गड्डी जांदी ए छलांगा मार दी

November 20, 2012 1 comment
गड्डी पर वो लिखवाएं-
सरकारी हो ‘ऊपी गोरमेंट’
असरकारी ‘ब्लाक प्रेसीडेंट’
पत्रकार लिखवाएं ‘प्रेस’
डाक्टर का ‘कट-पिट’ निशान
‘पुलिस’ खुदई खुद पहचान
जनता का रसूख कहां है?
रुतबा, तेवर, हक़ूक़ कहां है?
अपनी गड्डी, अपना वतन
जैसी प्लेट वैसा वज़न
प्लेट दिखाएं वो इतराएं
हम माथा समझें, तिलक लगाएं
किसको कोसें, क्या खुद को कोसें
हम तो हैं भगवान भरोसे
सो हमने भी जुगाड़ जमाया
गड्डी में झंडा लगवाया
प्लेट लगा दी ‘जय माता दी’
सारे बोलो जय माता दी!
चीखकर बोलो जय माता दी
गड्डी जांदी ए छलांगा मार दी
मैनूं याद आई मेरे गांव दी!
(उपदेश- सड़क पर चलने-चलाने का शऊर ना हो! क़ानून तोड़ते हों! ऐसे लोग देश चलाने वालों को गलाफाड़ गालियां कैसे देते हैं? अनुशासन के बिना सुराज नहीं!)
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चुनौती संसद को नहीं, मौजूदा राजनीति को

August 25, 2011 1 comment

अन्ना का आंदोलन संसद को चुनौती नहीं बल्कि मौजूदा राजनीति को है। अभी भी चेतने का वक़्त है। राजनीतिज्ञों के लिए। उन पर भरोसा टूटा है। लोकतंत्र में यह ख़तरा बड़ा है। संसद बनाम जनता के विवाद से कहीं ज़्यादा।

-हेमंत शर्मा (लेखक इंडिया टीवी में न्यूज़ डायरेक्टर हैं। आलेख दैनिक भास्कर में 25 अगस्त 2011 गुरूवार को प्रकाशित )

नता बड़ी है या संसद? यह बेहूदा बहस सरकार ने छेड़ी है। अन्ना के आंदोलन को भटकाने के लिए। क़ानून सड़क पर नहीं, संसद में बनता है। अन्ना संसदीय प्रक्रिया की अवमानना कर रहे हैं। अन्ना संसदीय प्रक्रिया को ब्लैकमेल और बुलडोज़ कर रहे हैं। पर इन कुतर्कों की आड़ में अब भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ उठा जनसैलाब नहीं रुकने वाला। अगर इन दावों में सच्चाई थी तो आज सरकार घुटनों के बल बैठकर अन्ना की मांगे मानने पर सहमत क्यों हो रही है। दरअसल, अन्ना के बढ़ते जनसमर्थन से जब डर लगा तो संसद के भी हाथ-पांव फूले और बातचीत शुरु हुई। यानी बात पहले भी हो सकती थी। बहानेबाज़ी के बजाय।

हमारे लोकतंत्र में संप्रभुता जनता के पास है। संसद उससे प्रभुता पाती है। जनता की कोख से ही संसद का जन्म होता है। वही जनता जिसका वोट तंत्र को लोक देता है। पांच साल के लिए संसद चुन क्या लोक अपने हाथ-पांव काट, मुंह पर पट्टी बांध ले? मनमोहन सिंह और कपिल सिब्बल के उक्त विचारों से तो ऐसा ही लगता है। डॉक्टर लोहिया ने कहा था कि ज़िन्दा क़ौमें पांच साल इंतज़ार नहीं करतीं। बाद के समाजवादियों ने उसे और आगे बढ़ा दिया कि ज़िंदा क़ौमें कभी इंतज़ार नहीं करतीं। जे.पी. ने भी वायदे पूरा ना कर पाने पर जब प्रतिनिधि वापस बुलाने की बात की थी तो क्या ये जननेता संसद की अवमानना कर रहे थे? जनआंदोलनों के ये दोनों नेता जनता की सर्वोच्चता मानते थे।

कोई इस सरकार से पूछे कि संसद की गरिमा कौन गिरा रहा है? जन-आंदोलनों से संसद की गरिमा नहीं गिरती। सदन की गरिमा गिरती है ए.राजा, कनिमोझी और कलमाड़ी जैसे सांसदों से। संसद की गरिमा गिरती है इस सूचना से कि 543 सांसदों में से कोई डेढ़ सौ (28 प्रतिशत) आपराधिक पृष्ठभूमि के हैं। सदन की गरिमा गिरती है कैबिनेट प्रणाली के इतर एक सुपर कैबिनेट से जिसे राष्ट्रीय सलाहकार परिषद कहते हैं। संसद की गरिमा गिरती है जब संसदीय फ़ैसले सदन के बाहर 10 जनपथ में लिए जाते हैं। संसद की गरिमा अन्ना नहीं गिरा सकते जिनकी आस्था गांधीवादी मूल्यों में है। सादगी, ईमानदारी और सत्याग्रह जिसके हथियार हैं। वरना है किसी राजनीतिक दल में ताक़त जो समूचे देश में एक आवाज़ पर इतने लोगों को सड़कों पर निकाल दे।

दरअसल अन्ना और उनके आंदोलन को लेकर कांग्रेस और सरकार की नीयत कभी साफ़ नहीं रही। हर बार दोहरे मापदण्ड रहे। दोहरी भाषा थी। नीयत भी अन्ना और उनके समर्थकों को ध्वस्त करने की रही। मौजूदा गतिरोध के मूल में यही वजह थी। पहले कहा गया कि अन्ना का अनशन संविधान विरोधी है। राहुल गांधी भट्टा परसौल में धरना दें तो गांधीवादी। अन्ना संविधान विरोधी। फिर अन्ना और उनकी टीम की छवि को ध्वस्त करने के लिए बेबुनियाद आरोपों का दौर चला। ऐसे आरोप लगे कि संवाद टूट गया। टीम अन्ना का रवैया सख्त हुआ। गतिरोध इस कदर बढ़ा कि बात कौन करे इस बात का संकट था। सारी फ़जीहत कराने के बाद सरकार ने प्रणब मुखर्जी को आगे किया। शायद पहली बार सरकार को समझ आया कि मसला राजनीतिक है। इसका वक़ीलों के ज़रिए क़ानूनी हल नहीं निकाला जा सकता।

यह समझ की दरिद्रता है कि अन्ना के आंदोलन को अवैधानिक और ग़ैरक़ानूनी कहा गया। गांधी के देश में अनशन और सत्याग्रह को ब्लैकमेल कहा गया। अनशन और सत्याग्रह को महात्मा गांधी ने अन्याय के ख़िलाफ़ लड़ने का ब्रह्मास्त्र माना था। आज उन्ही गांधी की पार्टी का सत्याग्रह के ख़िलाफ़ यह रवैया है। वैसे आज की कांग्रेस से गांधी की समझ रखने की अपेक्षा नादानी है। क्योंकि आज के ज़्यादातर कांग्रेसियों की गांधी के प्रति समझ मुन्नाभाई फ़िल्म देखकर बनी है। इसलिए सत्याग्रह और अनशन पर अगर सरकार का रुख़ ऐसा है तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

जिन्हें इस वक्त संसदीय प्रणाली याद आ रही है। वे उस वक्त कहां थे जब लोकपाल बिल की ड्राफ़्टिंग कमेटी में विपक्ष का कोई प्रतिनिधि नहीं था। सिर्फ़ नागरिक जमात और सरकार मिलकर बिल बना रहे थे। अब जब मामला फंसा तो विपक्ष याद आया। सर्वदलीय बैठक बुलाई गई। संसदीय प्रणाली में विपक्ष के बिना भी क़ानून बनता है। उस वक़्त इस प्रणाली का ध्यान क्यों नहीं रहा। उस वक़्त सरकारी अहंकार ने विपक्ष को हाशिए पर डाल क़ानून का मसविदा बना दिया। जिसे बाद में सिविल सोसाइटी ने ख़ारिज किया। तब प्रधानमंत्री ने सर्वदलीय बैठक बुलाई।

