था कि एक साया मेरी ओर बढ़ता जा रहा था। दस-बारह मीटर की दूरी बची थी कि अचानक से मेरी नज़र उस साये के चेहरे पर पड़ी. वो किसी दिव्य पुरूष का चेहरा था। पास पहुंचते ही इस दिव्य पुरूष के दर्शन मात्र से मेरे हाथ-पैर ढीले हो गए। चेहरे-मोहरे से जाने-पहचाने से लग रहे थे। समझ नहीं आ रहा था कि कौन हो सकता है यह दिव्य पुरूष। सिर के पीछे प्रकाश की छटा बिखरी थी, माथे पर तिलक और कानों में कुंडल, लंबी नाक और बड़ी आंखे.. रंग सांवला। चेहरे-मोहरे से अपने भगवान राम दिख रहे थे। मैने सोचा कि दशहरे के लिए स्पेशल प्रोग्राम कराने कोई स्टूडियो लेकर आया होगा..खाली टाइम में यहीं घूम रहे होंगे रामलीला वाले ये सज्जन.. लेकिन प्रभामंडल देख हैरानी में पड़ चुका था। मुझे वो अलौलिक लग रहे थे। अंधेरे में चेहरा ही नहीं बल्कि पूरा शरीर शनैः शनैः प्रकाशित हो रहा था…मैंने सोचा कि कहीं लगायी तो नहीं…फिर याद आया कि अरे, अभी घर पहुंचा ही नहीं हूं।

Prabhu Raam

भक्त नैतिक रूप से समर्थवान होना चाहिए जो भगवान से आंखे चार कर सके। मेरी क्या बिसात.. मेरे माथे पर पसीना आने लगा। कुछ पल वो देखते रहे, मैं संभला और पूछा.. “आप मुझे देख रहे हैं?” उस सज्जन ने कहा- “हां पुत्र, तुम कहां जा रहे हो? क्या मेरी सहायता करोगे?”

मैंने हिम्मत कर पूछा.. “आ..आ..आप कौन?”
वो बोले- “मैं राम हूं। अयोध्या का राम।”

इतना सुनते ही मैं मूर्छित होने की कगार पर था कि फौरन संभला और सवाल किया, रा.. रा.. राम.. आप… आप प्रभु श्री राम?
उन्होंने कहा, “हां पुत्र… मैं ही राम हूं।”
इतना कहते ही उनका एक हाथ ऊपर उठा..हथेली खुली और उसमें से मेरी तरफ़ आशीर्वाद की किरण लपकी। ठीक वैसे ही जैसे फ़िल्मों में देखा था। धन्य हुआ मैं.. साक्षात प्रभु मेरे सामने थे। अहा.. मर्यादा पुरूषोत्तम राम वो भी अकेले में.. कई आर्शीवाद, वरदान वगैरह मिलेंगे, यह सोचकर खुश हुआ जा रहा था। सारी दुनिया का ऐश्वर्य मेरी आंखों के सामने तैर रहा था।

“पुत्र, मेरी सहायता करो” प्रभु बोले। मैंने कहा, “हे मर्यादा पुरुषोत्तम, हे दयानिधान, सर्वशक्तिशाली.. मैं तो धन्य हूं आपके दर्शन मात्र से.. किंतु प्रभु.. मैं अदना-सा प्राणी आपकी क्या सहायता करूं?”

“पुत्र, बैकुण्ठधाम में मुझे समाचार मिला था कि मेरे होने ना होने की बात कलयुग में उठ रही है। पृथ्वीलोक के किसी राजा ने मेरे अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगाया है।“

नहीं.. नहीं प्रभु.. राजा ने नहीं रानी ने- मैं तत्क्षण बोला। प्रभु फिर बोले, “हां वही पुत्र.. किंतु मैं विचार कर रहा हूं कि मेरे होने नहीं होने का सवाल कैसे उठता है। क्या कलयुग में प्राणियों ने मेरी शिक्षाएं विस्मृत कर दीं? क्या असुरों का वर्चस्व हो गया?”