आंदोलन के प्रति कांग्रेस की ‘मिसहैंडलिंग’ का नुकसान तो राहुल गांधी को भी हो गया। इसका असर चुनाव में दिखेगा। जिस भ्रष्टाचार को उन्होंने मुद्दा बनाया। ग़ैरकांग्रेसी राज्यों में जाकर ज़ोर-ज़ोर से कहा दिल्ली से जो पैसा चलता है वह ज़िलों तक नहीं पहुंचता। बिचौलिए खा जाते हैं। अन्ना इसी भ्रष्टाचार को मिटाने की बात तो कर रहे थे। पूरे आंदोलन में राहुल गांधी की रहस्यमयी चुप्पी ने राहुल की भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ाई के प्रति संदेह पैदा किया है। उनकी लड़ाई दिखावा नज़र आई। अब वे कैसे इस सवाल को फिर से उठाएंगे। इस घमासान में सरकार का इक़बाल भी गया और पार्टी की साख भी। जनाक्रोश का निशाना अलग बनी। हालांकि पूरी फ़जीहत कराने के बाद सरकार हर सवाल पर घुटने के बल बैठी। सरकार ने वही किया जिसे पहले किया जा सकता था।

न दबाव और आंदोलन दरअसल प्रक्रियागत पेचीदगियां, प्रणाली और क़ायदे-क़ानून नहीं समझते। लोगों के इस सवाल का सरकार के पास कोई जवाब नहीं है कि 62 साल से लोकपाल क्यों अटका रहा। कितनी बार संसद में पेश हुआ। कितनी बार स्थायी समिति में गया। अब सरकार फिर से स्थायी समिति की आड़ में और ज़्यादा समय क्यों चाहती है। आम जनता सिर्फ़ यह समझती है कि जब सांसदों की अपनी तनख़्वाह और सुविधा बढ़ाने की बात होती है तो बिल तीन मिनट में पास हो जाता है लेकिन स्थायी समिति के अध्यक्ष लोकपाल के सवाल पर अभी तीन महीने का वक़्त और चाहते हैं।

आंदोलन की हवा निकालने के लिए षड़यन्त्र चौतरफ़ा हुए। पर हर षड़यन्त्र पर आंदोलन ने और ज़ोर पकड़ा। यही इसकी ताक़त थी। सही है कि लोकतंत्र में अपनी बात रखने की आज़ादी सबको है। लेकिन जब आंदोलन चरम पर हो अन्ना की जान कैसे बचे इसकी चिंता सब कर रहे हों। ऐसे वक्त नागरिक जमात में भेद पैदाकर एक और बिल लेकर कुछ लोग नमूदार हुए। यह कितना औचित्यपूर्ण था। सवाल बड़ा है। टाइमिंग को लेकर। अब तक यह बिल कहां था? मालूम हो कि बिल का प्रारूप देने वाली अरूणा रॉय राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की सदस्य हैं।

अन्ना का यह आंदोलन कोई अचानक फूटा लोगों का ग़ुस्सा नहीं है। लोगों का ग़ुस्सा सालों से सुलग रहा था। गए एक साल में परत दर परत भ्रष्टाचार और घोटालों का जो खुलासा हुआ उसने इस आंदोलन की ज़मीन तैयार की थी। पिछले एक साल में सबसे ईमानदार सरकार के दो लाख करोड़ का घोटाला सामने आया। पहले आदर्श सोसायटी फिर टूजी स्पेक्ट्रम फिर राष्ट्रमंडल खेल, उसके बाद एयर इंडिया में जहाज़ों की ख़रीद का मामला और अब ताज़ा मामला के. जी. बेसिन से भ्रष्टाचार का दानव निकला। अन्ना ने तो सुलग रही आग की सिर्फ़ राख झाड़ी है। लपटें तो पहले से मौजूद थीं। अन्ना का आंदोलन चुनौती संसद को नहीं मौजूदा राजनीति को है। अभी भी चेतने का वक़्त है। राजनीतिज्ञों के लिए। उन पर भरोसा टूटा है। लोकतंत्र में यह ख़तरा बड़ा है। संसद बनाम जनता के विवाद से कहीं ज़्यादा।

मध्यवर्ग की लहरों पर सवार अन्ना

August 21, 2011 2 comments

अमर उजाला में 20 अगस्त को प्रकाशित आलेख (अप्रकाशित हिस्सा भी शामिल-असंपादित)

लेखक- हेमंत शर्मा

रकारी झूठ। तंत्र की बेशर्मी। कांग्रेस की राजनैतिक मूर्खताओं ने अन्ना हजारे को महानायक बना दिया। देखते ही देखते अन्ना भष्ट्राचार के खिलाफ एक ‘ब्राण्ड’ बन गए। ठीक उसी तरह जैसे आज़ादी की लड़ाई में गांधी ‘ब्राण्ड’ बन गए थे। अन्ना अब किसी व्यक्ति का नाम नहीं है। बेदाग़ छवि का नाम है अन्ना। अन्ना प्रतीक हैं भ्रष्ट व्यवस्था से जूझने का। अन्ना नाम बन गया है संकल्प और दृढ़ निश्चय का। इसलिए 16 अगस्त को एक अन्ना के गिरफ़्तार होते ही देशभर में करोड़ों अन्ना सड़क पर हैं। कांग्रेस और सरकार के होश उड़ गए और वह ग़लतियों पर ग़लतियां करती रही। लगा मानो सरकार नहीं है। अन्ना की हर शर्त पर दम तोड़ती नज़र आई सरकार।

केंद्र सरकार ‘अन्ना डिजास्टर’ का प्रबन्धन करने में फेल रही। अन्ना पर लगातार ‘स्टैंड’ बदल कांग्रेस ने जिस बदहवासी और बौखलाहट का परिचय दिया, उससे साफ़ है कांग्रेस, जनता और समाज से कितना कट चुकी है। उसे ज़मीनी असलियत का पता नहीं है। अन्ना के दमन से ऐसा जनसैलाब उमड़ेगा इसका आकलन सरकार और पार्टी दोनों को नहीं था। सरकार जनमानस को समझने के बजाए कुछ वक़ीलों के ज़रिए क़ानूनी इबारतें पढ़ती रही और लोक के आगे तंत्र बौन हो गया।

वाल अब अन्ना या लोकपाल का नहीं है। बात आगे बढ़ चुकी है। इस मुल्क़ में लोकतंत्र रहेगा या नहीं यह बड़ा सवाल खड़ा हुआ है। क्या इस देश में विरोध, धरना प्रदर्शन किसी व्यक्ति या सरकार से पूछकर होगा? और वह भी जिसके खिलाफ़ प्रदर्शन होना है। क्या राहुल गांधी अब मायावती से इजाज़त लेकर उत्तरप्रदेश में अपना धरना प्रदर्शन करेंगे? सरकार की सोच देखिए। राहुल गांधी भट्टा परसौल में धरना प्रदर्शन करें तो गांधीवादी। दिल्ली में अन्ना अनशन करें तो असंवैधानिक। क्योंकि ‘वैदिक हिंसा, हिंसा न भवति’।

रअसल कांग्रेस ने बाबा रामदेव के आंदोलन को जिस शर्मनाक ढंग से कुचला था। उससे केंद्र मैं बैठी सरकार का न सिर्फ़ अहंकार बढ़ा बल्कि दमन की उसकी हिम्मत भी बड़ी। सरकार ने अन्ना के साथ भी वही तरीक़ा अपनाया जो हथकंडे ग़ुलाम भारत में ब्रिटिश हुकूमत अपनाती थी। लेकिन बिना किसी संगठन के अन्ना का आंदोलन गुजरात से गुवाहाटी तक जिस ढंग से फैला उससे सरकार घुटनों के बल बैठ गई। सरकार के खिलाफ़ देशभर में आक्रोश की जो लहर उमड़ी उसने जाति, वर्ग और उम्र की सीमा तोड़ी। अब तक जो लोग यह कहते थे कि भ्रष्टाचार अब इस देश में मुद्दा नहीं रहा। वे ग़लत साबित हुए। शहरी मध्यवर्ग और नौजवानों को लगा कि अन्ना की हार उनकी निजी पराजय है। अगर यह आंदोलन कुचला गया तो राजनेता निरंकुश हो जाएंगे। गांधी के अनशन का हथियार हमेशा के लिए कुंद हो जाएगा। यह मौका कहीं बेकार न चला जाए। इसी डर ने आम लोगों को सरकार के खिलाफ़ अपनी नाराज़गी जताने और सड़क पर आने को मजबूर किया।

विडम्बना देखिए जिन भ्रष्टाचारियों को अन्ना तिहाड़ में बंद देखना चाहते थे सरकार ने उसी जेल में अन्ना को कैद कर लिया। फिर सरकार को 12 घंटे के भीतर घुटने टेकने पड़े। अन्ना की रिहाई के आदेश हुए। अन्ना ने रिहाई से मना किया। सरकार और झुकी। उसने अनशन की भी इजाज़त दे दी। इस घटनाक्रम में सरकार का इक़बाल गया और कांग्रेस पार्टी की साख भी। अन्ना ने कांग्रेस का जो नुकसान अकेले कर दिया वह नुकसान पूरा विपक्ष मिलकर अब तक के कार्यकाल में नहीं कर पाया था।

न्ना ने एक झटके में सरकार का नैतिक बल ख़त्म कर दिया। अन्ना के आंदोलन ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की ईमानदार छवि को ध्वस्त कर दिया। भ्रष्टाचार के खिलाफ़ छिड़ी जंग कांग्रेस के खिलाफ़ जंग में तब्दील हो गई। कांग्रेस अनायास भ्रष्टाचार के समर्थक पाले में खड़ी नज़र आई। पहली दफ़ा अन्ना ने शहरी अराजनैतिक वर्ग को सड़कों पर उतारा। जिस युवावर्ग के ज़रिए कड़ी मेहनत कर राहुल गांधी अपनी राजनीतिक ज़मीन तलाश रहे थे। वह नौजवान एक झटके में इस 74 साल के इस बूढ़े के साथ चला गया। राजनीति मंडल आंदोलन के बाद पहली बार संसद से निकल कर सड़क पर आई। और बिना आपातकाल लगे अन्ना ने समूचे विपक्ष को एकजुट कर दिया वामपंथियों से लेकर भाजपा तक। ये है अन्ना की कामयाबी और कांग्रेस की नाकामी।

पिल सिब्बल, चिदंबरम, दिग्विजय सिंह, मनीष तिवारी हमारे लोकतंत्र के नए जमींदार हैं। ये देश को अपनी जागीर समझते हैं। उनके बयानों की भाषा से तो यही लगता है। यही वजह रही कि इनके बयानों से यह आंदोलन ज्यादा भड़का है। इन्हें नहीं पता कि लोकतंत्र सिर्फ चुनाव नहीं होता। इसमें असहमति और विरोध जताने का अधिकार भी होता है। दिग्विजय सिंह ने अन्ना को सलाह दे डाली कि राजनीति करनी है तो अन्ना सीधे चुनाव क्यों नहीं लड़ते। पर दिग्विजय सिंह यह सुझाव पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को क्यों नहीं देते? कपिल सिब्बल एक ही राग अलापते हैं कैसा क़ानून बने, यह संसद का अधिकार है। कोई दवाब बनाए यह असंवैधानिक है। पर सिब्बल जी जब नेशनल एडवाइजरी काउंसिल की राय को आप क़ानून मानते हैं तो संसद के सामने नागरिक जमात क्यों अपनी राय नहीं रख सकती?

कांग्रेस पार्टी ने जिस ढंग से अन्ना आंदोलन को ‘हैंडल’ किया उस पर सभी को हैरानी है। पहले एक क़दम आगे फिर दो क़दम पीछे। लगातार नासमझी से भरे फ़ैसलों से ही इस सरकार की किरकिरी हुई। हो भी क्यों ना? जब आपके सलाहकार कपिल सिब्बल और चिदंबरम जैसे लोग होंगे तो यही होगा। क्योंकि वे जनमानस को पढ़ने की बजाय क़ानून की इबारत पढ़ते हैं। कांग्रेस के इन रणनीतिकारों को न देश की समझ है न समाज की। ये वक़ील ‘क्लायंट’ को तो समझ सकते हैं पर देश की नब्ज़ का इन्हें अहसास नहीं है। इनका हिन्दुस्तान दूसरा है। ये गांव-देहात नहीं समझते। जिमखाना समझ रखते हैं। जब संतरी मंत्री बनेंगे तो शायद ऐसे संकट खड़े होंगे। यह राजनैतिक नासमझी और प्रबन्धन की विफलता नहीं तो और क्या है? जो भाजपा अब तक विपक्ष के लिए अछूत बनी थी वह सरकार की करतूतों से फिर विपक्षी एकता की धुरी बनने लगी। अन्ना के सवाल पर सीपीआई से लेकर मुलायम सिंह यादव तक भाजपा के साथ खड़े नज़र आए। ऐसी विपक्षी एकता इमरजंसी में हुई थी। सरकार के प्रबंधकों ने बिना इमरजंसी लगाए ऐसी स्थिति फिर से पैदा कर दी।

न्ना के इस आंदोलन से सबसे ज्यादा झटका राहुल गांधी को लगा है। पूरे देश के नौजवानों ने जिस ढंग से अन्ना आंदोलन में हिस्सा लिया, शहरी युवाओं का गुस्सा सड़कों पर फूटा। वे राहुल की राजनीति के लिए ख़तरे के संकेत हैं। राहुल देशभर में घूम घूमकर इसी नौजवान पीढ़ी से सहारे राजनीति पर काबिज़ होना चाहते थे। एक झटके में यह आधार इस बूढ़े के साथ चला गया। क्योंकि भ्रष्टाचार से त्रस्त युवाओं को अन्ना के आंदोलन में एक विश्वास और भरोसा दिखा। जिसे राजनीतिक दलों ने तोड़ा था।

राहुल गांधी की राजनैतिक शैली में कांग्रेस के जो युवा, संगठन और सरकार में आए थे उससे एक ख़ास तरह का शहरी मध्यवर्ग, अंग्रेजी दां, अंग्रेजी परस्त शासक वर्ग उभरा था। ज़्यादातर विदेशों में पढ़े इन युवा नेताओं का समाज बोध अंग्रेज़ियत के गिर्द था। अन्ना के आंदोलन से फिर भारत का वह नौजवान सामने आया है जो अब तक सत्ता परिवर्तन में भागीदार बनता रहा है। देहाती-कस्बाई नौजवान। जेपी आंदोलन के बाद से यह पीढ़ी राजनीति में हाशिए पर थी। अब नौजवानों की इस पीढ़ी ने फिर से अन्ना के जरिए अपनी सक्रियता दिखलाई है। मंडल आंदोलन के बाद पहली बार।

स देश की जनता भ्रष्टाचार का हिसाब लेती है। इतिहास में हमने कई दफ़ा देखा है। चार सौ सांसदो के साथ एक परमप्रतापी प्रधानमंत्री हुए थे। भ्रष्टाचार का आरोप लगा। आंदोलन हुए। चुनाव में जनता ने हिसाब चुकाया। लालू यादव पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे। देखिए बिहार के चुनावों में उनकी क्या हालत हुई। मौजूदा सरकार चारों तरफ़ से भ्रष्टाचार से घिरी है। लोहा गर्म है। राजनीति में अब तक दर्शक दीर्घा में बैठे लोग पहली बार आंदोलन के लिए सड़क पर निकले हैं। केवल मोमबत्ती लेकर सड़क पर जाने से कुछ नहीं होगा। पोलिंग बूथ भी जाना होगा। इसके लिए कमर कसिए।

मूमन हर ज्वलंत मुद्दे पर चुप रहने वाले प्रधानमंत्री ने लाल किले की प्राचीर से मुंह खोला तो कहा कि “अनशन ठीक नहीं है”, “संसदीय लोकतंत्र को चुनौती नहीं दी जा सकती”। तो क्या गांधी के देश में अनशन और सत्याग्रह को असंवैधानिक कहा जाए? प्रधानमंत्री यह भी कह गए कि भ्रष्टाचार से निपटने के लिए हमारे पास कोई जादू की छड़ी नहीं है अजीब बात है। इस देश के प्रधानमंत्री के पास जन आंदोलनों को कुचलने के लिए लाठी है। पर भ्रष्टाचार से निपटने वाली छड़ी नहीं है।

तो प्रधानमंत्री जी, भ्रष्टाचार से निपटने के लिए आपके पास जादू की छड़ी भले न हो। लेकिन इस देश की सर्वशक्तिमान जनता के पास एक छड़ी है। जब वह छड़ी चलती है तो परमप्रतापी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और चार सौ सीटें पाकर ताकतवर प्रधानमंत्री बने राजीव गांधी को कुर्सी से उतार जनता पटरे पर बिठा देती है। आप तो कठपुतली प्रधानमंत्री हैं और अभी सिर्फ़ शुरूआत है।