“नहीं प्रभु, ऐसे असुर तो इधर इंडिया में दिखते नहीं। हां.. बाहर से इम्पोर्ट होते रहते हैं..यहां की सरकार पकड़ भी ले तो घुमा-फिराकर पुष्पक में बिठाकर बाहर तक एक्सपोर्ट कर आ जाती है। बाक़ियों को छुड़ाने के लिए ह्यूमन राइट्स वाले हैं। किंतु रावण के जिन वशंजों को आपने जीवनदान दिया था, उन्हीं की पुश्तों ने यहां पार्टियां ज्वाइन कर ली हैं। वे ही राजपाट संभाल रहे हैं।“

प्रभु बोले- “पुत्र, जो भी हो। चूंकि, सभी युगों में विविध आचार व्यवहार संहिता होती आई है। इसलिए मैं कलयुग में आकर वर्तमान मानदंडों के अनुरूप आचरण करूंगा। नारद मुनि का कहना था कि किसी न्यायालय में मुझे अपने अस्तित्व को प्रमाणित करने के लिए सशरीर उपस्थित होना पड़ेगा। मुझे वहां ले चलो जहां न्यायालय हो। मैं स्वयं उपस्थित होकर अपने होने का प्रमाण दूंगा पुत्र।“
कहां मैं सांसारिक सुखों को भोगने की प्लानिंग कर रहा था और कहां प्रभु मुझे अदालती चक्कर में फंसाने की बात कर रहे थे। मैं भक्तिभाव की तंद्रा से जागा… सांसारिक अवगुणों से ग्रस्त हूं, इसलिए तुरंत भक्तिरस के कैमिकल लोचे से बाहर आ गया। सबसे बड़ा डर मुझे प्रभु के इस तरह एकाएक पदार्पण पर था। तत्क्षण मेरा दिमाग़ चकराया और मुझे सरकारी हलफ़नामे से लेकर चक्काजाम, ख़ून खराबा, कोर्ट कचहरी, संसदीय जूतम-पैजार, रैली-भाषण, दंगे-फ़साद सब याद आने लगे। ओहहह…

“प्रभु… सरकार से बड़ा कोई नहीं है प्रभु.. सरकार ने कह दिया कि आप नहीं थे तो मानने में क्या हर्ज़ है? मान लो प्रभु.. सरकारों से पंगे लेना विवेकपूर्ण कृत्य नहीं है प्रभु। प्लीस, आप इधर कोने में आइए हे पुरुषोत्तम.. कहीं यूपी पुलिस ने देख लिया तो शामत आ जाएगी। आए दिन एनकाउंटर करते रहते हैं। पता नहीं कब रासुका-वासुका, टाडा-मकोका लगाकर अंदर कर दे। सरकार ने कहीं आपको देख लिया तो राष्ट्रद्रोह का आरोपी बनाकर जेल में ठूंस देगी। प्रभु, आप कोई नेता- अभिनेता तो हो नहीं जो ज़मानत-अमानत करवा लेंगे। आप जगत के सामने सशरीर आ गए तो सरकार की विश्वसनीयता का क्या होगा? सरकार की बेइज़्ज़ती हो जाएगी। हे कौशल्यानंदन…. मेरी मानो कलटी मार देते हैं यहां से..।“

प्रभु बोले, “तो चलो पुत्र.. जहां से आए हो वहीं चलते हैं।“
मैं सकपका गया. तुरंत बोला..”नहीं नहीं प्रभु..जहां से आया वहां फिर क्यों ले जा रहे हो। ड्यूटी पूरी कर चुका हूं। आप ही का नाम लेकर ड्यूटी करता हूं। ‘जितनी तनख्वाह उतना काम, रघुपति राघव राजा राम’… उधर फ़िल्मसिटी है। कई चैनलों के स्टूडियों हैं। अपन वहां पहुंच गए और किसी रिपोर्टर ने देख लिया तो पकड़ लेगा। फिर जो दुदर्शा होगी… ओह। सारा दिन आपसे चमत्कारों के खेल कराएंगे, रामानंद सागर की रामायण के डायलॉग बुलवाएंगे। दर्शकों से फ़ोन पर सीधी बात कराएंगे। इतना ड्रामा जब दिनभर में हो जाएगा तो रात होते-होते पुलिस भी बुला लेंगे और सरेंडर का लाइव टेलीकास्ट करेंगे। दिन में चैनल और फिर रातभर पुलिस। बड़ा बुरा होगा प्रभु, भक्त की अर्ज सुनो और निकल चलिए मेरे साथ..।“