(हेमंत शर्मा इंडिया टीवी में न्यूज़ डायरेक्टर हैं)

तहख़ाना नंबर B का रहस्य

July 7, 2011 4 comments

(यह घटना पूरी तरह काल्पनिक है)

तहख़ाना ‘बी’ खोला जा रहा है…कमेटी के सातों सदस्य जस्टिस राजन के नेतृत्व में आगे बढ़ रहे हैं…नागद्वार लोहे का बना है…जिसे कुछ मज़दूर तोड़ने वाले हैं…सभी पूजा-यज्ञ आदि हो चुके हैं और नागदेव से परमिशन के बाद ही आख़री चेंबर खोला जाना है।

घंटो की ठोका-ठाकी के बाद दरवाज़ा चियांsss की आवाज़ से खुल रहा है…घुप अंधेरा हैं…कुछ बुज़ुर्ग सदस्यों को ऑक्सीजन का मास्क तक लगाना पड़ा है…कांपते हाथों और उत्सुक निगाहों से लोग खुलते दरवाज़े की ओर देख रहे हैं…चारों तरफ़ पिन ड्रॉप साइलेंस है…चैंबर ‘बी’ का दरवाज़ा खुल चुका है…अंदर घुप अंधेरा है।

कुछ मज़दूर आगे बढ़ते हैं…दरवाज़ा पूरी तरह खोलकर आगे बढ़ते हैं…तभी अंदर से दमदार आवाज़ आई…

“वहीं रुक जाओ”।

धड़ाssम…कमेटी का एक सदस्य वहीं बेहोश होकर गिर जाता है…बाक़ी थर-थराने लगते हैं…हर कोई स्तब्ध है…किसकी थी आवाज़???

राजा मार्तंड जो कमेटी के सदस्य हैं…हिम्मत करते हैं…आगे बढ़ते हैं…वे कहते हैं, “हम हैं महाराज…पद्मनाभ दास…प्रभु पद्मनाभस्वामी के दास”।

सबके चेहरे पर हवाइयां उड़ रही है…जो तहख़ाना 136 सालों से बंद था…वहां कोई कैसे पहले से मौजूद हो सकता है???

अंदर से अबकी बार कोई आवाज़ नहीं आई…कमेटी के दो सदस्य राजा साहब के साथ आगे बढ़ते हैं…तहखाने में वे अंदर आते हैं…अचानक नज़र पड़ती हैं…सबकी आंखें फटी रह जाती हैं।

वे तीनों देखते हैं कि यहां ख़ज़ाना नहीं बल्कि एक बूढ़ा..कृषकाय..साधु तपस्या में लीन बैठा है…आंखें बंद हैं…माथे पर तेज़ है…आभामंडल प्रकाशित है।

हिम्मत करते हुए जस्टिस राजन खामोशी तोड़ते हैं…पूछते हैं…महर्षि आप कौन? जवाब आता है-

“लोकपाल…हम लोकपाल हैं”।

सब कोई खिलखिला कर हंसते हैं…महर्षि ज़ोर से कहते हैं- “हां…हम लोकपाल है…हम क्या हैं..कौन हैं..कहां से हैं..और क्यों हैं..ये सब तुम्हें समझ नहीं आएगा। जो आसानी से तुम्हें समझ आता वही तुम्हें बता दिया कि हम लोकपाल हैं”।

“महर्षि, आप ऐसा क्यों कह रहे हैं…कृपया अपनी पहचान बताएं..क्या आप 136 सालों से यहीं पर हैं?”- राजन पूछते हैं।

“हां, हम यहीं हैं…यहीं थे और आगे भी रहेंगे..आज तुम नहीं आए बल्कि कालचक्र तुम्हें यहां लेकर आया है…तुम्हारा यहां आना समय ने तय किया था”।

“महर्षि, किंतु आपके यहां विराजमान होने का अभिप्राय क्या है? आपको कैसे पता लोकपाल का? आपका इस ख़ज़ाने के साथ कैसा रिश्ता? ये कैसा है रहस्य?”

“राजन, आज पांच छोटे-छोटे तहख़ानों का धन देखकर तुम्हारी आंखे फटी रह गईं…बाहर दुनिया के लोगों की नीयत बदलने लगी…जो लोग कल तक भारत को ग़रीब और दरिद्र मानते थे…उनके सुर भी बदलने लगे”

“राजन, सोचो पद्मनाभस्वामी के इस पवित्र मंदिर में जब इतना धन जमा है तो उस वक़्त का भारत कैसा रहा होगा? कितनी धन-संपदा रही होगी इस भारत में…ये त्रावणकोर रियासत भारत की 600 से ज़्यादा छोटी-बड़ी रियासतों का हिस्सा थी। त्रावणकोर से भी बड़ी और समृद्ध रियासतें थीं..तुम्हें आश्चर्य नहीं होता कि सोमनाथ को लूटने वाला 17 बार लूट गया तब भी वहां का भंडार खाली ना हुआ था।”

“राजन, तुम इस मंदिर की संपदा को राष्ट्रीय संपदा बनाना चाहते हो तो बना लो..लेकिन याद रखो..ये संपदा..यहां जो धन-दौलत तुम देख रहे हो वो पिछले तीन सौ सालों में इकट्ठा हुई है। लेकिन तुम जिसे राष्ट्रीय संपदा कहते हो.. जो सरकारी धन है.. उसका क्या?? बोलो सरकारी धन का क्या? राजा-कलमाड़ी-मारन-देवड़ा सरीखे तुम्हारे भ्रष्ट नेता केवल तीन सालों में तीन लाख करोड़ का घोटाला कर गए और तुम्हें उस लूट की चिंता लेशमात्र भी नहीं?? क्या वो जनता का धन नहीं है???”

“सुनो राजन, यहां तो केवल एक लाख करोड़ है…तुम्हारे नौकरशाहों, नेताओं और उद्योगपतियों ने स्विस बैंकों में लाखों करोड़ रुपए जमा किए हैं..वो भी केवल साठ सालों में। उस काले धन को कैसे सरकारी धन बनाओगे? जनता को वापस लाकर कैसे दोगे?”

“जब तुम उस धन की चिंता नहीं कर सकते तो पद्मनाभस्वामी के धन को हासिल करके तुम्हें क्या मिलेगा? क्या तुम्हें लगता कि तुम्हारे नेता-अफ़सर इस धन को भी लूट-लूटकर नहीं खाएंगे?”

“तुम मेरी बातों को समझ सको तो समझ लो…तुम्हारा भला हो।”

इतना कहते हैं महर्षि ग़ायब हो गए।

वो 3 घंटे..रामलीला मैदान पर सरकार की रावणलीला

June 5, 2011 21 comments

मैं और मेरा मित्र रात सवा बारह बजे रामलीला मैदान पहुंचे। इतनी रात जाने की वजह सिर्फ़ इतनी थी कि मुझे लग रहा था कि स्वामी रामदेव को ग़िरफ़्तार किया जा सकता है। मुझे उस वक़्त यह आभास हो चला था जब शाम को कपिल सिबल की प्रेस कॉफ्रेंस के जवाब में रामदेव ने यह ऐलान कर दिया था कि अब अनशन जारी रहेगा। पिछले चार दिनों में सरकार और रामदेव के बीच जो वार्ताएं चल रही थीं। उस पर पहला ब्रेक सिबल ने लगाया। ज़ाहिर है कि रामदेव को भी अपना जवाबी हमला करना था। लिहाज़ा यह शाम ढलते तक यह हो चुका था कि रामदेव अब अनशन जारी रखेंगे और सरकार चाहेगी कि अब वो बातचीत की बजाय डंडे से काम लेगी। जो कुछ देखा वो आपके सामने है-