इतने अनुरोध पर भी प्रभु नहीं माने.. कहने लगे, “भक्त.. तो आओ इधर चलते हैं..” और आगे बढ़ने लगे।
मैं उनके चरणों में लपका और कहा- “उधर, कहां जाना है प्रभु, आप मर्यादा पुरूषोत्तम राम हैं। उधर मर्यादित आचरण नहीं होता प्रभु। वो रास्ता दिल्ली को जाता है। जैसे आपकी राजधानी अयोध्या थी, इस कलयुग में भारत (अनुच्छेद एक के अनुसार भारत, जो कि इंडिया है) की राजधानी यही दिल्ली नगरिया है। वहां बहुत सारे राजनीतिक दलों के दफ़्तर हैं। प्रभु चुनाव निकट हैं, आप सशरीर हाथ लग गए तो रैलियां-भाषण करा-कराकर थका देंगे। आपके आने से पहले ही रामानंद की रामायण के कई एक्टरों को ये लोग रोड शो करा चुके हैं। एक बार इन पर तरस खाकर इनका काम कर भी दिया तो अगले चार साल तक ये आप पर तरस नहीं खाएंगे। हे अयोध्या नरेश, आप इस कचाइन में कूदने की चेष्टा क्यों कर रहे हैं।“
प्रभु मेरी प्रार्थना मान गए और मेरे साथ चलने लगे। हम कुछ आगे बढ़े.. नाला करीब था। दिल्ली की सारी गंदगी इसी नाले में बहते हुए नोएडा तक आती है। बदबू से नाक सिकोड़ते हुए प्रभु आगे बढ़ते रहे। नाले पर बने पुल को देखते ही प्रभु बोले, “पुत्र, नल और नील की याद आ गई। उन कुशल वानरों ने इससे सहस्त्र गुना चौड़े सागर के दो पाटों पर सेतु बना दिया था।“

मैं नए संकट में ! जैसे-तैसे प्रभु को फ़्लैशबैक में जाने से रोकता हूं, वो बार-बार त्रेतायुग में चले जाते हैं। जिस सवाल से पुरातात्विक विभाग वाले नहीं पार पा सके, उस सवाल को मेरे जैसा अपुरातात्विक महत्व का प्राणी से कैसे हल कर सकता है। मैंने दोबारा कहा “चलिए आप मेरे साथ”..प्रभु मेरे साथ चल पड़े।

एक रिक्शेवाले को रोका। वो रुककर प्रभु को ग़ौर से देखने लगा। इससे पहले कि वो भी जकड़ता, मैंने फ़ौरन रिक्शेवाले को कहा, “क्या देख रहे हो भाई, हम रामलीला वाले हैं। सेक्टर १५ ले चलो, पंद्रह रुपए देंगे।“ प्रभु को बिठाया आगे और मैं पीछे लटक लिया। रिक्शा घर तक पहुंचा.. शुक्र है, किसी ने ज्यादा देखा-देखी नहीं की..मेरे अनुमान से सभी अपने अपने घरों में भारत-पाकिस्तान के बीच ट्वेंटी-ट्वेंटी विश्वकप का मैच देख रहे थे।

घर पहुंचते ही प्रभु को अपने कमरे तक लेकर आया और हाथ पैर धुलाए। घर में सारी चीज़ें अस्त-व्यस्त पड़ी थीं। प्रभु देखकर मुस्कुराए और कहा, ”तुम अभी तक कुंवारे हो।” मैंने कहा, ”प्रभु आपकी कृपा रही तो आगे नहीं रहूंगा।”

प्रभु को शबरी ने जूठे बेर खिलाए थे। बेर मेरे पास कहां से होते.. फ्रिज खोलकर देखा तो कोला, केक और अगड़म-बगड़म पड़े थे। नीचे देखा .. हां सेब दिखा.. मैने प्रभु को प्रस्तुत किया। अयोध्यानंदन सेब खाने लगे। कृपानिधान किसी का निवेदन ठुकराते नहीं.. मैं प्रभु के चरणों में बैठ गया।

टीवी चालू किया तो चैनल खबरियाने लगे। सरेआम मुंह काला करने की खबर, तोड़-फोड़, रिश्वतखोरी, स्टिंग ऑपरेशन, बलात्कार… प्रभु की आंखे छलछला रही थीं… मैंने टीवी बंद कर दिया..
प्रभु की डबडबायी आंखे.. मेरी ओर उठी..और कहा, “पुत्र, तुमने अच्छा किया जो मुझे बता दिया कि इस स्वार्थी संसार में मेरे जीवनचरित का कोई महत्व नहीं रहा। अब मेरी किसी को आवश्यकता नहीं। ऐसे कलयुग से मेरा युग अच्छा था। राक्षस उस काल में भी थे किंतु उस समय सुर और असुर में अंतर देखते ही समझ आ जाता था। क्या करूंगा इन्हें अपने अस्तित्व का प्रमाण देकर। मुझे वापस जाना होगा.. अपने बैकुण्ठधाम में”
प्रभु के वचन सुनकर मेरी आंखों में आंसू उतर आए.. प्रभु सर्वशक्तिशाली थे। आज अपने को अप्रासंगिक मान रहे हैं। मुझे अपने कलयुगी होने पर शर्म आने लगी।