12.40 पूरे रामलीला मैदान में सन्नाटा पसरा हुआ था। लोग सो रहे थे। स्वामी रामदेव अपने समर्थकों के साथ मंच पर सो रहे थे।
12.40 मंच के दाहिनी ओर के गेट पर पुलिसबल का आना शुरू हुआ। पुलिसबल की बढ़ती तादाद देखकर सुगबुगाहट बढ़ गई। अधिकारियों से पूछे जाने पर बताया गया कि ज्वाइंट पुलिस कमिनश्नर आने वाले हैं।
12.50 RAF के जवान दाहिने गेट से ही आने शुरू हो गए। लोकल पुलिस ने मेन गेट (जहां से सारा दिन आवाजाही चल रही थी) से सारे मेटल डिटेक्टर डोर हटा दिए। इसी गेट से दिल्ली पुलिस के जवान भी आने लगे।
12.51 दिल्ली पुलिस के आला अधिकारी दाहिने गेट से अंदर आना शुरू हुए। सरगर्मी बढ़ते देख यह आभास होने लगा कि यह सारी कवायद स्वामी रामदेव को हिरासत में लेने के लिए की जा रही है। अब भी ज़्यादातर लोग सोए हुए थे। क्योंकि पुलिस दबे पांव पूरी तैयारी कर रही थी। मीडिया के कैमरे शुरू नहीं हुए थे।
12.55 पुलिस के जवानों ने मंच के करीब आना शुरू किया। समर्थक जागने लगे। जो हालात समझ रहे थे। उन्होंने लोगों को यह कहकर जगाना शुरू किया कि स्वामी जी को गिरफ़्तार किया जा रहा है। धीरे धीरे लोग मंच पर आने लगे। आपाधापी का माहौल हो गया। अब तक दोनों गेट से करीब पांच हज़ार जवान इकट्ठा हो चुके थे.. जिन्होंने पूरे पंडाल को दोनों तरफ़ से घेर लिया था।
12.55 कुछ रामदेव समर्थकों ने पुलिस के आला अधिकारियों को रोककर जानना चाहा कि क्या हो रहा है? क्या किया जाना है? अफ़सर कह रहे थे। योग शिविर की परमिशन रद्द कर दी गई है। और इस पूरे इलाक़े में धारा 144 लगा दी गई है। आप लोग सभी यहां से फ़ौरन चले जाएं। हालांकि पुलिस की ओर धारा 144 लगाए जाने की कोई घोषणा पब्लिकली नहीं की गई।
12.57 पुलिस के जवान मंच की ओर बढ़ रहे थे। अब तक मंच पर सभी जाग चुके थे। बाबा अपने कपड़े संभालकर उठ खड़े हुए। साथ आचार्य बालकृष्ण भी थे। पुलिस ने दाहिनी ओर से मंच पर चढने की कोशिश की। पुलिस के कुछ जवान रामदेव के नज़दीक पहुंच गए। एक जवान ने स्वामी रामदेव की बांह पकड़कर खीचने की कोशिश की जिसका समर्थकों ने विरोध किया.. इस झूमा-झटकी में करीब दस फीट ऊंचे मंच से स्वामी रामदेव गिरते-गिरते बचे..उन्हें मंच से नीचे कूदना पड़ा। अब स्वामी रामदेव को समर्थकों ने घेरकर मंच से नीचे उतारा।
01.10 रामदेव को उनके समर्थकों ने कंधों पर उठा लिया। पुलिस आगे बढ़ने लगी। समर्थकों बीच में दीवार बने रहे। अब तक सिर्फ़ नारेबाज़ी और हो-हल्ला होता रहा।

01.15 स्वामी रामदेव अपने समर्थकों के कंधे पर बैठकर मंच से नीचे तकरीबन पचास मीटर दूर भक्तों के बीच पहुंच चुके थे। उन्हें रिमोट माइक सौंपा गया जिससे वे लगातार अपील करते रहे कि पुलिसवाले समर्थकों से दूर रहे। महिलाएं और बच्चों से दूर रहें। लेकिन पुलिस बल आगे बढ़ता गया।
01.20 RAF के जवान आगे बढ़ने लगे। Tear Gas grenade Gun लेकर जवान मंच के नज़दीक आ गए। स्वामी रामदेव माइक पर बोलते रहे कि पुलिसवाले माता-बहनों से दूर रहे। समर्थकों से ज़बर्दस्ती ना करें। सभी गांधीवादी तरीक़े से पुलिस का विरोध करें।
01.40 स्वामी रामदेव के इर्दगिर्द महिलाओं का घेरा बन चुका था। इसके बाद उनके समर्थक, फिर तीसरा घेरा मीडिया का, अंतिम घेरे में रामदेव समर्थक थे। पुलिसवालों से इनकी भिड़ंत जारी थी। ये लोग हाथ जोड़कर, लेटकर पुलिसवालों से आगे ना जाने की अपील कर रहे थे।
01.45 दूसरी तरफ़ दिल्ली पुलिस बल के जवान लाठियां लेकर पंडाल में घुसने लगे। अब स्वामी रामदेव के साथ ज़बर्दस्ती शुरू हो चुकी थी। रामदेव लोगों के संबोधित करते रहे। उन्हें समर्थक सुरक्षा घेरे में लेकर वापस मंच की ओर बढ़ने लगे। मंच पर मौजूद पुलिसवालों को मिशन के लोगों ने हटाना शुरू किया।
02.00 भारी भीड़ के बीच रामदेव मंच पर पहुंच चुके थे। मंच पर उनके करीब ढाई सौ समर्थक आ चुके थे। नीचे पुलिसवाले समर्थकों को निशाना बनाने लगे। महिलाओं-बुजुर्गों और बच्चे इधर उधर भागने लगे। कई जगह लाइट बंद कर दी गईं थीं।
02.05 RAF के जवान दाहिनी ओर से मंच पर चढ़ने लगे। समर्थकों ने उन्हें ऊपर आने नहीं दिया। माइक बंद कर दिए गए थे। जवानों से समर्थकों की जमकर भिड़ंत हुई। जो सामने आया उसे लाठी पड़ी। जवान मंच पर चढ़ने में कामयाब नहीं हो पाए। हम यहीं से भागे.. खून के छीटें मंच पर टंगी सफेद झालर पर दिखे…
02.10 आंसू गैस का पहला गोल छोड़ा गया.. दूसरा गोल अगले मिनट.. कुल आठ गोले छोड़े गए। मंच के आसपास धुआं फैल गया। एक गोला फटने से मंच पर आग लग गई. इसे तुरंत समर्थकों ने बुझा दिया गया। पास में रखे फायर एस्टिग्यूशर की मदद से।
02.20 मंच पर स्वामी रामदेव अपने समर्थकों के साथ बैठे रहे। जवान मंच पर चढ़ने की असफल कोशिश करते देखे गए। मंच की सीढ़ियों पर ज़बर्दस्त संघर्ष हो रहा था। तभी मंच के पीछे से वाटर कैनन से बौझार शुरू हो गई। लोग इधर-उधर भागने लगे। आंसू गैस का असर बढ़ चला था जो मंच से सौ मीटर दूर तक महसूस किया जा रहा था।
02.25 मंच से नीचे पंडाल में हर तरफ़ पुलिस वाले समर्थकों को उठा-उठाकर यहां से भाग जाने के लिए बोल रहे थे.. इसी बीच कुछ लोगों को स्ट्रेचर पर ले जाते हुए वालयंटर भी देखे गए।
02.30 मंच पर पुलिस-समर्थकों के बीच झड़प..आग.. आंसू गैस.. महिलाओं और बुज़ुर्गों की पिटाई हो रही थी.
02.35 अब तक मंच पूरी तरह तबाह हो चुका था.. लोग भाग चुके थे.. स्वामी रामदेव का कुछ पता ना था।
03.00 रात स्वामी रामदेव के बारे में कई खबरें आईं..स्वामी रामेदव को पुलिस ने ग़िरफ़्तार कर आफ़िसर्स मेस में रखा है..पुलिस ने नोएडा सीमा पर छोड़ दिया..पुलिस रामदेव को मुंबई-जयपुर ले जा सकती है वगैरह। बाद में दिल्ली पुलिस ने कहा कि स्वामी को गिरफ्तार नहीं किया गया।



 अंत में कुछ बातें और साफ़ करना चाहूंगा..

  1. योग शिविर का पंडाल किसी मायने में पंच सितारा सुविधाओं से सुसज्जित नहीं था। केवल पंखे देखकर ऐसा कहना किसी की बौद्धिक विलासिता का ही परिचायक हो सकता है। सच तो यह है कि यह पंडाल वाटर प्रूफ़ तक नहीं था। रात पहुंचने पर हमें यहां भारी गर्मी और उमस लग रही थी।
  2. पुलिस का आधी रात दबे पांव शिविर में आ जाना और स्वामी रामदेव को गिरफ्तार करने के लिए किसी भी हद तक चले जाना साबित करता है कि सरकार इस जमावड़े से बेहद डरी हुई थी।
  3. दिल्ली पुलिस का कहना है कि लाठी चार्ज नहीं किया गया। यह सरासर ग़लत है। लाठी चार्ज हुआ। आरएएफ़ के जवान वहां किसलिए थे? आरएएफ़ के जवानों को हमने लाठियां चलाते देखा। कैमरों की टोली से दूर मंच के दाहिनी ओर से चढ़ रहे आरएएफ़ के जवानों ने समर्थकों पर सबसे पहले लाठियां चलाईं। मैं दौड़कर अपने मोबाइल से वीडियो बनाने के लिए वहां पहुंचा ही था कि एक लाठी मेरी पीठ पर टच की गई। मैंने कहा प्रेस से हूं तो उस जवान ने मुझसे कहा कि आप यहां से जाइए वरना पिटोगे। हमें वहां से हटा दिया गया। मोबाइल कैमरा बंद कर दिया गया। इसके बाद भी समर्थकों के बयान, उनके ज़ख्म और टीवी चैनलों पर चल रही तस्वीरें गवाही देती हैं कि पुलिस की ज़्यादतियां किस हद तक थीं। तस्वीरें देखिए –

सोने की चिड़िया परदेसी पिंजरे में बंद

June 3, 2011 3 comments

कालाधन कितना?

स्वामी रामदेव के मुताबिक़ (स्वाभिमान ट्रस्ट का अध्ययन)

258 लाख करोड़ रुपए विदेश में जमा काला धन

60 लाख करोड़ रुपए देश में जमा काला धन

प्रोफेसर आर. वैद्यनाथन (IIM प्रोफ़ेसर)

Global Financial Integrity Report 2006 के हवाले से

72 लाख 80 हज़ार करोड़ रुपए विदेश में जमा काला धन

Global Financial Integrity Report 2010

22 लाख 50 हज़ार करोड़ रुपए विदेश में जमा कालाधन

8 लाख 18 हज़ार करोड़ रुपए देश में जमा कालाधन

प्रणब मुखर्जी (जनवरी 2011 का बयान)

18 महीनों तक कई देशों से सूचनाएं इकट्ठा करने के बाद सरकार को अब तक भारतीयों के विदेश में जमा कालेधन का पता चला है तो केवल 15 हज़ार करोड़ रुपए का. प्रणब के मुताबिक़ कालेधन को लेकर छपने वाले सारे आंकड़े अप्रमाणित हैं.

चलिए, विस्तार से बातें आगे करेंगे। अभी इतना समझ लें कि बाबा रामदेव जिस 318 (258+60) लाख करोड़ की बात कर रहे हैं- उसका मतलब क्या है। इतनी राशि भारत वापस आ जाए तो क्या से क्या हो सकता है। लोग कहते हैं भारत सोने की चिड़िया बन जाएगा।


क्या होते हैं 318 लाख करोड़ रुपए

31800000,00,00,000 रुपए

यानी 318 पर बारह शून्य लगते हैं. यानी 318 ट्रिलियन रुपए

  1. भारत पर विदेशी कर्ज़ 261 बिलियन डॉलर (रिज़र्व बैंक ने 2010 में बताया है) यानी भारत पर विदेशी कर्ज़ है – 11 हज़ार 745 करोड़ रुपए
  • हम 27 बार विदेशी कर्ज़ चुका सकते हैं
  • देश के हर नागरिक पर लगभग 1,177 रुपए का विदेशी कर्ज है चाहे वह नवजात शिशु ही क्यों न हो जबकि घरेलू कर्ज को जोड लें तो यह रकम हर भारतीय पर लगभग 29,800 रुपए हो जाएगी।
  • यानी हर भारतीय इतना पैसा वापस आने पर देसी-विदेशी कर्ज़ मुक्त हो जाएगा
  1. भारत की जीडीपी 62.1 ट्रिलियन रुपए (62.1 लाख करोड़ रुपए)
  • पांच गुना ज़्यादा शक्तिशाली हो जाएगा अपना बजट.. यानी हम हर योजना पर पांच गुना ज़्यादा खर्च कर सकते हैं.
  1. यूएस की जीडीपी 635 ट्रिलियन रुपए (635 लाख करोड़ रुपए)
  • आधा अमेरिका के बराबर
  1. भारत का रक्षा बजट 1 लाख 70 हज़ार करोड़ रुपए
  • हम 300 साल का रक्षा बजट बना सकते हैं.
  1. नागार्जुन सागर जैसे 24 हज़ार 461 बांध बनाए जा सकते हैं.. देश की हर नहर, हर गांव पानी से लबालब हो सकता है
  1. दिल्ली-मुंबई-चेन्नई और कोलकाता को जोड़ने वाली स्वर्णिम चतुर्भुज सड़क योजना में लगने वाले खर्च की 530 गुना है यह रकम
  1. 30 लाख छोटे हॉस्पिटल (10 करोड़ रुपए की लागत वाले) देशभर में बनाए जा सकते हैं.. साथ ही 30 लाख छोटे स्कूलों (10 लाख रुपए की लागत पर) को बनाया जा सकता है जिससे हमारी साक्षरता दर 65 फ़ीसद से बढ़कर काफ़ी ज़्यादा हो जाएगी
  1. ग्रामीण इलाकों में हर हाथ को काम देने की महत्वाकांक्षी योजना मनरेगा के लिए सालाना बजट 40 हज़ार करोड़ रुपये है.. यानी कालाधन इससे 795 गुना ज़्यादा है.
  1. वित्त वर्ष 2011-12 के लिए सर्वशिक्षा अभियान का बजट सिर्फ 21 हज़ार करोड़ रुपये है.. यानी कालाधन इससे 1514 गुना ज़्यादा है.

(सभी आंकड़े एक डॉलर= 45 रुपए में परिवर्तनीय)

स्विज़रलैंड में 6 फ़ीसद लोग केवल बैंकिंग के कारोबार में लिप्त है। दुनिया के किसी दूसरे हिस्से में इतनी बड़ी तादाद में बैकिंग व्यवसायों से जुड़े लोग नहीं है। यहां तक कि स्विज़रलैण्ड की जीडीपी का लगभग 50 प्रतिशत अंश बैंकिग गतिविधियों से आता है। जो किसी भी अन्य देश से कहीं ज़्यादा है। देश की 75 लाख की आबादी में 5 लाख लोग प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर बैंकिंग के कारोबार से जुड़े हैं। जानकारों का मानना है कि अगर भारत जैसे देशों ने यहां से अपना काला धन निकालना/निकलवाना शुरू किया तो स्विस अर्थव्यवस्था ध्वस्त भी हो सकती है। इसलिए स्विस बैंकिंग सेक्टर और स्विट्जरलैंड सरकार की कोशिश है कि तमाम कानूनी दांव-पेचों और अंतरराष्ट्रीय संधियों का हवाला देकर काले धन के इस कारोबार को बचाया जा सके।

पांच सालों में ही देश से बाहर गए 72 लाख 80 हज़ार करोड़ रुपये काले धन पर अध्ययन करने वाले आईआईएम, बेंगलौर के प्रोफेसर आर. वैद्यनाथन के मुताबिक, ’2002-06 के बीच भारत से हर साल करीब 1,36,466 करोड़ रुपये काले धन के रूप में देश से बाहर गए हैं।

प्रोफेसर आर. वैद्यनाथन ने अपना अध्ययन Global Financial Integrity की 2006 में प्रकाशित रिपोर्ट के आधार पर किया था। यह सारी जानकारी उन्होंने Rediff को 2009 में दी थी। http://election.rediff.com/interview/2009/mar/31/inter-swiss-black-money-can-take-india-to-the-top.htm

किंतु इसके बाद प्रोफ़ेसर देव कर ने 2010 में इसी Global Financial Integrity के लिए एक रिपोर्ट प्रकाशित की है। जिसके मुताबिक़ 60 सालों में 22 लाख 50 हज़ार करोड़ रुपए कालाधन बाहर चला गया। चार साल पहले यह आंकड़ा 72 लाख 80 हज़ार करोड़ आंका गया था। प्रोफ़ेसर देव कर जीएफ़आई से संबंद्ध हैं।http://www.gfip.org/storage/gfip/documents/reports/india/gfi_india.pdf

स्विस बैंकों में कितना धन- प्रामाणिक आंकड़े ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक स्विट्जरलैंड का ताज़ा जीडीपी आंकड़ा करीब $491.92 Billion यानी 22 लाख करोड़ का है। वहां के 300 से ज़्यादा बैंकों में जमा रकम स्विट्जरलैंड की कुल जीडीपी से कहीं ज़्यादा है।