मैंने प्रभु से कहा, “हे मर्यादा पुरुषोत्तम… आप मेरे मन में बस जाओ.. मन में रहो प्रभु, आप खुद यही कहते आए हो कि मैं तो चाहने वाले के दिल में रहता हूं, भक्तों के हृदय में रहता हूं। मेरे मन में ही रहो प्रभु, सरकार का डर भी नहीं होगा। सरकार खुद कह चुकी है कि लोगों के मन में रहते हैं राम। तो क्यों ना संप्रभुत्वसम्पन्न लोकतांत्रिक कल्याणकारी राज्य में संवैधानिक आचरण करते हुए आप मेरी बात मान ही लो.. हे कौशल्यानंदन, मान लो मेरी बात.. मेरे मन में रहो।“

और प्रभु मान गए। मेरे राम मान गए और मेरे मन में समा गए..

राम हृदय में हैं मेरे, राम ही धडकन में हैं
राम मेरी आत्मा में, राम ही जीवन में हैं
राम हर पल में हैं मेरे, राम हैं हर स्वांस में
राम हर आशा में मेरी, राम ही हर आस में
राम ही तो करुणा में हैं, शान्ति में राम है
राम ही हैं एकता में, प्रगति में राम हैं
राम बस भक्तों नहीं, शत्रु के भी चिन्तन में हैं
देख तज के पाप रावण, राम तेरे मन में हैं
राम तेरे मन में हैं, राम मेरे मन में हैं
राम तो घर घर में हैं, राम हर आंगन में हैं
मन से रावण जो निकाले, राम उसके मन में हैं

(अंतिम पंक्तियां जावेद अख़्तर की लिखी हुई हैं. फ़िल्म स्वदेस से साभार)

मॉडल बनी भिखारन.. दर्शक की चिट्ठी

September 3, 2007 at 7:53 pm | In कटाक्ष | 19 Comments

फुल्ली फालतू चैनल के पोस्ट बॉक्स में आई एक चिट्ठी मेरे हाथ लग गई। चिट्ठी एक दर्शक की है.. जिसे यहां जस का तस छापा जा रहा है।

gitanjali

संपादक,
फुल्लीफालतू न्यूज़ चैनल
आडियोकॉन टॉवर.
डंडेवालान, नई दिल्ली

महोदय,
आपके चैनल पर प्रसारित मॉडल गीतांजली की ख़बर देखकर मै द्रवित हुआ जा रहा हूं। यह बालिका कभी मशहूर मॉडल सुष्मिता सेन की सखी हुआ करती थी। पता नहीं सुष्मिता आगे क्यों बढ़ गई और ये क्यों पीछे रह गई। यह सवाल ऐसा है जिसका जवाब ढूंढना राष्ट्रीय महत्व का विषय है। यह जानकर संतोष हुआ कि आप चौथे स्तंभ की भूमिका का सफलतापूर्वक निर्वहन कर रहे हैं। आपके चैनल से पता चला कि यह मॉडल इन दिनों सड़कों पर भीख मांग रही है और इस ख़बर को कवर करने के महायज्ञ में जुटे पत्रकार और कैमरामैनों ने अपने अथक परिश्रम से हम तक यह खबर पहुंचाई, इसके लिए मेरा सहृदय धन्यवाद स्वीकार करें।

महानुभाव, गीतांजली इन दिनों जिस ग़रीबी में अपना जीवन जी रही है, उसे देखकर मेरा मन व्याकुल हुआ जा रहा है। वो मॉडलिंग किया करती थी। आपकी एंकर ने बताया कि पहले वो रैंप पर चला करती थी और अब फुटपाथ पर चला करती है। सच है, फुटपाथ पर चलना अब शर्म की बात है और मैं शर्म से पानी-पानी हो गया हूं क्योंकि मेरे देश की आधुनिक पढ़ी-लिखी नारी का ये हाल है। नशे और अय्याशी में डूबी ज़िंदगी अर्श से फर्श पर आ जाए तो यह समाज के लिए चिंता का विषय है। फुटपाथ पर रहने वाले और भूख से मरने वाले बच्चों और गर्म ग़ोश्त का सामान बन चुकी बच्चियों की खबरें चिंता का विषय क़तई नहीं हो सकती। गीतांजली वहां पहुंचे पराक्रमी पत्रकारों को अंग्रेज़ी में फटकार लगा रही थी। मुझे अंग्रेज़ी समझ तो नहीं आती किंतु चेहरे के भावों को पढ़कर ऐसा लगा मानो कि वह कह रही हो कि, ‘लानत है आप जैसे लोगों पर, देश में महिलाओं की कोई कद्र नहीं है। स्टॉप इट.. यू फूल.. मेरी ज़माने को परवाह नहीं।’ इतने पर भी आपके बहादुर खबरनवीसों ने हार नहीं मानी और खबर को कवर करने का सामाजिक उत्तरदायित्व निभाते रहे।