दुनियाभर का एक तिहाई offshore funds (मूल देश के बाहर किसी अन्य देश की बैंक में जमा धन) इस वक़्त स्विस बैंकों में जमा है।

यह रकम 2001 में US$ 2.6 trillion (117 लाख करोड़ रुपए) थी। यह बढ़कर 2007 में US$6.4 trillion (288 लाख करोड़ रुपए) हो गई। अब अनुमान लगाया जा सकता है कि इस वक़्त रकम कमोबेश 360 लाख करोड़ रुपए हो सकती है।

Swiss Accountancy Firm KPMG की रिपोर्ट 2010 के अनुसार बैंकों में जमा आधे से ज़्यादा रकम अवैध [illicit financial transaction] मानी गई है। यह रकम 108 लाख करोड़ रुपए के बराबर है। सनद रहे ये आंकड़ा स्विस फ़र्म का बनाया हुआ है। भारत सरकार की ओर से लेशमात्र का दबाव स्विस बैंकों या वहां की सरकार पर नहीं है। इसके उलट यूरोपीय यूनियन और अमेरिकी सरकार ने कड़ा रुख़ किया हुआ है।

स्वामी रामदेव का दावा है कि भारत का 258 लाख करोड़ रुपए इन दिनों विदेशी बैंकों में जमा है। इसी कालेधन को वापस लाना है।

जानकारों के मुताबिक़ स्विस बैंकों में कालाधन जमा करने वाले देशों में सबसे आगे भारत है

1.         भारत

2.         रशिया

3.         यूके

4.         यूक्रेन

5.         चीन

Wikileaks के मुखिया जूलियन असांज भी मानते हैं कि स्विस बैंकों में जमा कालेधन सबसे ज़्यादा खाते भारतीयों के हैं। हाल ही में स्विस बैंक के पूर्व अधिकारी रूडोल्फ़ एल्मर ने 2000 गोपनीय खातों का ब्यौरा एक सीडी के रूप में जूलियन असांज को सौंपा था।

रुपए को ख़तरा

कोई व्यक्ति रुपया बेचकर स्विस बैंक को मिलियन-बिलियन डॉलर भेजता है। वह फिर स्विस फ़्रैंक्स (स्विस मुद्रा का नाम) खरीदता है। इस तरह लोग रूपये को बेच रहे हैं तथा नतीजा यह हो रहा है कि राष्ट्र की मुद्रा अस्थिर हो रही है। इस प्रकार भ्रष्टाचार में बढ़ोतरी ही हो रही है। इस तरह दोहरा अपराध हो रहा है। रूपए के इस परिवर्तन के चलते भारतीयों के लिए सभी चीज़ें और महंगी होती हैं।

स्विस बैंक क्यों हैं टैक्स हैवन

दुनियाभर में लगभग 70 देश टैक्स हेवन माने जाते हैं। इनमें स्विज़रलैंड, मारीशस, एंटीगुआ-बरबूड़ा, बेहामास, बहरीन, साइप्रस, दुबई, जिब्राल्टर, मलेशिया, मालदीव, माल्टा, न्यूजीलैंड, पनामा, फिलिपींस आदि।


1934 में स्विस पार्लियामेंट ने एक क़ानून बनाया था, जिसने बैंकिंग क्षेत्र में न केवल गोपनीयता को अपनाया था बल्कि इसका उल्लंघन करने को दंडनीय अपराध भी बना दिया। वहां के कानून में ही यह प्रावधान है कि बैंक ग्राहकों और खाताधारकों से जुड़ी जानकारियां गुप्त रहेंगी। इसी कानून का फायदा उठाकर भारत सहित दुनिया के अनेक देशों के भ्रष्ट राजनेता, उद्योगपति और नौकरशाह अपना काला धन स्विस बैंकों में जमा कराकर बेफिक्र हो जाते हैं। विदेशों में जमा दुनिया का एक तिहाई धन स्विस बैंकों में जमा है।

नाम नहीं नंबर वाला खाता

स्विट्जरलैंड में 300 से ज्यादा बैंक और बैंक डीलर हैं, इनमें से ये बैंक ज़्यादा मशहूर हैं: UBS, Bank Sarasin & Cie और Credit Suisse. जिस कालेधन के बारे में हम बातें करते हैं। वे बेनामी नहीं होते हैं। बल्कि इन खातेदारों का नाम जानना इसलिए बेहद मुश्किल होता है क्योंकि ऐसे खातों को Numbered Account कहा जाता है। इन खास खातों की जानकारी बैंक के सामान्य कर्मचारियों को भी नहीं होती है।

Source- http://www.swconsult.ch/cgi-bin/banklist.pl

स्विस बैंकों के साथ समस्या

मार्च 2009 में जब ओबामा प्रशासन ने कालेधन ख़िलाफ़ अभियान छेड़ा था तो स्विस बैंकों ने गोपनीयता का रोना रो दिया था। अमेरिका ने अपने 52,000 खातेदारों के बारे में जानकारी मांगी थी। जवाबन स्विस बैंकों ने ऐसे पैसों को इंश्योरंस कवर से कहीं ज़्यादा गोपनीयता वाले प्रावधानों के बराबर लाकर खड़ा कर दिया। Wikileaks बताता है कि स्विस बैंक टैक्स चोरी पर जारी पेनाल्टी की रकम देने पर तैयार हो सकते हैं लेकिन पूरी रकम सीज़ करने पर राज़ी नहीं हो सकते। यह भी ग़ौरतलब है कि स्विस बैंकों के इस धतकरम को वहां की पार्लियामेंट का भी ज़बर्दस्त सहयोग मिलता रहा है।

मज़े की बात यह है कि अमेरिका जैसा शक्तिशाली देश तो कम से कम स्विस सरकार पर दबाव डालकर यह काम आसान करवा सकता है। क्योंकि ना सिर्फ़ बल के दम पर बल्कि कारोबारी के तौर पर भी अमेरिका में स्विस फ़र्मों की डिपेंडेंसी भारत की तुलना में कहीं ज़्यादा विस्तृत है।

यहां बात सिर्फ़ गोपनीयता की भी नहीं है। स्विस बैंकों के क़ानून के साथ दिक्कत यह है कि वे सूचना का खुलासा करने से पहले जमाकर्ता के अपराध की पड़ताल कर आश्वस्त होना चाहते हैं क्योंकि टैक्स की चोरी भारत-अमेरिका में जुर्म हो लेकिन स्विज़रलैंड में इसे गुनाह नहीं माना जाता है। ऐसे में कालेधन के खातेदार की जानकारी हासिल करने के लिए आपको उस खातेदार के भ्रष्टाचार में लिप्त होने, ड्रग्स के कारोबार में शामिल होने या आतंकी गतिविधियों में शामिल होने वाले मामले चलाने पड़ते हैं। यानी पहले आप इन पर इस तरह के मुक़दमे चलाइए और उसके बाद कोर्ट वारंट लेकर स्विज़रलैंड जाएं। वहां की ज्यूडिशयरी में इसे सौंपे और अपराधी के बारे में बैंकों से जानकारी मांगे। और ऐसा करना किसी सरकार के लिए ज़्यादा मुश्किल होता है।

Sources:

Global Financial Integrity Report on India 2006 & 2010

KPMG report on Swiss capital market

Business Week magazine report: Swiss Banks:ParadiseLost

CIA Factbook

PTI

Times Now interview with Julian Assange

आंखन देखी: पीपली का इंडिया को मैसेज

August 14, 2010 9 comments

तीन दिन से बेचैनी थी इसे लेकर.. आज छुट्टी के रोज़ सुबह उठते ही सोचा कि कैसे भी हो आज यह फ़िल्म देखनी ही है। कहानी लगभग पूरी पता थी। तनवीर साहब के रंगकर्मियों को आए दिन टीवी पर फ़िल्म का प्रोमोशन करते देखा तो यह भी सहज अनुमान था कि स्टोरी ट्रीटमेंट कैसा होगा। फ़िल्म में मीडिया की जमकर खिंचाई हुई है- प्रोमो देखकर पता चल जाता है। तो फिर नया क्या था?

हम सभी जानते हैं कि ‘भारत’ में किसान आत्महत्या करते रहते हैं। कम से कम इतना तो ‘इंडिया’ जानता है। पर क्यों करते हैं यह पते की बात है। इंडिया को यह नहीं पता है। फ़िल्म देखने के बाद पता चलेगा या नहीं? यह भी नहीं पता। पता चल भी गया तो होगा क्या? इसका भी नहीं पता। इंडिया वो समाज है कि जो आज फ़िल्म हिट या फ्लाप कराता है। क्योंकि भारत में सिंगल स्क्रीन थियेटर सिमटता बाज़ार है। फ़िल्म पीपली लाइव इंडिया तक भारत की कहानी पहुंचाती है।

इंडिया में वे रहते हैं जिन्हें भारत के बारे में बातें करना नहीं पसंद नही। ऐसा करने से उनकी लेट नाइट पार्टियों में खलल पड़ता है। आपने गौर किया होगा कि श्याम बेनेगल जैसा आला कलाकार अब तंज़िया तर्ज़ पर फ़िल्में बना रहा है। पिछले दिनों ‘वेलकम टू सज्जनपुर’ और ‘वेलडन अब्बा’ दोनों इसी हंसी-हंसोड़ के बीच गांवों की कहानी कह गईं और हमारी व्यवस्था पर चोट कर गईं। पीपली लाइव भी हास्य की चाशनी में लपेटा हुआ नीम का कड़वा पत्ता है जो आपको हंसाते-गुदगुदाते कुछ सोचने पर मजबूर करती है। मुझे जैसे मीडियाकर्मी को यह फ़िल्म शर्मिंदा करती है। मेरे साथी इसे देखने के बाद हाल से निकलकर किसी से ना कहें कि वे मीडिया में हैं। वरना इंडिया दोबारा हंसेंगा।

सीधा फ़िल्म पर आऊं। इंटरवल तक फ़िल्म ख़ासकर दो पात्रों तक सीमित है। थियेटर कलाकार रघुवीर यादव और ओंकारदास माणिकपुरी। दोनों मंजे अभिनेता है। गांव के हैं और गांववाले का रोल निभाना पड़े तो सब कुछ सहजता से होता है। इंटर के पहले तक फ़िल्म की कहानी बेहद धीमी गति से बढ़ती है। अब तक बैकग्राउंड (पार्श्वध्वनि) नदारद है। पात्रों के मुंह से गालियां सुनकर उन्हें हंसी आ सकती है जिन्हें ऐसा असामान्य लगता है। क्योंकि स्टूपिड, बास्टर्ड में वो मज़ा नहीं है जो मादर… एंड.. में मिलता है। यह भी इंडिया और भारत का फ़र्क है जो गालियों में भी भेद करा देता है।

केंद्रीय पात्र नत्था (ओंकार) और उसके भाई बुधिया (रघुवीर) ने अपनी पुश्तैनी ज़मीन बैंक में गिरवी रखी है। बैंक किस्त नहीं जमा कर सके लिहाज़ा ज़मीन भी हाथ से चले जाना ख़तरा आन पड़ा है। जब ये पता चलता है कि सरकार आत्महत्या करने वाले किसान के परिवार को मुआवजा देती है तो बुधिया चालाकी से नत्था को आत्महत्या करने पर राज़ी कर लेता है। यह ख़बर बेहद छोटे से अख़बार में छपती है जो राष्ट्रीय मीडिया तक पहुंच जाती है। फिर शुरू होता है आत्महत्या करने जा रहे नत्था के पीछे मीडिया का मेला। नेताओं की ओछी राजनीति और सरकारी महकमे की योजनाओं में लिपटी कवायद। बेहद सटीक व्यंग्यात्मक शैली में बुनी हुई कहानी इंटर के बाद तेज़ गति से आगे बढ़ती जाती है और एक एक कर हमारे नेता, मीडिया, सरकारी अफ़सर सबके कपड़े उतरते दिखाई देने लगते हैं। ऐसा दर्शक महसूस करता है। ये अलग बात है कि नेता-मीडिया-अफ़सर ऐसा महसूस नहीं करते। वे सिर्फ़ और सिर्फ़ ऐसे ही रहते हैं मानो वही करना उनका मकसद है, प्रोफ़ेशन है।

फ़िल्म में रघुवीर और ओंकार स्वाभाविक लगे क्योंकि वे अपनी निजी ज़िंदगी में भी उसी पात्र के आसपास ही हैं। टीवी रिपोर्टर बने विशाल शर्मा ने कमाल का अभिनय किया है। वे कुमार दीपक के पात्र को जी रहे थे। नत्था की मौत पर विशाल ज़ोर से चीख-चीखकर कहते हैं- ‘’नत्था की मौत की यह रात भारत पर भारी पड़ेगी।‘’ ज़बर्दस्त अभिनय। मुझे तब भी लगा कि हां इंडिया पर इसका असर नहीं होगा। विशाल ने दीपक चौरसिया की तरह हाव-भाव दिखाए हैं तो नंदिता (मल्लिका शिनाय) कुछ कुछ बरखा दत्त सरीखी लगी हैं। वे टीवी डिबेट के दौरान एग्रीकल्चर मिनिस्टर के साथ अपने साथी एंकर की झड़प को चतुराई से ‘मैनेज’ जो कर लेती हैं।

रेटिंग के चक्कर में जो धमा-चौकड़ी और चौपाल मीडिया सजाता है उसका माखौल इतना उड़ाया गया है कि दर्शक एक ही बात कहेगा कि फ़िल्म मीडिया पर कटाक्ष है। दरअसल, फ़िल्म पूरे सिस्टम पर कटाक्ष है। जहां नहीं हंसना है वहां हंस रहे दर्शकों को देखकर मैं माथे पकड़े बिना नहीं रह सका। क्योंकि संवेदना और सनसनी में जिस फ़र्क को मीडिया (स्वनामधन्य पत्रकार) नहीं समझ सकता वह दर्शक कैसे समझ सकता है? तभी कड़वी बातें कहने के लिए फ़िल्मकारों को कामेडी का सहारा लेना पड़ रहा है। इसी बीच सच्ची पत्रकारिता औऱ पत्रकार की मौत हो जाती है। (यह भी फ़िल्म की कहानी है) जिसे देखकर गहरा आघात लगता है।

कैमरा बोलता है यह फ़िल्म का आखरी सीन कह रहा था। नत्था के ग़ायब होने के बाद मीडिया का रेला गांव से बोरिया-बिस्तर बांधे चला जाता है। सत्ता और विपक्ष के नेताओं के बीच सेटिंग हो जाती है। बुधिया, उसकी अम्मा, नत्था की विधवा और बच्चे अपनी उसी टूटी-फूटी ज़िंदगी को जीने लगते हैं। पर नत्था कहीं खो गया है। कैमरा दौड़ रहा है.. गांव की टूटी दीवारों… पगडंडियों.. सूखे खेतों.. डूबते सूरज.. टूटी सड़कों से.. पक्की सड़कों… फिर लिपे-पुते हाईवे से गुज़रता हुआ महानगर की गगनचुंबी इमारतों.. मेट्रो रेल.. विशाल होर्डिंग्स.. हाई क्लास अपार्टमेंट तक आ पहुंचा है। कहानी जवाब देती है कि नत्था आख़िर है कहां?

‘’भारत में पिछले दस सालों में अस्सी लाख किसानों ने काश्तकारी छोड़ दी है।‘’ यह फ़िल्म की कहानी का आखरी संदेश है। भारत से इंडिया तक का कैमरे का यह सफ़र नत्था का सफर है। इंडिया के इंडीपेंडेंस डे पर आमिर, अनुषा, महमूद और नया थियेटर रंगकर्मियों का ऐसा तोहफ़ा जिसे कबूलने पर मैं तो शर्मिंदा हुआ जाता हूं। कहानी की आत्मा को जीता इसका संगीत है। फ़िल्म की कहानी के साथ चलता इंडियन ओशन का यह गीत जो हर शब्द में कहानी कहता जाता है.. आप सुने.. और हां फ़िल्म ज़रूर देखें.. क्योंकि कहानी कहने वाले हम जैसे लोग ही तो हैं।

देस मेरा रंगरेज़ ये बाबू
घाट घाट यहां घटता जादू
राईं पहाड़ है कंकड़ शंकर
बात है छोटी बड़ा बतंगड़
इंडिया सर ये चीज़ धुरंधर
रंग रंगीला परजा तन्तर
अरे रंग रंगीला परजा तन्तर.. (यहां सुनें)

आप सभी को स्वाधीनता दिवस की शुभकामनाएँ.. आइए अपने अंदर के भारत को जगाए।

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