मुझे याद आता है कि आमिर ख़ान की शादी की खबर कवर करने के लिए आपके कैमरामैनों ने भारी लताड़ सुनने के बाद भी हम तक तस्वीरें पहुंचाई थी। ऐश-अभि के विवाह पर आप लोग बिग बी के घर के बाहर दिन-रात भूखे-प्यासे रहकर भी डटे रहे। आप लोगों ने हाल ही में सलमान के घर के पिछवाड़े तक में छलांग लगाकर हम तक उनकी सलामती का समाचार दिखाया था। सुरक्षाकर्मियों की दुत्कार झेलकर भी आपने हम तक मिनट-मिनट की खबर पहुंचाकर पत्रकारिता का धर्म साहस के साथ निभाया। मैं यह देखकर निश्चिंत हुआ था कि जिस देश में पेड़ पर लटकर खबर शूट करने वाले जुगाड़ू पत्रकार हों, उस देश का भविष्य सुरक्षित हाथों में है। उस देश में कोई परदे में नहीं रह सकता। सारे परदे हटा देना ही मीडिया का उद्देश्य होना चाहिए। चाहे कहीं से भी किसी के भी हटाने पड़ जाएं। कोई संकोच नहीं होना चाहिए। आपकी इसी खुलेपन की नीति का मैं समर्थक हो चुका हूं। मैंने ”जागरुक नहीं जुगाडू” का नारा अपना लिया है।

मैं सलाम करता हूं उन कैमरामैनों को जो सही एंगल के चक्कर में अपनी ही बिरादरी के लोगों की मां-बहनों को बार-बार याद करते हैं। स्टैंड लगाने के लिए होने वाला संघर्ष मुझे स्वाधीनता संघर्ष से भी ज़्यादा महत्व का विषय लगता है।

हे मूर्धन्य, गीतांजली की बदहाली की ख़बर दिल को ठेस पहुंचाती है। यदि पढ़ी-लिखी महिला का ये हाल है तो अनपढ़ी का क्या होता होगा? देश की आधी आबादी की चौथाई के साथ ऐसा हो सकता है तो तीन-चौथाई की फिक्र कौन करेगा। सही है, आपको पहले एक-चौथाई में आने वाली ऐसी प्रतिभाशाली महिलाओं की सुध लेनी चाहिए। बाक़ी के बारे में सरकार ने महिला आयोग बिठाया हुआ है। आपके चैनल से यह जानकर संतोष हुआ कि गीतांजली इन दिनों नशे का सहारा ले रही है। मेरा राष्ट्रीय महिला आयोग से भी अनुरोध है कि वह गीतांजली को तमाम सुविधाएं मुहैया कराए। प्रसन्नता इस बात की है कि आपकी ख़बर का असर तुरंत देखने मिला है। चैनल से ही ज्ञात हुआ कि अमेरिका के एक अप्रवासी भारतीय डॉक्टर ने गीतांजली को मदद का आश्वासन दिया है। ऐसी सूचना मिलने के बाद पेप्सी पी रही गीतांजली कार में बैठकर घर के लिए रवाना हो गयी। बाद में रैंप की अन्य मशहूर मॉडलों ने भी इस मामले में अपनी चिंता जताई जिसे देखकर मुझे संतोष हुआ जा रहा है कि मैं संवेदनशील समाज में जी रहा हूं। मैं इस मशहूर मॉडल को नहीं जानता था- यह मेरी अल्पज्ञता है। अब जान गया हूं, मेरा अनुरोध है कि गीतांजली से ‘सीधी बात’ की जाए। एक अनुरोध और.. इस बार भी हमेशा की तरह ‘सीधी बात’ दिखाते हुए टिकर हटा दिया जाए।

-दर्शक

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